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पुरस्कार भी हथियार!

पुरस्कार भी हथियार!

पिछली सदी के छठे-सातवें दशक की बात है, फ्रांस के अस्तित्ववादी चिंतक और दार्शनिक ज्यां पाल सात्र्र को नोबल पुरस्कार मिला था और उन्होंने उसे आलू का बोरा कह कर लौटा दिया था। शायद नोबेल पुरस्कार जैसा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार ठुकराने वाले वे इकलौते लेखक थे। ये कहना गलत न होगा कि नोबल पुरस्कार लेकर उन्हें जो प्रसिद्धि नहीं मिलती, उससे कहीं ज्यादा ठुकराकर मिली। भारत में इन दिनों में सात्र्र के 35-40 लघु अवतार पैदा हो गए हैं। उनमें से किसी को नोबल पुरस्कार तो नसीब नहीं हुआ, लेकिन साहित्य अकादमी के पुरस्कार मिले हैं तो वो उसे लौटाकर एक बार फिर प्रसिद्धि बटोर रहे है। जैसा एक लेखक ने लिखा था कि पुरस्कार मिले तो शोहरत मिलती है, लौटाओ तो और ज्यादा शोहरत मिलती है। आजकल ये साहित्यकार ऐसी ही शोहरत का आनंद ले रहे हैं। जिसे लेकर इन दिनों बवाल मचा हुआ है। लोगों को समझ में नहीं आ रहा कि आखिर ऐसी क्या आफत आ पड़ी है कि लेखक अकादमी के पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं। इसको लेकर लेखकों के अलग-अलग तर्क हैं। कोई कहता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा मंडरा रहा है। कोई कहता है देश का बहुलतावाद खतरे में है। कोई मानता है, देश में मोदी सरकार के आने के बाद से असहिष्णुता बढ़ती जा रही है।

साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की शुरुआत हिन्दी के लेखक उदय प्रकाश ने की। उस वक्त मुद्दा था, कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी की संवेदनहीनता। तब यह कहा गया था कि साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने ना तो विरोध जताया और ना ही उन्होंने कोई शोक सभा की। बाद में यह बात भी झूठ साबित हुई, जब यह बात सामने आई की साहित्य अकादमी ने बेंगलुरू में कलबुर्गी की हत्या के बाद एक शोक सभा की थी। जिसमें अकादमी के उपाध्यक्ष कंबार समेत कई स्थानीय लेखक मौजूद थे। इस तरह झूठ से ही पुरस्कार लौटाने के अभियान की शुरूआत हुई। फिर हिन्दी के लेखक अशोक वाजपेयी और नेहरू-गांधी परिवार की रिश्तेदार व अंग्रेजी लेखिका नयनतारा सहगल ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की। अब तक साहित्यकारों पर हो रहे हमलों का प्रतिरोध हो रहा था, लेकिन इन दो लेखकों ने इसमें बहुलतावादी संस्कृति पर खतरे और बढ़ती असहिष्णुता को भी अपने प्रतिरोध से जोड़ दिया। इसके लिए सहगल ने प्रतीक चुना दादरी में हुई घटना को। 29 वर्ष पूर्व दिल्ली में सिख नरसंहार के बाद और 1989 के भागलपुर दंगों से पहले 1986 में यह पुरस्कार उन्होंने लिया था। तब से लेकर अब तक उन्हें यह लौटाने का माकूल अवसर नहीं मिला या वे पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कोई अवसर तलाश रहे थे। अगर वाकई उन्हें सांस्कृतिक विविधता की इतनी चिंता थी तो वे 2015 से बहुत पहले ज्यादा माकुल मौका पुरस्कार वापसी के लिए चुन सकती थीं। खैर, सहगल से यह सिलसिला शुरू हुआ फिर कुछ और नाम जुड़ते गए। इन्होंने दादरी हत्याकांड और गोमांस विवाद पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद तो करीब तीन दर्जन साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी।

