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बिहार के जनादेश के मायने

बिहार के जनादेश के मायने

हाल में संपन्न बिहार के विधानसभा चुनावों का असली विजेता कौन है? और असली हार किसकी हुई है? विजेता या उसके गठजोड़ की सफलता की वजहें क्या हो सकती हैं? हारी हुई पार्टी या गठजोड़ के खिलाफ क्या वजहें रही? और अंत में, 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों का राष्ट्रीय राजनीति में क्या असर पडऩे वाला है?

मेरे ख्याल से, कमोवेश ये सवाल देश में राजनीति के हर जानकार या विश्लेषक के दिमाग में होंगे। लेकिन, उनके जवाब अलग-अलग हो सकते हैं। यूं तो सभी सवाल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन मेरे लिये आखिरी सवाल सबसे अहम है, इसलिए उसके विस्तार में मैं ज्यादा जाऊंगा।

हालांकि, मुझे पहले सवाल से ही शुरू करने दीजिए। मेरे हिसाब से असली विजेता लालू प्रसाद यादव हैं। वे देश में मौजूदा वक्त में ऐसे पहले बड़े नेता (पूर्व मुख्यमंत्री तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री) हैं, जो भ्रष्टाचार में दोषी ठहराए गए हैं और इसलिए वे छह साल (2019) तक चुनाव लडऩे के योग्य नहीं हैं, लेकिन उन्होंने चमत्कार कर दिया। उनका राष्ट्रीय जनता दल (राजद) 80 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरा। 2010 के विधानसभा चुनावों में (22 सीटें) और 2014 के संसदीय चुनावों में (महज 4 सीट) पाकर उनकी पार्टी हाशिये पर पहुंच गई थी। लेकिन, आज लालू बिहार के किंगमेकर बनकर उभरे हैं। इसके नाते अब वे राष्ट्रीय मंच पर बेहतर भूमिकाएं निभा सकेंगे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसमें कहां बैठते हैं? उन्हें राजद और कांग्रेस से गठजोड़ करने के बाद फिर जनादेश हासिल हुआ है। इसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि, नीतीश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस दूसरे मुकाबले में पटकनी दे दी। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ (एनडीए) से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के नाता तोडऩे के बाद ये दोनों पिछले दो साल से एक-दूसरे से भिड़ते रहे हैं। लेकिन, मेरे हिसाब से इस चुनाव में सबसे बड़ी हार नीतीश की हुई है। पिछले साल से वे बिहार के निर्विवाद नंबर एक नेता रहे हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। वे मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। लेकिन, उनके समर्थक और चहेते अब शायद ही ये दावा कर पाएं कि, वे नंबर एक हैं। इस मायने में चुनाव खत्म होने के बाद भी बिहार के नेतृत्व का मामला (लालू और नीतीश के बीच) अनसुलझा है।

आइये, अब कुछ ठोस तथ्यों पर नजर डाली जाए। निवर्तमान बिहार विधानसभा में जदयू की 115 सीटें थीं। लेकिन, नई विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने 71 विधायकों के साथ ही बैठेंगे। यानी 44 सीटें कम हो गईं। दूसरे, राज्य में सबसे प्रमुख दल से जद(यू) अब भाजपा (जी हां, विडंबना देखिए कि भाजपा) और राजद के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच गई है। इकलौती पार्टी के नाते भाजपा को करीब 24.8 प्रतिशत वोट मिले, जो राजद के 18.5 और जद(यू)के 16.7 प्रतिशत वोटों से अधिक है। चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि, भाजपा को कुल 91.5 लाख वोट मिले, जबकि राजद को 67.9 लाख और जद(यू) को करीब 62 लाख वोट मिले। महागठबंधन में लड़ी कांग्रेस को महज 6.7 प्रतिशत वोट मिले। हालांकि, वह 27 सीटें जीतने में कामयाब हो गई, जो उसका 1995 के बाद से बिहार में सबसे अच्छा प्रदर्शन है। 2010 में कांग्रेस को महज चार सीटें मिली थीं, इसलिए इस बार उसकी सफलता दर करीब 65 प्रतिशत रही है। लेकिन, उसकी ताकत के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह महागठबंधन में सबसे छोटा सहयोगी रही है और लालू-नीतीश की पीठ पर सवारी करके इतनी ताकत पा सकी है।

