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असहमति नहीं, बेईमानी

असहमति नहीं, बेईमानी

क्या एमएम कलबुर्गी पहले बुद्धिजीवी हैं, जिनकी भारत में हत्या हुई? विद्वान कन्नड़ लेखक अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लडऩे के लिये मशहूर थे, जो ज्यादातर हिंदू धर्म में फैला हुआ हैं। वह मूर्ति पूजा के प्रबल विरोधी थे, जिसकी वजह से कई हिंदू कट्टरपंथी उनके विरोध में थे। दुर्भाग्यवश इस साल अगस्त महीने में उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन, वे पहले बुद्धिजीवी नहीं थे, जिनकी हत्या भारत में की गई। दो साल पहले, साल 2013 में एक मराठी बुद्धिजीवी और महाराष्ट्र में काला जादू-टोना और अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले अंधश्रद्र्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेन्द्र दाभोलकर की भी हत्या कर दी गई थी, लेकिन अनके हत्यारे आज भी पुलिस की गिरफ्त से आजाद हैं।

यहां ध्यान देने की बात यह है कि निंदा के लायक ये दोनों हत्याएं दो अलग राज्यों में हुईं और दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में है तो साल 2013 में वह महाराष्ट्र की सत्ता में थी। अब इसमें अंतर केवल यह है कि उस समय केंद्र की सत्ता में कांग्रेस थी, अब कथित तौर पर दक्षिणपंथि (भारतीय जनता पार्टी भी समाजवाद के एक किस्म के बड़े भक्त के रूप में खुद को मानती है) भाजपा की सरकार है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी कर रहे हैं। लेकिन, फिर यह भी याद करने लायक तथ्य है, कि भारत के संघीय ढांचे में शक्ति वितरण के तहत पुलिस मतलब कानून-व्यवस्था, केंद्र सरकार के नहीं बल्कि, राज्य सरकार के नियंत्रण में हैं।

इन बुनियादी तथ्यों के आधार पर हम भारत के साहित्यिक व्यक्तित्व और कलाकारों के वास्तविक पाखंड, बेईमानी और बड़े पैमाने पर दोहरे मापदंडों को समझते हैं, जिनके लिए कलबुर्गी की दुखद हत्या के मद्देनजर प्रदर्शन महज एक वर्ग के बीच में रोने के लिए ही महत्वपूर्ण हैं।

इसे लिखते समय, जिन 40 भारतीय लेखकों ने विभिन्न बिंदुओं पर भारत की सर्वोच्च साहित्यक संस्था, साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त किया था, जिसे स्वायत्त माना हुआ है, लेकिन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित है। उनका यह आरोप मिथ्या है कि अकादमी कलबुर्गी की हत्या पर चुप रहा वह भी ऐसे समय में जब यहां मोदी के राज में स्वतंत्र विचारों के खिलाफ ”असहिष्णुता का वातावरण’’ बढ़ रहा है।

मैं जो यहां कहने जा रहा हूं वह है इन देवियों और सज्जनों और उनकी विचारधारा के बारे में बताना। लेकिन, उसके पहले मुझे ये बताना है कि वे विरोध-प्रदर्शनों में कैसे चयनात्मक बातें करते हैं। दाभोलकर की मौत हो गई, लेकिन इनमें से किसी ने पुरस्कार नहीं लौटाये। किसी लेखक ने निंदा के एक शब्द भी नहीं कहे, जब इस्लामिक विद्वान मौलाना मसूदी (उदार इस्लाम का एक बड़ा समर्थक) और सर्वानंद कौल प्रेमी की बेरहमी से कश्मीर में कट्टरपंथियों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई। किसी की कभी भी दिल्ली की तत्कालीन कांग्रेस सरकार और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की हिम्मत नहीं हुई, जब भारत में शरण ली हुई बांग्लादेशी उपन्यासकार तसलीमा नसरीन को नीच, कमीना, कहा गया और ललकारते हुए शिकार करने की धमकी दी गई। इनमें से किसी ने भी कश्मीर में हिंदुओं की जातीय सफाई पर कभी आंसू बहाए? उनमें से कोई भी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सम्मान लेने से कभी नहीं झिझका, जबकि साल 1984 में देश भर में सबसे भयानक, सिख विरोधी दंगे हुए और यकीनन कांग्रेस की सरकार इसे रोकने की बजाय मूकदर्शक ही बनी रही।