जितने लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं उनमें से ज्यादातर वामपंथी हैं और ये पूरा मामला कहीं ना कहीं राजनीति से प्रेरित है। यह कहना है साहित्य अकादमी से सम्मानित बुजुर्ग लेखक गोविंद मिश्र का। दूसरी तरफ यह बात भी सामने आ रही है मोदी सरकार ने जैसे ही फोर्ड फाउंडेशन जैसी संस्थाओं पर नकेल कसना शुरु किया वैसे ही दूसरी तरफ इन लोगों के माथे पर बल पडऩे लगे। एबीपी चैनल पर बहस के दौरान राकेश सिन्हा ने गणेश देवी पर आरोप लगाया था कि वो फोर्ड फाऊंडेशन से पैसे लेते हैं।

सम्मान लौटाने की हवा के पीछे कुछ हत्याएं हैं, ऐसा सम्मान लौटाने वालों की अगुवाई करने वालों का दावा है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में तीन विवेकवादी लेखकों दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्याएं हुई हैं, लेकिन इनमें से किसी हत्या का अपराधी पकड़ा नहीं गया, यहां तक की उसके बारे में कोई सुराग भी नहीं मिला है। इन घटनाओं से लेखकों का मन व्यथित हुआ। लेकिन, लोग यह भी जानना चाहते हैं कि सोनिया-मनमोहन शासन के दौरान हुई तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या पर साहित्यकारों की राय क्या है? क्या वे इसके लिये तत्कालीन केंद्र सरकार को दोषी ठहराते हैं? आपातकालीन प्रताडऩाओं पर जो चुप्पी साधे रही, 1984 के सिख कत्लेआम पर जो न उभरी, हजारों कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या पर जो खामोश रही, उस असंवेदनशीलता को लोग सवालिया नजरों से देख रहे हैं। सामूहिक हत्याकांडों पर चुप्पी और चुन्निदा हत्याओं पर हाहाकार मचाने वाली इस साहित्यिक सोच को भी लोग समझना चाहते हैं।

साहित्यकार सम्मान लौटाएं, यह स्थिति दु:खद है। इसे राष्ट्रीय मुद्दा बताकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह सिर्फ चंद लेखकों से जुड़ी बात नहीं है। लेकिन, इसमें सच्चाई कम है। अभी साहित्य अकादमी में भी इसे बहुत समर्थन हासिल नहीं है। अकादमी के 600 पुरस्कार पाने वाले लेखक जीवित हंै। इनमें से केवल चालीस ने ही इस्तीफा दिया है, मतलब यह की अभी तक दस प्रतिशत लेखकों ने भी पुररस्कार नहीं लौटाया है। दरअसल, बात जितनी बड़ी है, उससे ज्यादा बड़ी करके दिखाई जा रही है।

वैसे जिन लेखकों ने पुरस्कार लौटाएं हैं, उन्होंने इसकी कई वजहें बताई हैं। किसी ने लेखन की स्वतंत्रता पर हमला होने के कारण लौटाया है। किसी ने साम्प्रदायिकता का विरोध करने के कारण लौटाया है। किसी ने अपने संप्रदाय का पक्ष रखने के लिए लौटाया है। कुल मिलाकर यह राजनीति है। जिस घटना और नीति से वर्तमान केन्द्रीय सरकार और केन्द्रीय साहित्य अकादमी का कोई संबंध नहीं है, उसके लिये भी उसे दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है। वर्षों पहले घटित घटनाएं जो किसी और सरकार के शासन में घटी थीं, उनके संदर्भ में आज अचानक सम्मान और पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं। इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि इन लेखकों ने अपनी अंतरात्मा के जागने पर सम्मान लौटाए हैं या किसी राजनीतिक विचारधारा के आदेश पर वे यह करने को बाध्य हुए हैं?