अब आइये, भाजपा की अगुआई वाले एनडीए का हाल जाना जाए। भाजपा 2010 के 91 से 53 सीटों पर पहुंच गई है। उसके सहयोगियों ने उसे और नीचा दिखाया। इस कदर कि, एनडीए को कुल 34 प्रतिशत वोट ही मिले, जबकि महागठबंधन को करीब 46 प्रतिशत वोट मिले। भारत के किसी चुनाव में जीतने और हारने वाले के बीच करीब 12 प्रतिशत वोटों का अंतर भारी माना जाता है। फिर, एनडीए की अगुवाई खुद प्रधानमंत्री कर रहे थे, इसलिए यह मोदी की बुरी हार है, खासकर इसलिए भी क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में उनकी अगुवाई में एनडीए कुल 40 संसदीय सीटों में से 31 जीती थी।

तो, इस चुनाव में जीत और हार को कैसे समझेंगे? जवाब इसी में है कि विजेताओं को वोट अपने लिए मिला है या मोदी की भाजपा के खिलाफ। हालांकि इस बारे में निश्चित तौर पर कहना मुश्किल है। अगर कोई यह कहे कि मोदी और भाजपा ने नकारात्मक प्रचार किया तो यह मोदी के खिलाफ वोट हो जाता है। यह सोच इस तथ्य से पुष्ट होती है कि लालू और नीतीश प्रचार के दौरान इस पर कम ही बोले कि उन्हें लोग क्यों वोट दें, वे ज्यादातर समय यही कहते रहे कि मोदी को लोग इसलिए वोट न दें, क्योंकि वे ‘‘सांप्रदायिक राजनीति’’ करते हैं, ‘‘वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं’’, उनकी नीतियां ‘‘गरीब विरोधी’’ हैं, वे ‘‘अहंकारी’’ हैं, वगैरह-वगैरह। हालांकि, इन सभी आरोपों पर बहस हो सकती है और महागठबंधन पर भी ये आरोप मढ़े जा सकते हैं। मैं यह यकीन के साथ नहीं कह सकता कि, भाजपा ने ही बिहार से काफी दूर दादरी में एक मुसलमान की कथित तौर पर गाय की हत्या और गोमांस खाने के लिए पीट-पीटकर हत्या के साथ चुनावों को सांप्रदायिक रंग दे दिया। गौर से देखें तो लालू ने ही मुसलमानों और सेक्यूलर राजनीति के प्रति अपना सरोकार दिखाने के लिये पहले बीफ का जिक्र किया और अपने बड़बोलेपन में फंस गए।

28-11-2015

लोगों को भाजपा की भाषा और शैली में गड़बडिय़ां दिखती हैं। लेकिन, महागठबंधन के बारे में क्या कहेंगे? भाजपा ने अगर मुसलमान विरोधी नारे उछाले तो लालू तो मुसलमानों और कुछ जातियों को गोलबंद करने के लिए खुलेआम आह्वान कर के ध्रुवीकरण करने की कोशिश की। मैं यह नहीं समझ पाता कि, किसी उम्मीदवार के पक्ष में हिन्दुओं को गोलबंद करना सांप्रदायिकता है तो मुसलमानों को गोलबंद करना सेकुलर कैसे हो जाता है। मैं यह भी नहीं पचा पाता कि मोदी की भाषा अगर नीतीश और लालू के लिए तीखी है तो मोदी के खिलाफ लालू के बोल (जो छापने लायक भी नहीं है) कैसे जायज और राजनैतिक संवाद का ‘अद्भुत’ नमूना हो जाते हैं! सभी ने कहा कि मोदी के चुनावी भाषण का 90 प्रतिशत हिस्सा विकास की बातों को समर्पित होता था तो लालू, नीतीश और राहुल गांधी (कांग्रेस उपाध्यक्ष) के भाषणों में (जातियो और अल्पसंख्यकों की)पहचान की राजनीति पर जोर होता था। फिर भी मोदी विभाजनकार हो जाते हैं, जबकि दूसरे पाले के नेता राष्ट्रीय एकता और शांति के दूत की तरह पेश किए जाते हैं! ‘

