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नरेन्द्र बनाम नपुंसक

नरेन्द्र बनाम नपुंसक

जब लड़ाई शुरु होती है तो सेना के विशेषज्ञ प्रथम रक्षा पंक्तिके ध्वस्त हो जाने की संभावना को ध्यान में रखते हुए द्वितीय रक्षा पंक्ति और उससे भी आगे तृतीय रक्षा पंक्ति तक की तैयारी करके रखते हैं। उसी की तर्ज पर कम्युनिस्ट पार्टियां दुनिया भर में सिविल वार की तैयारियां करती हैं। कम्युनिस्टों की इस रणनीति की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि उनके सिविल वार में सामान्य आदमी या ‘लोक’ सदा गायब रहता है। लेकिन, साम्यवादियों का दावा रहता है कि लोक मानस को सबसे ज्यादा वही जानते हैं। यह अलग बात है कि लोक मानस को समझ पाने का उनका दावा इतिहास ने सदा झुठलाया है। भारत विभाजन के समय वे मुस्लिम लीग के साथ थे और पाकिस्तान निर्माण के समर्थक थे। 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के आंदोलन के समय वे अंग्रेजों के साथ थे और भारतीय मानस को समझने का दावा भी कर रहे थे। 1962 में चीन के आक्रमण में वे चीन के साथ थे फिर भी भारत के लोगों के मन को समझने का दावा कर रहे थे। 1950 से लेकर आज तक कम्युनिस्टों के सभी समूहों को मिला कर वे लगभग साढ़े पांच सौ की लोकसभा में वे पचास से ज्यादा सीटें कभी जीत नहीं सके, फिर भी उनका दावा रहता है कि भारतीय जन के असली प्रतिनिधि वही हैं।

