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भारतीय समाज की भयावह विषमता

भारतीय समाज की भयावह विषमता

अनेक पत्रिकाओं में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव के पहले के वायदों का उल्लेख है। इनका एक वायदा था कि, भारतीयों का जो धन टैक्स की चोरी तथा फॉरेन एक्सचेंज कानून का उल्लंघन कर विदेशी बैंकों में रखा गया है, उसे भारत में लाने पर यदि बांट दिया जाये तो देश की प्रत्येक जनता को 15 लाख रूपये मिलेंगे। नरेन्द्र मोदी ये करके दिखायेंगे। कुछ देश ऐसे हैं, जैसे – स्विटजरलैंड, वहां बैंक में एकाउन्ट खोलने पर यदि आप बैंक को कह देते हैं, कि मेरा नाम गुप्त रखा जाये, तो आपका नाम गुप्त ही रखा जायेगा, किसी भी कीमत पर उसका खुलासा नहीं किया जायेगा। स्विटजरलैंड में कानून बना दिया गया है, कि यदि बैंक नाम बता देता है तो बैंक को दण्ड दिया जाएगा।

नरेन्द्र मोदी की सरकार तथा दिल्ली की केजरीवाल सरकार भ्रष्टाचार मिटाने की बात करती है। केजरीवाल ने अनेक सरकारी अधिकारियों को दंडित भी किया है। उपयुक्त दोनों संदर्भ में मुझे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह, राम मनोहर लोहिया तथा विमल जालान (जो भारत सरकार के अर्थ सचिव रहे थे) की याद आती है। विश्वनाथ प्रताप सिंह, 31 दिसम्बर 1984 से 23 जनवरी 1985 तक भारत सरकार में वित्त मंत्री रहे। फिर 2 दिसम्बर 1989 से दस नवम्बर 1990 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने टैक्स चोरी हटाने के लिये बहुत कड़े नियम बनाये। अनेक उद्योगपतियों को जेल में भी डाल दिया था। संयोगवश मैं उनसे बहुत प्रभावित था। हमारा ग्रेफाइट इलैक्ट्रोड का कारखाना भोपाल में था। इसकी तकनीक विश्व में 4 कंपनियों के पास ही थी। दो कंपनियां अमेरिका की, एक फ्रांस की और एक जर्मनी की थी। हम ने फ्रांसीसी कंपनी से इस काम के लिये बात की थी। फ्रांसीसी कंपनी ने यह शर्त लगा दी थी कि, हम इलैक्ट्रोड का निर्यात नहीं करेंगे। केवल भारत में ही बेचेंगे। भारत सरकार इन समझौतों की अवधि पांच साल की रखती थी। पांच साल बाद जब अवधि बढ़ाने का समय आया तो मैंने भारत सरकार से कहा कि निर्यात न करने की शर्त हटाने के लिये फ्रांसीसियों पर जोर दें। फ्रांसीसी अड़े रहे पर कई महीनों के वार्तालाप के बाद 5000 टन के उत्पादन में 500 टन निर्यात की शर्त पर राजी हो गये। हम निर्यात करने लग गये।

इन चारों विदेशी कंपनियों ने आपस में समझौता कर लिया था तथा दाम काफी ऊंचे रखते थे अत: निर्यात में मुनाफा काफी था। पर विदेशों में गुणवत्ता के मापदण्ड भारत के मुकाबले अत्यन्त कठिन थे। निर्यात के कारण हमारी गुणवत्ता विदेशों के लायक हो गई। ईश्वर की लीला हुई, चारों कंपनियों का समझौता टूट गया। प्रत्येक कंपनी निर्यात बढ़ाने की चेष्टा करने लगी। हमारे फ्रांसीसी साझेदारों ने हमें अधिक-से-अधिक निर्यात करने के लिये उत्साहित किया। निर्यात में थोड़ा नुकसान होने पर भी हमने 3 हजार टन माल एक साल में निर्यात कर दिया। प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अत्यन्त प्रसन्न हो गये तथा मेरा संबंध उनसे मधुर हो गया।

ग्रेफाइट इलैक्ट्रोड के देश में उपयोग पर काफी कर था, जबकि निर्यात करमुक्त था। मेरा बेटा अब काम संभालने लग गया था। मैंने उसे कह दिया था कि एक्साईज डिपार्टमेंट में किसी भी हालत में पैसे नहीं खिलाये। यदि कोई समस्या आये तो हम लोग विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास चलेंगे। एक दिन शाम को उसने कहा कि, एक्साईज डिपार्टमेंट में एक नया ऑफिसर आया है। वह बिना पैसे लिये माल नहीं छोड़ रहा है। यदि दो दिन में माल नहीं छूटता है तो मुंबई से जिस जहाज से माल जाना जरूरी है, वह जहाज चला जाएगा ।

