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होर्डिंग्स के सियासी खेल में उलझा राजस्थान

होर्डिंग्स के सियासी खेल में उलझा राजस्थान

इन दिनों राजस्थान में होर्डिंग्स का गजब खेल खेला जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि होर्डिंग्स के इस सियासी खेल में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी एवं प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस बराबर रुप से सक्रिय हैं और इसके जरिये दोनों दलों की अंदरूनी धड़ेबंदी का भी समय रहते खुलासा हो रहा है। फिलहाल यह होर्डिंग्स राजनीति पश्चिमी राजस्थान के दो जिला मुख्यालयों जोधपुर तथा बाड़मेर तक सिमटी हुई है, लेकिन इसने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को अपने घेरे में ले रखा है।

तो पहले शुरूआत करते हैं – पाकिस्तान की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से सटे बाड़मेर जिला मुख्यालय की, जहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 23 से 25 अक्टूबर तक जिले का दौरा किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद वसुंधरा का वहां पहली बार जाना हुआ। इस दौरे के कई सियासी मायने थे। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले वसुंधरा राजे ने कांग्रेस के प्रमुख जाट नेता कर्नल सोनाराम को भाजपा में शामिल कर उन्हें बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से पार्टी प्रत्याशी बनवाया। भाजपा के दिग्गज नेता पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंत सिंह बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरे और वसुंधरा ने इस चुनाव को ‘मूंछ की लड़ाई’ का प्रतीक बना कर भाजपा को जीत दिलवाई। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के धुर विरोधी रहे कर्नल सोनाराम ने बाड़मेर के लीलाणा की जगह पचपदरा में तेल रिफाइनरी स्थापित करने के गहलोत सरकार के निर्णय का कड़ा प्रतिरोध भी किया था। इसके बावजूद गहलोत ने आनन-फानन में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से रिफाइनरी के शिलान्यास की रस्म अदायगी कराई। तेल रिफाइनरी में राजस्थान सरकार की महज 26 फीसदी हिस्सेदारी में रिफाइनरी की लागत से अधिक वित्तीय सहयोग को राज्य के हितों के विपरीत बताने वाली वसुध्ंरा राजे को बाड़मेर जिले की जनता को भी यह भरोसा दिलाना था कि रिफाइनरी जरूर लगेगी। गौरतलब है कि अपने कार्यकाल की महत्वांकाक्षी परियोजना तेल रिफाइनरी के अभी तक जमीनी हकीकत नहीं बनने पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हमेशा भाजपा सरकार और वसुंधरा राजे पर निशाना साधते रहे हैं।

मुख्यमंत्री के दौरे से पहले बाड़मेर सर्किट हाउस को बम से उड़ाने की धमकी वाले पत्र से एक बारगी इस यात्रा पर ही सवालिया निशान लग गये थे। निर्धारित कार्यक्रमों के साथ वसुंधरा राजे ने जिले का दौरा पूरा किया, लेकिन सावधानी बरतते हुए उन्हें सर्किट हाउस के स्थान पर सैन्य क्षेत्र में रात्रि विश्राम करवाया गया।