14-11-2015

अब हम हिंदी लेखक उदय प्रकाश के बारे में बात शुरु करते हैं। वे पहले लेखक थे जिन्होंने अकादमी की ”चुप्पी’’ पर पिछले महीने पुरस्कार वापस कर दिया था। हिंदी लेखक उदय प्रकाश का दावा है कि उनका दृष्टिकोण- धर्मनिरपेक्ष, उदार, अल्पसंख्यक और दलित समर्थक है।’’ उन्होंने भारत के वामपंथी बहुल जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और कुछ समय के लिए पढ़ाया भी। 1990 के दशक में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो उन्हें कृषि मंत्रालय द्वारा भारतीय कृषि इतिहास पर 15 एपिसोड की टीवी डॉक्यूमेंट्री कृषि कथा के अनुसंधान, लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी मिली। इसे 1997 में प्रसारित किया गया था। प्रकाश को साल 2010 में (जब कांग्रेस का शासन था) लघु कहानियों के उनके संग्रह, मोहन दास के लिए हिंदी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज गया।

हमारे पास के. सच्चिदानंदन भी हैं, जिन्होंने मलयालम और अंग्रेजी में कविताएं लिखने के साथ ही समीक्षा लेखन का कार्य किया है। वह साहित्य अकादमी के पूर्व सचिव, जनरल काउंसिल के कार्यकारी बोर्ड और अकादमी की वित्तीय समिति में सेवारत थे। जिसे उन्होंने विरोध प्रदर्शन की चल रही इस श्रृंखला के पहले ही छोड़ दिया। उन्होंने खुद के बद्धिजीवी होने का दावा किया और कहा, ”धर्मनिरपेक्षता और जाति विरोध समर्थित विचारों का समर्थन करते हैं और अन्य कारण जिनमें पर्यावरण और मानव अधिकार जैसे विषय शामिल हैं’’।

अब बात करते हैं पूर्व नौकरशाह, अशोक वाजपेयी की, जो नौकरशाही में अपनी श्रेष्ठता के लिए नहीं जाने जाते, बल्कि दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे अर्जुन सिंह की अपनी लेखनी के माध्यम से गुणगान करने वाले दरबारी के रुप में जाने जाते हैं। वास्तव में अशोक वाजपेयी कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में एक कुलपति बन गये थे। वे मध्य प्रदेश में भारत भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के ट्रस्टी, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के सदस्य, संगीत नाटक अकादमी के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य, और ललित कला अकादमी, भारतीय राष्ट्रीय अकादमी के अध्यक्ष रह चुके हैं।

अब बात हाई प्रोफाइल नयनतारा सहगल की, जो स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भतीजी हैं, जिन्होंने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस कर दिया है, जिसे उन्होंने अपने राजनीतिक उपन्यास रिच लाईक अस के लिए 1986 में जीता था। लेकिन यहां इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता की उनकी अंतरात्मा ने उन्हें 1984 के देशव्यापी सिक्ख विरोधी दंगों के बाद पुरस्कार लेने से नहीं रोका और जब देश में कांग्रेस पार्टी का राज था। मैं उनकी कही गई बातों में से, बेहद महत्वपूर्ण हिस्से को दुबारा आपके सामने पेश कर रहा हूं, जिसे नयनतारा सहगल ने एक अखबार को दिये इंटरव्यू में ये बताया था कि उन्होंने पुरस्कार क्यों लौटाया। उन्होंने कहा था कि ”हमें भारत के विचार को बचाने की जरूरत है। भारत में फिर से विश्वास और प्रशंसा के वातावरण की जरूरत है। दुर्भाग्य से, आज हम उन लोगों के द्वारा शासित हैं, जिनकी मानसिकता अंधकार युग की हैं। हमें जिन लोगों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है, वे मन और विचारधारा से फासिस्ट हैं। देश खतरनाक समय से गुजर रहा है। मोदी के शासन के कुछ ही महीनों बाद जिन लोगों ने उन्हें विकास के नाम पर वोट दिया, उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया है। विकास का मोदी मॉडल एक तमाशा है’’। और तब फिर वह कांग्रेस पार्टी के खोए हुए गौरव को पुनर्जीवित करने के बारे में बोलीं, ”मेरा मानना है कि जनता परिवार बढिय़ा काम कर रहा है, दोनों संसद के अंदर और बाहर आवाज उठा रहे हैं। समय की मांग है कि विपक्षी पार्टियां एक साथ आकर एक संयुक्त मोर्चा का निर्माण करें’’।