विश्वनाथ प्रताप सिंह से प्रात: साढ़े सात बजे कोई भी मिल सकता था। हम दोनों वहां सात बजे पहुंच गये। लम्बी लाईन थी। हम भी खड़े हो गये। जब हमारा नम्बर आया तो उन्होंने हमारी बात सुनी तथा हमें एक कमरे में ले गये। वहां उन्होंने किसी से फोन पर बात की तथा हमें कहा कि यदि चार बजे तक माल नहीं छूटे तो हम उनसे दफ्तर में मिलें। जब मैंने कहा कि उनके दफ्तर में अपॉइन्टमेन्ट मिलना असंभव है तो उन्होंने अपने सचिव से कह दिया कि हमें मिलने में कोई कठिनाई नहीं उपस्थित हो। एक बजे फैक्ट्री से मेरे पास फोन आ गया कि माल तो साढ़े ग्यारह बजे छूट गया है तथा ट्रक से मुंबई भेज दिया गया है, पर ऑफिसर का वहां से ट्रांसफर हो गया है। यदि यह ट्रांसफर हम नहीं रूकवा पायेंगे तो एक्साईज के ऑफिसर परेशान करेंगे। हम सदैव तो मंत्री के पास नहीं जा सकेंगे। मैं दौड़ कर मंत्री महोदय के पास गया। उन्हें धन्यवाद दिया तथा ट्रांसफर रूकवाने का अनुरोध किया। मंत्री महोदय ने मुझे डांटा कि, भ्रष्टाचार में मैं तुम्हें जेल भेज सकता हूं। तुमने कैसे भ्रष्टाचारी पर रियायत करने की बात को मुझे कहने का साहस किया

यह उदाहरण मैं नरेन्द्र मोदी की व केजरीवाल की सरकार का ध्यान आकर्षित करने हेतु दे रहा हूं। एक दिन प्रात: अखबार में किर्लोस्कर की गिरफ्तारी की खबरें पढ़ मैं अत्यन्त उत्तेजित हो गया तथा विश्वनाथ प्रताप सिंह से मिलने उनके घर गया। मैंने क्रोध में कहा कि जो सबसे अधिक कर की चोरी करता है, उसे तो आप छूते नहीं और हम जिसे व्यापारियों में काफी हद तक ईमानदार मानते हैं, उसे आप गिरफ्तार करते हैं। उन्होंने कहा कि यही बात तुम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कहो। अर्जुन सेनगुप्ता ब्रुसेल्स में यूरोपियन कॉमन मार्केट में हमारे राजदूत थे। मैं उनसे ग्रेफाइट इलैक्ट्रोड के कारटेल के संबंध में मिला था। वे उस समय इंदिरा गांधी के प्रमुख सचिव थे। मैं उनके पास गया तथा उन्हें कहा कि, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मुझे इंदिरा जी से मिलने के लिये कहा है। उन्होंने कहा कि उनका फोन भी मेरे पास आ गया है कि मैं आपको इंदिरा जी से मिला दूं। उन्होंने मुझे समझाया कि तुम व्यापारी हो नेताओं की राजनीति में मत पड़ो। उनके समझाने पर मैं इंदिरा जी से नहीं मिला।

पर विश्वनाथ प्रताप सिंह से फिर मिला। इस बार उनसे अनुरोध किया कि, आप आधा घंटा दे सकें तो समय दीजियेगा। उन्होंने दस बजे दफ्तर बुलाया तथा फोन बंद कर कमरे के बाहर लालबत्ती जलवाकर मुझे अपनी बात कहने का आदेश दिया। मैंने उन्हें कहा कि मेरा आधा समय अपनी आय छिपाकर पैसा निकालने तथा फिर निकले हुये पैसे को वापस व्यापार में डालने के रास्ते खोजने में तथा नेपाल के व्यक्तियों के नाम में रूपये दिखाने आदि में लग जाते हैं। मैंने उन्हें बताया कि राम मनोहर लोहिया से मेरा सम्पर्क था। वे कोलकाता बालकृष्ण बायेंवाला के यहां ठहरते थे। बालकृष्ण जी के माध्यम से मैं उनसे मिला। लोहिया जी उस समय खर्च पर सीमा लगाने की बात करते थे। मैंने उन्हें समझाने की चेष्टा की थी कि इन्कम टैक्स की चोरी को व्यापारी वर्ग बुरा नहीं मानते। चुनावों का खर्च प्राय: काले धन से ही पूरा होता है। लोहिया जी खूब सिगरेट पीते थे। मैं सिगरेट छूता भी नहीं था। मैंने उन्हें समझाया कि रूपये कमाना कोई पाप नहीं है। उसका खर्च समाज के लिये समस्या उत्पन्न करता है। मैं अनुरोध करता हूं कि, आप इन्कम टैक्स हटाने का मुद्दा उठाएं, ताकि हमें चोरी करना सीखना न पड़े। बदले में आप खर्च पर ऊंचे कर लगा दीजिये। आप इस मुद्दे को उठायें। रूपये कमाने की प्राक्रिया जटिल होती है। ऑफिसर कभी उस प्रक्रिया से गुजरता नहीं तथा उसके लिये व्यापारी को पकड़ पाना बहुत कठिन होता है। खर्च छिपाना अत्यन्त मुश्किल है। कैसे मकान में वह रहता है, कितनी मोटर गाडिय़ां रखता है, किस विद्यालय में उसके बच्चे पढ़ते हैं, कितने नौकर, नौकरानियां, रसोइये, कितने एयरकंडीशनर हैं। छुट्टियां मनाने कहां-कहां जाता है। पति-पत्नि के साथ दो वर्ष के बालक भी जाते हैं, साथ में उनकी महिला सेविकाएं व नौकर भी हवाई जहाज से जाते हैं। सब विदेशों में कैसे होटल में ठहरते हैं। शादी-विवाह पर कितना खर्च करते हैं। यह छिपाना असंभव है।