वसुंधरा राजे की यात्रा से पहले उनके खास सलाहकार रहे एक वरिष्ठ मंत्री को बाड़मेर में जातीय समाज का आयोजन कराने को भी बुलाया, लेकिन उन्होंने विशेष रूचि नहीं ली। दरअसल राजपूत, क्षत्रिय समाज से जुड़े भगवान सिंह रोलसाहबसर का एक अंतराल पर बाड़मेर जिले का नियमित दौरे पर रहते हैं और वह जसवंत सिंह जी के विधायक पुत्र मानवेन्द्र सिंह के सम्पर्क में है। इसे ध्यान में रखते हुए और लोकसभा चुनाव में समाज विशेष के लोगों की नाराजगी दूर करने के लिये आयोजन के माध्यम से नब्ज टटोलने का वसुंधरा राजे का प्रयास सिरे नहीं चढ़ पाया। रही सही कसर जिला प्रशासन की विकास योजनाओं के प्रति अनभिज्ञता तथा प्रभावी प्रस्तुतिकरण की नाकामी के चलते मुख्यमंत्री को डांट-फटकार का सहारा लेना पड़ा। इसका नजला बाड़मेर के जिला कलेक्टर के तबादले के रूप में सामने आया। बाड़मेर में तेल रिफाइनरी के बारे में अनौपचारिक स्वीकारोक्ति के अलावे इस सीमांत जिले के लिये कोई विशेष घोषणा नहीं होने से भी लोगों में निराशा रही। यह निराशा और गहरा गई, जब तीन चार दिन बाद मुख्यमंत्री ने नागौर जिले के दौरे में डीडवाना में जिले के लिये 3,500 करोड़ लागत की उन्नीस योजनाओं से जुड़ी शिलापट्टिकाओं के शिलान्यास या लोकार्पण की रस्म अदायगी की। मुख्यमंत्री ने लोगों को भरोसा दिलाया कि अब राजस्थान आधुनिक एवं विकसित प्रदेश बनने की राह पर चल पड़ा है।

28-11-2015

बाड़मेर दौरे से पहले जिला मुख्यालय के प्रमुख स्थानों पर भाजपा के बागी वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह के समर्थन में जन-भावनाओं को उभारने वाले होर्डिंग्स लगाये गये थे। इनमें कहा गया कि-बाड़मेर, जैसलमेर मेरा परिवार है, रेगिस्तान के संस्कार ही मेरी पूंजी हैं, राजस्थान सबसे आगे रहे, यही जीवन लक्ष्य है, निजहित नहीं, जनहित सर्वोपरि। इन होर्डिंग्स पर जसवंत सिंह के फोटो भी लगे हुए थे। गौरतलब है कि दिल्ली में अपने आवास पर गिरने के कारण जसवंत सिंह बेहोश होकर कोमा में चले गये थे। सूत्रों के अनुसार अब उन्हें बेड पर उठा कर बैठाया जाता है। वह कुछ होश में हैं तथा कुछ-कुछ सुन भी रहे हैं, लेकिन जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। दीपावली के बाद उनका एक ऑपरेशन किया जाना है। यह भी याद रहे कि वसुंधरा राजे ने कभी भाजपा के दिग्गज नेता स्वर्गीय भैरो सिंह शेखावत और जसवंत सिंह की हौसला अफजाई से अपना राजनीतिक सफर आरम्भ किया था। वक्त बदला और राजनीतिक समीकरण बदले तो वसुंधरा राजे के पहले मुख्यमंत्रित्व काल में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच जसवंत सिंह पार्टी के विरोधी रवैये के सूत्रधार बनकर उभरे थे और पिछले लोकसभा चुनाव में तो उन्हें भाजपा के खिलाफ खुली बगावत पर उतरना पड़ा। उनके पुत्र विधायक मानवेन्द्र सिंह मुख्यमंत्री के बाड़मेर दौरे के समय गुजरात की यात्रा पर गए हैं, ऐसा बताया गया। प्रतिपक्ष कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के बाड़मेर दौरे के समय जिला प्रशासन से मुख्यमंत्री से मिलवाने और ज्ञापन देने के लिए समय मांगा था, लेकिन कतिपय कारणों के चलते प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी। यही नहीं प्रशासन ने संभावित विरोध प्रदर्शन के चलते धारा 144 भी लगा दी थी। लेकिन, इसके विपरीत कांग्रेस नेताओं ने एकजुट होकर अपना विरोध जताते हुए मुंह पर काली पट्टी बांधकर मार्च निकाला और महात्मा गांधी की प्रतिमा के चरणों में प्रतीकात्मक ज्ञापन भी रखा। कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र के लिए शर्मनाक दिन बताया और मुख्यमंत्री का पुतला भी जलाया।

