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नए विदेश सचिव की चुनौतियां

नए विदेश सचिव की चुनौतियां

By प्रकाश नंदा

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मानना है कि सुजाता सिंह के मुद्दे को सम्मानजनक ढंग से निपटा जाना चाहिए था। उनके अनुसार, सुजाता सिंह को पहले ही बता दिया गया था कि ओबामा के भारत दौरे के बाद विदेश सचिव के रूप में एस. जयशंकर की नियुक्ति की जाएगी। सामान्यत: जयशंकर 31 जनवरी को सेवानिवृत्त होने वाले थे। विदेश सचिव के रूप में नियुक्ति उनके सेवाकाल की 2 वर्ष तक विस्तार की औपचारिकता है।

एस. जयशंकर के रूप में भारत को नया विदेश सचिव मिला है। भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी की विदेश सचिव के रूप में मोदी द्वारा नियुक्ति से मैं व्यक्तिगत रूप से खुश हूं, क्योंकि जयशंकर भी उसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं, जहां से मैंने पढ़ाई की है। मेरे बहुत से दोस्तों और वरिष्ठों को, जिनसे मैं प्राय: मिलता रहता हूं, उनकी बौद्धिक क्षमता और व्यक्तिगत निष्ठा में बहुत विश्वास है। भारत के रणनीतिक गुरू कहलाने वाले उनके पिताजी स्व. के. सुब्रह्मण्यम के साथ भी मुझे काम करने का  सौभाग्य मिल चुका है। यह एक खुला रहस्य है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त करने के लिए बेहद उत्सुक थे, लेकिन सोनिया गांधी के दबाव के आगे झुकते हुए उन्होंने सुजाता सिंह को इस पद पर बैठा दिया।

आज वही कांग्रेस, जो वर्तमान में देश की सबसे प्रमुख विपक्षी दल है, समय से पहले सुजाता सिंह की सेवानिवृत्ति को लेकर सरकार की आलोचना कर रही है। मेरी राय में जयशंकर की नियुक्ति को दो संदर्भों में देखा जाना चाहिए, प्रक्रियात्मक और महत्तायुक्त। प्रतिक्रियात्मक के रूप में सरकार को अपने अधिकारियों को चुनने का अधिकार प्राप्त है। इस संदर्भ में यह बात ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने दो बैच के दर्जनों अधिकारियों को नजरअंदाज करते हुए जुलाई 2004 में श्याम शरण को विदेश सचिव बनाया था। मनमोहन सिंह सरकार ने 2006 में 16 वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी कर शिवशंकर मेनन को नियुक्त किया। इस निर्णय के खिलाफ कई अधिकारियों ने त्याग-पत्र दे दिया था।

वास्तव में सुजाता सिंह पहली ऐसी अधिकारी नहीं हैं, जिन्हें नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद बदला गया है। इसके पहले वित्त सचिव और प्रधानमंत्री एवं पूर्व प्रधानमंत्रियों की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) के प्रमुख को भी बदल दिया गया था। मोदी ने रक्षा शोध एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) के प्रमुख की सेवा अवधि पहले ही कम कर दी है। हालांकि इन अधिकारियों के साथ जिस तरह से व्यवहार किया गया, खासकर डीआरडीओ के प्रमुख के साथ, वह आलोचकों को मजबूत आधार देता है। सम्मानपूर्वक वार्ता के अवसर तलाशे जा सकते थे। विश्वास में लेकर उनके अब तक के योगदान की सराहना करते हुए उन्हें विनम्रता से बताया जा सकता था कि वे जिस पद पर हैं उसके लिए सरकार के पास दूसरा आईडिया है।

इंडियन सिविल सर्विसेज के प्रमुख और कैबिनेट सचिव अजीत कुमार सेठ पर मोदी की कृपा ने भी आलोचकों को मुद्दा दे दिया है। सेठ को दो बार सेवा विस्तार मिल चुका है। पहली बार मनमोहन सिंह द्वारा एक साल का सेवा विस्तार दिया गया और दूसरी बार छ:-छ: माह के लिए दो बार मोदी सरकार द्वारा विस्तार दिया गया है। समान्य रूप से उनकी सेवानिवृत्ति 2013 में ही होनी थी।