कम्युनिस्ट अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में वे लोकतांत्रिक पद्धति से कभी जीत नहीं सकते, इसलिए तेलंगाना सशस्त्र क्रांति से लेकर कश्मीर में शेख अब्दुल्ला को आगे कर के जम्मू-कश्मीर को अलग स्वतंत्र राज्य बनाने के प्रयास करते रहे। लेकिन, जन विरोध के कारण वे वहां भी असफल ही रहे। तब उन्होंने अपनी रणनीति बदली और कांग्रेस में घुस कर वैचारिक प्रतिष्ठानों पर कब्जा करने में लग गये। उसमें उन्होंने अवश्य किसी सीमा तक सफलता प्राप्त कर ली। कांग्रेस को भी उनकी यह रणनीति अनुकूल लगती थी। इससे कांग्रेस को अपनी तथाकथित प्रगतिशील छवि बनाने में सहायता मिलती रही और कम्युनिस्टों को बौद्धिक जुगाली के लिये सुरक्षित आश्रयस्थली उपलब्ध होती रही। लेकिन, इन आश्रयस्थलों में सुरक्षित बैठकर बौद्धिक जुगाली करते इन तथाकथित साहित्यकारों, रंगकर्मियों, फिल्म निर्माताओं और इतिहासकारों में एक अजीब हरकत देखने को मिलती है। भारतीय इतिहास, संस्कृति, साहित्य इत्यादि को लेकर जो अवधारणाएं, अपने साम्राज्यवादी हितों के पोषण के लिये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने प्रचलित की थीं, ये भलेमानुस भी उन्हीं की जुगाली कर रहे हैं। जबकि, रिकॉर्ड के लिये साम्यवादी जनता में यही प्रचारित करते हैं कि उनके जीवन का अंतिम ध्येय ही साम्राज्यवाद की जड़ खोदना है। भारत में यह विरोधाभास आश्चर्यचकित करता है। ब्रिटिश साम्राज्यवादी भारत को लेकर जो अवधारणाएं स्थापित कर रहे थे, वे भारतीयता के विरोध में थीं। उनका ध्येय भारत में से भारतीयता को समाप्त कर एक नये भारत का निर्माण करना था, जिस प्रकार चर्च ने यूनान में यूनानी राष्ट्रीयता को समाप्त कर एक नये यूनान का निर्माण कर दिया और इस्लाम ने मिस्र में वहां की राष्ट्रीयता को समाप्त कर एक नये वर्तमान मिस्र का निर्माण कर दिया। इसी को देख कर डॉ. इकबाल ने कभी कहा था ‘यूनान, मिस्र, रोमां मिट गये जहां से।’ इस मिटने का अर्थ वहां की राष्ट्रीयता एवं विरासत के मिटने से ही था। इसी का अनुसरण करते हुये ब्रिटिश साम्राज्यवादी हिन्दुस्तान को भी बीसवीं शताब्दी का नया यूनान बनाना चाहते थे। उस समय की कांग्रेस में उन्होंने ऐसे अनेक समर्थक पैदा कर लिये थे, जो भारतीयता को इस देश की प्रगति में बाधा मानकर, उसे उखाड़ फेंक कर, यूनान की तर्ज पर एक नये राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे। कांग्रेस में पंडित नेहरु इसके सरगना हुए। कम्युनिस्ट भी इसी अवधारणा से सहमत थे, इसलिए इस मंच पर बैठने वाले वे स्वाभाविक साथी बनें। इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा तैयार किये गये इस वैचारिक अनुष्ठान में कांग्रेस और कम्युनिस्ट स्वाभाविक साथी बनें। जाहिर है कि भारत में भारतीयता विरोधी यह वैचारिक अनुष्ठान ब्रिटिश-अमेरिकी साम्राज्यवादी शक्तियों ने तैयार किया था, इसलिए इसकी सफलता के लिये वे 1947 से ही प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से दूर व नजदीक से इसकी सहायता करते रहे। कहना न होगा, जहां तक सांस्कृतिक व इतिहास की लड़ाई का प्रश्न है, भारत में कम्युनिस्ट इच्छा से या अनिच्छा से ब्रिटिश-अमेरिकी साम्राज्यवादी शक्तियों का मोहरा बन गये। भारतीय राजनीति का पिछले तीस साल का कालखंड तो इस मोर्चा के लिये अत्यंत लाभकारी रहा और वे भारतीयता के विरोध को ही भारत की राजनीति का केन्द्र बिन्दु बनाने में कामयाब हो गये। इसका कारण केन्द्र में गठबंधन की राजनीति का वर्चस्व स्थापित हो जाना था। भारतीयता विरोधी विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के लिये यह समय सबसे अनुकूल रहा।

