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शैतान सुनाए धर्म-वचन!

शैतान सुनाए धर्म-वचन!

नरेंद्र मोदी एक राज्य के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री बने हैं। उनका यह सफर फूलों की सेज नहीं बल्कि कांटों भरा रास्ता रहा है। मोदी की इस अद्भुत और युगांतकारी सफलता ने दिलजले विरोधियों की जमात खड़ी कर दी है। मोदी के ये पेशेवर विरोधी उनके आगे कूच को तो रोक नहीं पाए, मगर ये विरोधी हमेशा उनके रास्ते में कांटे बिछाने की कोशिशों में जरूर लगे रहते हैं। कुछ लोग उनके व्यक्तिगत विरोधी भले ही होंगे, लेकिन उनके वैचारिक विरोधियों की तादाद सबसे ज्यादा है। कुछ लोग उन्हें गुजरात दंगों का दोषी मानते हैं, और उनके प्रधानमंत्री बनने तक भी इस कोशिश में जुटे रहे कि, किसी तरह से उन्हें अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया जाये। जब वे इसमें सफल नहीं हो पाए तो कुछ मोदी विरोधी तत्व लगातार इस कोशिश में लगे रहे कि, विदेशों में मोदी को नरसंहार का सूत्रधार बनाकर ऐसे प्रचारित किया जाये की अमेरिका और यूरोप के देश उन्हें वीजा तक देने से इंकार कर दें। कुछ लोग मोदी द्वारा किये गये गुजरात के विकास और उसे दुनिया भर में मिली शोहरत से खार खाए हुए हैं। वे उसे लताडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ते। दरअसल मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल गया। उसे अस्थिर करना संभव नहीं है, इसलिए सारी मोदी विरोधी ताकतें इकट्ठी हो कर, कांग्रेस सरकार के दौरान बड़े पदों और पुरस्कारों से उपकृत साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों के इस्तीफों और बयानों के जरिये यह माहौल बनाने की कोशिशें कर रही हैं कि, मोदी सरकार के आने के बाद देश का माहौल बिगड़ रहा है। देश में असहिष्णुता फैल रही है।

28-11-2015शैतान धर्मग्रंथों के उद्धरण देने लगे- ऐसी कहावत है अंग्रेजी में। इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा सामने आ रहा है। असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या जैसे शब्दों की बाढ़ आई हुई है। इस बाढ़ पर सवार हो कर कई लोग महानायक बनने की कोशिशों में जुटे हैं, क्योंकि पुरस्कार से जो शोहरत मिलती है, उससे कहीं ज्यादा पुरस्कार लौटाने से मिलती है। साथ ही मिलता है, उंगली कटाकर शहीद होने का सुख। यदि इनमें सचमुच असहिष्णुता का ईमानदारी से विरोध करने वाले लोग होते तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत होता और उनसे लोकतंत्र मजबूत होता। लेकिन, यह लोग जिन-जिन विचारधाओं से जुड़े हैं, वे अपने आप में असहिष्णु विचारधाराएं हंै, उनमें कुछ विचारधाराओं के शब्दकोश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम का शब्द भी नहीं है। इसलिए ऐसा लगता है कि, आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा और असहिष्णुता का विरोध करने के लिये उनकी आत्माएं अचानक क्यों जाग गई हैं? गोया असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मोदी की सरकार के आने के बाद अचानक शुरू हो गया हो। दरअसल देश की कई ताकतें 2002 से ही मोदी की खिलाफत करती रही हैं। वे साम, दाम, दंड, भेद आदि सभी हथकंडे अपना कर मोदी को गुजरात के दंगों का कसूरवार ठहरा कर मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहती थीं, लेकिन जब जनता की अदालत और न्यायिक अदालत ने उनको कसूरवार मानने से इंकार कर दिया और इन लोगों की मोदी को हराने की अपील के बावजूद मोदी लोकप्रियता की लहर पर चढ़कर प्रधानमंत्री बन गये तो इन ताकतों की हताशा की कोई सीमा नहीं रही। उनके सामने एक ही विकल्प बचा था कि, मुई उस जनता को ही बदल दें, जिसने उनकी अपील को नजरअंदाज कर इन दिग्गजों की शान में गुस्ताखी की। लेकिन, क्या करें, इस लोकतंत्र की सबसे बडी कमजोरी ही ये है कि सरकार बदली जा सकती है, मगर जनता नहीं बदली जा सकती। सो बेचारों को मन मसोस कर रह जाना पड़ा। इन्हीं जमात वालों में एक थे हिंसा पर शोध करने वाले नाटककार विजय तेंदुलकर उन्होंने एक सभा में कहा था कि कोई मुझे एक पिस्तौल लाकर दे। एक साहित्यकार थे अनंतमूर्ति, वे मोदी विरोध में यह भूल गए कि चुनाव में जनता द्वारा किये गये फैसले को सिरमाथे धारण करना पड़ता है। मगर अनंतमूर्ति जनता के नहीं अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे तो उन्होंने देश की जनता को धमकी दी की अगर मोदी को प्रधानमंत्री बनाया तो वे देश छोड़कर चले जाएंगे। मगर इस देश की एहसान फरामोश जनता ने उनकी इच्छा पूरी नहीं की। तो वे देश ही नहीं, दुनिया छोड़कर चले गये।