यहां मैं, नीतीश कुमार के नारे ‘‘बिहारी बनाम बाहरी’’ का जिक्र करना चाहूंगा, जिससे वे वोटरों कह रहे थे कि उनके जैसे ‘‘बिहारी’’ पर भरोसा करें, मोदी जैसे ‘बाहरी’ पर नहीं। राष्ट्रीय एकता और भावना के लिए ऐसे नारे पर चुनाव लडऩे से अधिक खतरनाक और क्या हो सकता है। नीतीश के इस नारे का मतलब देश के विभिन्न राज्यों में ‘धरती-पुत्रों’ की उग्र राजनीति करने वालों को ही शह देना होगा। यह बिहारियों के लिये भी खतरनाक होगा क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की तो बात ही छोडि़ए मुंबई, सूरत और भोपाल जैसे शहरों में बिहारी भरे पड़े हैं और अपने काम का महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। अब महाराष्ट्र में अगर शिवसेना या गुजरात और मध्यप्रदेश में भाजपा नीतीश के नारे का नकल करती है तो देश जल उठेगा। नीतीश की दलील इस मायने में भी बेमानी है कि मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए बिहार के लिए वे बाहरी नहीं हुए।

हां, इस दलील में जरूर कुछ दम है कि मोदी की नाकामी (और लालू-नीतीश की सफलता ) का राज यह है कि एनडीए ने कोई मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं उतारा। यह किसी भी चुनाव में अहम होता है, चाहे प्रांतीय चुनाव में हार हो या राष्ट्रीय। दूसरी ओर नीतीश महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के चेहरा थे। दूसरे, लोकसभा चुनावों में लहर बनकर उतरने वाले मोदी का वह जादुई एहसास अब लोगों को आकर्षित नहीं करता। उन्हें अब अनिर्णयग्रस्त और वादे न पूरे करने वाले नेता के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि इस बार बिहार चुनाव का सबसे अहम पहलू महागठबंधन के पक्ष में वोटों का गणित और उसकी केमिस्ट्र रही है। अगर 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन को देखें तो उससे भी इस बार मोदी की अगुवाई वाला एनडीए नीतीश-लालू-राहुल के महागठबंधन से काफी पिछड़ा हुआ था। 2014 में एनडीए को 38.8 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि लालू-नीतीश-राहुल के वोट को जोड़ दें तो वह 45 प्रतिशत बैठता है। लेकिन, उस समय लालू और नीतीश अलग-अलग लड़े थे। इसलिए एनडीए कुल 243 विधानसभा क्षेत्रों में से 172 सीटों पर जीत दर्ज कर सका था। इस बार वे मिलकर लड़े तो एनडीए सिर्फ 92 सीटों पर उतर आया, 145 सीटें ऐसे ही महागठबंधन की ओर चली गई थी। मैं यहां बुजुर्ग विश्लेषक सुरजीत एस. भगा का जिक्र करना चाहूंगा। जिन्होंने, बड़ी सूझबूझ के साथ बताया था कि दुनिया भर के चुनावों के अनुभव के मद्देनजर किसी राष्ट्रीय चुनाव के दो वर्ष के भीतर सत्तारूढ़ दल करीब 6 प्रतिशत वोट गंवा बैठता है।

सुरजीत एस. भगा ने भविष्यवाणी की थी, ‘‘सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि एनडीए 80 सीटों के आगे बमुश्किल जा पाएगा। उसे 50 से 70 सीटें मिलने की संभावना ही है। अगर मुझे ठीक-ठीक अनुमान लगाने को कहा जाए तो मैं कहूंगा कि जद(यू) गठजोड़ को 175 सीटें और उनडीए को 60 सीटें मिल सकती हैं।’’ उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई! इसलिए यह कोई अजूबा नहीं है कि एनडीए क्यों हारा। उसके जीतने की संभावना तभी थी जब जद(यू), राजद और कांग्रेस के वोटर अपने अंर्तविरोधों को भुला नहीं पाते, लेकिन नतीजों से साफ है कि उन्होंने अंर्तविरोध भुला दिया।

28-11-2015

अब आइए देखें कि बिहार चुनाव के नतीजों का राष्ट्रीय असर क्या होने वाला है? बेशक, लोकसभा में भाजपा की संख्या के मद्देनजर इससे केंद्र सरकार के स्थायित्व पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन, यह तो कबूल करना ही होगा कि मोदी का करिश्मा उतार पर है। बिहार चुनावों की हार से केंद्र सरकार की साख प्रभावित होगी और प्रधानमंत्री के खिलाफ मोहभंग की बयार बहने लगेगी। जबकि उनका कार्यकाल अभी साढ़े तीन साल बाकी है। इसके अलावा बिहार में हार से भाजपा असम समेत पूर्वी भारत में बड़ी ताकत बनकर नहीं उभर पाएगी। इससे देश को विकसित करने का उनका नजरिया भी प्रभावित होगा। विपक्ष संसद के भीतर और बाहर अधिक जोरदार ढंग से उनकी योजनाओं में पैर फंसाएगा।

