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पुरस्कार लौटाने में निवेश?

पुरस्कार लौटाने में निवेश?

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: मीडिया में बड़ी चर्चा है कि देश में असहिष्णुता का राज है और विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं रही है।

पिता: बेटा, यह तो मैं भी सुन रहा हूं।

बेटा: पर पिताजी, सच्चाई क्या है?

पिता: बेटा, आजकल के राजनीतिक माहौल में अपनी प्राकृतिक आंखों से कोई कुछ भी नहीं देखता। राजनीति में सब ने कोई न कोई चश्मा पहन रखा है। कोई भी दिन के उजाले की सच्चाई नहीं देखता। यह तो उस शख्स पर निर्भर करता है कि उसने कौन सा चश्मा पहन रखा है।

बेटा: पिताजी, यह कैसे हो सकता है? सच्चाई तो सच्चाई ही रहेगी। वह कैसे बदल सकती है?

पिता: बेटा, तूने कहावत सुनी है न कि सावन के अंधे को हरा-हरा ही दिखाई देता है?

बेटा: हां, यह तो सुना है पर सच्चाई कैसे छुप सकती है?

पिता: ले तू मेरा काला चश्मा पहन और अब बता तुझे सब कुछ कैसा दिखाई दे रहा है?

बेटा: पिताजी, अब तो सब कुछ काला ही दिख रहा है।

पिता: चश्मा उतार और अब बता कि क्या सचमुच सब कुछ काला है?

बेटा: नहीं, सब कुछ काला नहीं है। मुझे तो सब रंग दिखाई दे रहे हैं।

पिता: बेटा, वह इसलिए क्योंकि,तूने अब चश्मा नहीं पहन रखा है।

बेटा: पिताजी, कुछ लोग फिर चश्मा क्यों पहने रखते हैं और सच क्यों नहीं देखना या समझना चाहते हैं?

पिता: इसलिए कि उन्हें दूसरों में, अपने विरोधियों में केवल बुराई ही बुराई देखनी होती है, अच्छाई कभी नहीं।

बेटा: तो फिर ये लोग असहिष्णुता का ढिंढोरा क्यों पीट रहे हैं?

पिता: राजनीति के लिये, वोट के लिये। वास्तव में असहिष्णुता तो वे लोग ही फैला रहे हैं, जो इसका सब से अधिक प्रचार व ढिंढोरा पीट रहे हैं।

बेटा: कैसे?

पिता: बेटा, सहिष्णुता के भाव का मतलब होता है कि ऐसा कुछ नहीं करना जिससे दूसरे की भावना आहत होती हो। पर यही लोग तो यह सब कर रहे हैं।

बेटा: जैसे?

पिता: बेटा, व्यक्ति को अपना ही नहीं, अपने देश-समाज व पड़ोसी का भी ध्यान रखना पड़ता है, ताकि उसको कोई परेशानी न हो, उसकी भावनाओं को कोई ठेस न पहुंचे। पर हुआ क्या?

बेटा: मुझे नहीं पता पिताजी।

पिता: तू तो मूर्ख है, अनजान है। पता है कि पिछले वर्ष ‘किस ऑफ लव’ का ड्रामा चला था?

बेटा: वह क्या था पिताजी?

पिता: इसमें कुछ मनचले बागों, पार्कों व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर जाकर अपने साथ किसी महिला या लड़की को लेकर फिल्मी जोड़े की तरह वह सब कुछ कर रहे थे, जो आजकल फिल्मी पर्दे पर होता है।

बेटा: पिताजी, यदि पति-पत्नी ऐसा कर रहे हैं तो किसी को क्या परेशानी?

पिता: परेशानी यह कि वह पति-पत्नी होते ही नहीं। यदि होते तो वह पार्कों में क्यों भागते? इसके लिये क्या उनके घरों में जगह नहीं है? वह उन लोगों को क्यों परेशान करें जो अपने परिवार या भाई-बहन के साथ वहां घूमने आये हैं?

बेटा: तो हुआ क्या?

पिता: जब लोगों ने व पुलिस ने इस पर एतराज किया तो हो-हल्ला मच गया कि यह ‘मॉरल पुलिसिंग’ है। वयस्कों के परस्पर सहमति के आधार पर किये जा रहे निजी व्यवहार पर उनके मानवाधिकार का हरण।

बेटा: जब पुलिस एहतियात नहीं बरतती तो फिर बलात्कार की घटनाएं भी तो हो जाती हैं।

पिता: तब बेटा हम सब छाती पीट-पीट कर कहते हैं कि यह सब अपराध पुलिस की ढील व उसकी लापरवाही से हो रहे हैं।

बेटा: पर पिताजी, है तो गलत। पुलिस ही नहीं समाज भी उत्तरदायी है।

पिता: बेटा, पाखण्ड तो हम बहुत करते हैं न। एक ओर तो हम वयस्क महिला व पुरूष को बिना शादी के इकट्ठा रहने देते हैं। तब हम इसे दोनों का अपनी मर्जी से रहना ही मानवाधिकार मान लेते हैं।

बेटा: यह तो गलत है।

पिता: नहीं बेटा, इसे हमारा वर्तमान सभ्य समाज लिव-इन-रिलेशनशिप के रूप में मान्यता देता है।

बेटा: पिताजी, यह होता क्या है?

