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रसातल की ओर कांग्रेस

रसातल की ओर कांग्रेस

By विजय दत्त

कभी-कभी मजाक भी हकीकत को  प्रदर्शित कर देता है। कुछ ऐसी ही वास्तविकता यह जोक भी बता रही है। सोनिया गांधी ने अपने दुलारे बेटे राहुल गांधी से पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए कहा। बेटे ने कहा-कौन-सी पार्टी!

अगर राहुल गांधी अपनी कांग्रेस पार्टी, जिसके वे उपाध्यक्ष हैं, की सतत पतन की वास्तविकता को समझ लेते तो आश्चर्य नहीं होता। अभी भी कांग्रेस से जुड़े नेता कथित रूप से यह सोच रहे हैं कि वे पार्टी में रहें या नहीं।

129 साल पुरानी पार्टी की इस स्थिति के लिए आखिर कोई तो जिम्मेवार है। यह पार्टी अभी हाल तक वट वृक्ष की तरह थी, जिसके नीचे कोई भी वृक्ष पनप नहीं सकता था। गांधी परिवार के मां-बेटे ने पिछले दशक में पार्टी को अपनी जागीर बना ली और उस पर तानाशाह की तरह शासन किया। राजनीति की नई खिलाड़ी मां सिर्फ अपने कुछ खास लोगों पर निर्भर रही और उन लोगों को पार्टी से पूरी तरह दूर रखा जो राजनीति को गंभीरता से लेते थे। सिर्फ वही लोग सोनिया गांधी से मिल सकते थे, जिन्हें चाटूकारों की टीम चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि उनकी छवि और पार्टी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों से सोनिया गांधी पूरी तरह अछूती रह गईं।

शहजादा को उस सम्मान और विशेषाधिकार को देकर आसमानी दुनिया में बैठा दिया गया, जो सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए सुरक्षित हैं। वे अपने आप को ऐसे साथियों से घिरे रखे जो उन्हें एक धनाढ्य परिवार से ताल्लुक रखने वाला शख्स और देर रात तक कॉकटेल पार्टी का आदी मानता था। मीडिया से दूरी बनाकर और अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं एवं प्रमुख लोगों से मिलने से इंकार कर उन्होंने स्थिति को और भी बदतर बना दिया। वे ऐसी आभासी दुनिया में रहे जहां वास्तविक भारत और भारतीय को मंगल ग्रह का प्राणी समझा जाता था। जब से वे पार्टी के उपाध्यक्ष और चुनाव अभियान के प्रमुख बने तब से पार्टी की गिरावट ने रफ्तार पकड़ ली। चुनावी रैलियों में दिए गए भाषणों की स्टाईल और सामग्री से वास्तविक तथ्यों से उनके सहलाकारों ने उन्हें दूर रखा। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस अपनी सीटें खोती रही और अंतत: लोकसभा में सिमटकर रह गई। उम्मीद की गई थी कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस पर चर्चा और कुछ निर्णय लिया जाएगा। अपनी परंपरा को पूरा करते हुए बैठक भी समाप्त हो गई। बैठक में प्रस्ताव पारित कर मां-बेटे में पूरी निष्ठा व्यक्त की गई और पार्टी को पुनजीर्वित करने का आह्वान किया गया।

तथ्य यह है कि इंदिरा गांधी के समय से ही पार्टी नेताओं को प्रशिक्षित और उनका ब्रेनवॉश कर उन्हें पालतू बना दिया गया, ताकि निष्ठा दिखाने की बात पर अपनी पूंछ हिला सकें। राजीव गांधी की टीम में रहे पूर्व प्रमुख सूचना अधिकारी स्व. यू.सी. तिवारी ने एक बार मुस्कुराते हुए मुझसे कहा था – ”आप जानते हैं कि गांधी परिवार ईश्वर का वरदान है। वे अपनी पार्टी के लोगों, यहां तक कि नौकरशाहों से कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं। जिससे वे नाराज हो जाते हैं उसे लात मारकर बाहर कर देते हैं। अगर वे किसी को दुबारा लात मारना चाहते हैं तो उंगली के इशारे से वापस बुलाते और वह व्यक्ति सिर झुकाए वापस आता और बुदबुदाते हुए धन्यवाद कहता।’’