इसका मतलब यह नहीं है कि, हमारे आगे अभी से यह साफ हो गया है कि 2019 के आम चुनाव (या वे जब भी हों) में राष्ट्रीय विपक्ष कैसा शक्ल लेगा। जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि बिहार में असली नेतृत्व का मामला सुलझा नहीं है। इसलिए अभी यह मान लेना मुश्किल है कि विपक्ष मोदी के खिलाफ किसी एक नेतृत्व में लड़ेगा। अगर ऐसा होता भी है तो अभी नेता को पहचान पाना मुश्किल है। क्या वे नीतीश होंगे या लालू (अगर आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट से चारा घोटाले से बरी हो जाते हैं)? या फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल या मुलायम सिंह यादव या मायावती या राहुल गांधी होंगे? ये लाख टके के सवाल हैं जिनका जवाब बिहार के नतीजों से नहीं मिलता।

दूसरी ओर बिहार के नतीजे यह भी अंदाजा नहीं देते हैं कि, सत्तारूढ़ भाजपा में मोदी के नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठने लगेंगे, जिसकी चर्चा दिल्ली के बातूनी वर्ग में खूब है। अगर नीतीश, लालू या राहुल गांधी ही 2014 में भारी झटके से उबर सकते हैं तो भला मोदी को उबरने में क्या बात आड़े आ सकती है? मुझे लगता है कि, मोदी या भाजपा इस मौके को सुशासन और विकास के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करने और बड़बोले तत्वों को किनारे करने में लगाएंगे।

अभी तो मोदी को सत्ता संभाले महज 18 महीने ही हुए हैं। लेकिन, लालफीताशाही और लाइसेंस राज जारी है। भारत कारोबार करने के लिहाज से काफी मुश्किल देश बना हुआ है। मोदी अभी भी 50 प्रतिशत से अधिक आला निवेशकों को आकर्षित करने में नाकाम हैं। असल में पुराने किस्म के कानूनों के अलावा विदेशी कंपनियों को राष्ट्रीय मंच पर नहीं तो सूबों में नेताओं और मीडिया का विरोध झेलना पड़ता है। अफसरशाही अभी भी प्रक्रिया को पेचीदा बनाती है।

मोदी ने नेहरूवादी मॉडल को तोड़कर सुशासन का एक नया मॉडल देने की बात की थी। वोटरों ने उन्हें मोदी मॉडल लाने की कोशिश करने का पांच साल का समय दिया। लोगों ने उस मायने भाजपा में नहीं, बल्कि मोदी में अपना भरोसा जताया था, क्योंकि पार्टी अभी भी नेहरूवादी मॉडल से ही जुड़ी हुई है। हालांकि, यह जानना अभी संभव नहीं है कि मोदी अपनी पार्टी भाजपा या संघ परिवार में विरोध को किस कदर शांत कर पाएंगे, क्योंकि संघ परिवार भूमंडलीकरण या उदारीकरण का घोर विरोधी है। दरअसल आरएसएस को मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम कतई नहीं सुहाता। जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह आज भी एक लोकलुभावन पार्टी ही है।

दरअसल मोदी और भाजपा की दिक्कत तीन मामलों में है। मैं पहले भी इस बारे में लिख चुका हूं। इन मसलों को सुलझाये बगैर मोदी अपनी खोई जमीन वापस नहीं पा सकते। एक, मोदी (और उनके मंत्रियों ) और पार्टी कार्यकर्ताओं/समर्थकों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। कुर्सी पाने के बाद मंत्री अपने घेरे में मस्त हैं और कार्यकर्ताओं तथा सहानुभूति रखने वालों के प्रति अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं, जो उनकी और पार्टी की जीत के लिये वर्षों से बिना मुरझाए सक्रिय रहे हैं। इससे भी बदतर यह है कि उनकी जीवन- शैली बदल गई है। इसमें दो राय नहीं कि पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को मोदी के महंगे कपड़े पहनना (हालांकि यह मिथक है कि वे दस लाख का सूट पहनते हैं) या उनके मंत्रियों का वीआइपी कल्चर नहीं सुहाया। एक दलील यह है कि मंत्री कार्यकर्ताओं से इसलिए नहीं मिलते, क्योंकि वे कोई मांग कर बैठेंगे या सिफारिश करने को कहेंगे। वैसे, हर मामले में यह सही नहीं हो सकता, क्योंकि कार्यकर्ता कई बार सलाह देने भी जाते हैं। यह भी सही है कि लोकतंत्र में राजनैतिक सरपरस्ती जायज मानी जाती है।