पिता: बेटा, यह आधुनिक युग की देन है जिसमें कोई महिला व पुरूष अपनी मर्जी से बिना शादी के एक साथ रह सकते हैं। जब तक चाहो इकट्ठा रहो और बिगड़ जाये तो बाय-बाय कहो और अलग हो जाओ।

बेटा: पिताजी, आजकल यह बीफ पार्टियां चल पड़ी हैं। यह क्या हैं?

पिता: बेटा, पीछे कुछ लोगों ने बीफ खाने का विरोध किया। उनका तर्क था कि इससे हिन्दू भावना को ठेस लगती है।

बेटा: क्या उन्होंने किया दूसरों की भावनाओं का सम्मान?

पिता: बेटा, यह बीफ पार्टियां तो उसी का विरोध कर रही हैं। ऐसे आयोजन कर वह बता रहे हैं कि यह हमारा निजी अधिकार है और हम दूसरे की भावनाओं की परवाह नहीं करते।

बेटा: तो फिर ये लोग इस आचरण से अहिष्णुता पैदा कर रहे हैं या रोक रहे हैं?

पिता: यह तो स्पष्ट ही है कि वह इस प्रकार उत्तेजना का वातावरण पैदा कर रहे हैं।

बेटा: पर पिताजी, यही लोग नहीं हैं जो ढिंढोरा पीट रहे हैं कि देश में सहिष्णुता का वातावरण नहीं है?

पिता: यही तो रोना है।

बेटा: मतलब जैसे चोर चिल्लाये की घर में किसी ने चोरी कर ली है?

पिता: बिल्कुल, सही कहा तूने।

बेटा: पिताजी, आजकल यह विचार और उसकी अभिव्यक्ति पर अंकुश की क्या बात हो रही है? कई महानुभावों ने तो साहित्य अकादमी व सरकार द्वारा दिये गये पुरस्कार व सम्मान भी लौटा दिये हैं।

पिता: यही तो बेटा मेरी भी समझ के बाहर है। वह क्या कह रहे हैं यह मुझे भी समझ नहीं आ रहा है। कहां और किसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश है, मुझे तो दिख ही नहीं रहा।

बेटा: पिताजी, जो नेता व लेखक यह आरोप लगा रहे हैं, क्या वह टीवी नहीं देखते या अखबार नहीं पढ़ते?

पिता: ये पढ़े-लिखे विद्वान नेता तो अवश्य यह सब देखते और पढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें तो दूसरे क्या बोलते हैं, उस पर ही तो बोलना होता है।

बेटा: नहीं पिताजी, मुझे तो ऐसा नहीं लगता वरना ये किस मुंह से कह सकते हैं कि देश में विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है?

पिता: मैं समझा नहीं बेटा।

बेटा: पिताजी, बिहार में चालू विधानसभा चुनाव अभियान में तो किसी भी नेता की जुबान पर कोई लगाम है ही नहीं। हर अपने विरोधी नेता की आलोचना / भत्र्सना ही नहीं कर रहा, बात तो गाली-गलोच तक पहुंच गई है। चुनाव में कुछ भी अनाप-शनाप बोला जा रहा है। यदि अभिव्यक्ति पर बंधन होता तो क्या कोई ऐसा बोल सकता था?

पिता: बेटा, बात तो तेरी ठीक है। यदि बर्दाश्त और सहिष्णुता का भाव न होता तो पता नहीं कितनों के सिर फूट जाते और कितने लोग अपनी जान गंवा बैठते।

बेटा: तो फिर पिताजी, ये सम्माननीय लेखक, विचारक, इतिहासकार, कलाकार और फिल्मकार क्यों ऐसी भ्रांतियां फैला रहे हैं?

