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पुरस्कार लेने और लौटाने के राजनीतिक मंच पर कम्युनिस्टों का मांस भोज

पुरस्कार लेने और लौटाने के राजनीतिक मंच पर कम्युनिस्टों का मांस भोज

नयनतारा सहगल नेहरु परिवार से ताल्लुक रखतीं हैं। अंग्रेजी भाषा में लिखती-पढ़ती रही हैं। उनके लिखे पर कभी साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कार दिया था। पिछले दिनों उन्होंने वह पुरस्कार साहित्य अकादमी को वापस कर दिया। वैसे तो उम्र के जिस पड़ाव पर नयनतारा सहगल हैं, वहां उनके संग्रहालय में कोई पुरस्कार या पत्र के होने या न होने से बहुत अन्तर नहीं पड़ता। उनका कहना है कि देश में हालात ठीक नहीं हैं। साम्प्रदायिकता बढ़ रही है और कोई कुछ नहीं कर रहा। इसलिए वे अपना पुरस्कार लौटा रही हैं। नयनतारा सहगल को इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि 1947 से लेकर 2015 तक उन्हें पहली बार देश में बढ़ रही साम्प्रदायिकता दिखाई दी और उन्होंने घर के सामान की तलाशी लेकर देश को लौटाने के लिये साहित्य अकादमी द्वारा दिया गया प्रशस्ति-पत्र ढ़ूढ निकाला। लिखती तो वे काफी अरसे से हैं और साम्प्रदायिकता भी तब से ही है, जब से वे लिखती रही हैं, लेकिन साम्प्रदायिकता उन्हें कभी दिखाई नहीं दी और न ही उनकी आत्मा उस समय पुरस्कार वापस करने के लिये वजिद हुई। अब नरेन्द्र मोदी की सरकार आते ही उनकी आत्मा अतिरिक्त सक्रिय हो गई। कभी भूतकाल में साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये पुरस्कार को राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की चेष्टा, भारत के अंग्रेजी भाषा साहित्य के इतिहास की दु:खद घटना ही कही जाएगी। लेकिन, इस पर आश्चर्य इसलिए नहीं होता कि देश में अंग्रेजों के और अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में ऐसी दु:खद घटनाओं के अम्बार दिखाई दे जाते हैं। भारत में अंग्रेजी भाषा के साहित्य के पुरोधा नीरद चौधरी तो अंग्रेजों के चले जाने से ही इतना दु:खी हुये थे कि हिन्दुस्तान छोड़कर ही इंग्लैंड में जा बसे थे। नयनतारा का धन्यवाद करना होगा कि वे इतनी साम्प्रदायिकता के बाबजूद कम से कम देश में तो रह रहीं हैं। देश पर इतना अहसान क्या कम है?