जो भी हो, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मानना है कि इस मुद्दे को सम्मानजनक ढंग से निपट जाना चाहिए था। उनके अनुसार, सुजाता सिंह को पहले ही बता दिया गया था कि ओबामा के भारत दौरे के बाद विदेश सचिव के रूप में एस. जयशंकर की नियुक्ति की जाएगी। सामान्यत: जयशंकर 31 जनवरी को सेवानिवृत्त होने वाले थे। विदेश सचिव के रूप में नियुक्ति उनके सेवाकाल की 2 वर्ष तक विस्तार की औपचारिकता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा नियम/परंपरा बनाया गया है कि तीनों सेनाओं के प्रमुख, कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, विदेश सचिव, वित्त सचिव और गृह सचिव को अपने सेवाकाल में (60 वर्ष की उम्र से पहले) अगर एक बार नियुक्त कर दिया गया तो उनका न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष का होगा।

सुजाता सिंह का मामला ऐसा पहला मामला बन गया है, जिनकी दो वर्ष की ऑफिसियल गारंटी की अवधि पूरी होने से पहले ही पद छोडऩे के लिए बाध्य कर दिया गया। हालांकि यह अस्पष्ट है कि यह ऑफिसियल गारंटी किसी खास पद के लिए होती है या समस्त सेवाकाल के लिए। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो क्या सरकार ने उनकी बची अवधि तक के लिए कोई अन्य कार्य सौंपे हैं? हालांकि यह सवाल बेमानी है, क्योंकि उन्होंने अपनी सेवा से ही त्याग-पत्र दे दिया है। उनके हटाए जाने के निर्णय के तुरंत बाद ही सुजाता सिंह ने कहा – ”अपनी सेवा के 38 साल के बाद ही मैंने सेवानिवृत्ति लेने की सोची।’’ इसके अलावा सरकारी हलकों से आने वाली कुछ रिपोर्ट बताती हैं कि निश्चित अवधि का नियम तभी लागू होता है जब अधिकारी सेवा में हो,  लेकिन अधिकारी जैसे ही 60 साल की उम्र की सेवानिवृत्ति की सीमा को पार करते हैं, वह सरकार के साथ ऐसे अनुबंध में दाखिल होते हैं, जहां दोनों अपनी इच्छा से इससे बाहर निकल सकते हैं। हालांकि इस रिपोर्ट की वास्तविकता के बारे में कहना मुश्किल है, लेकिन सुजाता सिंह पिछले ही साल 60 वर्ष की हो चुकी हैं।

अब जयशंकर की नियुक्ति की महत्ता की बात करते हैं। उनकी नियुक्ति के क्या मायने हैं? मैं यहां मोदी की विदेश नीति की प्राथमिकताओं वाले क्षेत्र विदेश व्यापार, विदेशी निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवत्र्तन, एशिया-प्रशांत क्षेत्र और अमेरिका, जापान, चीन, ऑस्ट्रेलिया और रूस के रिश्तों आदि पर उनके प्रयास के बारे में फोकस करने नहीं जा रहा हूं। मेरा मानना है कि भारतीय विदेश सेवा के प्रमुख के रूप में जयशंकर के सामने भारतीय राजनयिक सेवा के साथ समरूपता और मधुर संबंध बनाए रखने की चुनौती है। यह निर्विवाद है कि पारंपरिक कूटनीति की सतत प्रासंगिकता के अलावा वैश्विकरण के युग में देश की राजनीतिक और सुरक्षा हित, आर्थिक कूटनीति, जलवायु कूटनीति, लोक कूटनीति के साथ-साथ विदेशी कार्यालय से लेकर संसद एवं मीडिया के प्रति जवाबदेही को बढ़ाने की जरूरत है।

कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें नए विदेश सचिव को बहुत स्पष्टता के साथ सुलझाने की जरूरत है। पहला, भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका के कारण भारत को विदेश मंत्रालय के तहत आने वाले घरेलू पोस्ट सहित विदेशों के 162 भारतीय मिशन एवं पोस्ट पर कार्य को संचालित करना होता है। हालांकि इसमें शुरूआत की क्षमता औसतन 8 से 15 भारतीय विदेश सेवा की अधिकारियों की है, जबकि कैडर की कुल क्षमता लगभग 600 है। इस तथ्य से समस्याएं कई गुणा बढ़ जाती हैं जब अन्य देशों के विपरीत, हमारे देश में थिंक टैंक, शिक्षा और मीडिया का नेपथ्य से सेवा में आगमन का कोई प्रावधान नहीं है। विदेश मंत्रालय की कार्य-पद्धति अभी भी क्षेत्रीय प्रभागों पर आधारित है, (हर प्रभाग एक क्षेत्र विशेष से संबंधित देशों के समूह के साथ काम करता है) जबकि विकसित देश मुद्दा आधारित रूख का चुनाव करते हैं।