28-11-2015इस बीच 24 अक्टूबर की रात में सिणधरी चौराहे तथा रेलवे स्टेशन के पास लगे दो होर्डिंग्स से बाड़मेर जिला मुख्यालय पर राजनीतिक भूचाल आ गया। भाजपा राजस्थान के संगठन महामंत्री रहे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निकटवर्ती भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर के समर्थन में दो बडे होर्डिंग्स लगाये गये थे। होर्डिंग्स पर एक ओर ओम माथुर और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फोटो अंकित था इस पर लिखा हुआ था – बिहार चुनाव जाने दो, ओम माथुर को आने दो। ओम माथुर आएंगे, खुशहाल राजस्थान बनाएंगे। इन होर्डिंग्स तथा इस पर लिखे स्लोगन को लेकर बाड़मेर से जयपुर और दिल्ली तक तीव्र प्रतिक्रिया हुई। बताया जाता है कि इन पोस्टर्स और होर्डिंग्स को जोधपुर से बनवाकर मंगवाया गया था। ये होर्डिंग्स किसने लगवाये इसकी पुख्ता सूचना नहीं मिल पायी है। लेकिन, भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार बाड़मेर जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे दिलीप पालीवाल, एडवोकेट स्वरूप सिंह राठौड़ तथा सिवाना विधायक हमीर सिंह भायल की गिनती माथुर समर्थकों में की जाती है। राठौड पाटी से निष्कासित हैं। इस होर्डिंग्स की सूचना मिलते ही अपनी पहली प्रतिक्रिया में माथुर ने कहा कि किसी ने षडयंत्रपूर्वक ऐसा प्रयास किया है। जयपुर में योग शिविर में भाग लेने आये बाबा रामदेव से 28 अक्टूबर को भेंट करने आये ओम माथुर ने फिर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह पार्टी विरोधी लोगों का काम हो सकता है। मैं ऐसी हल्की राजनीति में विश्वास नहीं करता। यह पार्टी कार्यकर्ता का काम नहीं हो सकता। पोस्टर किसने लगाये, यह पता करना यहां की सरकार का काम है। मैं राज्य में पिछले चालीस वर्षों से राजनीति कर रहा हूं। पार्टी का एक धड़ा ही नहीं, बल्कि पार्टी का प्रत्येक कार्यकर्ता मुझसे स्नेह करता है। पाली जिले के मूल निवासी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे ओम माथुर ने भाजपा में सक्रिय होने से पहले पश्चिमी राजस्थान में किसान संघ का काम किया। वसुंधरा गुट के मुखर विरोधी विधायक घनश्याम तिवारी के साथ सांगानेर भाजपा प्रशिक्षण शिविर में हुई बदसलूकी प्रकरण में भी माथुर, तिवारी से मिलने दिल्ली से जयपुर आये थे। भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी ओम माथुर के दिल में जयपुर या राजस्थान आने का मोह बरकरार है। बस मौके की ताक में हैं।

28-11-2015कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन तथा ओम माथुर होर्डिंग्स प्रकरण से नाराज वसुंधरा राजे ने जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को झाड़ पिलाते हुए यह बताया कि आपके जिले में क्या हो रहा है? मुख्यमंत्री ने बाड़मेर अचंल के प्रमुख जाट नेता और पूर्व मंत्री गंगराम चौधरी की प्रतिमा का अनावरण कर सभा को संबोधित किया। अलबत्ता वसुधंरा राजे ने भाजपा कार्यकर्ताओं की लम्बी मैराथन बैठक में मंडल स्तर पर फीड बैक लिया, लेकिन पार्टी के स्थानीय नेताओं में किसी को भी तरजीह नहीं दी। मुख्यंमत्री 25 अक्टूबर की शाम बाड़मेर से दिल्ली रवाना हुईं और अगले दिन ओम माथुर के समर्थन में लगे होर्डिंग्स अचानक गायब हो गये। लेकिन, जसवंत सिंह के पोस्टर होर्डिंग्स यथावत बने हुए थे।