लेकिन, नयनतारा सहगल के तुरन्त बाद, आईएएस अधिकारी रहे अशोक वाजपेयी ने भी अपना पुरस्कार साहित्य अकादमी को लौटा दिया। अशोक वाजपेयी प्रशासन चलाने के साथ-साथ हिन्दी में कविता कहानी भी लिखते रहते थे। उनकी उन कविता कहानियों पर उन्हें भी कभी साहित्य अकादमी ने इनाम इकराम दिया था। ये सब बातें मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह के जमाने की हैं। अर्जुन सिंह थे तो खांटी राजनैतिक किस्म के प्राणी ही, लेकिन कविता कहानी और किस्से सुनने का उन्हें भी काफी शौक था। वैसे उनको लेकर कई किस्से भी प्रचलित हो गये थे। इस कारण से मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह व अशोक वाजपेयी की जोड़ी ख़ूब जम गई थी। एक को किस्से कहानी सुनने का शौक था और दूसरे को लिखने और सुनाने का। इसलिए जोड़ी जमनी ही थी। कई लोग तो यह भी कहते हैं कि इस जोड़ी ने मध्य प्रदेश में आतंक मचा रखा था। उन दिनों अशोक वाजपेयी की कविताई ख़ूब फली-फूली और जगह-जगह से इनाम इकराम भी मिलें। दरबार में रहने का यह लाभ होता ही है। यह परम्परा आज की नहीं, प्राचीन काल की है। जिन दिनों भोपाल में गैस कांड हुआ था, लोग कुत्ते और बिल्ली की तरह मर रहे थे, लेकिन अर्जुन सिंह इसके लिये जिम्मेदार कम्पनी के मालिक को जेल भेजने की बजाए, जहाज देकर देश से बाहर सुरक्षित पहुंचाने के राष्ट्रीय कार्य में लगे हुए थे। उन दिनों भी चर्चा हुई थी कि शायद अशोक वाजपेयी विरोध स्वरुप सरकार द्वारा दिया गया कोई मोटा न सही, छोटा पुरस्कार ही वापस कर देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। आत्मा को भी समय स्थान देखकर ही जागना होता है। शायद अशोक वाजपेयी को लगा होगा कि वह राजनैतिक लिहाज से उचित समय नहीं था। सब साहित्यकार जानते हैं कि पुरस्कार लेने और लौटाने में भी पूरी राजनीति होती है। अचानक अब अशोक वाजपेयी ने फैसला ले लिया कि जब नयनतारा सहगल ने घर की सफाई शुरु कर दी है और इनाम वापस करने शुरु कर दिये हैं तो उन्हें भी पीछे नहीं रहना चाहिये। उन्होंने भी अपना साहित्य अकादमी वाला पुरस्कार वापस लौटाने की घोषणा कर दी है। कारण उनका भी वही है कि देश की हालत बिगड़ती जा रही है। प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? वैसे कई साहित्यकार इस बात को लेकर भी हैरान हैं कि उन्होंने केवल साहित्य अकादमी वाला पुरस्कार ही क्यों लौटाया? पुरस्कार तो उन्हें अर्जुन सिंह के जमाने में और भी बहुत मिले थे। लेकिन, क्या लौटाना है और क्या संभाल के रखना है, इसे अशोक वाजपेयी से बेहतर कौन जान सकता है? ऐसे साहित्यकार साहित्य को थाली बनाकर प्रयोग करते हैं। जीवन भर यजमान से उस थाली में भर-भर कर दान-दक्षिणा प्राप्त करते रहते हैं। उसके बलबूते साहित्य की रणभूमि में चिंघाड़ते रहते हैं। समय निकालकर भारत भवन में घुस कर साहित्यिक खर्राटे मारते हैं। शिष्य मंडली उन खर्राटों की भी व्यंजनामूलक व्याख्या करती है। जब सूर्य अस्त होने का समय आता है, यजमान के घर से ‘अब कुछ नहीं मिलेगा’ का आभास होने लगता है तो ग़ुस्से में आकर, तब तक मिल चुके माल असबाब समेट कर खाली थाली यजमान की ओर फेंक देते हैं। अशोक वाजपेयी से बडा प्रयोगधर्मी साहित्यिक जगत में कौन है? जिसे वे पुरस्कार लौटाने की संज्ञा दे रहे हैं, वह मात्र गुस्से में आकर यजमान की ओर फेंकी गई खाली थाली की झनझनाहट है। इसे मध्य प्रदेश में वाजपेयी के सब मित्र अच्छी तरह जानते हैं। इस समय सचमुच अर्जुन सिंह की बहुत याद आ रही है। वे आज होते तो शिष्यों को क्या यह दिन देखने पड़ते?

केरल के साहित्यकार साराह जोसफ और उर्दू साहित्यकार रहमान अब्बास ने भी अपना सम्मान वापस कर दिया है। इसी प्रकार पंजाब के तीन चार साहित्यकारों गुरबचन भुल्लर, अजमेर सिंह औलख, और आत्मजीत ने साहित्य अकादमी को कुछ बरस पहले मिले पुरस्कार लौटा दिये। दर्द सब का एक ही है। देश में साम्प्रदायिक वातावरण पनप रहा है। इन सभी बुजुर्ग साहित्यकारों की भावना पर भी शक नहीं किया जा सकता। बुढ़ापे में वे भला झूठ क्यों बोलेंगे। कुछ के पास साहित्य अकादमी के निकायों की सदस्यता ही थी। दो, तीन ने वही छोड़ दी। यह अलग बात है कि उनकी सदस्यता की मियाद वैसे भी कुछ समय में खत्म ही होने वाली थी।

