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प्रकृति और जीव जगत में मिथक और जादुई यथार्थ

प्रकृति और जीव जगत में मिथक और जादुई यथार्थ

By मनोज दास

भारतीय रहस्यवाद कहता है कि हमारे जीवन और प्रकृति का एक जादुई पक्ष है। वेद की बातों पर अभी बात नहीं करते हैं जो हमारी अवधारणाओं के लिए अधिक सांकेतिक साबित हो सकते हैं। लेकिन, जब हम उपनिषदों में यमराज से नचिकेता की बातचीत या राजा जनक-याज्ञवल्क संवाद पढ़ते हैं या गीता का संदेश पढ़ते हैं तो यह साफ-साफ एहसास होता है कि उसके लेखक अपने समय के मनुष्य की बुद्धि से काफी आगे की सोच रहे थे।

हाल में विज्ञान कांग्रेस में मिथकों पर कुछ पर्चे पढऩे के अवसर दिए जाने के खिलाफ काफी कुछ लिखा-पढ़ा गया। सवाल है कि क्या मिथक कपोलकल्पित जादुगरी के सिवाय कुछ नहीं हैं? सच्चा वैज्ञानिक नजरिए वाला कोई भी उनकी अहमियत को इस तरह खारिज नहीं कर सकता। कोई भी सच्चा अनुसंधानकर्ता उन्हें महज हंसी का विषय नहीं बना सकता।

अमेरिका के लॉस एंजिलिस में एक सम्मेलन के दौरान चाय विराम के समय नासा (अमेरिकी अंतरिक्ष शोध संस्थान) के एक वैज्ञानिक ने इन पंक्तियों के लेखक से पूछा, ”नीम के जिन गुणों को अब हम अपनी अत्याधुनिक प्रयोगशाला के जरिए जान पा रहे हैं, प्राचीन आयुर्वेद ने कैसे उसे इस कदर ठीक-ठीक जान लिया था?’’ यह वही दौर था जब कुछ अमेरिकी एजेंसियां नीम के औषधीय गुणों पर एकाधिकार पेटेंट हासिल करने की कोशिश कर रही थीं, जिसका भारत ने विरोध किया और मामला जीत लिया। उस वरिष्ठ वैज्ञानिक ने आगे मुझसे पूछा, ”आपके यहां कैसी प्रयोगशाला रही होगी?’’

मैंने कहा, ”शायद चेतना की प्रयोगशाला रही हो। आयुर्वेद के संस्थापक ऋषियों को नीम के औषधीय गुणों का एहसास हुआ होगा और उन्होंने उसके रहस्य को जान लिया होगा।’’ नासा के वैज्ञानिक कुछ देर सोचते रहे और फिर कहा, ”इसका मतलब क्या यह है कि प्रकृति के रहस्यों को जानने का कोई वैकल्पिक रास्ता भी है।’’ मैंने कहा, ”हमें यही मानकर चलना चाहिए। जरा सोचिए, आप जैसे शोधकर्ता अपने दिमाग, बुद्धि की क्षमता और तार्किक तौर-तरीकों से ही विश्लेषण और आकलन करते हैं। अगर ये गुण आपके पास नहीं होते तो आप क्या करते? आप इनका अविष्कार तो नहीं ही कर पाते! चेतना के ये गुण हमें मिले हैं तो कुछ मौलिक या पूर्व चेतना भी होगी ही। क्या हम इससे इनकार कर सकते हैं कि जिस चेतना की हम उत्पति हैं, वह ज्ञान का कोई वैकल्पिक राह की बना सकती है?’’