25 हजार रूपया महीना कमाने वाले से खर्च का हिसाब अवश्य मांगा जाना चाहिये। भारत में शायद पांच लाख परिवार ऐसे होंगे, जिनका खर्च प्रति व्यक्ति लाख रूपये मासिक होगा। गाडियां-यात्राओं आदि का खर्च सब कंपनियों में लिखा जाता है। साधारण शेयर होल्डर को नुकसान उठाना पड़ता है। अनैतिकता को बढ़ावा मिलता है।

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सारी बातें सुनी तथा विमल जालान को बुला लिया और सारी बात समझाई। विमल जालान मुझे अपने कमरे में ले गये और कहा कि, यह व्यवहारिक नहीं है। आखिर कितना टैक्स हम लगा देंगे? इससे सरकार का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाएगा।

हमारे देश का आदर्श ”सादगी पूर्ण जीवन तथा विचारों की उच्चता’’ रहा है। मैंने स्वयं देखा है कि, इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री नहीं रहीं तो वे विनोबा जी के आश्रम में पवनार रहने आई थीं। अपने कपड़े स्वयं धोना, रसोईघर में रसोई बनाने में सब की सहायता करना, कमरा स्वयं साफ करना सहित सभी काम सहजता से कर रही थीं। मेरे कहने का तात्पर्य है कि, भारत में सादा जीवन उच्च पदों पर आसीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के खून में बसा हुआ है। भंयकर गर्मी में भी विनोबा जी ने कभी एयर कंडीशनर का उपयोग नहीं किया। यूरोप और अमेरिका में खर्च पर टैक्स व्यवहारिक नहीं है तथा उनके लिये आवश्यक भी नहीं है। भारतीय संस्कृति में यह व्यवहारिक है। इसका विरोध भी नहीं होगा।

यह 30 साल पुरानी बात है। समृद्ध परिवारों के खर्चे पहले से कई गुणा बढ़े हैं। जिस देश में 30 करोड़ आदमी रात में भूखे सोते हों वहां यह स्थिति भयानक है। ऐसे में हम तो नक्सलवादियों के हाथ ही मजबूत कर रहे हैं। हत्याएं करना उन्हें अनैतिक नहीं लगता। फ्रांस की क्रान्ति, रूस की क्रान्ति के उदाहरण हमारे सामने हैं। यदि कोई लेनिन या फ्रांस की क्रांति के जैसे नेता भारत में उत्पन्न हो गये तो बहुत बड़ा खून-खराबा हो जायेगा।

स्विटजरलैंड के सबसे बड़े बैंक क्रेडिट स्विस की ग्लोबल वैल्थ 2014 के आंकड़ों की पुस्तक आयी है। उसमें बताया गया है कि, भारत के सर्वोच्च 1 प्रतिशत धनवानों के पास भारत की कुल 50 प्रतिशत सम्पत्ति है।

बाकी बचे 99वें प्रतिशत लोग उससे संतोष करते हैं, जो बचता है। दूसरी ओर विश्व के सबसे गरीब 20 प्रतिशत व्यक्तियों में 4 में से 1 भारतीय है। यानि 25 प्रतिशत भारतीय हैं। यदि तुलना करें तो यह संख्या चीन में केवल 3 प्रतिशत रहती है।