लेकिन, ऐसे अवसर पर कम्युनिस्टों की सक्रियता देखते ही बनती है। कहीं भी राजनैतिक भोज हो या साहित्यिक भोज, कम्युनिस्ट उसकी गंध को मीलों दूर से ही सूंघ लेते हैं। उसके बाद झपट्टा मारकर वे मंच पर कब्जा जमा लेते हैं और अपना नुक्कड़ नाटक चालू कर देते हैं। एक के बाद एक, आकाश मार्ग से पंख फैलाते हुए उनका धरती पर उतरना बहुत ही मनमोहक दृश्य उपस्थित करता है। आकाश मार्ग से उतरने का यह भव्य दृश्य दो बार होता है। पहले पुरस्कार प्राप्त करने के समय और दूसरा, यदि जरुरत पड़ जाये तो उसे लौटाने के समय। नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी द्वारा साहित्य के धरातल पर शुरु किये गये इस साहित्यिकनुमा राजनैतिक भोज की गंध देखते-देखते कम्युनिस्ट खेमे में पहुंच गई। वे बड़ी संख्या में वहां एकत्र हो गये और अब धड़ाधड़, जिसके पास साहित्य अकादमी का पुरस्कार था, वह साहित्य अकादमी का पुरस्कार और जिस के पास कोई प्रदेश या जिला स्तर का पुरस्कार था, उसने वही पुरस्कार लौटाना शुरु कर दिया। इन्दिरा गांधी के जमाने में कम्युनिस्ट उनके काफी समीप चले गये थे। संकट के वक्त में उनकी मदद कर दिया करते थे। उनके कामों की प्रगतिवादी शब्दावली में व्याख्या करके वैचारिक गरिमा प्रदान करने का वामपंथी कार्य भी करते थे। इसके बदले में उन्हें सरकार से इनाम इकराम मिलते रहते थे। साहित्य के काम धंधे में लगी टोली को साहित्यिक इनाम मिलते थे। जिन्हें पढ़ाने का शौक था, उनको इनाम में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय दिया गया। जिनकी राजनीति में रुचि थी, उनको पार्टी में शामिल करके एक आध मंत्री पद भी दिया गया। बीच-बीच में रुस सरकार भी इन लोगों को मास्को में बुला बुला कर साहित्यिक पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र दिया करती थी। सरकारी खर्च पर घूमना फिरना तो होता ही था। लेकिन, अब वह युग बीत गया है। लेकिन, साम्यवादी खेमा अस्त होने से पहले एक अंतिम लड़ाई लड़ लेना चाहता है। इसलिए अपने जमाने में प्राप्त इस सारी पुरानी सामग्री को समेट कर, अपनी वाममार्गी साधना से एक ऐसा हथियार बनाना चाहता है जो नरेन्द्र मोदी को चित्त कर दे। साहित्यिक पुरस्कार लौटाने का यह नुक्कड़ नाटक उसी का हिस्सा है। अलबत्ता इस बात का ध्यान सभी रख रहे हैं कि सम्मान लौटाने की सीमा सम्मान देने वाली संस्था से प्राप्त सूचना-पत्र तक ही सीमित रहे। जहां तक सम्मान से प्राप्त धनराशि का प्रश्न है, उसको इस अभियान से दूर ही रखा जाये। बहुत से साहित्यकार पुरस्कार लौटाने में यही बेईमानी कर रहे हैं। अरसा पहले इनाम देने वाली संस्था ने जो इनाम देने की चिट्ठी भेजी थी और उसके साथ प्रमाण-पत्र नत्थी किया था, वह तो इनाम देने वाली संस्था को लौटा रहे हैं, लेकिन साथ आया चेक अभी भी गोल कर रहे हैं। सार-सार को गहि रहे थोथा देत उड़ाए। थोथा सर्टिफिकेट अकादमी की ओर उड़ा दिया और धन रुपी सार अभी भी संभाल कर ही रखा हुआ है। साहित्यिक पुरस्कारों के मांस भोज में सारा मांस चट कर लेने के बाद यह सूखी हड्डियां लौटाने का नया साम्यवादी पर्व शुरु हुआ है।