अनंतमूर्ति अनंत में विलीन हो गए तो क्या उनके बहुत से संगी-साथी, चेले-चपाटे इस देश में मौजूद हैं। वे मोदी को हटाना चाहते हैं, लेकिन उनका दुर्भाग्य यह है कि चुनाव साढ़े तीन साल दूर हैं, और वे हैं कि एक पल मोदी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। तो उन्होंने तय किया है कि, वे मोदी सरकार के खिलाफ अहिंसक गुरिल्ला युद्ध लडेंग़े। कभी लेखक पुरस्कार लौटाएंगे, कभी फिल्मकार, कभी इतिहासकार बयान देंगे तो कभी कलाकार। इस तरह पिछली सरकार के चापलूस एक-एक कर बगावत का नाटक करेंगे और मीडिया में माहौल बनाने की कोशिश करेंगे कि, देश में असहिष्णुता से त्राहि-त्राहि मची हुई है। अखलाक की मौत को ऐसे उछाला जाएगा कि लोग 1984 के सिख दंगे भूल जाएंगे। कश्मीर से हिन्दुओं को भगाया जाना बहुत सामान्य घटना लगेगी। इस मोदी विरोधी गैंग में तीन ताकतें बहुत प्रमुख हैं और उनकी खासियत यह है कि, असहिष्णुता ही उनकी विचारधारा है।

