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क्या बिहार के वोटरों ने अपने पैरों पर मार ली कुल्हाड़ी?

क्या बिहार के वोटरों ने अपने पैरों पर मार ली कुल्हाड़ी?

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर कई एक्जिट पोलों ने भविष्यवाणी की, लेकिन सब गलत ही साबित हुईं। सबसे सही भविष्यवाणी रही अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की। उन्होंने 5 नंवबर को इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में कहा था कि महागठबंधन को 175 और एनडीए को 60 सीटें मिलेंगी। उनकी यह भविष्यवाणी लगभग सही निकली। महागठबंधन को 178 और एनडीए को 56 सीटें मिली। यह भविष्यवाणी करने के पीछे उन्होंने तर्क यह दिया था कि, लोकसभा चुनाव में एनडीए के खिलाफ राजद, जेडीयू और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। अब वही तीनों पार्टियां महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ रही हैं। इसी ने महागठबंधन को एक अजेय सामाजिक गठबंधन बना दिया और चुनाव का गणित ही बदल गया, जिससे लोकसभा चुनाव की तुलना में चुनाव परिणाम ही उलट गये और महागठबंधन को भाजपा की तुलना में तीन गुना या विधानसभा की दो तिहाई सीटें मिलीं।

बिहार की तीन प्रमुख पार्टियों का महागठबंधन कई मामलों में अनूठा था, जिसमें मोदी के जादू से खौफ खाई हुई राज्य की तीन पार्टियां एकजुट हो गईं थीं। इनमें से राजद और कांग्रेस ने तो केवल अपनी ताकत के बल पर बिहार में लंबे समय तक राज किया है। नीतीश की जद (यू) भाजपा के साथ सत्ता में रही। भाजपा-जद (यू) गठबंधन ने राज्य के लोगों को लालू के जंगलराज से मुक्ति दिला कर पहली बार विकास की गंगा में नहलाया। यह बात अलग है कि, उसका सारा श्रेय नीतीश ले गये और विकास पुरुष बन गए। मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर उनके चेहरे ने भी महागठबंधन को ताकत दी और वह जाति और विकास दोनों का प्रतिनिधित्व करने वाला गठबंधन बन गया। कांग्रेस के इस गठबंधन के साथ जुड़ जाने से मुख्य रुप से पिछड़ी जातियों के गठबंधन के साथ सवर्ण और दलित वोट भी जुड़े। दूसरी तरफ भाजपा नीत एनडीए का चार पार्टियों का गठबंधन सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बे-असर रहा। एक तरह से भाजपा ने इन दलों को बड़ी संख्या में सीटें देकर अपनी हालत कमजोर कर ली। जो चुनावी नतीजों से स्पष्ट है।

28-11-2015इन चुनावी परिणामों का सबसे खतरनाक पहलू है, जंगलराज लाने वाले लालू की बिहार की राजनीति में धमाकेदार वापसी। उसने लालू के बारे में प्रचलित इस गीत को सही साबित कर दिया कि, जब तक रहेगा समोसे में आलू, तबतक रहेगा बिहार में लालू। चारा घोटाला के अपराधी लालू को जिस तरह से बिहार की जनता ने सबसे ज्यादा सीट देकर जिताया है, वह बिहार के लिए कोई शुभ संकेत तो निश्चित ही नहीं है। नीतीश कुमार को जिस तरह विकास पुरूष माना जा रहा है, लेकिन यदि उनके विकास से बिहार की जनता गदगद है तो कहना पडेगा कि, वह बहुत भोली और परम संतोषी है। नीतीश के विकास की यह खासियत रही कि, इन दिनों राज्यों के खजाने में बड़े पैमाने पर आ रहे पैसों का उन्होंने अच्छा इस्तेमाल किया। सड़कें बनवाईं, बिजली पहुंचाई और लड़कियों में साईकिलें बांटी। इससे लोग फूले नहीं समा रहे। लेकिन, अन्य कई राज्यों से तुलना करें तो कहना पड़ेगा कि, यह कोई बहुत बड़ा विकास नहीं है। सरकारों को यह काम तो करना चाहिए। लेकिन, नीतीश बिहार में उद्योग-धंधों के लिये कोई अनुकूल माहौल बना सकें, जिससे राज्य में रोजगार पैदा हों और बिहार से लोगों का पलायन रुके। इस तरह नीतीश के विकास में कल्पनाशीलता का अभाव था, लेकिन विकास को तरसे बिहारियों को नीतीश का विकास ही स्वर्ग लगने लगा। नीतीश भी यह दिखाने लगे कि, उन्होंने विकास का कोई वैकल्पिक मॉडल खड़ा कर दिया है। अब जीत के बाद नीतीश की असली समस्याएं शुरू होंगी, क्योंकि जंगलराज के मसीहा लालू प्रसाद यादव सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरे हैं तो सुशासन बाबू कहलाने वाले नीतीश के लिये विकास तो दूर रहा सुशासन बनाए रखना भी मुश्किल हो जाएगा। दरअसल नतीजों से नीतीश भले ही किंग बने हों, मगर लालू प्रसाद किंगमेकर बनकर उभरे हैं। इसलिए राजनीति में यह सवाल उभरेगा कि किंग की चलेगी या किंगमेकर की। तब लालू और नीतीश में जंगल में मंगल होने के बजाय दंगल होते देर नहीं लगेगी।