कम्युनिस्टों की यही ख़ूबसूरती है। वे गोल बांध कर हमला करते हैं। जब से नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी है, तब से कम्युनिस्ट खेमे में हाहाकार मचा हुआ है। भाजपा को हराने के लिये कम्युनिस्ट न जाने कितने-कितने फॉमूले जनता को समझाते रहे। लेकिन, इस देश की जनता कम्युनिस्टों की भाषा नहीं समझती। क्योंकि, उनकी भाषा इस देश की मिट्टी से निकली हुई नहीं होती। उनकी भाषा कभी मास्कों की भट्टी से तप कर निकलती थी और कभी बीजिंग की भट्टी से। इसलिए देश के लोगों ने कम्युनिस्टों को हाशिये पर पटक दिया। साहित्यकारों को आगे करके अपनी राजनैतिक लड़ाई लडऩा कम्युनिस्टों की पुरानी शैली है। इसे किसी भी दशा में शोभनीय नहीं कहा जा सकता। उनके लिये साहित्य की स्वतंत्रा जरुरी नहीं है, वह केवल पार्टी के प्रचार का साधन मात्र है। उनके लिये साहित्यकार की उपयोगिता भी यही है, जिसका उपयोग वे इस समय कर रहे हैं। साहित्य और साहित्यकार की कम्युनिस्टों के खेमे में क्या औकात है, इसका ख़ुलासा आधुनिक कम्युनिस्ट अरुन्धति राय ने किया है। उसके अनुसार, हमारी रणनीति केवल साम्राज्य को ललकारने की ही नहीं होनी चाहिये, बल्कि हर तरीक़े से उसकी घेराबन्दी करने की होनी चाहिये। इसकी प्राणवायु समाप्त करने की, इसकी हंसी उड़ाने की, इसको लज्जित करने की होनी चाहिये। यह सब कुछ हमें अपनी कला, अपने संगीत,अपने साहित्य, अपने हठ, अपनी योग्यता और अपने परिश्रम से करना होगा। लोगों को अपनी कहानियां सुनाने की योग्यता से करना होगा। ”कम्युनिस्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जनता के पास जाकर, उससे उनकी भाषा में संवाद रचना करने में असफल हैं, क्योंकि वे स्वयं आध्यात्मिकता प्राणवायु पर जीते हैं। लेकिन, लोकशाही को गिराने के लिये, वे साहित्य का दुरुपयोग करने में लज्जा भी महसूस नहीं करते। उनकी एक मात्र योग्यता, जिसकी ओर राय ने इशारा किया है, हठपूर्वक अपने कहानी को बार बार दोहराते रहने की ही है। कम्युनिस्ट साहित्य को प्रचार सामग्री और साहित्यकार को पार्टी का भोंपू मानते हैं। यही कारण है कि अब लोकशाही के खिलाफ अपनी लड़ाई में वे, साहित्यकारों को उपहास का पात्र बना रहे हैं।