सबसे पहले हैं कम्युनिस्ट। आज भले ही पूरी दुनिया के लोगों ने कम्युनिज्म की विचारधारा को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया हो, भारत में भी इनकी नस्ल प्राय: लुप्त हो चुकी हो, लेकिन बुद्दिजीवियों में इस प्रजाति के काफी प्राणी जिंदा हैं, इसलिए लाल किले पर न सही जेएनयू पर अब भी लाल झंड़ा फहराता है। वहां के बुद्धिजीवी अब भी इंकलाब जिंदाबाद मंत्र के साथ रसरंजन करते हैं। खैर ये कम्युनिस्ट बुद्दिजीवी इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बेहद चिंतित हैं। लेकिन, उनका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति प्रेम कुछ नया ही है। जब एक तिहाई दुनिया लाल होती थी, तब किसी कम्युनिस्ट देश के लोगों को पता नहीं होता था कि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस चिडिय़ा का नाम है। भारत के कम्युनिस्ट हमेशा इसको गरियाते रहते थे। कहा करते थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुर्जुआ कंसेप्ट है, इसकी क्या जरूरत। संसद को सूअरबाड़ा बोलते थे। रूस चीन आदि देशों से उन्हें भारत से ज्यादा प्यार होता था। जब मॉस्को में बारिश होती थी तो वे दिल्ली में छाता तान लेते थे। सोवियत संघ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इतना खतरनाक समझा जाता था कि, लेखकों को इसकी सजा के लिये साइबेरिया भेजा जाता था। लेकिन, भारत के वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नर्क सोवियत संघ से पुरस्कार पाकर अपने को धन्य महसूस करते थे। परंतु, हमारे देश के कॉमरेड जिन कम्युनिस्ट देशों की दिन-रात अंधभक्ति करते थे, वहां अभिव्यक्ति का तो छोडि़ए, जीने का भी अधिकार नहीं था। कम्युनिस्ट देशों में करोड़ों लोगों को बुर्जुआ और प्रतिक्रियावादी करार देकर मौत के घाट उतार दिया गया। इस तरह कम्युनिज्म दुनिया की सबसे असहिष्णु विचारधारा थी। इस असहिष्णु विचारधारा के अनुयायी आज के भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े योद्धा बनने की कोशिशें कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भारत के कम्युनिस्ट करोड़ों लोगों की हत्या करने वाले सोवियत संघ, चीन, कम्बोडिया की सरकारों के समर्थक रहे, वरन भारत में उन्होंने पश्चिम बंगाल और केरल में जहां उन्हें सरकारें बनाने का मौका मिला, वहां उनका इतिहास रक्तरंजित रहा है। पश्चिमी बंगाल में माकपा की हरमद वाहिनी ने हजारों माकपा विरोधियों की हत्याएं कीं, केरल में माकपा ने सैकडों संघ के स्वसंसेवकों की हत्याएं कीं। ऐसे कम्युनिस्ट मोदी पर असहिष्णुता का आरोप लगा रहे हैं, जिनके हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हुए हैं। आज एक अखलाक को रो रहे हैं, लेकिन वे न जाने कितने मासूमों की हत्या कर चुके हैं।28-11-2015

देश में कथित असहिष्णुता बढऩे के खिलाफ माहौल बनाने में सबसे बड़ी भूमिका कांग्रेस की है। आजादी के 67 साल में ज्यादातर समय वही सत्ता में रही। उस दौरान न जाने कितने दंगे हुए, लेकिन तब कभी उसे असहिष्णुता नजर नहीं आई। दिल्ली के दंगे तो कांग्रेसियों ने ही कराए थे, जिसमें तीन हजार सिख मारे गए। लेकिन, वह हमेशा संघ परिवार और भाजपा पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण उसने बड़ी तादाद में बुद्दिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकारों और इतिहासकारों को उपकृत किया है। अब वह उनसे इस्तीफे दिलवाकर या बयान जारी करवा कर उनका मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल कर रही हैं। जिन इतिहासकारों ने बयान जारी किया है उनमें ज्यादातर वही लोग हैं, जिन्हें कांग्रेस राज में इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें तैयार करने का काम सौंपा गया था। कलाकारों में शाहरूख खान जैसे लोग हैं, जो गांधी परिवार के नजदीक रहे हैं। शर्मिला टैगोर और लीला सैमसन जैसे लोग हैं, जिन्हें कांग्रेस ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाकर उपकृत किया है। इनमें अशोक वाजपेयी जैसे बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें भारत भवन जैसी संस्थाओं की जिम्मेदारी सौंपकर कला और साहित्य के क्षेत्र में एक लॉबी बनाने का मौका दिया था। वे आज कांग्रेस द्वारा किये गये एहसानों का बदला चुका रहे हैं। ये सारे कलाकार मोदी विरोध में ऐसे अंधे हैं कि यह भूल जाते हैं कि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा हमला तो कांग्रेस ने आपातकाल लागू करके किया था। वे इसी कांग्रेस के मोहरे बन रहे हैं। वैसे अब कांग्रेस अपने द्वारा प्रायोजित मोदी विरोधी अभियान के पक्ष में खुलकर उतर आई है।