होर्डिंग्स के सियासी खेल का दूसरा नजारा पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर जोधपुर में दिखाई दिया। गहलोत वसुंधरा सरकार की नाकामियों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देने में कोई चूक नहीं करते। गहलोत का कहना है कि दो साल में सरकार की साख खत्म हो चुकी है और अब डैमेज कन्ट्रोल के लिये मुख्यमंत्री ने जिलों का दौरा करने का शिगूफा छोड़ा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने भी बाड़मेर दौरे के औचित्य पर सवालिया निशान लगाते हुए इसे जनता को भ्रमित करने की सरकारी कवायद बताया है। बयानबाजी में कांग्रेस के दोनों नेताओं की प्रतिस्पर्धा में कोई कसर बाकी नहीं है। इस प्रतिस्पर्धा के चलते एक तरफ राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नेतृत्व में गठित भारतीय जनता पार्टी सरकार ने आगामी 13 दिसम्बर को प्रदेशव्यापी स्वास्थ्य बीमा योजना के माध्यम से दूसरी वर्षगांठ का जश्न मनाने की योजना बनाई है। लेकिन, कांग्रेस ने तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की अगुवाई में सरकार बनाने के सपने बुनने आरम्भ कर दिये हैं और इसकी शुरूआत भी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर जोधपुर से की गई है।

सूर्यनगर के रूप में प्रसिद्ध जोधपुर में प्रमुख स्थानों पर इन दिनों लगे पोस्टर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे है। इस पोस्टर में एक तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का हाथ जोडऩे की मुद्रा में फोटो है तो इसके बराबर में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह, हाथ का निशान है। बीच में राजस्थान के नक्शे में राज्य विधानसभा का फोटो है, जिस पर चुनाव चिन्ह वाली तीन तिरंगी पट्टियां दर्ज है। इसके ऊपर एक स्लोगन है – नई सोच, नई उमंग, सचिन जी के नेतृत्व में बढ़ेंगे हम। नक्शे के नीचे ‘जन-जन की आवाज, 2018 में पायलट सरकार’ स्लोगन का उल्लेख किया गया है। पोस्टर राजेश मेहता की ओर से लगवाये गये हैं। जो जोधपुर नगर निगम के पूर्व पार्षद तथा कांग्रेस के युवा नेता हैं।

28-11-2015

इन पोस्टरों के लगाने से गहलोत के गृहनगर में कांग्रेस पार्टी में व्याप्त गुटबाजी सतह पर आ गई है। तीन बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और दो बार मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो चुके अशोक गहलोत का पार्टी में बोलबाला रहा है। लेकिन, पूर्व पार्षद राजेश मेहता ने सचिन पायलट को भावी मुख्यमंत्री के रूप में दर्शा कर गहलोत के नेतृत्व को खुली चुनौती दे डाली है। मेहता पार्टी के संगठन स्तर पर बदलाव के जबरदस्त पैरोकार रहे हैं। जिला और वार्ड कार्यकारिणी के गठन के समय भी वह परिवर्तन की मांग उठा चुके हैं। उनका कहना है कि पिछले दस सालों से सईद असंरी जोधपुर शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं। इससे पहले करीब पन्द्रह साल तक जुगल काबरा अध्यक्ष रहे। दोनों ही अशोक गहलोत के कट्टर समर्थक हैं। जुगल काबरा विधायक रह चुके हैं, लेकिन सईद अंसारी को दो बार विधायक पद के चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। काबरा भी एक बार पराजित हो चुके हैं। इसी प्रकार कई वार्ड अध्यक्ष भी 15 से 20 साल से पदों पर काबिज हैं, इसमें परिवर्तन होना चाहिए। जानकार सूत्रों के मुताबिक सईद अंसारी ने अपने पद से त्यागपत्र भेजा हुआ है।

