ब्रेकिंग न्यूज़ 

बिहार के बाद अब क्या?

बिहार के बाद अब क्या?

बिहार में बदलाव की आहट लोगों की टीस बनकर ठिठक गई और आठ नवंबर को दोपहर तक जनता जनार्दन के फैसले ने महागठबंधन को बिहार सौंप दिया। 243 सदस्यीय विधानसभा सीट में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। पिछले चुनाव में सबसे अधिक सीटें पाने वाली जद(यू) तीसरे नंबर पर रही। वहीं कांग्रेस की भी किस्मत चमक गई। दोनों ही दलों को नीतीश कुमार ने अपने कंधे का सहारा देकर सफलता का स्वाद चखा दिया। वहीं सत्ता में आने का ख्वाब देख रही भाजपा को 53 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। यही नहीं उसके रालोसपा, लोजपा और हम जैसे शतरंज के मोहरे चले ही नहीं। पूरी तरह पिटे साबित हुए। इसी के साथ अगले पांच साल के लिये बिहार की किस्मत का फैसला हो चुका है।

दिल्ली के बाद यह दूसरा चुनाव है, जिसने भाजपा को औंधे मुंह गिरने के लिये मजबूर किया। इसके भी अपने कारण हैं। दोनों ही चुनावों में पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं से ज्यादा दूसरे पर भरोसा किया। रणनीति में स्थानीय नेताओं की बजाय, प्रधानमंत्री के साथ मंच पर जीतन राम मांझी छाए रहे। प्रतफिल सामने है। भाजपा जाति की नहीं विकास की राजनीति करती है। भविष्य के भारत और राष्ट्रीय अस्मिता, गौरव तथा सिद्धांत की राजनीति करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इसी एजेंडे पर बिहार में चुनाव लडऩे गए थे, लेकिन बुरी तरह से क्षेत्रीयता और जाति के झमेले में उलझे बिहार को नई रोशनी में नहीं ला सके। चारा घोटाले के अभियुक्त और जमानत पर रिहा लालू प्रसाद यादव ने पलक झपकते ही बिहार को फिर जातीय राजनीति के आगोश में घसीट लिया। आरक्षण के मुद्दे से लेकर फरीदाबाद के सुनपेड़ में दलित परिवार की आपसी रंजिश में हुई आगजनी को इसका आधार बनाया।

चुनाव परिणाम आने के बाद साफ है कि, भाजपा को सीटें भले नहीं मिलीं, लेकिन पूरे राज्य में वोट मिले। पिछले चुनाव की तुलना में आठ फीसदी वोट बढ़ा। भाजपा ने दूसरे, तीसरे और चौथे चरण में अच्छा प्रदर्शन किया। 158 सीटों पर चुनाव लड़कर पार्टी केवल 53 सीटें जीतने में सफल रही। वहीं सहयोगी लोजपा के खाते में 41 सीटों पर चुनाव लडऩे के बाद केवल दो सीटें आई। 21 सीटों पर चुनाव लड़कर रालोसपा 2 तो 23 सीट पर चुनाव लड़कर मांझी की पार्टी हम केवल 1 सीट जीत पाई। यहां तक कि मांझी अपनी परंपरागत सीट से चुनाव हार गए। इसके उलट कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ। पिछले चुनाव में लालू की पार्टी केवल 22 सीटें जीत सकी थी। कांग्रेस के खाते में चार सीटें गई थी। इस बार विधानसभा चुनाव 2015 ने लालू प्रसाद यादव को नेता बना दिया। उनकी पार्टी को 80 तो कांग्रेस को 27 सीटें मिली। जबकि, 115 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली जद(यू) 71 पर सिमट गई। इस तरह यह नीतीश की नहीं बल्कि, लालू की बड़ी राजनीतिक जीत है।

बढ़ेगी चुनौती

महागठबंधन की घोषणा के मुताबिक भले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बनें। लालू प्रसाद यादव लगातार भाजपा का रथ रोकने का खम ठोंक रहे हों, लेकिन राजनीति के जानकार जानते हैं कि लालू चतुर राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने आठ नवंबर को ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का दौरा करने का ऐलान कर दिया। बिहार की सत्ता हमेशा से लालू का एजेंडा रही है। इसलिए वह नीतीश कुमार के कंधे पर बैठकर उनके पेट अपना दांत गड़ाते रहेंगे। इससे जहां बिहार के विकास का पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो गया है, वहीं लोगों को जंगलराज जैसा भय भी सता रहा है।

तीनों दल बनाएंगे सरकार

महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे, लेकिन राज्य सरकार को दृढ़ता देने के लिए कांग्रेस पर सरकार में शामिल होने का दबाव बढ़ रहा है। इसके लिए मंत्री के कोटे को लेकर चर्चा आरंभ हो चुकी है। कांग्रेस रणनीतिकारों के मुताबिक जिस फॉर्मूले पर सीटों का बंटवारा हुआ है, उसी आधार पर मंत्रिमंडल में भागीदारी तय होगी।

28-11-2015

भाजपा में बढ़ेगी रार

भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है। हर कोई पार्टी के फोरम पर बिना भय के अपनी बात रख सकता है। ऐसे में एक बार फिर बिहार के नतीजे से आहत नेता पार्टी को थोड़ा असहज स्थिति में ला सकते हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद से ही इसका ठीकरा संघ प्रमुख मोहन राव भागवत के आरक्षण वाले वक्तव्य से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तक पर फोड़ा जा रहा है। शत्रुघ्न सिन्हा, अरूण शौरी, आरके सिंह, हुकुमदेव नारायण यादव, अश्विनी चौबे समेत तमाम ने अपना विरोध जताना शुरू कर दिया है।

लगेगी लगाम

भाजपा अपने उन नेताओं को लेकर असहज है जो सांसद तो उसके हैं, लेकिन बयानों से लगातार सांसत बढ़ा रहे हैं। नौ नवंबर की संसदीय बोर्ड की बैठक में भी अनुशासन को बनाए रखने को लेकर मानदंड तय होने के पूरे आसार हैं। संसदीय बोर्ड की बैठक में पार्टी जहां हार के कारणों की समीक्षा करेगी, वहीं भावी रणनीति पर चर्चा होगी।

भागवत से मिले अमित शाह

बिहार चुनाव का नतीजा आने और संसदीय बोर्ड की बैठक शुरू होने से कुछ देर पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आरएसएस प्रमुख मोहनराव भागवत से भेंट की। करीब आधा घंटे तक चली चर्चा में शाह ने तमाम मुद्दों पर अपना पक्ष रखा। बताते हैं कि इस बैठक में ही भावी दिशा तय हो गई। इससे पहले संघ प्रमुख ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी बात की थी। इसके कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

क्यों सफल रहे नीतीश?

नीतीश और लालू की जोड़ी ने सफल रणनीति अपनाई। महागठबंधन ने जहां मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार की छवि का सहारा लिया, वहीं नीतीश संयमित भाव में रहे। जबकि लालू प्रसाद यादव ने जमकर मोर्चा लिया। लालू ने ही बिहार की राजनीति को जातीय रंग देने से लेकर तमाम पहल की। कांग्रेस ने पूरे महाअभियान में खुद को दोनों नेताओं के भरोसे छोड़ दिया। वहीं भाजपा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बाद नेताओं की कोई कमी नहीं थी। ऊपर से पार्टी कई बार अपनों के बीच ही जूझती दिखाई दी।

रंजना

монтаж ламинатаyeella отзывы

Leave a Reply

Your email address will not be published.