इसलिए पार्टी के नेता के अलावा गांधी परिवार भी पार्टी की इस दुर्दशा के लिए समान रूप से जिम्मेवार है। अब उनके प्रति वफदारी में भी संदेह नजर आने लगा है। कांग्रेसियों के लिए वफादारी का अर्थ है, जो उन्हे जीत दिलाकर सत्ताधारी पार्टी का हिस्सा बनाए रखे। अब जबकि गांधी परिवार एक के बाद एक पराजय का मुंह देख रहा है, कांग्रेसियों की वफादारी भी घटती जा रही है।

पूर्व मंत्री रहीं जयंती नटराजन, जिन्होंने दावा किया था कि उनकी रगों में दशकों से बहने वाला कांग्रेस का खून अब पूरी तरह निकल चुका है, की इस्तीफे के बाद पार्टी में घबराहट है। नटराजन, जिनकी वफादारी पर कभी प्रश्रचिह्न नहीं उठा, ने राहुल गांधी पर आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन आरोपों की अब जांच हो रही है। सूत्रों का कहना है कि उन पर आपराधिक धाराएं लगाई जाएंगी। हालांकि यह महिला भी साफ-सुथरी साबित नहीं हो सकती, उनके उपर भी कई आरोप हैं। उनकी पूर्व पार्टी के लोगों का कहना है कि अपने खिलाफ मुकदमा चलाए जाने से बचने के लिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। एक स्तंभकार के अनुसार, हस्तक्षेप करने के नटराजन द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं। स्तंभकार का अरोप है कि अगर राहुल के हस्तक्षेप के बाद अनिल अग्रवाल की प्रस्तावित परियोजना को रोका नहीं गया होता तो अग्रवाल बॉक्साईट रिजर्व के पास एल्युमिनियम रिफाईनरी का निर्माण करते, जिसके कारण एल्युमिनियम की वैश्विक कीमत आधी हो जाती। उनका आरोप है कि अग्रवाल के इस कदम से अंतर्राष्ट्रीय उत्पादक परेशान हो गए और एक उम्रदराज सोशलाईट (बहुत पहले एक रॉकस्टार से शादी कर ली थी) के जरिए राहुल गांधी तक पहुंचे। इस मुलाकात को तय कराने में दिल्ली की एक अन्य सोशलाईट का अहम योगदान रहा है, जो गांधी परिवार की बेहद करीबी हैं। अंतत: इस काम को अंजाम दिया गया। उन्होंने जनजातिय लोगों से कहा कि वे दिल्ली में उनके सिपाही हैं। नटराजन ने आरोप लगाया कि सिपाही की अपनी भूमिका को छोड़ते हुए उन्होंने अग्रवाल की परियोजना को नामंजूर कर दिया।

अगर यह सच है तो नियम और कानून का सीधा उल्लंघन है। इस मामले में उस व्यक्ति द्वारा हस्तक्षेप किया गया, जिसके पास न तो कोई अधिकार था और न ही कोई जिम्मेदारी। स्तंभकार ने एक अन्य मामले की ओर इशारा करते हुए आरोप लगाया कि परिवार के मित्रों को आलीशान टाईगर कैंप खोलने के लिए टाईगर रिजर्व प्रोजेक्ट्स के नियमों में ढील दी गई। इस तरह के और खुलासे पार्टी को और अधिक परेशान करेगी।

लेकिन जिस तरह राहुल गांधी व्यवहार कर रहे हैं और भाषण दे रहे हैं उससे यही लगता है कि या तो वे पार्टी की अंदरूनी समस्याओं को समझने में नाकाम रहे हैं या एक अलग किस्म की अपनी ही दुनिया में मस्त हैं। दिल्ली में अपने दो उम्मीदवारों के पक्ष में की गई रैली में वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सिर्फ अपनी शेखी बघारते रहे। निश्चित रूप से ऐसा करने के लिए उनके सलाहकारों ने कहा होगा। ओबामा के भारत आगमन के दौरान मोदी द्वारा पहने गए सूट को लेकर उन्होंने खुब हंगामा किया।

इसके लिए किसी विश्लेषण की जरूरत नहीं है कि ऐसे हास्यास्पद बयानों से वोट नहीं हासिल किए जाते, जबकि मतदाताओं के नाराज होने के आसार ज्यादा होते हैं। पार्टी के ही कुछ लोगों का कहना है कि वे पूरी तरह असफल (एक प्रबुद्ध दिग्गज ने उनके लिए विशेष रूप से मूर्ख शब्द का प्रयोग किया) हैं और उनके नेतृत्व में पार्टी भी जीत हासिल नहीं कर सकती। उत्तर प्रदेश के एक नेता का कहना है कि खुद डूबेंगे और हम सबको ले डूबेंगे।

