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ज्ञान का दीपक

ज्ञान का दीपक

हर साल दीपावली आने से चारों ओर खुशियों की लहर दौड़ जाती है। नई उमंग, नई बहार छा जाती है। हर बार हम इस पर्व को कुछ खास बनाने के प्रयास में जुटे रहते हैं। यदपि उत्तर भारत में दीपावली को बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। हर कोई इस पर्व का आनन्द और उल्लास के साथ स्वागत करते हैं। अपने घरों को सुसज्जित करके, खुद को नूतन वस्त्रों तथा आभूषणों से सजाते हैं। नाना प्रकार के व्यंजन और मिष्ठान बनाये जाते हैं। दीपावली में लक्ष्मी पूजा भी की जाती है। लक्ष्मी जो सुख और समृद्धि की देवी कहलाती हैं। लक्ष्मीजी कि पूजा करके इस पावन उत्सव पर हम अपने घरों में सुख और समृद्धि को निमंत्रण देते हैं।

दीपक जलाना, पूजा करना, उपहार देना और लेना, नूतन वस्त्र धारण करना यह सब कुछ क्षण के लिए सुख प्रदान कर सकते हैं। दीपावली की इस खुशी को हम जितना भी समेटने का प्रयास करते हैं वह हमारे हाथ से रेत की तरह निकल जाती हैं। यह खुशी केवल कुछ क्षण या कुछ दिन तक महसूस कर सकते हैं। जिस प्रकार हम अपने चारों तरफ दीपक जला कर आन्नद का एहसास करते हैं, उसी प्रकार एकबार अगर हम अपने अन्दर ज्ञान को प्रदीप्त करेंगे तो अज्ञानता स्वरूपी अंधकार को हमेशा के लिए मिटा सकते हैं। एकबार ज्ञान का दीपक मन में जलाने से पूरी जिंदगी खुशियों की बारात जैसी होने लगती है। जो खुशी ज्ञान के द्वारा प्राप्त होती है उसका मुकाबला और किसी दूसरी चीजों से नहीं किया जा सकता। जिन खुशियों को पाने का प्रयास हम करते हैं वह सदैव हमारे पास रह सकती हैं। देखा जाए तो असल में हमारे हर दुख का कारण हमारी अज्ञानता है। जब तक पूरी तरह से हम इस जीवन को समझ नहीं पाएगें, तब तक हम खुद को शोक के दलदल से मुक्त नहीं कर पायेंगे।

आधुनिक समाज में लोंगों के अंदर अज्ञानरूपी अंधकार ऐसे छा गया है कि उसे आलोकित करना भी एक कठिन कार्य हो गया। अपने आपको शिक्षित और ज्ञानी कहलाने वाले व्यक्तियों में भी अज्ञानता भरी रहती है। हमारी अज्ञानता को दृष्टि में रखकर कुछ व्यक्ति अर्थ उपर्जन करने लगते हैं। अत्यंत सहजता से लोगों की मूर्खता का उपभोग करने लगते हैं। जब तक हम अपने अन्दर के ज्ञान का उपभोग नहीं कर पाएंगे अपने आप को साधू कहलवाने वाले व्यक्तियों से खुद को लुटते देखते रहेंगे। क्षणिक सुख की तलाश में उन पापियों को बढ़ावा देने लगते हैं। देखा जाए तो उन दुष्कर्मियों के दुष्कर्मं केवल हमारी अज्ञानता के कारण बढ़ रहे हैं। हमारे अंदर का ज्ञान ही हमारे सही और गलत की पहचान करवाता है।

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्माऽमृतं गमय।

एक बार अपने अन्दर ज्ञान का दीपक जलने लगता है तो पूरा जीवन आलोकित हो जाता है। जिस व्यक्ति के अन्दर ज्ञान का दीपक जलता है वह अपने साथ-साथ बाहर के लोगों को भी आलोकित करने लगता है। सच्ची ज्ञान प्राप्ति के लिए और अपने भीतर दीपक प्रज्जवलन करने के लिए एक गुरू की आवश्यकता है।

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम:॥

लेकिन सद्गुरू पाने की चाहत रखने वाले व्यक्ति भी कई बार भटक जाते हैं। जब तक सदगुरू न मिल जाएं तब तक ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा छोडऩी नहीं चाहिए। पुराण, शास्त्रों जैसे गीता, भागवत आदि अध्ययन के द्वारा ज्ञान की प्राप्ती की जा सकती है। गुरू तथा ग्रंथ चुनने के लिए भी जो ज्ञान चाहिए वह मिल सकता है तो केवल ईश्वर कृपा के बल पर। केवल स्वच्छ और निर्मल हृदय रखनेे वाले इंसान को सहज रूप से ईश्वर कृपा मिल सकती है। महाकवि कालिदास अपनी सरलता के कारण माता काली के प्रिय हो सके और ज्ञान की प्राप्ति कर सके।

आइए इस बार दीपावली में अपने अंदर सच्चे ज्ञान का दीपक प्रज्जवलित करके अपने जीवन को हमेशा के लिए सुखमय बनाएं।

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