दूसरा, भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी अपनी वास्तविक भूमिका को लेकर भ्रमित हैं और कोई भी विदेशी पहल में वाणिज्य, पर्यावरण और ऊर्जा आदि अन्य मंत्रालयों की बढ़ती दखल से नाराज भी हैं। बहुत से राज्यों, सीमावर्ती राज्यों में यह विचार तेजी से फैल रहा है कि इसके पीछे सरकार की नीतियां है। यहां तक कि भारत सरकार में भी विदेश मंत्रालय अपनी चमक खो रहा है और उसकी वास्तविक शक्तियां धीरे-धीरे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ हस्तांतरित हो रही हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए जवाबदेह होता है। इन वर्षों में राष्ट्रीय सलाहकार भारतीय विदेश नीति की नौकरशाही का सरताज बनकर उभरा है। विदेश मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारियों और सेवानिवृत्त सचिवों ने व्यक्तिगत मुलाकात में मुझे बताया कि मनमोहन सिंह के शासन काल में भारतीय विदेश नीति निर्धारण की प्रक्रिया सबसे ज्यादा संकुचित हुई, क्योंकि सब कुछ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा नियंत्रित किया जाता था। सारी शक्तियों को अपने हाथ में रखने की मोदी की कथित छवि के बीच जयशंकर के लिए देश के बाहरी मुद्दों से निबटने के लिए विदेश मंत्रालय की महत्ता को बनाए रखने की कठिन चुनौती है।

तीसरा, सेवाकाल में अपने सहयोगियों के प्रति वफादारी परीक्षण एक विदेश सचिव के लिए बहुत बड़ी समस्या है। ध्यान देने वाली बात है कि विदेश सचिव विदेश मंत्रालय में सचिव स्तर का सिर्फ एक अधिकारी ही नहीं है। हालांकि अपने सहयोगियों में पहले वही है, लेकिन यह भी तथ्य है कि सचिव स्तर वाले विभिन्न देशों के 30 ग्रेड-1 राजदूत के अलावा विदेश मंत्रालय में तीन अन्य सचिव होते हैं। इनमें सभी समान स्तर के अधिकारी होते हैं और विदेश मंत्रालय तक उनकी सीधी पहुंच होती है। लेकिन, ऐसी भी कहानियां आती रहती हैं कि उनमें आपस में ही संघर्ष होता रहता है। यहां मैं दिग्गज राजनयिक किशन एस. राणा की पुस्तक ‘एशियन डिप्लोमैसी’ का हवाला दूंगा कि 1970 से ही अन्य सचिवों के कार्यों को अपने हाथ में लेकर विदेश सचिव ने अपने हाथ मजबूत किए।

क्षेत्रीय प्रभागों के अलावा विदेश सचिव अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, रूस, चीन, जापान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और नेपाल जैसे महत्वपूर्ण देशों के साथ संबंधों का भी प्रभारी होता है। इसका अर्थ है कि कम-से-कम 7 क्षेत्रीय प्रभागों के संयुक्त सचिव विदेश सचिव के सीधे अंतर्गत आते हैं और इन प्रभागों के अंतर्गत आने वाले देशों में कार्यरत सचिव भी। सभी बहुपक्षीय सम्मेलन विदेश सचिव के प्रभार के अंतर्गत ही होते हैं। विदेश सचिव मीडिया रिलेशन, लोक कूटनीति, सहायता कार्यक्रमों (हाल ही में सम्मिलित), वाणिज्य और दूतों के बीच समन्वय के लिए भी उत्तरदायी होता है। इसके अलावा, नए राजदूत की नियुक्ति की पहल का अधिकार भी विदेश सचिव के हाथ में होता है और उसी का भेजा हुआ प्रस्ताव विदेश मंत्रालय के पास जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो विदेश सचिव के पास बहुत अधिक काम होता है, जबकि अन्य सचिवों के पास काम की कमी होती है और यही उनकी नाराजगी की वजह होती है। राणा लिखते हैं कि इसके कारण मंत्रालय में समग्र सर्वेक्षण का काम प्रभावित होता है। अपनी पुस्तक में राणा लिखते हैं – ”विदेश मंत्रालय ने अपने विदेशी समकक्षों से नहीं सीखा है कि एक व्यक्ति के जरिए एक वृहद कूटनीतिक नेटवर्क चलाना असंभव होता है, खासकर तब जब इसमें राजनीतिक भूमिका आंशिक न हो।’’

तो क्या आंतरिक वार्ता की गुणवत्ता में जयशंकर सुधार लाएंगे, जब विदेश मंत्रालय मे अपने कार्यों की प्रासंगिकता को लेकर खींचतान हो रही हो? उनकी प्रसिद्धि का यह परीक्षण का वक्त है ।

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