उनका दृढ़तापूर्वक मानना है कि गांधी कांग्रेस प्राईवेट लिमिटेड कंपनी की परिशोधन के पठासीन अधिकारी हैं राहुल गांधी। राजनीति और सूक्ष्मता को समझने या राजनीतिक हवा की दिशा को पढऩे की नाकाबिलियत के कारण राहुल गांधी राजनैतिक भूमि खोने के दर्द को नहीं समझ पाते। उन्हें सिर्फ देश पर शासन करने की अपने परिवार के ‘दैवीय अधिकार’ की समझ है। यह धारणा तेजी से बढ़ रही है कि उनकी पार्टी के लोग जानते हैं कि राहुल गांधी प्रतिदान से परे हैं और अगर उन्हें राजनीति में जीवित रहना है तो उन्हें अपना इंतजाम खुद करना होगा।

ऐसी स्थिति में पार्टी छोडऩे वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। राज्यों में अब कैडर नाम मात्र के रह गए हैं। अपनी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित राहुल गांधी 129 साल पुरानी पार्टी की खोई हुई जमीन को पुन: प्राप्त करने में सक्षम नहीं हैं।

28-03-2015

जब भारी जय जयकार के बीच राहुल गांधी का पार्टी उपाध्यक्ष के रूप में अभिषेक किया गया, तब उन्होंने कहा था कि राज्यों में पार्टी को पुनर्संगठित करना उनकी पहली प्राथमिकता है। लेकिन महाराष्ट्र और असम छोड़कर, जहां पार्टी की राज्य ईकाई पहले से ही है, किसी भी राज्य में कांग्रेस ईकाई पूर्णत: संचालित नहीं है।

यह भी देखना होगा कि सोनिया गांधी 2019 के आम चुनावों तक रहती है या नहीं। ‘गया राम’ की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। कभी बेहद ताकतवर रहे हाईकमान की खुली अवज्ञा, बगावत और इस्तीफे की खबरें एक नियमित विशेषता बन गई है। हालिया रिपोर्ट झारखंड से संबंधित है, जहां 6 में से 4 कांग्रेस विधायक इस्तीफा सौंपने वाले थे। नटराजन के इस्तीफा देने के कुछ दिन पहले की इस खबर से सोनिया गांधी चौंक गईं थीं। पार्टी में अनुशासन लगभग खत्म हो चुका है। गांधी परिवार का डर अब इतिहास की बात हो चुकी है।

हाल ही में एक अन्य पूर्व केन्द्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ भी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं। पार्टी महाचिव जनार्दन द्विवेदी का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति दिया गया बयान भी पार्टी के आधिकारिक रूख से अलग था। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की प्रतिक्रिया से बेपरवाह तमिलाडु के कांग्रेसियों में भी पोस्टरबाजी शुरू हो गई। एक पक्ष कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ई.वी.के.एस. एलांगोवन का था तो दूसरा पी. चिदंबरम का। एक दूसरे की आलोचना से भरे पोस्टर दिवारों पर जगह-जगह दिखाई दे रहे थे। तिरूचि, मदुरै, इरोड, चेन्नै और शिवगंगा की दीवारों पर लगे पोस्टरों में हर पक्ष एक दूसरे को बदनाम करने के लिए प्रोपगंडा फैलाने की बात कह रहा था। एलांगोवन ने चिदंबरम और उनके बेटे को पार्टी छोडऩे के लिए कहा और शिवगंगा से पूर्व सांसद से इस मामले को पार्टी अध्यक्ष सोनिया तक ले जाने का आग्रह किया। बाद में सोनिया गांधी ने एलांगोवन को बुलाकर उनके बयान देने के समय पर गहरी नाराजगी जताई। यह बयान उस दिन आया था, जिस दिन नटराजन ने पार्टी से इस्तीफा दिया था। सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि कार्ति ने बयान दिया था कि प्रदेश कांग्रेस तमिलनाडु में 5 हजार से ज्यादा वोट नहीं दिला सकती। हालांकि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस तरह संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, क्योंकि गांधी परिवार किसी को बाहर का रास्ता दिखाने की हिमाकत नहीं कर सकता। इसका व्यापक प्रभाव पार्टी के लिए संकट की स्थिति उत्पन्न कर सकता है। राहुल गांधी के खिलाफ कटु आरोपों से साफ जाहिर हो जाता है कि पार्टी पर गांधी परिवार का शिकंजा पहले ही ढीला हो चुका है। पार्टी के विभाजन की शायद यह शुरूआत है।