क्या खोया क्या पाया


28-11-2015

लालू-नीतीश और कांग्रेस के महागठबंधन ने बिहार में बीजेपी के लिए न के बराबर ही कुछ छोड़ा है, 243 सीटों में से महागठबंधन को 178 सीटें मिली हैं। ये बहुमत दो तिहाई से भी ज्यादा का है। जिसके बारे में किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया होगा। बिहार चुनाव में बाजी मारने वाली पहले नंबर की पार्टी लालू प्रसाद यादव की आरजेडी ही है, जिसको बिहार की जनता ने सबसे ज्यादा वोट दे कर जिताया है। आरजेडी को कुल 80 सीटें मिली हैं। जबकि, 2010 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव की पार्टी को सिर्फ 22 सीटें मिली थीं, यानी इस बार करीब 58 सीटों से आगे रही आरजेडी। जबकि, नीतीश कुमार की जेडीयू को 71 सीटें मिली हैं। हालांकि, 2010 के चुनाव में जेडीयू को 115 सीटें मिली थीं मानें कि, इस बार जेडीयू को 44 सीटों का घाटा हुआ है। बावजूद इसके महागठबंधन के साथ मिल कर जीत का सेहरा तो जेडीयू ने भी ्अपने सिर बांध ही लिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि 2010 में नीतीश कुमार बीजेपी के साथ थे और इस बार महागठबंधन की एक मजबूत कड़ी हैं। इस बार कांग्रेस को भी जबरदस्त कामयाबी मिली है। 2010 में बिहार में कांग्रेस के पास सिर्फ 4 सीटें थीं, लेकिन इस बार कांग्रेस ने 27 सीटें जीती हैं, मतलब 23 सीटों का फायदा कांग्रेस को भी मिला है। अगर बीजेपी गठबंधन की सीटों को देखें तो बीजेपी को 2010 के मुकाबले बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। 2010 में बीजेपी ने 91 सीटें जीती थीं जबकि, इस बार बीजेपी को सिर्फ 53 सीटें ही मिली हैं। बीजेपी की हार की वजह उसके सहयोगी दल भी हैं। रामविलास पासवान की एलजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिली हैं, जबकि उपेंद्र कुशवाहा की आरएसएलपी को 2 सीटें और बीजेपी के तुरुप का पत्ता माने जा रहे जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) को सिर्फ 1 सीट मिली है, जो कि उम्मीद से कहीं ज्यादा कम है।