14-11-2015

पिछले दिनों सरकार ने देश में छिपा हुआ काला धन बाहर निकालने के लिये एक स्कीम चालू की थी कि यदि फलां तारीख तक अपना काला धन बाहर निकाल दोगे तो माफी मिल जाएगी। उसके बाद पकड़े गये तो कानून के अनुसार सजा होगी। इसका लाभ उठाते हुए बहुत से लोगों ने अपना काला धन सरकार को लौटा दिया। एक साहित्यकार पूछ रहे थे कि क्या सरकार ने पुरस्कारों को लेकर साहित्यकारों के लिये भी कोई ऐसी योजना लागू की है? उनका ऐसा भ्रम इसलिए बना, क्योंकि नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी को देखकर कुछ अन्य स्थानों पर भी इक्का-दुक्का लोगों ने यह पुरस्कार लौटाया है। दरअसल, साहित्य जगत से जुड़े लोग अच्छी तरह जानते हैं कि पुरस्कार प्राप्त करने की भी अपनी एक स्थापित राजनीति है। जिनकी किताबों को पढऩे के लिये दस पाठक भी नहीं मिलते और जिनके किताब की पांच सौ प्रतियों में छपा पहला संस्करण बिकने में ही दस साल लग जाते हैं, कई बार उन्हें ही साहित्य शिरोमणि घोषित किया जाता है। कई बार ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार मिलता है कि पुरस्कार मिलने के बाद ही साहित्य जगत को पता चलता है कि पुरस्कार विजेता लिखता भी है। यह साहित्य जगत का अपना काला बाजार है। जिस प्रकार पुरस्कार लेने की राजनीति है, उसी प्रकार पुरस्कार लौटाने की भी अपनी एक राजनीति है। जो उसी राजनीति के चलते पुरस्कार लेगा तो वह उसी राजनीति के आधार पर पुरस्कार लौटायेगा भी। नहीं लौटायेगा तो तंजीम से बाहर कर दिया जायेगा।

जो अपने बलबूते पुरस्कार प्राप्त करता है, वह उसकी अपनी कमाई है। उसके लौटाने का सवाल कहां पैदा होता है? लेकिन, जिनको दरबार में रहने के कारण पुरस्कार मिला होता है, उनको संकट काल में दरबार के कहने पर पुरस्कार लौटाना ही होता है। दरबारी परम्परा में इसमें नया कुछ नहीं है। साम्यवादियों से बेहतर इसे कौन समझ सकता है? पंजाबी में कहा भी गया है- धर्म से धड़ा प्यारा। पंजाब के औलख, भुल्लर और मेघराज मित्तर से ज्यादा अच्छी तरह इसे कौन समझ सकता है?

पंजाबी की एक दूसरी साहित्यकार प्रो0 दिलीप कौर टिवाणा ने पद्म श्री वापस कर दिया। अस्सी साल की उम्र में वैसे भी इन पुरस्कारों और तगमों की कोई औकात नहीं रह जाती। उम्र का एक हिस्सा होता है, जिस में ये पुरस्कार और तगमे किसी भी व्यक्ति को बढ़ाने में सहायता करते हैं। उतना लाभ इन तगमों से लिया जा चुका है। उम्र के चौथे मोड़ पर ये तगमे और पुरस्कार उस बांझ पशु के समान हो जाते हैं, जिनसे जितना दूध लिया जा सकता था, लिया जा चुका है। अब आगे इसके बियाने और दूध देते रहने की कोई संभावना नहीं है। लोग उस बांझ पशु को घर से निकाल देते हैं। अनेक साहित्यकारों के लिये इन तगमों और पुरस्कारों की भी यही स्थिति हो गई है। लेकिन, उनकी रणनीति की दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने पुरस्कार लेने का भी लाभ उठाया और अब पुरस्कार लौटाने का भी लाभ उठा रहे हैं। भैंस जीती है तो दूध पाओ और उसके मरने के बाद चमड़े से भी पैसा कमाओ। पुरस्कार लौटाकर चमड़े से भी पैसा कमाने की साहित्यिक व्यवसायिकता का प्रमाण ही कुछ साहित्यकार दे रहे हैं। नरेन्द्र मोदी को घेरने के लिये कम्युनिस्ट टोला कितने ही हथकंडे अपना चुका है। लेकिन, देश की जनता कम्युनिस्टों का साथ नहीं दे रही। अब उन्होंने साहित्यकारों को आगे करके यह नई लड़ाई छेड़ी है। लेकिन, उन्हें शायद यह अहसास नहीं है कि रणभूमि में यह बहुत कमजोर बटालियन उतार दी गई है। यह कुछ देर के लिये मनोरंजन तो कर सकती है, लेकिन देश की जनता को मुख्य मार्ग से हटा नहीं सकती। ऐसा नहीं कि पुरस्कार लौटाने वाले सभी साहित्यकार कम्युनिस्ट विचारधारा के खूंटे से बंधे लोग ही हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनका किसी भी विचार धारा से कोई रिश्ता नहीं है। वे भी पुरस्कार लौटाने वालों की जमात में शामिल हो गये हैं। ये लोग चलती भीड़ में शामिल होने वालों की श्रेणी के हैं। हर समाज में ऐसे लोग मिलते हैं।

