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असहिष्णु मोदी विरोधी

असहिष्णु मोदी विरोधी

असहिष्णुता अति प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में सर्वव्यापी रही है। यह धार्मिक पहचान, भाषा, खान-पान या कपड़े की पसंद के आधार पर बंटी रही है। असहिष्णुता जिसका मतलब होता है, अन्य जातीय समूहों को कोई भी राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक अधिकार न देना, बावजूद इसके कि वो सभी एक ही तरह की मान्यताओं को मानते या ना मानते हों।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभालाने के बाद से, एक असहिष्णु बहुसंख्यकवादी राज्य के रूप में भारत और उसकी सरकार को बदनाम करने का एक अभियान शुरू किया गया है। असहिष्णुता अचानक एक बड़ी समस्या बन गई है, जिस पर रोजाना बहस भी हो रही है और हर दिन चर्चा भी। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया जिसमें वाशिंगटन पोस्ट से लेकर पाकिस्तान का डॉन तक शामिल हैं, सभी ने भारत में असहिष्णुता की बढ़ती परेशानी पर गंभीर चिंता जताई। प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सोशल मीडिया में कई सवाल खड़े किये गये। असहिष्णुता के विषय पर टीवी स्टूडियो में खूब बहस हुई, नेताओं, शिक्षाविदों, धार्मिक नेताओं और सामाजिक वैज्ञानिकों ने इस मुद्दे को खूब खरोंचा और कहा कि असहिष्णुता का बढ़ता हुआ हुआ दानव देश को रसातल की ओर धकेल रहा है।

असहिष्णुता के मुद्दे को मुख्यधारा की मीडिया और प्रबुद्ध लोगों द्वारा उछाला जा रहा है। वास्तव में, इन धर्मनिरपेक्ष लोगों ने मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में नामित होने से पहले ही उन्हें विभाजनकारी करार दिया था। नई व्यवस्था के प्रभार संभालने के बाद सांप्रदायिक घटनाओं में तेजी से गिरावट आने के बाद भी मनगढ़ंत और चयनात्मक खबरों के जरिये इन बातों को बल दिया जा रहा है। साल 2014 के संसदीय चुनाव के पहले जब मोदी प्रचार कर रहे थे तो उन्होंने ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा दिया था। इसका मतलब था कि किसी के साथ धार्मिक आधार पर किये गये भेदभाव को सहन नहीं किया जायेगा। इसके बावजूद कि उन्हें 2002 के गुजरात दंगों के लिये जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, भाजपा को जीत मिली और वह सत्ता में आई।

हाल की घटनाओं के तीन खास आयाम हैं। गोवध और गोमांस की खपत, दलितों पर अत्याचार और विशेष रुप से पाकिस्तान के साथ संबंधों का मुद्दा। असहिष्षुता का मुद्दा सभी मुद्दों का गला घोंटने का प्रयास करता है। कुछ घटनाएं राजनीतिक फायदों के लिये इस्तेमाल की जा रही हैं, लेकिन ये हमें इन कारणों का पता लगाने में मदद नहीं करती हैं कि ये हमें विचारों, विश्वासों और मान्यताओं को लेकर असहिष्णु क्यों कर रहे हैं? क्योंकि, असहिष्णुता को गैर-धर्मनिरपेक्ष बनाम धर्मनिरपेक्ष के रुप में बांटकर बहस नहीं की जा सकती। अगर हम आज की बीजेपी के सभी शीर्ष नेताओं का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वे सभी उदार दक्षिणपंथी नेता हैं, और मोदी इनके नेता हैं। मीडिया द्वारा मोदी के लिये जो कुछ भी कहा गया इसके बावजूद सच तो यह है कि मोदी केवल बातों के शेर नहीं हैं, वह काम भी करना जानते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विहिप और बजरंग दल पर सख्ती की थी। विहिप नेता प्रवीण तोगडिय़ा से उनकी कटुता जगजाहिर है, चुनावों के दौरान इस विंग ने मोदी के खिलाफ काम किया था। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा शासित राज्यों में कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ।

भारत में कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है, शत्रुता और असहिष्षुता की किसी घटना के लिये प्रधानमंत्री को दोष देना बेतुका है। राज्य की घटनाओं के लिये चाहे वह बीजेपी या गैर बीजेपी शासित राज्यों में हुई हो, मोदी सरकार को दोष देना तथाकथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का फैशन बन चुका है।

जिन लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटा दिये हैं, उन लेखकों का ताजा प्रदर्शन बेहद खराब और हास्यास्पद है। इन लेखकों की अंतरात्मा तब नहीं रोई और जागी, जब बिहार में तत्कालीन सरकार की विफलता की वजह से वहां के दलितों का बड़ी बेदर्दी से लक्ष्मणपुर बाथे, मियांपुर, बथानी टोला, नगरी बाजार और शंकरबिगहा में कत्ल कर दिया गया। तब इन्होंने उनके लिये न्याय की मांग नहीं की। आखिर क्यों? किसी लेखक ने तब प्रदर्शन नहीं किया जब अदालत ने पीएसी के 16 जवानों को साल 1987 में सामने से गोली मार कर हत्या करने के आरोप में बरी कर दिया। भारत में किसी लेखक ने साल 1980 और 1990 के दशकों में सिखों, मुसलमानों, हिन्दुओं और दलितों की हत्या होने पर पुरस्कार नहीं लौटाया। सिर्फ खुशवंत सिंह ने 1984 के ऑपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में अपना पद्मश्री लौटाया था। लेखकों के बारे में ये बताना कठिन है कि उनकी राजनीतिक पसंद क्या है? वह स्वयं की सुविधा के मुताबिक किसी एक सरकार को पसंद कर सकते हैं। वैसे, मोदी की अप्रत्याशित जीत को तथाकथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग के द्वारा आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

दीपक कुमार रथ

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