उन्होंने कहा, ”आपकी बातें तार्किक लगती हैं।’’ मैंने कहा, ”आप ऐसा कह रहे हैं क्योंकि आपमें सही मायने में वैज्ञानिक नजरिया है, यानी आप किसी अवधारणा को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं करते क्योंकि वह एक खास समय में आपकी धारणाओं के अनुकूल नहीं है।’’

इस तरह हम एक-दूसरे का अभिवादन करके विदा हुए। उस समय मेरे दिमाग में यह नहीं आया कि उनका ध्यान द मदर के ‘प्रेयर्स ऐंड मेडिटेशंस’ लेख की ओर नहीं दिलाऊं, जिससे उन्हें संकेत मिल जाता कि ‘प्रकृति के रहस्य को जानने के वैकल्पिक तरीके’ सिर्फ अतीत में ही उपलब्ध नहीं थे। यह हमारे दौर में भी प्रकृति की जादुई वास्तविकताओं की ओर कुछ सोच-विचार से इस बारे में और स्पष्ट हो सकती है। मदर ने 7 अप्रैल 1917 को अपनी डायरी में लिखा, ”मुझे गहरा ध्यान लग गया और मैं खुद को एक खिले फूल के रूप में देखने लगी और फिर चारों तरफ खिले हुए फूल दिखने लगे। मैं जब और गहरी चेतना में उतरी तो एक नीली-सी रोशनी से अचानक मेरा स्वरूप ऐसे विशाल वृक्ष का हो गया जो आसमान तक तना है और जिसकी सैकड़ों भुजाएं फैली हुई हैं……’’ और जब वे गहरे चेतना में उतर गईं तो वृक्ष ने उनके कान में कहा, ”इसी फूल में वसंत के व्यतिक्रमों का समाधान है।’’

भारतीय रहस्यवाद कहता है कि हमारे जीवन और प्रकृति का एक जादुई पक्ष है। वेद की बातों पर अभी बात नहीं करते हैं जो हमारी अवधारणाओं के लिए अधिक सांकेतिक साबित हो सकते हैं, लेकिन जब हम उपनिषदों में यमराज से नचिकेता की बातचीत या राजा जनक-याज्ञवल्क संवाद पढ़ते हैं या गीता का संदेश पढ़ते हैं तो यह साफ-साफ एहसास होता है कि उसके लेखक अपने समय के मनुष्य की बुद्धि से काफी आगे की सोच रहे थे।

अगर वैज्ञानिक काकुले ने बेंजीन अणुओं की संरचना के फार्मूले का समाधान एक चमत्कारी सपने देखा कि एक लहराता सांप अपनी पूंछ पकड़ लेता है। रामानुजम अगर कहते हैं कि सबसे पेचीदा गणितीय समस्याओं का हल उन्हें देवी नामक्कल ने सपने में सुझाया। कोई मनोवैज्ञानिक कह सकता है कि उनके अवचेतन से ऐसे समाधान निकले, लेकिन रहस्यवाद का कोई छात्र कहेगा कि ये हमारी सामान्य चेतना में जादुई यर्थाथ का हस्तक्षेप है।

मोटे तौर पर मिथक तीन तरह के होते हैं। एक, विलक्षण बौद्धिकता का सार दूर अतीत की कहानियों के जरिए हासिल होता है। नचिकेता की मृत्यु के रहस्य की जिज्ञासा और मृत्यु के देव यमराज के रहस्योद्घाटन से पता चलता है कि मनुष्य की सच्ची शख्सियत आत्मा अमर होती है। यह बात मिथकीय स्पींक्स से मिलती-जुलती है। एक सुनसान सड़क के किनारे टीले पर बैठे वह सवाल करता है कि वह कौन-सा जीव है जो सुबह चार पैरों पर चलता है, दिन चढऩे में दो पैरों पर और शाम होते-होते तीन पैरों पर चलने लगता है? यह अजीब जीव जवाब के लिए यात्रियों को सूर्यास्त तक का समय देता है। जब शाम तक अभागा यात्री जवाब नहीं दे पाता तो वह उसे निगल जाता है। अंत में नायक ओदिपस उसका सामना करता है और कहता है, ”मैं ही तुम्हारा जवाब हूं। मैं मनुष्य हूं। कोई मनुष्य अपने जीवन के प्रारंभ या बचपन में चार पैरों पर चलता है, उम्र बढऩे पर वह दो पैरों पर खड़ा हो जाता है और जीवन की सांध्य बेला में लाठी के सहारे तीसरे पैर के सहारे चलने लगता है।’’