28-11-2015

लेकिन, वर्ष 2014 में भारतीयों ने तीस साल के बाद लोकतांत्रिक पद्धति से कांग्रेस-कम्युनिस्टों के इस संयुक्त मोर्चा को ध्वस्त कर दिया। पहली बार लोकसभा में किसी एक राजनैतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। कम्युनिस्टों के लिये सबसे कष्टकारी बात यह थी कि यह बहुमत भारतीय जनता पार्टी को मिला। जिन राष्ट्रवादी शक्तियों के विरोध को कम्युनिस्टों ने अपने अस्तित्व का आधार ही बना रखा था, उन्हीं राष्ट्रवादी शक्तियों के समर्थन में भारत के लोग एकजुट होकर खड़े हो गये। कम्युनिस्टों की आश्रयस्थलियां नष्ट होने के कगार पर आ गईं। इतने सालों तक वह जिस स्वप्न लोक में रहते रहे उसी को धीरे-धीरे यथार्थ मानने लगे थे, उसे भारत की जनता ने एक झटके में झटक दिया। भारतीय मानस को समझ लेने का उनका दावा खारिज हो गया। दरबार उजड़ गया। भारत के इतिहास और संस्कृति की साम्राज्यवादी व्याख्या पर खुश होकर राजा सोने की अशर्फी इनाम में देता था, वह राजपाट लद गया। लगता है कि दरबार के उजड़ जाने पर, उसके आश्रितों की फौज विलाप करती हुई राजमार्ग पर निकल आई हो। कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों की यह फौज अब अंतिम लड़ाई के लिये मैदान में निकली है। इतिहास इस बात का गवाह है कि वे लोकतंत्र में भी अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक तरीकों से नहीं लड़ते हैं। पहली रक्षा पंक्ति में उनका विश्वास ही नहीं है। लोकतंत्र में वही रक्षा पंक्ति लोकतांत्रिक होती है, क्योंकि इसी में लोग अपने मत का प्रयोग करते हुए अपना निर्णय देते हैं। कम्युनिस्ट जानते हैं कि इस रक्षा पंक्ति पर उनकी हार निश्चित है, इसलिए दबाव बनाने के लिये वे दूसरी, तीसरी रक्षा पद्धति का निर्माण बहुत ही मेहनत से करते हैं। लेकिन, ये रक्षा पंक्तियां शुद्ध रुप से गैर लोकतांत्रिक तरीकों से गठित होती हैं। जिस प्रकार आतंकवादी अपनी लड़ाई में बच्चों को, स्त्रियों को चारे के रुप में इस्तेमाल करते हैं, उसी प्रकार कम्युनिस्ट अपनी लड़ाई में कलाकारों, लेखकों, साहित्यकारों, चित्रकारों, इतिहासकारों का प्रयोग हथियार के रुप में करते हैं। लेकिन, इस काम के लिये वे सचमुच साहित्यकारों, कलाकारों या इतिहासकारों का प्रयोग करते हों, ऐसा जरुरी नहीं है। क्योंकि, कोई भी साहित्यकार या इतिहासकार आखिर कम्युनिस्टों की इस गैर लोकतांत्रिक लड़ाई में हथियार क्यों बनना चाहेगा? इसलिए कम्युनिस्ट अत्यन्त परिश्रम से अपने कैडर को ही साहित्यकार, इतिहासकार, और सिनेमाकार के तौर पर प्रोजेक्ट करते रहते हैं, ताकि इस प्रकार के संकटकाल में उनका प्रयोग किया जा सके। भारत में कम्युनिस्टों को इस काम में सत्तारुढ़ कांग्रेस से बहुत सहायता मिली। अपने लोगों को विभिन्न सरकारी विभागों से समय-समय पर पुरस्कार दिलवा कर उनका रुतबा बढ़ाया गया। पिछले साठ साल से कम्युनिस्ट भारत में यही काम कर रहे थे। इसलिए उनके पास विभिन्न क्षेत्रों में पुरस्कार प्राप्त या फिर जिनका रुतबा बढ़ गया हो, ऐसे लोगों की एक छोटी-मोटी फोज तैयार हो गई है।

28-11-2015अब कांग्रेस के परास्त होने के कारण कम्युनिस्ट भी एक प्रकार से अनाथ हो गये हैं। बहुत मेहनत से तैयार की गई चरागाहों से बाहर होने की संभावना बिल्कुल सामने आ गई है। राष्ट्रवादी शक्तियां भारतीय परिप्रेक्ष्य में मजबूत हो रही हैं। कम्युनिस्टों के लिये अपने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। इसलिए उन्होंने रिजर्व में रखी अपनी फौज मैदान में उतार दी है। सबसे पहले उन साहित्यकारों की बटालियन मैदान में उतारी गई है, जिन्हें लम्बे अरसे से पुरस्कार खिला-खिला कर पाला- पोसा गया था। उन्होंने अपने इनाम इकराम लौटाने शुरु किये। वैसे तो अनेक लोगों के बारे में भारत की जनता को भी पहली बार ही पता चला कि वे भी साहित्यकार हैं। इनमें से कुछ साहित्यकार तो ऐसे हैं जिनके ‘अमर साहित्य’ की चर्चा केवल ‘आईएएस सर्किल’ में ही होती है। अनेक साहित्यकार अपने लिखे को अपने परिवार वालों को सुना कर ही संतोष प्राप्त करते रहते हैं। शेष पार्टी के कैडर में गाकर तालियां बटोरते हैं। रही बात पुरस्कारों की तो ‘अंधा बांटे रेवडिय़ां, फिर-फिर अपनों को’ की कहावत का अर्थ हिन्दी वालों को इनको पुरस्कार मिलते देख कर ही समझ में आया। कम्युनिस्टों को भ्रम था कि इससे देश में कोहराम मच जायेगा। लेकिन, ऐसा न होना था और न ही हुआ। कोहराम उनसे मचता है, जिनका देश की जनता पर कोई प्रभाव हो। कुछ दिन अखबारों में हाय-तौबा तो मचती रही, इलेक्ट्रोनिक चैनलों पर बहस भी चलती रही। लेकिन, कम्युनिस्ट भी समझ गये थे कि यह पटाखा आवाज चाहे जितनी कर ले, जमीन पर इस का प्रभाव नगण्य ही होगा।

