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गुनाह नहीं प्रेम की अभिव्यक्ति

गुनाह नहीं प्रेम की अभिव्यक्ति

प्रेम ईश्वर का वरदान है जिसकी चाहत सिर्फ इंसान को ही नहीं बल्कि, धरती पर रहने वाले हर प्राणी को है। प्रेम ही एक मात्र साधन है जो व्यक्ति, परिवार, समाज को एक धागे में पिरो कर रख सकता है। अगर धरती पर लोगों के ह्दय में प्रेम न बहता तो संसार में सब कुछ निरस होता कोई किसी से न बंधता और न ही रिश्तों की परवाह करता, आखिर दुनिया को बाध कर रखने वाला प्रेम ही तो है। जिससे दुनिया का संचार हो रहा है। ‘आखिरी ई-मेल’ लेखक ओम प्रकाश यादव का एक ऐसा ही उपन्यास है जिसमें उन्होंने युवा वर्ग की एक प्रेम कहानी को सार्थक रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उपन्यास लिखने के लिए किसी साहित्यक भाषा-शैली का नहीं बल्कि, आम बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। जिसे समझना हर वर्ग के लिए बहुत आसान है। ये कहानी दिल्ली यूनिवर्सिटी की है, जहां अपनी अल्हड़ उम्र से गुजरने वाले न जाने कितने ही छात्र-छात्रा अपने सुनहरे भविष्य का सपना सजो कर आते हैं, और जीवन के कई दूसरे एहसासों को बटोर कर अपने साथ ले जाते हैं। युवाओं के जीवन का ये वह खास मौका होता है, जिसमें वह जीवन की हर खुशी को समेट कर अपने हिस्से में कर लेना चाहते हैं। और कभी-कभी वक्त ऐसा भी आता है जब यह युवा अपने चंचल मन की गिरफ्त में आ कर किसी की प्रेम भावनाओं में खुद को समर्पित कर देता हैं बिना ये जाने की उसका परिणाम क्या होगा।28-11-2015

28-11-2015लेखक ओम प्रकाश यादव का उपन्यास ‘आखिरी ई-मेल’ ऐसा ही उपन्यास है। जिसमें एक युवक अपने निश्चल प्रेम में अविरल बहता जा रहा है, ये सोच कर कि शायद उसकी जिंदगी में खुशियां इन्द्रधनुष के रंग भर देंगी, लेकिन हुआ इसके विपरीत। उसकी जिंदगी में तब एक तूफान आ गया जब उसे अपनी उम्मीद के विपरीत सब कुछ मिला, लेकिन उसने अपनी जिंदगी के इन खास पलों से सिखा की जिंदगी किसी के लिए रूकती नहीं बल्कि, वक्त के साथ लोगों में भी बदलाव आ जाता है। ये कहानी प्रेरित करती है कि वक्त कभी न रूका है किसी के लिए और न ही जिंदगी, लेकिन इनकी रफ्तार हमेशा बदलती रहती है। जब हम खुश होते हैं तो लगता है जैसे वक्त बहुत तेजी से आगे भाग रहा है और जब उदास होते है तो वक्त लगभग रूक सा जाता है। ऐसा ही हुआ इस उपन्यास के नायक मनीष के साथ जब उदासी ने उसे चारों तरफ से घेर लिया तो उसकी जिंदगी बिना प्रेम के निरस हो गई। लेकिन वक्त कहां किसी को ज्यादा देर दुख या खुश में रहने देता है। आखिर उसकी जिंदगी में उसकी पत्नी लता ने कदम रखा और उसे उससे वह सभी खुशियां हांसिल हो गई जो वह कभी अपनी प्रेमिका कोमल से चाहता था। लेकिन वक्त कभी-कभी इंसान को कुछ बातों और इंसानों को भूलने की इजाजत नहीं देता। जिंदगी तेजी से दौड़ रही थी। मनीष के पास सब कुछ था कि आचानक एक दिन एक हादसा हुआ और कोमल उसमें क्षतिग्रस्त हो गई, लेकिन दोनों के तार तो कब के टूट चुके थे। क्या वास्ता था। लेकिन जिंदगी ने फिर से करवट बदली और एक बार फिर से कोमल, मनीष के सामने आ गई। समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वक्त ऐसी अठखेलियां क्यों कर रहा था मनीष के साथ। लेकिन, वक्त शायद मनीष की परीक्षा ले रहा था कि मनीष अपने अतीत को भूला कर वर्तमान में जी सकेगा या फिर एक बार सही और गलत की ऊहापोह में जूझते हुए आगे बढ़ेगा। ये कहानी मनीष के साथ-साथ दूसरे युवकों के जीवन से भी संबंधित हो सकती है। अक्सर युवक ऐसी आवस्थाओं से गुजरते हैं और जाने-अनजाने अपनी जिंदगी के सही-गलत फैसले ले बैठते हैं, लेकिन इस उपन्यास से यहीं प्रेरणा मिलती है कि व्यक्ति को अपनी भावनाओं को खुद में समेटना नहीं चाहिए बल्कि, उनकी अभिव्यक्ति कर देनी चाहिए। जीवन में प्रेम हो तो घोर निराशाओं में भी हममें आशा का संचार हो सकता है। प्रेम के प्रवाह से जड चेतन में, अंधकार प्रकाश में, रूपांतरित होने लगते हैं।

प्रीति ठाकुर

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