वोट शेयर के हिसाब से देखें तो लालू प्रसाद यादव का वोट बैंक टस से मस नहीं हुआ है। लालू यादव की पार्टी को करीब 18 फीसदी, नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को करीब 17 फीसदी और कांग्रेस को करीब साढ़े छह फीसदी वोट मिले हैं। कुल मिलाकर महागठबंधन को 41.6 फीसदी वोट मिले हैं। वोट शेयर के हिसाब से बिहार में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है। बीजेपी का वोट शेयर 2010 में साढ़े 16 फीसदी से बढ़कर इस चुनाव में करीब 25 फीसदी हो गया है। एक तरह से देखें तो आरजेडी और जेडीयू से बीजेपी का वोट शेयर करीब 7-7 फीसदी ज्यादा है, लेकिन गठबंधन के वोट शेयर को देखें तो करीब 7 फीसदी वोट का अंतर है। ये अंतर इतना बड़ा है कि महागठबंधन को दो तिहाई सीटें मिल गईं। ऐसे नतीजे इसलिए आए हैं, क्योंकि बीजेपी और उसके सहयोगी दल जनता को रिझाने में नकामयाब साबित हुए और वोट खींचने में असफल रहे।

बीजेपी, लालू और नीतीश कुमार के वोटों के समीकरण की काट नहीं कर पाई। बीजेपी के सहयोगी ही उसकी सबसे कमजोर कड़ी साबित हुए। मांझी, कुशवाहा और पासवान का फैक्टर बीजेपी के काम नहीं आया। जीतन राम मांझी खुद एक जगह से चुनाव हार गए, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने भी बहुत खराब प्रदर्शन किया। रामविलास पासवान के भाई और भतीजे दोनों चुनाव हार गए। इसके अलावा बीजेपी की अंदरूनी लड़ाई ने भी पार्टी को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया तो वहीं शत्रुघ्न सिन्हा खुलकर नीतीश कुमार के पक्ष में बोल रहे थे। सबसे बड़ी बात ये है कि बीजेपी के प्रचार में नेगेटिव कैंपेनिंग काफी हावी हो गई। मुद्दा विकास से भटककर बीफ, शैतान और पाकिस्तान वाले बयानों पर चला गया। इसके अलावा संघ प्रमुख मोहन राव भागवत के आरक्षण पर विवादित बयान ने भी बीजेपी को काफी नुकसान पहुंचाया। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने इसे अगड़ी और पिछड़ों की लड़ाई बनाकर पेश किया। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ओवर एक्सपोजर ने भी कहीं-ना-कहीं नुकसान पहुंचाया है। नरेंद्र मोदी ने बिहार में 30 रैलियां की थीं, जिसमें 4 रैलियां चुनाव की घोषणा से पहले और 26 रैलियां घोषणा होने के बाद की गई थीं। इन 30 रैलियों में 13 जगहों पर ही बीजेपी को जीत मिली और 17 जगहों पर पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। एक ओर केन्द्र में भाजपा ने शानदार जीत हासिल कर जहां अपनी जीत का परचम लहराया था, वहीं बिहार चुनाव में तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है। बिहार विश्व का पहला गणतंत्र रहा है, अत: हर राजनीतिक पार्टी बिहार में अपनी जीत दर्ज कराने में खुद की शान समझती है, लेकिन, भाजपा अपनी इस कोशिश में नाकामयाब रही, ये भाजपा और पूरे एनडीए के लिये काफी निराशाजनक है।

 प्रीति ठाकुर


बिहार मोदी लहर के लिए कड़ी परीक्षा थी और कहना न होगा कि, दिल्ली और बिहार के चुनावों ने बता दिया कि भाजपा अब केवल मोदी लहर के भरोसे चुनाव नहीं लड़ सकती। उसे राज्यों में अपने संगठन को मजबूत बनाना होगा। उसका कोई विकल्प नहीं है। दरअसल बिहार में उसकी हार की वजह यह भी है कि उसका गठबंधन बहुत कमजोर साबित हुआ। लोक जनशक्ति पार्टी, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी की पार्टी बेहद कमजोर साबित हुईं। वह न तो एनडीए के वोटों में इजाफा कर पाईं और न ही अपने लिए सीटें जुटा पाईं। उन्हें भाजपा ने ज्यादा सीटें देकर अपने पैरों पर कुल्हाडी मार ली। चुनावों में ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त था कि पप्पू यादव की पार्टी, समाजवाजदी पार्टी, औवेसी की पार्टी और वामपंथी मोर्चा आदि तो वोट कटवा की भूमिका भी ठीक से नहीं निभा पाए। लेखकों के पुरस्कार लौटाने वाले वामपंथी लेखक भाजपा के हारने से भले ही खुश हो लें लेकिन, उन्होंने जातिवादी पार्टियों की पिछलग्गू बनकर अपनी क्या दुर्गति बना ली है। कभी वामपंथियों का गढ़ रहे बिहार में अब वामपंथ का कोई भविष्य नहीं रहा है, केवल दो या तीन सीटें सीपीआई (एमएल)जीत सकी है। टीवी पर सारे वामपंथी बुद्धिजीवी वामपंथी दलों का नहीं, जातिवादी राजनीति का समर्थन करते नजर आते हैं। देश के वामपंथ का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?

