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आत्मा से साक्षात्कार

आत्मा से साक्षात्कार

इस दुनिया में रहने वाले हर प्राणी को अपने जीवन में रोजाना सुख के साथ दु:ख और आनन्द के साथ बिशाद, उत्थान के साथ पतन का सामना करना पड़ता है। इसी सुख-दु:ख और आनन्द-बिशाद में हम हमेशा अपना अस्तित्व ही भूल जाते हैं। अपनी स्थिति को एक तरफ रखकर देखते हैं तो सुख और उसी क्षण अपने को दूसरी परिदृश्य में रखकर सोचें तो वहीं सुख-दु:ख में परिणत हो जाता है और दु:ख भी सुख में रूपान्तरित हो जाता है। छोटा बच्चा जन्म लेता है तो उसे जब तक किसी भी चीज के अन्तर का अनुभव नहीं होता है, तब तक वह हमेशा सुखी रहता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, वैसे ही उसके सामने हर चीज का अन्तर दृश्यमान होने लगता है। जाति, धर्म, वर्ण, लिंग यहां तक की भावना, सोच का अन्तर भी अनुभव करने लगता है। उसमें से खुद के रास्ते में थोड़ा भी व्यतिक्रम महसूस करते ही वह खुद को दु:खी पाते हैं। जब तक हम खुद को इन सभी चीजों से अलग महसूस नहीं करेंगे, तब तक हमारा हर सुख-दु:ख में बदल जायेगा। साधना द्वारा ही हम इस स्थिति में आ सकते हैं। साधना द्वारा हम उसी साधारण चीज को महान बना सकते हैं। कोई भी व्यक्ति जन्म से गुणी या विद्वान नहीं होता है। अध्यात्म और कठोर साधना उन्हें महान बनाती हैं। जब तक हम खुद की आत्मा से परिचित नहीं होंगे, तब तक हम दूसरों को पहचानने में असक्षम रहेंगे।

हमारा बाहरी परिचय अपने खुद के हाथ में है। हमारा वातावरण हमें अच्छा या बुरा बनाने के लिए जिम्मेदार होता है। हमारे सामने हमेशा अच्छे या बुरे दोनों रास्ते दण्डायमान रहते हैं। अच्छे की बजाय, बुरी चीजें हमें आसानी से आकिर्षत करती हैं, जो अच्छी चीज हमारी आत्मा को शुद्ध बनाने में मदद करती है, वह रास्ता अधिक कठिन होता है। जहां इंसान उसी क्षण तो आनन्द लेता है, लेकिन बाद में उसकी मधुरता में इतना खो जाता है कि अपने आप को भी उससे बाहर नहीं निकाल पाता है। आनंददायक जीवन किस को अच्छा नहीं लगता है। लेकिन जब वह माया जाल सदृश्य हमको जकड़ लेता है तो उससे मुक्ति पाकर अपनी आत्मा तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। हम पूरी तरह उसी दुनिया में खुद को डुबा कर रखते हैं। पूरा जीवन हमारा एक दलदल जैसा बन जाता है। जैसे मदिरा पीने वाला व्यक्ति जितना ज्यादा पीने लगता है, उतना ज्यादा आनन्द लेने लगता है। लेकिन, उन्हें यह अंदाजा भी नहीं होता है कि जितना ज्यादा मदिरा का सेवन करने लगते हैं, उतना अधिक खुद को अपने आप से दूर करने लगते हैं।

हमारा मन एक आईने के समान होता है। मन का आईना हमेशा हमारे कुस्वभाव के द्वारा ढ़का रहता है। जिसके द्वारा हमें अपना खुद का स्वरूप भी स्वच्छ नहीं दिखता है। मन के आईने को ढकने वाला जो आवरण रहता है वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मास्तर्य, यह छह, हमारे इतने बड़े शत्रु होते हैं, जो हमें हमेशा ही अपनों से अलग रखते हैं। इतना ही नहीं मन को अवरुद्ध करने वाली दूसरी चीजों में धनमद, कुलमद, ऐश्वर्य मद, सौन्दर्य मद, यौवन मद आदि। इन्हीं चीजों के द्वारा हमारा मन ढंका रहता है। जहां हम अपनी खुद की स्थिति को उपलब्ध नहीं कर पाते हैं। केवल हमारे द्वारा बाहरी दुनिया में किये गये उपभोग को अपना अस्तित्व मानकर खुश हो जाते हैं। लेकिन, वही खुशी चिर:स्थायी नहीं होती है। जैसे ही हम उन सभी चीजों से दूर होने लगते हैं। हमारा दुख वैसे-वैसे बढ़ता जाता है। वेद, वेदान्त, पुराणों, शास्त्रों के अध्ययन के द्वारा ज्ञान प्राप्त कर के अपनी आत्मा को पहचानने के प्रयास करने चाहिएं। एक बार हम अपने आप से खुद की पहचान बढ़ाए तो पूरी दुनिया में किसी भी हालात में दु:खी नहीं होंगे।

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