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तो, जाति से मात खा गया विकास!

तो, जाति से मात खा गया विकास!

अब तो जो होना था, हो गया इसलिए भाजपा के रणनीतिकारों गहरा आत्ममंथन करना होगा। बिहार की परीक्षा पास करने का पक्का भरोसा होने के बावजूद नरेंद्र मोदी का जादू काम नहीं कर पाया। प्रधानमंत्री की विशाल रैलियां भी कोई नतीजा नहीं दिला पाईं। आखिरकार विकास के एजेंडे और नरेंद्र मोदी की विराट शख्सियत की काट अकेले जाति के मुद्दे में मिल गई। पिछले लोकसभा चुनावों की तरह हाईटेक सोशल मीडिया का अभियान भी बिहारियों को यकीन नहीं दिला पाया। मोदी की पसंदीदा टोली ने चुनाव रणनीति को धारदार बनाने की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, लेकिन आखिरकार उनकी हर कोशिश नाकाम साबित हुई। आखिर वहां के लोगों ने बिहारियों की ही सुनी, बाहरी की नहीं। इससे सेक्युलर मीडिया एक बार फिर मोदी के सरपरस्तों पर हमला बोलने का मूड़ बना चुका है और जाहिर है, यह बड़ी साजिश की तरह होगा।

मध्य प्रदेश में कुछ साल पहले सड़क, बिजली, पानी के मसले पर कांग्रेस के दिग्गी राजा को भाजपा ने पटखनी दी थी और जाति का मामला दब गया था। बिहार भी बिमारू स्थिति से जूझ रहा है। कई ऊंचे और निचले वर्गों के बिहारी रोजगार और सुविधाओं के अभाव में बाहर का रुख कर रहे हैं। आश्चर्य है, फिर भी विकास का एजेंडा काम नहीं कर पाया? इसलिए कहीं इसी के बीच वह सूत्र है जिसे मोदी और उनके रणनीतिकारों को पकडऩा होगा। दिल्ली में भाजपा की भारी हार के बाद से यह इंतजार ही होता रहा कि पार्टी संगठन को मजबूत किया जाएगा। वह कहावत है न कि बड़ पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है! इसलिए अब मोदी हार गए हैं तो समीक्षा और समुचित कार्रवाई की जरूरत है।

मोदी के वफादारों ने फौरन यह ऐलान कर दिया कि बिहार के नतीजे प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं हैं। यह तो सभी जानते थे कि पटना के नतीजे चाहे जो आएं, लोकसभा सदस्यों की संख्या पर उससे कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है, लेकिन मोदी की छवि और असर तो काफी हद तक घट गया है। इस साल के शुरू में दिल्ली से जो बयार बही, अब वह पुख्ता हो गई है। लेकिन यह देश के लिए कतई अच्छी नहीं है। मोदी की राष्ट्रीय हीरो और परिवर्तनकारी नेता की छवि को झटका लगा है।

बिहार चुनावों के दो महीने पहले मोदी ने राज्य के लिए 1.25 लाख करोड़ रु. के पैकेज की घोषणा की। उन्होंने आने वाले मंत्रियों को प्रचार के लिए भेजा और खुद 28 रैलियां को संबोधित किया। इसके साथ शुरू हुई पंद्रह महीने पहले भारी जीत से दमकते लोकप्रिय तथा ताकतवर प्रधानमंत्री और एक करिश्माई मुख्यमंत्री तथा उनके दागदार सहयोगी की तीखी जुबानी जंग। भाजपा अध्यक्ष ने बिहार चुनाव जीतने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी। आखिर वे सबसे वफादार सहयोगी जो हैं। लेकिन सब कुछ बेकार गया। ऐसा लगता है कि भाजपा में एक नया तरीका अपना लिया गया है कि पार्टी को नया चेहरा देकर उसकी परंपरागत व्यवस्थाओं और रणनीतियों को भुला दिया जाए। बदलाव का बेशक स्वागत होना चाहिए, लेकिन सवाल है कि किस कीमत पर?