किसी नेता को यह नहीं समझना चाहिए कि वह भगवान है और मंत्री बनकर वह तो चुनावी जीत का लाभ लेगा और उसके पार्टी कार्यकर्ता हमेशा काम करते रहेंगे, बदले में कुछ नहीं मांगेंगे। दरअसल सफल नेता वह होता है, जो अपने समर्थकों के प्रति वफादार होता है। लेकिन, छोटे स्वार्थों के लिए राष्ट्रीय हित को तिरोहित नहीं करता। मोदी को संघ परिवार, खासकर आरएसएस के नेताओं से बात करनी चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि, दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों में उग्र और कट्टर भावनाओं को छोडऩा चाहिए और इसी वजह से उग्र नेताओं को अपने तरीके बदलने चाहिए। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि, आरएसएस में ढेरों लोग ऐसे नहीं हैं, जो ईमानदारी से समाज की भलाई के काम में नहीं जुड़े हैं। मोदी को उनसे कहना चाहिए कि, संकीर्ण हिंदू वोट बैंक की राजनीति उन्हें छोडऩी चाहिए।

दूसरे, मोदी के बारे यह धारणा है कि वे दावे तो ऊंचे-ऊंचे करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम बहुत कम करते हैं, चाहे स्वच्छ भारत अभियान हो या गंगा सफाई परियोजना। इसी तरह वे ‘मेक इन इंडिया’ की बात करते हैं, लेकिन उसका मतलब तब तक खास नहीं निकलेगा, जब तक ऐसी शिक्षा नीति नहीं लाई जाएगी जो हमारे स्नातकों को रोजगार लायक बनाए और ठोस प्रशासनिक सुधार हो। और तो और, बड़े-बड़े बयानों के बावजूद मोदी सरकार खाद्य पदार्थों की कीमतों पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हो पाई है। मेरी राय में इसी महंगाई ने बिहार में मोदी की संभावनाएं घूमिल कर दीं। किसानों को इस महंगाई से एक पैसे का फायदा नहीं होता। अगर किसान को अपनी शुरुआती कीमत से 400 से 700 गुना अधिक पर अनाज खरीदना पड़ता है, तो सही है कि वितरण शृंखला पर मोदी का कोई काबू नहीं है।

तीसरे, मोदी के सामने दिल्ली में राष्ट्रीय मीडिया का भारी विरोध झेलना पड़ता है। यही रवैया राष्ट्रीय बुद्धिजीवी वर्ग का भी है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि, राष्ट्रीय जनमत तैयार करने वाले अकादमिक, कलाकार, पत्रकार और ऐसे बुद्धिजीवी जो नेहरूवादी मॉडल में रचे-बसे हैं या ‘वाम/उदार/सेकुलर तंत्र से जुड़े हैं, वे सभी मोदी, भाजपा या वैकल्पिक दृष्टि रखने वाले सभी से घोर घृणा करते हैं। फिर भी उन्हें शांत करने या उखाड़ फेंकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, भले मोदी के पास वह शक्ति हो। यह करना तो फासीवाद होगा। नेहरूवादी विचारधारा में ये लोग इतने रचे-बसे हैं, कि इन्हें मोड़ा या झुकाया नहीं जा सकता। लेकिन, मोदी यह कर सकते हैं कि जहां सरकार की चलती हो, उन विश्वविद्यालयों, थिंक टैंक या मीडिया में वैकल्पिक विचारधारा के लोगों (न कि सिर्फ आरएसएस से जुड़े लोगों को) को जगह दें। लेकिन, इससे भी बढ़कर मोदी को इन बुद्धिजीवियों के साथ रहना सीखना होगा, जो उनके कार्यकाल को अपने पैमाने से तौलेंगे। उन्हें बुद्धिजीवियों में अपने और सरकार के बारे में फैली धारणा को शांत करने का कोई और तरीका निकालना होगा।

बहरहाल, मोदी के पास साधारण जीवन जीने, कड़ी मेहनत करने और वादों पर अमल करने के अलावा कोई चारा नहीं है। यही बिहार नतीजों के असर को कम करने का बेहतर तरीका हो सकता है। मोदी को यह समझना चाहिए कि बिहार चुनाव उनके प्रधानमंत्री होने पर बड़ा सवाल है, अब उनका काम ही बताएगा कि यह सवाल बड़ा नहीं है।

प्रकाश नंदा

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