28-11-2015इसमें कोई सन्देह नहीं है कि, भारत में गरीबी काफी घटी है। पर क्या हम कह सकते हैं कि विषमता भी घटी है? क्रेडिट स्विस की रिपोर्ट जोर देकर कहती है कि, आर्थिक सुधारों के 30 वर्ष बाद भी विषमता बढ़ती जा रही है। भारत के सर्वोच्च धनवानोंं का हिस्सा जो साल 2000 में देश की सम्पत्ति का 66 प्रतिशत था आज 74 प्रतिशत है। भारत के 1 प्रतिशत धनवानों के पास साल 2000 में भारत की सम्पत्ति का 37 प्रतिशत हिस्सा था, वह आज बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया है। करोड़ों भारतीयों के लिये विकास की यह कहानी पडिय़ों के देश की कल्पना मात्र है। सबसे अधिक गरीबी की मार वन प्रदेश में रहने वालों पर पड़ती है। भारत का 90 प्रतिशत कोयला तथा बड़े-बड़े बांध वन प्रदेशों में हैं ।

विषमता का सत्य अनुमान भिन्न-भिन्न प्रदेशों के आंकड़ों से नहीं लग सकता। हमें गांवों के स्तर पर जाना पड़ेगा। 3 जनवरी 2015 का संचित बक्शी का लेख ”विषमता’’ पढ़ रहा था। 92 जिले ऐसे हैं, जिन्हें भारत के सर्वाधिक विकसित और सर्वाधिक गरीब जिलों में शामिल किया जाता है। इसके कुछ उदाहरण हैं – महाराष्ट्र का थाना, गुजरात का बड़ोदरा, बिहार का रांची, आंध्र का विजयापटनम तथा छत्तीसगढ़ का रायपुर। विकास की दिशा में परिवर्तन की आवश्यकता है। जिस विकास में रोजगार की वृद्धि नहीं होती, वह विकास गरीब भारत को विषमता की ओर धकेलता है। वस्त्र उद्योग, भारत का बहुत बड़ा उद्योग है। जो पुरानी मिलें हैं, उनमें मजदूरों की संख्या उतनी ही बड़ी, नई मिलों से चौगुनी हैं। तो क्या नई मिलें नहीं लगनी चाहिएं, नई मिलों का उत्पादन निर्यात की गुणवत्ता ही नहीं बढ़ाता है, बल्कि बेरोजगारी भी बढ़ाता है। समाधान आसान नहीं है पर समाधान खोजना तो पड़ेगा।

कलाम साहब की पुस्तक ”मेरी आध्यात्मिक अनुभूतियां प्रमुख स्वामी जी के साथ’’(अक्षरधाम के मुख्य स्वामी जी) पढ़ रहा था। वहां भी वे लिखते हैं कि, 10 प्रतिशत वार्षिक जीडीपी का विकास काफी नहीं है, साथ-साथ 22 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का विकास न हो, उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, सुरक्षा तथा आधारतंत्र का ढांचा प्राप्त न हो तो इस विकास का अर्थ गरीब के लिये कुछ नहीं होता। राष्ट्रपति के कार्यकाल की अवधि 25 जुलाई 2007 को समाप्त होने पर उन्होंने लोकसभा में अपने विदाई भाषण में भी कहा था कि, देश से गरीबी का पूर्ण उन्मूलन हो, मेरा स्वप्न साकार होना चाहिए।

मेरे मित्र जे. एस. राजपूत ने अंग्रेजी में लिखी अपनी एक पुस्तक जो मुझे भेजी है, उसमें भी मैंने पढ़ा कि, सारे विश्व में शिक्षा, अत्याधिक किताब व परीक्षा केन्द्रित हो गई है। उनके शारीरिक श्रम व हृदय से सारे संबंध छूट गये हैं। इससे हिंसा, अविश्वास, धर्मांधता और स्वार्थ को बढ़ावा मिल रहा है तथा भौतिकता तथा व्यक्तिगत खर्च ऐसे स्तर पर पहुंच गया है जो वांछनीय नहीं है।

जिन लोगों को सम्पत्ति उत्पादन करने की कला आती है। उनको अनुशासित करने के लिये कड़ाई करनी होगी। इन्हें मार देने से देश को नुकसान होगा। मेरी पुस्तक ”पैनोरमा’’ में इसी विषय पर ”लोहिया-विश्वनाथ प्रताप सिंह’’ शीर्षक एक लेख अंग्रेजी में है। जो सरकार विदेश से रूपये लौटाने की बात करती है, उससे यह आशा अवश्य की जाती है कि, कोई ऐसी समिति बनाई जाये जो इस बढ़ती विषमता व इसके समाधान’’ पर अध्ययन कर एक रिपोर्ट दे।

एल. एन. झुनझुनवाला

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