भाजपा के चुनाव हारने के बाद यह कहा जा रहा है कि, जनता ने उसकी विभाजनकारी राजनीति को ठुकरा दिया है, गाय को चुनाव में लाना उसके लिये घातक साबित हुआ, क्योंकि गाय दूध देती है वोट नहीं, दादरी कांड आदि उसे ले डूबे, यह चुनाव मोदी सरकार पर जनमत संग्रह था, आदि आदि। कुछ हद तक यह बाते सही हो भी सकती है, लेकिन चुनावी नतीजों में इनकी भूमिका सीमित ही रही। वैसे ये सारी बातें ऐसी होती हैं, जिनके प्रभावों को नाप पाना असंभव होता है। यह बातें पत्रकारों के व्यक्तिगत अनुमानों पर ज्यादा आधारित होती हैं। उनका महत्व टीवी चैनलों पर बहसों को दिलचस्प बनाने के लिए ज्यादा होता है। फिर भी भाजपा को बयानबाजों पर अंकुश लगाने की कोशिश करनी ही चाहिए।

28-11-2015

चुनाव के नतीजों के बारे में अब कहा जा रहा है कि, इसने नीतीश कुमार की शोहरत में चार चांद लगा दिए हैं। इस जीत के साथ राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद इतना बढ़ गया है कि, वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रुप में उभरे हैं। लेकिन, गंभीर राजनीतिक पर्यवेक्षक इस बात को गंभीरता से नहीं लेते, क्योंकि केजरीवाल ने जब दिल्ली में जीत हासिल की थी, तब भी ऐसा कहा गया था लेकिन, बाद में पार्टी के अंदरूनी झगड़ों ने उनका कद और प्रतिष्ठा को बढ़ाने के बजाय घटा दिया। बिहार के चुनाव में उन्होंने जिस तरह महागठबंधन का पर्दे के पीछे से साथ दिया, उससे भ्रष्ट लालू की ही मदद हुई। फिर नीतीश का कद बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वे लालू के साथ कैसे निपटते हैं? वैसे लालू ने स्पष्ट कर दिया है कि, वे बिहार को नीतीश को सौंप रहे हैं और वे दिल्ली संभालेंगे। वैसे कई राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि, दस साल से सत्ता से दूर लालू को सत्ता का महत्व ज्यादा समझ में आएगा। वे कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगे, जिससे उनका नीतीश से टकराव हो। लेकिन, ऐसे राजनीतिक विश्लेषकों की भी कमी नही है, जो मानते हैं कि दोनों नेताओं का स्वभाव उन्हें लंबे समय तक साथ नहीं रहने देगा। इसके अलावा देश में जयललिता, ममता, नवीन पटनायक आदि ऐसे-ऐसे मुख्यमंत्री मौजूद हैं, जिन्होंने अपने बूते 35-37 लोकसभा सीटे हासिल की हैं, वे नीतीश को बहुत भाव देंगे, ऐसा नहीं लगता। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि, क्या कांग्रेस किसी गैर भाजपा गठबंधन में प्रधानमंत्री पद का दावा छोड़कर गौण भूमिका निभाने को तैयार होगी? इसकी संभावना कम ही है। वैसे इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि, फिर से तीसरा मोर्चा बनने की संभावनाएं बढ़ गईं हैं।