ऊपर दिये उदाहरणों से समझा जा सकता है- ये निर्देशी हैं संपूर्ण नहीं। लगभग हर वो शख्स जिसने पुरस्कार वापस किया और कुछ पदों से इस्तीफा दे दिया (तथाकथित उदारवादी और वामपंथी) उनकी राजनीतिक सोच बहुत मजबूत है। उनकी सोच वर्तमान की मोदी सरकार के विचारों से मेल नहीं खाती है। लगभग इन सभी लेखकों को पुरस्कार और पद इसलिए हासिल हुआ, क्योंकि उनकी निकटता और अंतरंगता पूर्व की केंद्र सरकारों के साथ रही है। हम देख सकते हैं की उनके इस्तीफे पूर्णतया राजनीतिक नाटक हैं, वे साहित्यिक स्वतंत्रता के लिये कुछ नहीं कर रहे हैं। यह प्रसिद्ध है कि कांग्रेस के लंबे शासन काल में एक खास कुल ”वामपंथी बुद्धिजीवी’’ उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष वर्ग के लोगों को ही बढ़ावा मिला। उन्हें राज्यसभा का टिकट दिया गया, पद्म पुरस्कार और अन्य पुरस्कारों के साथ ही सरकारी विभागों और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में कम सैलरी पर नौकरियां तो मिलीं, लेकिन उच्च भत्ते के साथ कई सुविधाएं दी गईं, जैसे- उन्हें दिल्ली में घर भी दिये गये। जाहिर है कि इन ”सरकारी बुद्धिजीवियों’’ द्वारा नरेंद्र मोदी को बहकाया नहीं जा सकता है, जैसा वो पहले करते रहे हैं, इसलिए वे परेशान और चिंतित हैं। उनकी पीड़ा है कि उन्हें अब राजनीतिक संरक्षण नहीं मिल जाएगा। इसलिए यह ज्यादा बेहतर है कि, ”वे सभी शहीद का दर्जा पाने के लिए इस्तीफा दे रहे हैं, जिससे की लोगों की सहानुभूति उनके साथ बनीं रहे’’। और ठीक ऐसा ही उन्होंने किया है, और इस प्रक्रिया में मोदी को बदनाम कर रहे हैं।

इस संदर्भ में, मैं फेलोशिप और साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने को लेकर नब्बे वर्षीय लेखिका कृष्णा सोबती की बेवकूफी के मामले की तरफ ध्यान दिलाना चाहूंगा। जिन्होंने साहित्य अकादमी के साथ अपने संबंधों का विच्छेद फेलोशिप और पुरस्कार वापस कर दिया। उन्हें इस बात का श्रेय मिलता है कि उन्होंने 2010 में कांग्रेस सरकार द्वारा दिया गया पद्म भूषण पुरस्कार लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ”एक लेखक के रुप में मुझे अधिष्ठान से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। मैं मानती हूं कि मैंने सही फैसला किया है’’। अगर यह उनका विचार है, तब क्यों उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ इस मुद्दे में शामिल होने के लिए उस दूरी को पार किया, जबकि वह कांग्रेस द्वारा शासित एक राज्य में एक बुद्धिजीवी की हत्या के लिए भी जवाबदेह नहीं है। दूसरी बात, अगर आप सच में बौद्धिक स्वतंत्रता चाहते हैं तो फिर आप क्यों अकादमी और सरकार का एक अभिन्न अंग बनना चाहते हो? क्योंकि, एक वही हमेशा तर्कसंगत तरीके से एक लोकतांत्रिक देश में सरकार का विरोध कर सकते हैं, और उन्हें सरकार और एक स्वायत्त संगठन के साथ जुडऩे की कोई जरुरत नहीं है।

मेरा अंतिम तथ्य यह है कि इन देवियों और सज्जनों ने एक लोकतांत्रिक और बहुलवादी भारत में विचारों की सहिष्णुता के अभाव पर रोया है, हालांकि इस संबंध में उनका ही इतिहास बेहद खराब है। मोदी के शासन का विरोध करने की प्रक्रिया में उन्होंने अपने वैकल्पिक विचारों की असहिष्णुता को ही उजागर किया है। ”भगवाकरण’’ के खिलाफ उनका रोना सरासर बकवास है। मौका मिलने पर वह अपने दर्शन के परे उठने वाली हर आवाज को दबा देंगे जैसा की वो सत्ता में रहते हुए कर चुके हैं। मेरे दोस्त सुशांत सरीन ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है, ”हिटलर और मुसोलिनी ने युद्ध थोप दिया और लाखों यहूदियों को काट डाला गया, उनकी आवाज और थूथन बांध दिये गये, स्टालिन और माओ तो इससे भी ज्यादा बदतर थे। और अभी तक वामपंथी उन्हें उदार विचारधारा का पोस्टर ब्वाय बताते फिरते हैं। क्या घटिया मजाक है !’’

प्रकाश नंदा

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