कैसे-कैसे बुद्धिजीवी इस पुरस्कार लौटाने के अभियान का हिस्सी बन गए हैं, इसकी मिसाल हैं, कश्मीर के दो मुस्लिम साहित्यकार जिन्होंने, साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाए हैं। उन्हें लगता है कि देश में आज असहिष्णुता का माहौल है। लेकिन, जब कश्मीर घाटी से हिन्दू निकाले गए, तब उन्हें कभी असहिष्णुता नजर नहीं आई। पिछले कई वर्षों से श्रीनगर में कोई सिनेमा थियेटर नहीं चलता। लेकिन, इसमें उन्हें कोई असहिष्णुता नजर नहीं आती।

कुल मिलाकर देश में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि, आज अचानक देश में असहिष्णता पैदा हो गई है, जबकि पहले देश में कांग्रेस के राज में अमन चैन था। कहीं दंगे नहीं होते थे। कहीं सांप्रदायिक तनाव नहीं था। जबकि हकीकत अलग है कि, मोदी सरकार बनने के बाद कहीं कोई दंगा नहीं हुआ, कहीं कोई तनाव नहीं है, लेकिन कुछ राजनीतिक ताकतें उसे पैदा करने की कोशिशें लगातार कर रही हैं।

अक्सर संघ परिवार के उग्र तत्वों द्वारा तीखे भड़काऊ बयान देने को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। लेकिन, असहिष्णुता को मुद्दा बनाने वाले लेखक खुद कहां सहिष्णु हैं। इतिहासकार इरफान हबीब के बयान की कितने लोगों ने निंदा की, जिसमें आरएसएस की तुलना आतंकी संगठन आईएस से की गई थी? इरफान हबीब के बयान को पढ़कर सबसे पहला सवाल उठता है कि, हमारे सेक्युलर इतिहासकारों का नजरिया कितना विकृत है। उन्होंने यही इतिहास बच्चों को पढ़ाया होगा। उन्हें न तो आईएस के बारे में ठीक जानकारी है न संघ के बारे में। यदि वे वर्तमान की घटनाओं का सही और निष्पक्ष विश्लेषण नहीं कर पाते तो इतिहास का तटस्थ विश्लेषण क्या कर पाते होंगे? शाहरूख खान को लीजिए बहुत असहिष्णुता की बात कर रहे हैं, पर वे ऐसे घर्म को मानते हैं, जो विचारधारा के स्तर पर ही सेक्युलरिज्म विरोधी और असहिष्णु है। वे समाज की सहिष्णुता पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन, क्या उन्होंने कभी अपने धर्म की असहिष्णुता पर सवाल उठाया? इस सदी में इस्लामी आतंकवाद और मुसलमानों के आपसी झगड़ों में लाखों लोग मारे गये। लेकिन, शाहरूख को इसमें कही असहिष्णुता नजर नहीं आई। इस असहिष्णुता पर उन्होंने क्या कभी सवाल उठाने की हिम्मत की? असहिष्णुता पर सिलेक्टिव सवाल उठाने से समस्या हल नहीं होगी। उनके असहिष्णुता का मुद्दा उठाने से यही संदेश जाता है कि, हिन्दू समाज बहुत असहिष्णु है। इस पर उन्हें वैसे ही तीखे जवाब मिलना स्वाभाविक है।

असल में जैसा कमल हासन ने कहा- असहिष्णुता हमारे समाज में काफी है, तभी तो देश का बंटवारा हुआ। तब से असहिष्णुता समाज में चली आ रही है। लेकिन, मोदी विरोधी यह साबित करने की कोशिशें कर रहे हैं कि, असहिष्णुता का अविष्कार मोदी सरकार ने किया है। इससे बड़ा झूठ कोई हो ही नहीं सकता। दरअसल आज के असहिष्णुता के आंदोलन को देखकर लगता है कि, मोदी विरोधियों के लिये एक आदमी की हत्या सबसे बड़ी असहिष्णुता है और हजारों लोगों की हत्या केवल एक आंकड़ा। तभी तो उन्हें दादरी की घटना सबसे बड़ी असहिष्णुता लगती है और कांग्रेस के जमाने के दंगों की वो परंपरा जिनमें हजारों मारे गये थे, वह एक सामान्य घटना। ऐसे साहित्यकारों की समझ की दाद देनी पड़ेगी।

सतीश पेडणेकर

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