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जनता का पैसा, जनता की जेब

जनता का पैसा, जनता की जेब

अपुन के केजरी मियां बाजीगर निकले। जनता का पैसा मुनाफा काटकर जनता की जेब में लौटाने का अर्थशास्त्र गढ़ रहे हैं। इसे लेकर अर्थशास्त्री भी चकरा जा रहे हैं। चकराना भी चाहिए क्योंकि दिल्ली सरकार के राजस्व की स्थिति आमदनी अठन्नी और सामने खर्चा रूपइय्या वाली हो गई है। आखिर कहां से मिलेगी बिजली, पानी, वाई-फाई…फलां..फलां की सब्सिडी। वह भी करदाताओं के पैसे से सबको लाभ। एक मियां तो अलापने भी लगे हैं ‘यूनीवर्सल सब्सिडी इज डैंजरस, इट इज ओनली फॉर नीडी पीपुल’। जबकि केजरी हैं कि समझाए जा रहे हैं, जनता का पैसा है, उसी को तो जा रहा है। अब कौन समझाए कि भइय्या दिल्ली के विकास के लिए क्या यमुना की रेत में खेती करोगे।

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