जनार्दन द्विवेदी जैसे वफादार व्यक्ति ने माना कि कांग्रेस देश में कमजोर हो चुकी है, क्योंकि यूपीए-2 के दौरान कुछ खास गलतियां की गईं। उन्होंने कहा कि संगठन को मजबूत करने के लिए संघर्ष की जरूरत है। यूपीए-2 के दौरान की गई कुछ खास गलतियों के कारण वर्तमान में पार्टी की यह दुर्दशा है और यह देखा जाना चाहिए ऐसी गलतियों को न दुहराया जाए।

अतीत में इस तरह की गलतियों को अनुशासनहीनता माना गया और इसके लिए दंडित भी किया गया, लेकिन अब गांधी परिवार को किसी भी नेता को छूने की हिम्मत नहीं है। वर्तमान शक्ति समीकरण पर मंथन जल्दी ही होने की उम्मीद है। सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी की अपरिहार्यता रेखांकित हो रही है, लेकिन अपनी मां की वजह से बहादुर बनने का वे दिखावा कर रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं (आधार वाले दिग्गज नेता नहीं, बल्कि पिछला चुनाव हारने वाले) के साथ बैठक में पार्टी नेताओं से उन्होंने कहा कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए और लोगों का विश्वास फिर से जीतने के लिए योजना बनाएं।

लेकिन पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठन का नया ढांचा खड़ा किए बिना वे पुराने ढांचे को तोड़ रहे हैं। ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सचिव का कहना है – ”उन्होंने उस बात को उजागर नहीं किया है कि करना क्या है। हालांकि उनके आस-पास मंडराने वालों की लंबी कतार है, लेकिन वे ऐसे  व्यक्ति नहीं ढ़ुंढ़ सके जो उनकी योजना को कार्यान्वित कर सके।’’

राहुल को इस बात का एहसास नहीं है कि उनका और उनकी पार्टी के भाग्य का अवसान हो रहा है। उनके आसपास रहने वाले ज्यादा से ज्यादा नेता इस को बात को समझ चुके हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ अभी चूक रही है। हाल के सप्ताहों में पंजाब और ओडिशा ईकाई के बहुत से नेता इस्तीफा दे चुके हैं। कुछ मामलों ने पार्टी को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

मामले को बदतर बनाते हुए मीडिया भी कुछ महीनों से केरल, राजस्थान, जम्मू और कश्मीर तथा तमिलनाडु के नेताओं के बयानों को हाईलाईट किया। इसका कुछ उद्देश्य राहुल गांधी की चापलूसी से दूरी को दिखाना था। लेकिन इस आलोचना के धागे पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सलाहकारों में शामिल शक्तिशाली लोगों की ओर इशारा कर रहे थे।

विडंबना यह है कि राहुल गांधी का ट्रैक रिकॉर्ड खुद आंतरिक आलोचनाओं से जुझने का रहा है। उन तक पहुंचने की बाधा के पीछे दबे स्वरों में उनकी लगतार उनकी विदेश यात्रा को बताई जाती है। मुलाकात के लिए उपलब्ध नहीं होने के कारण पार्टी के आम कार्यकत्र्ता ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेता भी अपनी तौहीन मानते हैं। राहुल गांधी अपनी अनुपस्थिति के लिए ज्यादा जाने जाते हैं। वे जब भी सामने आते हैं, उनकी सार्वजनिक उपस्थिति छिटपुट अतिश्योक्तिपूर्ण सक्रियता दिखाती है, बजाय सतत राजनीतिक सक्रियता के।

एक अनिच्छुक राजकुमार की राजनीति में जबरन प्रवेश और उसकी शक्ति की अभिलाषा उन्हें नुकसान पहुंचा रही है। जनता और पार्टी के लोगों को लगता है कि उनकी मां द्वारा उन्हें राजनीति छोडऩे की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि एक भाग्यशाली परिवार के मध्यम आयु वाले युवा के रूप में उन्हें अपनी जिंदगी जीने की आजादी मिल सके। इससे वह भी खुश होंगे और लंबे समय से कष्ट में रह रही कांग्रेस भी खुश होगी।

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