जहां-जहां की रैली, वहां-वहां खाई मुंह की


28-11-2015

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद रैलियों की शुरूआत की। लेकिन, ये भाजपा का दुर्भाग्य ही रहा कि उन्होंने जहां-जहां भी रैलियां कीं, वहां-वहां भाजपा को हार का ही मुंह देखना पड़ा। प्रधानमंत्री ने बिहार में कुल 30 रैलियां की थीं, लेकिन रैलियों में जुटी भीड़, वोट की सूरत में तब्दील नहीं हो सकीं। चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद नरेन्द्र मोदी ने जिन 26 शहरों में प्रचार किया, उनमें से 12 सीटों पर भाजपा हार गई। पहले दौर की 6 सभाओं की बात करें तो बेगूसराय और समस्तीपुर जैसे बड़े जिलों में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया है। वहीं मुंगेर, बांका और नवादा जिलों को मिलाकर सिर्फ 4 सीटें हासिल हुईं हैं। इस दौर में पीएम ने 5 सभाएं की थी। 2 जगह पार्टी जीती और 3 जगह हार गई।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्टूबर से बिहार के बांका से चुनाव प्रचार की शुरुआत की थी। लेकिन, बांका की 5 में से 4 सीटें महागठबंधन के खाते में चली गईं। पीएम ने एक ही दिन में 4 चुनावी सभाएं की थीं। 8 अक्टूबर को ही बेगूसराय, समस्तीपुर और नवादा में भी प्रधानमंत्री ने सभाएं की और लोगों को संबोधित किया। लेकिन, पीएम की इन कोशिशों के बाद भी इन तीनों जिलों की 22 सीटों में से एक भी सीट पर भाजपा अपना खाता नहीं खोल पाई। 8 अक्टूबर को ही मुंगेर में भी पीएम ने सभा की जिसका परिणाम यह हुआ कि यहां की 3 में से मात्र 1 सीट ही एनडीए के हाथ आई। भभुआ में भी पीएम की सभा हुई थी, लेकिन वहां की सीट जेडीयू के खाते में गई। जहानाबाद की सभी तीन सीटें महागठबंधन को मिलीं और मखदूमपुर सीट से जीतन राम मांझी हार गए। इस दौर में पीएम ने 4 सभाएं की और चारों जगह की सीट पार्टी हार गई। सासाराम की बात करें तो इस जिले में बीजेपी और आरएलएसपी को एक-एक सीट ही हाथ लगी है, जबकि इस जिले के दिग्गज नेता रामेश्वर चौरसिया भी हार गए। जिले की 7 में से 5 सीटें महागठबंधन की झोली में चलीं गईं। इसके बाद पीएम ने कैमूर और जहानाबाद में रैली की। जहां कैमूर जिले की 4 में से 2 सीटें बीजेपी, एक जेडीयू और एक बीएसपी के खाते में गई है। दूसरे दौर के चुनाव प्रचार की शुरुआत पीएम ने 9 अक्टूबर को औरंगाबाद से की। उस दिन पीएम औरंगाबाद और सासाराम गए। औरंगाबाद में बीजेपी अपना खाता तक नहीं खोल सकी। बाकी तीनों सहयोगियों के खाते में एक-एक सीट जरूर आईं। मतलब कि 6 में से बीजेपी खुद एक सीट भी नहीं जीत पाई। औरंगाबाद की सीट पर बीजेपी के रामाधार सिंह विधायक हुआ करते थे, लेकिन इस बार नीतीश और लालू की लहर का कहर उन पर भी बरपा है।

28-11-201525 तारीख को पीएम ने 4 सभाएं कीं। छपरा के मढौरा में उस दिन पीएम ने पहली सभा की थी। मढौरा से बीजेपी हार गई और हाजीपुर शहर की सीट बीजेपी जीत गई। इसके अलावा पटना में पीएम ने रैली की थी, वहां पार्टी को जीत हासिल हुई। नालंदा के बिहारशरीफ में भी पीएम ने सभा की थी। यहां की 7 में से 6 सीटें बीजेपी हार गई है। 26 अक्टूबर को पीएम ने बक्सर और सीवान में सभा की थी। बक्सर में सिर्फ एक बक्सर की सीट बीजेपी जीत सकी है। जिले की बाकी 3 सीटें महागठबंधन के खाते में चली गईं। इस दौरान मोदी ने कुल 5 सभाएं कीं, जिसमें से 4 सीटों पर पार्टी जीती और एक पर हार हुई।