वैसे पुरस्कार लौटाने के इस नुक्कड़ नाटक में भाग लेने वाले साहित्यकारों को एक प्रश्न का उत्तर तो इस पूरे नाटक में देना ही होगा। हो सकता है कि वह प्रश्न स्क्रिप्ट में न हो, लेकिन मंच के नीचे बैठे दर्शकों को भी आधुनिक नुक्कड़ नाटकों में प्रश्न पूछने का अधिकार तो है ही। दर्शकों का वह प्रश्न है कि देश में इससे पहले भी अनेक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हो चुकी हैं। दादरी की घटना ऐसी पहली घटना नहीं है। आपातकाल को पुरानी घटना भी मान लिया जाये तो 1984 में कांग्रेस की नाक के नीचे जो नरसंहार हुआ, उसे देखने के बाद भी किसी की आत्मा क्यों नहीं जागी? अब तो यह सिद्ध हो चुका है कि उस नरसंहार में उस समय के सत्ताधीशों का प्रत्यक्ष हाथ था। वैसे कार्ल माक्र्स आत्मा की सत्ता को नकारते हैं, लेकिन फिर भी कार्ल माक्र्स को ही साक्षी मानकर बता सकते हैं कि वे अब तक चुप क्यों थे? वे अब तक चुप क्यों रहे, यह प्रश्न बांग्ला भाषा की जानी पहचानी लेखिका तसलीमा नसरीन ने भी उठाया है। अरसा पहले नसरीन की पुस्तक पर सरकार ने पाबंदी लगा दी थी। पश्चिम बंगाल की उस समय की साम्यवादी सरकार ने तो तसलीमा का कोलकाता में रहना तक मुश्किल कर दिया था। उनको देश से निकालने की ही तैयारियां होने लगी थीं। कारण मुसलमानों की नाराजगी ही कहा जा रहा था। तसलीमा के अनुसार कुछ भारतीय लेखकों ने उनकी पुस्तक पर पाबंदी लगाने और उन्हें पश्चिम बंगाल से बाहर किए जाने का भी समर्थन किया था। तसलीमा को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि जब उनके खिलाफ फतवे जारी हो रहे थे, दिल्ली में वे लगभग नजरबन्दी की हालत में रह रही थीं और उनकी किताब पर आधारित एक टीवी धारावाहिक का प्रसारण रोक दिया गया, तब तो ये लेखक चुप ही रहे। इस साहित्यिक प्रश्न पर तो उनकी आत्मा जाग सकती थी। तसलीमा नसरीन का ग़ुस्सा जायज ही है। जिस समय लेखकों को लेखक समुदाय के ही दूसरे लेखक की बोलने की आजादी के लिए, विरोध ही दर्ज करवाना नहीं, बल्कि उसके लिए सक्रिय संघर्ष भी करना चाहिए था, तब तो वे सामूहिक रुप से भी और व्यक्तिगत रुप में भी चुप ही रहे। अब जब मुद्दा आपराधिक है और दंड संहिता से ताल्लुक रखता है, तो तीन दर्जन से भी ज्यादा लेखक पारितोषिक वापस देने के लिए तैयार हो गये। तसलीमा नसरीन का प्रश्न बिल्कुल जायज है, लेकिन इसका उत्तर देने के लिए किसी भी लेखक ने स्वयं को बाध्य नहीं माना। यह पुरस्कार लौटाने वालों की जमात का दोहरा चरित्र ही स्पष्ट करता है।\