पुरस्कार व सम्मान लौटाना मोदी सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताने का तरीका बन गया है। दरअसल, पुरस्कार लौटाने वालों में बहुत से लेखक थे, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में बयान जारी करके मोदी का विरोध किया था। लेकिन, अब मोदी जब जीत गए तो उन्हें यह बर्दाशत नहीं हो रहा है, इसलिए पुरस्कार लौटा कर वे अपना विरोध मोदी सरकार के प्रति जता रहे हैं। पुरस्कार लौटाना मतभेद को जाहिर करने का एक तरीका बन गया है। एक बार पुरस्कार ले लेने के बाद उसे वर्षों बाद लौटाना, आखिर इस कृत्य की अहमियत ही क्या है? तभी तो वित्तमंत्री अरूण जेटली ने इसे गढ़ा हुआ विरोध कहा।

लेखकों के इस्तीफे पर सबसे सटीक बयान नामवर सिंह का था। उन्होंने कहा है, ‘लेखकों को साहित्य अकादमी के पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिएं, बल्कि उन्हें सत्ता का विरोध करने के और तरीके अपनाने चाहिएं, क्योंकि साहित्य अकादमी लेखकों की अपनी निर्वाचित संस्था है। लेखक अखबारों में सुर्खियां बटोरने के लिये इस तरह पुरस्कार लौटा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौटा रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिएं, क्योंकि अकादमी तो स्वायत्त संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। चूंकि यहां गंभीर प्रश्न यह उठ रहा है कि साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त संस्था से मिला सम्मान वापस करने का पाखंड रचने वाले साहित्यकार उन पुरस्कारों को क्यों नही वापस कर रहे हैं जो बाकायदा उन्हें केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा सीधे दिए गये हैं?

उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अध्यक्ष और चर्चित गीतकार गोपालदास नीरज ने देश में बिगड़ते सौहार्द की आड़ लेकर पुरस्कार लौटाने की होड़ को प्रपंच करार दिया है। उन्होंने कहा कि कुछ साहित्यकार सरकारों के खिलाफ साजिश विरोध कर रहे हैं। उन्हें सरकार की किसी नीति-रीति से विरोध है तो कविता, कहानी, उपन्यास या जिस भी विधा में वो पारंगत हैं, लिखकर रोष प्रकट करें। नीरज ने यह सवाल भी दागा कि साहित्यकार आखिर किस बात पर अकादमी पुरस्कार लौटा रहे हैं? फिर, जवाब भी दिया कि ये सिर्फ पब्लिसिटी स्टंट है। बकौल नीरज, ऐसा करने वाले अधिकांश लेखक वामपंथी विचारधारा के ही हैं। कुछ दूसरे लेखक भी भेड़-चाल में शामिल हो गए हैं।

पुरस्कार लौटाने की बहस पर विवाद के दौरान कई सवाल उठे। लेखक चेतन भगत ने कहा कि लेखक अपना पासपोर्ट और डिग्रियां भी लौटाएं। अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के एक दिन बाद जाने-माने हिंदी लेखक काशीनाथ सिंह ने चेतन भगत को ‘बाजारू’ कहते हुए कहा कि ‘भगत के लिखे हुए साहित्य में गंभीरता की कमी है।’ भगत ने अपने ट्वीट् में पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों पर ‘राजनैतिक रूप से प्रेरित होने’ का आरोप लगाते हुए सवाल किया था कि क्या जो लोग सरकार को पसंद नहीं करते, वह अपना पासपोर्ट और शैक्षणिक डिग्रियां भी लौटाएंगे?

अब पुरस्कार लौटाने का विरोध करने वाले लेखक भी एकजुट होने लगे है। 23 अक्टूबर को जब दिल्ली में साहित्य अकादमी की बैठक हुई तो जहां पुरस्कार लौटाने और इस्तीफा देने वाले लेखकों के पक्ष में कुछ लेखकों ने प्रदर्शन किया, तो वहीं दूसरी तरफ पुरस्कार वापस कर राजनीति करने वाले लेखकों के विरोध में भी लेखकों ने प्रदर्शन किया। ये लेखक भी अब सक्रिय होकर पुरस्कार लौटाने की राजनीति का विरोध करने लगे हैं।

सतीश पेडणेकर

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