जैसे ही उसने यह जवाब दिया, स्पींक्स कूदकर जान दे देता है। इसका नैतिक संदेश स्पष्ट है। मनुष्य की मृत्यु इसलिए होती है क्योंकि वह खुद को नहीं जानता। जिस दिन वह खुद को जान लेता है, मृत्यु खुद मर जाती है।

दूसरे मिथक में कोई भूला-विसरा महान सत्य छुपा होता है। समझिए कोई संत अगर अपने भौतिक अस्तित्व से शाश्वत और समय (अनंत और वर्तमान) का रिश्ता जाहिर करता है तो हम अतीत, वर्तमान और भविष्य का अनुभव कर पाते हैं। शिव, महाकाल या शाश्वत समय लेटे हुए हैं।  काली या संक्रमण काल का एक पैर पीछे यानी अतीत में है, दूसरा वर्तमान में और उसका रुख भविष्य की ओर है। काली मानवमुंड की माला पहने हुए दिखती हैं, इनमें हर एक अतीत का प्रतीक है। काली अंधेरा हैं, जिससे हम कभी नहीं जान पाते हैं कि अगला पल क्या होने वाला है। लेकिन यह एक मूर्तिशिल्प के जरिए लोकप्रिय कथाओं को पौराणिक मिथक के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन यह लोककथा ही है।

तीसरा मिथक उन कहानियों में जाहिर होता है जो सामाजिक रूप से अहम भूमिका निभाती हैं। इसका एक उदाहरण देखिए : कोरापुट की पहाडिय़ों पर एक आदिवासी रहते हैं जिनकी स्त्रियां अपनी कमर को कुछ जेवरात से ढंकती हैं और बाकी नंगे रहती हैं। पिछली सदी के साठवें दशक तक जब मैं उनके इलाके में गया था, वे कपड़े पहनने से इनकार करती थीं, क्योंकि इससे उनकी मूल सुंदरता छुप जाएगी।

सुंदरता किसके लिए? यह सवाल हमें मिथकीय काल में ले गया। एक बार मां सीता अपने जुड़वा बच्चों के जन्म के बाद तमसा नदी में नहा रही थीं। कुछ महिलाओं ने अनके नंगे बदन के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, ”प्रकृति का शिशु होने के नाते क्या आप यह नहीं समझ पातीं कि मातृत्व के इस समय में मैं प्राकृतिक अवस्था में हूं?’’ महिलाओं को अपने सवाल पर पछतावा हुआ और उन्होंने अपने वस्त्र हमेशा के लिए त्याग दिया और अब वे हजारों पीढिय़ों से उसी रूप में हैं।

हम उम्मीद करें कि तेजी से बदलते समय ने इतिहास के उस सामूहिक सौंदर्य शायद बदल न दें। मैं इसकी कोई नृतत्वशास्त्रीय व्याख्या नहीं खोज पाया हूं, लेकिन किसी मिथक का सामूहिक व्यवहार में उतरना वाकई विशेष महत्व का है। इस तरह रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों से निकले कई मिथक कई स्थानीय परंपराओं के रूप में मान्य हैं और वही हमारी राष्ट्रीय पहचान का भाव पैदा करते हैं।

सिर्फ पांच और तीन सदी ही बीते हैं जब कॉपरनिकस ने कहा था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज की थी। मनुष्य उसके बाद से विज्ञान में भारी छलांग लगा चुका है, लेकिन जीवन का मूल चरित्र आज उससे अलग नहीं हुआ, जो कॉपरनिकस के पहले था। तब भी अच्छे और बुरे, सुखी और दुखी लोग थे, बस बाहरी स्थितियां बदल गई हैं। मनुष्य को जो बात बनाए रखती है वह है उसकी आस्था। आस्था ही जननी है। हर कदम पर, हर सांस में आस्था होती है, लेकिन इससे बढ़कर एक आस्था हमारे गहरे मन में होती है, वह किसी भौतिक वस्तु या आदर्श से स्वतंत्र होती है। अक्सर मिथक उस आस्था को ताकत देते हैं और इस तरह वे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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