पिता: बेटा, यही तो मुझे समझ नहीं आ रहा। राजनेताओं में तो जिम्मेवारी का अभाव होता है। झूठ बोलना तो मानों राजनेताओं का तो अब जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। उसे तो अपनी झूठी बात को ही सही साबित करना होता है। झूठा साबित हो जाने पर इनको तो कोई शर्म या ग्लानि होती नहीं। पर इन बुद्धिजीवियों को क्या हो गया है? वह तो लगता है कि इस मामले में राजनेताओं को भी पीछे छोडऩे की होड़ में आ गये हैं।

बेटा: पिताजी, आपको पता है कि प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने तो यहां तक कह दिया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व आईएसआईएस में कोई अन्तर नहीं है।

पिता: बेटा, ऐसा कह कर हबीब साहिब ने तो अपने आपको ही छोटा साबित कर दिया है। उन्होंने विचार अभिव्यक्ति की उसी स्वतंत्रता का लाभ उठाया है, जो उन जैसे बुद्धिजीवी कहते हैं कि उनसे छीन ली गई है।

बेटा: इसका मतलब तो पिताजी यह हुआ कि वह अपनी कही बात को खुद ही झूठला रहे हैं।

पिता: बिल्कुल ठीक।

बेटा: पिताजी, हबीब साहिब तो एक बहुत बड़े इतिहासकार है। जहां तक मैं जानता हूं, इतिहासकार किसी और चीज से तो समझौता कर ले पर सत्य से कभी समझौता नहीं करता, चाहे उसे कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। तो क्या अब तक उन्होंने जो इतिहास लिखा है, उसमें सत्य की इतनी ही मात्रा है?

पिता: यह तो बेटा देखना ही पड़ेगा।

बेटा: पिताजी, इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में दिल्ली व अन्य कांग्रेस शासित प्रदेशों में जो दंगे हुए और 4-5 हजार सिक्खों का नरसिंहार किया गया था वह सामाजिक सहिष्णुता का ही एक नमूना था?

पिता: क्या उल्टी बात करता है तू? ऐसी दर्दनाक घटनायें कभी सामाजिक सहिष्णुता का उदाहरण हो सकती हैं?

बेटा: परंतु, स्व. राजीव गांधी को तो उसके बाद ही भारत रत्न से अलंकृत किया गया था?

पिता: यह तो सच है।

बेटा: और पिताजी, यह भी तो सच है कि कई ऐसे भी महानुभाव हैं, जिन्होंने कांग्रेस व राजीव सरकार से सम्मान प्राप्त किये और आज वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश और देश में असहिष्णुता का वातावरण होने का आरोप लगा रहे हैं।

पिता: उनमें से तो कुछ पुरस्कार लौटाने में भी अग्रणी हैं।

बेटा: यह तो अजीब बात है।

पिता: बेटा, राजनीति में सब कुछ चलता है।

बेटा: पर पिताजी, वह तो राजनीतिज्ञ नहीं, बद्धिजीवी व कलाकार हैं।

पिता: तो बेटा यही कह सकते हैं कि उन पर भी राजनीति का रंग चढ़ गया है।

बेटा: पिताजी, सम्मान लौटाने वालों को लोग पाखंडी भी कह रहे हैं। उनका तर्क है कि जब अतीत में ऐसी घटनाएं घटीं तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?

पिता: मुझे तो लगता है कि इन सारे ड्रामे के नेपथ्य में बिहार चुनाव है। जैसे ही चुनाव समाप्त हो जायेगा, यह सारा शोर भी खत्म हो जायेगा।

बेटा: पिताजी, मुझे एक और बात बताइये। भारत रत्न अमत्र्य सेन आजकल कहां हैं? ऐसे मामलों में तो वह सब से पहले कूदते थे। यह आरोप तो वह बहुत पहले से लगा रहे हैं। क्या वह इसलिये चुप हैं कि यदि वह जुबान खोलेंगे तो सब से पहले उन्हें ही अपना सम्मान लौटाना पड़ेगा? इसी प्रकार की रहस्यमयी चुप्पी विख्यात समाजसेविका व पद्मश्री तीस्ता सीतलवाड़ ने अपना रखी है।

पिता: बेटा, कई लोग बहुत समझदार होते हैं। वह घर फूंक कर तमाशा नहीं देखना चाहते। वह तो दूसरों का ही तमाशा देख कर ताली बजाते रहते हैं।

बेटा: पिताजी, लोग बता रहे हैं कि एक महानुभाव ने पहले अपना पद्म भूषण पुरस्कार लौटा दिया था। बाद में जब हालात बदले तो नई सरकार ने उसे पहले से भी बड़ा पद्म विभूषण पुरस्कार देकर उसकी कुर्बानी को अलंकृत कर दिया।

पिता: तब यह लगता है कि पुरस्कार लौटाना भी एक निवेश है, जो बाद में आपको और भी बड़ा लाभ दे सकता है।

बेटा: तो पिताजी अब भी कहीं यही तो नहीं हो रहा?

पिता: यह तो बेटा वही जानें या ईश्वर।

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