28-11-2015भाजपा और कांग्रेस में संगठनात्मक चुनावों की रस्म अदायगी का दौर भी जारी है। भाजपा के मण्डल स्तरीय चुनावों में भी आपसी गुटबाजी तथा हाथापाई की नौबत आ चुकी है तो कांग्रेस में भी संगठनात्मक चुनावों को लेकर अंदर खाने की राजनीति जोरों पर है। विपक्ष के रूप में एक तरफ कांग्रेस को सरकार के खिलाफ संघर्ष की भूमिका निभानी है, तो पार्टी की भावी राजनीति के लिए भी संघर्ष जरूरी माना जा रहा है। गहलोत के पिछले कार्यकाल में सरकार की तरह संगठन स्तर पर भी गहलोत समर्थकों का दबदबा था। अब गहलोत समर्थक जिलाध्यक्षों एवं प्रदेश कार्यकारिणी पदाधिकारियों तथा अन्य नेताओं की जगह नये चेहरों को आगे लाने की मुहिम शुरू हो गई है। पार्टी विधायक जहां अपने जिले में पार्टी में संगठन में अपना वर्चस्व कायम रखने की जुगत में हैं तो वहीं गहलोत और पायलट समर्थक भी अपनी लॉबिंग में जुटे हुए हैं। इसी बीच पूर्व केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश द्वारा कांग्रेस में साठ साल के नेताओं की विदाई तथा मार्गदर्शक की भूमिका में आने की वकालत से नई बहस छिड़ गई है। साठ पार कर चुके नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया से सपाट नये चेहरों को लाने का गणित फिलहाल टेढ़ी खीर लगता है। हर जिले में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त बन रही है। इस बीच सरकार पर खान घोटाले को रफा-दफा करने के आरोप में जुटी कांग्रेस को जयपुर विकास प्राधिकरण के बहुचर्चित एकल पट्टा प्रकरण में पूर्व मंत्री शांति धारीवाल पर एसीबी जांच की तलवार लटकने से झटका लगा है।

कांग्रेस ने भी शांति धारीवाल की ढाल बनकर भाजपा सरकार पर अपने नेताओं को फंसाने का आरोप लगाया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आगे आकर प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय के बाहर आयोजित कांग्रेसजनों की सभा में धारीवाल को एसीबी पूछताछ के लिये भेजने के बाद साफ-साफ कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, फिर नई सरकार बनेगी। लेकिन, भाजपा के ये कारनामें, ये नई परम्परा, इनके और इनके मंत्रियों के लिए खतरनाक साबित होगी। गहलोत ने अधिकरियों को निष्पक्ष होकर काम करने की नसीहत दी और यहां तक कह दिया कि दबाव में जो काम करेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा। इस सभा में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी मौजूद नहीं थे। गहलोत समर्थक पूर्व मंत्रियों तथा नेताओं ने सभा में यहां तक कहा कि उनकी सरकार आने पर भाजपा के लोगों को गिन-गिन कर जेल में भेजेंगे। इस पर पलटवार करते हुए गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने कहा कि मैं किसी के खिलाफ न तो फालतू कार्यवाही करता हूं और न ही इसमें विश्वास। कांग्रेसी कहते हैं कि उनका राज आने पर वे बदले की भावना से कार्यवाही करेंगे तो यह उन्हें मुबारक हो। हम सीट पर आते हैं तो किसी पार्टी के नहीं होते। पूरे राजस्थान के होते हैं। इस तरह के वक्तव्य से न तो व्यवस्था बना सकेंगे और न ही न्याय प्राप्त कर सकेंगे।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी का भी कहना है कि सरकार किसी भी पार्टी की हो अधिकारी अपना काम करते हैं। भाजपा सरकार निष्पक्ष और नियमों में रहकर काम करती है। किसी ऑफसर पर दबाव नहीं डालती। कांग्रेस के नेता जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति तथा सियासी खेल का ये ऊंट किस करवट बैठेगा, इसकी प्रतीक्षा सभी को रहेगी।

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