28-11-2015इसलिए कुछ दिन पहले मैदान में दूसरी बटालियन उतारी गई। यह बटालियन उन लोगों की थी जो फिल्में वगैरह बनाते हैं। कई लोगों की फिल्में तो जनता देखती भी है, लेकिन इनमें से कई निर्माता ऐसे भी हैं जिनको अपनी फिल्मों के लिये दर्शक भी स्वयं ही तलाशने पड़ते हैं। क्योंकि, ऐसे निर्माता विदेशों से कुछ ईनाम आदि बटोर ही लेते हैं, इसलिए सजायाफ्ता की तरह ही इनामयाफ्ता तो कहला ही सकते हैं। वैसे कम्युनिस्टों की रणनीति में अच्छा फिल्म निर्माता वही होता है, जिसकी फिल्म से आम जनता दूर रहती है। रामानन्द सागर कम्युनिस्टों की दृष्टि में अच्छे और प्रतिनिधि निर्माता नहीं थे, क्योंकि उनके धारावाहिक रामायण को देखने के लिये इस देश की जनता अपना सारा काम-काज छोड़ देती थी। साहित्यकारों के मोर्चे पर फेल हो जाने के बाद इन फिल्म निर्माताओं ने रणभूमि में शक्तिमान की तरह मुट्ठियां तानते हुए प्रवेश किया। उनको लगता होगा कि उनको देखते ही देश की जनता उनके साथ ही मुट्ठियां भीचते हुए सड़कों पर निकल आयेगी, लेकिन हंसी- ठिठोली के अलावा इस अभियान में से कुछ नहीं निकला। कुछ दिन उन्होंने भी अपने ईनाम वापस करने में लगाये। उसका हश्र भी वही हुआ, जो मेहनत से पाले-पोसे तथाकथित साहित्यकारों का हुआ था।

28-11-2015अब उतरी है ढोल-नगाड़े बजाते हुए अंतिम वाहिनी। यह वाहिनी स्कूलों, कॉलेजों व विश्वविद्यालयों से रिटायर हो चुके उन अध्यापकों की है जो इतिहास पढ़ाते रहे हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके इरफान हबीब इस सेना के आगे-आगे झंडा लहराते हुये चल रहे हैं। उनके साथ रोमिला थापर तो है हीं। के. एम. पणिक्कर और मृदुला मुखर्जी दायें-बायें चल रहे हैं। उनका कहना है कि देश में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा है, लेकिन नरेन्द्र मोदी चुप हैं, बोलते नहीं। उनको बोलना चाहिये। इरफान हबीब यह नहीं बताते कि यह साम्प्रदायिकता कौन फैला रहा है। इरफान भाई अच्छी तरह जानते हैं कि यह साम्प्रदायिकता उन्हीं की सेना के लोग फैला रहे हैं। लेकिन, आज हिमाचल प्रदेश के इतिहासकार कहे जाने वाले विपन चन्द्र सूद की बहुत याद आ रही है। कुछ साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गये। नहीं तो इरफान हबीब और रोमिला थापर के साथ वही मिल कर त्रिमूर्ति का निर्माण करते थे। नाचते-गाते हुए साम्यवादी खेमे में इतिहासकार कहे जाने वाले ये लोग भी निकल जायेंगे। कुछ देर तक जनता का मनोरंजन होता रहेगा। लेकिन, इससे भारत की राष्ट्रवादी शक्तियां और भी मजबूत होकर निकलेंगी, क्योंकि उनके पीछे देश की जनता है।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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