14-11-201523 अक्तूबर को साहित्य अकादमी की बैठक के समय जनवादी लेखक मंच के नाम से कुछ साहित्यकारों ने अकादमी भवन के बाहर प्रदर्शन किया और अकादमी के अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा। इन लेखकों का कहना था कि अकादमी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार की रक्षा के लिये आगे आना चाहिये। लेखकों का यह जत्था यह नहीं बता रहा था कि अकादमी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध कब किया? अकादमी विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन करवाती है। उसके आधार पर उनमें से कुछ को पुरस्कार दिया जाता है। कर्नाटक में एक जाने माने प्रतिष्ठित साहित्यकार कलबुर्गी की हत्या कर दी गई है तो वहां अपराधियों को दंडित करने के लिये साहित्यकारों को अवश्य लडऩा चाहिये। लेकिन, साहित्यकार ऐसा न करके दिल्ली में साहित्य अकादमी के आगे क्या कर रहे हैं? जाहिर है कि उनका दुख कलबुर्गी की नृशंस हत्या को लेकर नहीं है, बल्कि वे उसकी ढाल बना कर नरेन्द्र मोदी की सरकार पर निशाना साधना चाहते हैं। यह वर्षों पुराना घटिया साम्यवादी तरीका है, जिस पर से रंग रोगन पहले ही उतर चुका है। कलबुर्गी की आत्मा भी साम्यवादियों की इस हरकत पर आंसू बहा रही होगी। मरे हुए आदमी की लाश पर भी राजनैतिक रोटियां सेंकने की यह निंदनीय हरकत है। लेकिन, साम्यवादियों के लिये तो वैसे भी साहित्यिक कला साधना नहीं है, बल्कि पार्टी एप्रेटस का एक हिस्सा मात्र है। साहित्य अकादमी ने साहित्यकारों से अपील की है कि वे पुरस्कार को राजनैतिक लड़ाई का साधन न बनायें।

14-11-2015

वैसे तो साहित्य अकादमी की अपनी महिमा भी न्यारी ही रही है। एक बार जम्मू-कश्मीर के एक सज्जन एम. के. टेंग ने वहां के उस समय के मुख्यमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की जीवनी आतिशे-चिनार लिखी थी। वह जीवनी शेख के सुपुर्दे खाक हो जाने के बाद छपी। लेकिन, किताब पर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का नाम लेखक के नाते ही छाप दिया गया। जबकि टेंग ने किताब के शुरु में ही साफ कर दिया था कि मेरी शेख की जीवनी लिखने की इच्छा थी। इसलिए मैं उनके पास उनकी जीवन यात्रा की घटनाएं और किस्से जानने के लिये जाता था और शेख मूड में आकर बताते भी थे। शेख से बातचीत करने के बाद घर आकर टेंग साहिब उनकी जीवनी लिखने का काम शुरु कर देते। इसके बाबजूद कोई घटना गलत न लिखी जाये, इसके लिये वे लिखने के कुछ दिन बाद शेख को जाकर वह दिखाते भी थे। कोई भी जीवनी लेखक प्रमाणिक सामग्री जुटाने के लिये यह सब करेगा ही। लेकिन, बाद में उस किताब का लेखक ही शेख अब्दुल्ला को बता दिया गया। किताब के छपते ही साहित्य जगत में हंगामा हो गया कि इस किताब का लेखक किसको माना जाये? शेख को या टेंग को? शेख परिवार की राजनैतिक हैसियत देखते हुये टेंग भला क्या साहस दिखाते। वैसे भी उन्होंने इस बात का ख़ुलासा उस किताब में कर ही रखा था। लेकिन, साहित्य अकादमी ने आनन-फानन में उर्दू भाषा के साहित्य का उस साल का पुरस्कार ही शेख मोहम्मद के नाम कर डाला। टेंग चुप रह गये। अब देखना होगा कि जब नयनतारा सहगल व अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी के दिये पुरस्कार लौटाने की शुरुआत कर दी है तो क्या अब्दुल्ला परिवार के लोग भी यह पुरस्कार लौटायेंगे? आखिर, एम. के. टेंग के साथ न्याय हो जाये, इसी को ध्यान में रखते हुये यह पुरस्कार लौटाया जा सकता है।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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