चौथे दौर के चुनाव प्रचार की शुरुआत पीएम ने सीवान से की थी। सीवान मे कुल 8 सीटें हैं। जिसमें से सीवान शहरी सीट को छोड़कर बीजेपी जिले की तमाम सीटें हार गई। 27 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने बेतिया, सीतामढ़ी और मोतिहारी में सभा की। बेतिया शहर में 15 साल से बीजेपी का कब्जा था, लेकिन यहां से बीजेपी हार गई। मोतिहारी से बीजेपी के प्रमोद कुमार जीत गए हैं। 30 अक्टूबर को गोपालगंज और मुजफ्फरपुर में पीएम की रैली थी। दोनों ही सीटों से बीजेपी को जीत हासिल हुई है, लेकिन इन जिलों में एनडीए का प्रदर्शन काफी खराब रहा। कुल मिलाकर चौथे दौर में 6 जगहों पर सभाएं हुईं, जिनमें से 4 सीटें पार्टी जीत गई। पांचवें दौर के चुनाव के लिए पीएम ने 1 नवंबर को मधुबनी, मधेपुरा, कटिहार में सभाएं की थीं, जिसमें से कटिहार को छोड़ कर मधुबनी और मधेपुर से बीजेपी हार गई। 2 नवंबर को दरभंगा, पूर्णिया और फारबिसगंज में पीएम ने सभाएं की, जिसका परिणामस्वरूप पार्टी को तीनों शहरों से जीत हासिल हुई। यानि, पांचवें दौर की कुल 6 सभाओं में से बीजेपी को 4 जगह से जीत और 2 जगह से हार का सामना करना पड़ा।

         प्रीति ठाकुर  


यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, अध्यक्ष अमित शाह के चुनाव व्यवस्थापन के लिये नई चुनौतियां लेकर आया है। अब दोनों का नेतृत्व पहले की तरह निर्विवाद नहीं रह जाएगा। कुछ सुगबुगाहटें तो अभी से पैदा हो गईं हैं। जिन लोगों को सत्ता में भागीदारी नहीं मिली है, वे अब शत्रुघ्न सिन्हा या अरुण शौरी के तरह अपने असंतोष को प्रकट कर सकते हैं। इसके अलावा सरकार को उन नेताओं पर भी अनुशासन का डंडा चलाना पड़ेगा जो अनावश्यक बयानबाजी कर पार्टी और सरकार के लिए परेशानी पैदा करते हैं। इसके अलावा बिहार की हार ने भाजपा की मोदी के इस कार्यकाल में बहुमत हासिल करने की मंशा पर पानी फेर दिया है। निश्चित ही इससे सरकार के आर्थिक सुधार तेज करने का संकल्प प्रभावित होगा। कल एक टीवी बहस के दौरान शेषाद्रीचारी ने कहा कि सरकार को अपने कामकाज के लिये राज्यसभा में बहुमत पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। उसे एकमत बनाने की कोशिशें करनी चाहिएं। अभी तो सरकार के लिये यही राह खुली हुई है। लेकिन, बिहार की जीत के बाद विपक्ष में नई जान आ गई है, वह ज्यादा मुखर होगा और एकमत बनाने में उसकी दिलचस्पी कम होगी। वैसे भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना, अकाली दल आदि का भाजपा पर दबाव बढ़ जाएगा।

वैसे बिहार के नतीजे बिहार के लिये बहुत शुभ संकेत नहीं हैं। लालू का राजनीति में पुनरोदय राज्य के लिये अच्छा संकेत नहीं है। विकास की राजनीति करने वाले नीतीश अब पूरी तरह से लालू पर निर्भर होंगे। उनको लालू से कम सीटें आई हैं, विकास तो छोड़ ही दीजिए, सुशासन भी प्रभावित होगा। कभी कभी तो लगता है, बिहार के मतदाताओं ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। बिहार फिर जातिवाद के भंवर में फंस गया है।

 सतीश पेडणेकर

 

 

 

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