मोदी के पास अभी भी साढ़े तीन साल का समय बाकी है, अगर उनकी सरकार ऐसे नतीजों से पंगु हो जाती है, तो यह सचमुच एक राष्ट्रीय त्रासदी की तरह होगा। उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली है और अब एनडीए के विकास के एजेंडे पर आगे बढऩे को तैयार दिखते हैं। सुधारों की प्रक्रिया अभी भी आधे में ही अटकी हुई है। जीएसटी, श्रम कानूनों में सुधार और विदेशी निवेशकों के लिए सहूलियत वाला माहौल बनाने का काम अभी बाकी है। बिहार के नतीजों से विपक्ष संसद के बाहर और भीतर तेज हमले शुरू कर सकता है और उन आर्थिक सुधारों में फगार फंसा सकता है, जिन्हें मोदी आगे बढ़ाने की भारी कोशिश कर रहे हैं। आखिर उन्हें भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेना ही पड़ा जिस पर वे अड़े हुए थे।

बेशक, बिहार में जीत से राज्यसभा में संख्या के लिहाज से कोई बड़ा फर्क भले न आता, लेकिन उससे मोदी को अपनी सुधार प्रक्रिया को जोशोखरोश से आगे बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से ज्यादा ताकत मिल जाती। बिहार के बाद वह बढ़त उन्हें हासिल हो जाती जिसकी चर्चा अर्थशास्त्री और राजनैतिक विश्लेषक कर रहे थे। लेकिन हार से उन निवेशकों में जरूर निराशा छा सकती है जो मोदी सरकार के सुधार कार्यक्रमों को आगे बढऩे की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। शेयर बाजार ने अगले दिन इस मूड का अंदाजा दिया।

निवेशक और अर्थव्यवस्था के जानकार चाहते थे कि भाजपा बिहार चुनाव जीते, क्योंकि पार्टी राज्यसभा में अपनी ताकत बेहतर करने की कोशिश कर रही थी। उधर सदन में उसकी कमजोर स्थिति कई सुधार कार्यक्रमों को पारित कराने में रोड़ा बनी हुई है। बिहार की हार से उस बहुमत की संभावना अब 2019 से आगे खिंच सकती है, जब मोदी का कार्यकाल खत्म होगा।

मोदी के लिए चुनौती यह है कि वे हार के बावजूद इस प्रक्रिया को आगे ले जाएं। सरकार के वित्तीय समायोजन, सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क और नकदी हस्तांतरण योजना तथा वित्तीय क्षेत्र को दुरुस्त करने के कार्यक्रम जैसे कदमों को अहम सुधारों के लिए जरूरी कदम माना जा रहा है। एनडीए सरकार इसकाश्रेय ले सकती है, लेकिन इसमें कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट का बड़ा योगदान रहा है। इससे देश के आयात खर्च का बोझ कम हुआ और महंगाई के मोर्चे में कुछ राहत मिल गई।

अब लोगों में यह धारणा घर करती जा रही है कि मोदी सरकार की घरेलू नीतियां मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग की तकलीफें दूर करने में नाकाम होती जा रही हैं। महंगाई सिर चढ़कर बोलने लगी। दाल, तेल, सब्जियों के दाम से आम आदमी का जीवन दूबर होता जा रहा है। इससे जमाखोरों और कालाबाजारियों का तो मुनाफा बढ़ रहा है, लेकिन आम लोगों के दो जून की रोटी पर भी आफत पड़ती जा रही है। मौसम की मार से पैदावार बर्बाद होने के कारण किसानों की खुदकशी के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। सरकार कालेधन को वापस लाने के दावे चाहे जितना करे, लेकिन धरातल पर तो उसका असर खास नहीं दिख रहा है। 15 लाख रु. देश के हर आदमी के खाते में डालने का वादा तो अमित शाह ही जुमला कहकर खारिज कर चुके हैं। बिहार में हार का पार्टी पर दूरगामी असर पड़ सकता है। मोदी को अब बेकार लोगों की मंडली को हटाने पर मजबूर होना पड़ेगा। उन्हें समझदार लोगों और दरकिनार किए गए नेताओं की बात सुननी पड़ेगी, जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी की सेवा की है। मोदी को अपनी टीम को नया स्वरूप देना होगा और बयान बहादुरों से तौबा करनी पड़ेगी। देश के लोग तो उन्हें काम दिखाने के लिए अभी और मोहलत देने को तैयार लगते हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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