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ऊँ ही परम सत्ता और सृष्टि का आधार है

ऊँ ही परम सत्ता और सृष्टि का आधार है

उपनिषदों में कहा गया है कि सृष्टि के प्रारम्भ में सबसे पहली जिस ध्वनि का निर्माण हुआ वह ऊँ ही था। ओंकार ध्वनि ‘ऊँ’ को दुनिया के सभी मंत्रों का सार कहा गया है। ऊँ तीन अक्षरों ‘अ’,’ ऊ’ और ‘म’ से बना है। छंदोग्य उपनिषद के अनुसार ऊँ ब्रह्म रूपी शाश्वत चेतना है। पतंजलि के योग सूत्र में ऊँ की उपासना से ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता बताया गया है। ऊँ के उच्चारण से जहां मानव और ईश्वर की सत्ता के बीच का अंतर खत्म होता है, वहीं मनुष्य शरीर के भीतर भी इसके उच्चारण से सकारात्मकता का विकास होने लगता है। ऊँ का उच्चारण शरीर में स्पंदन और ध्वनि पैदा करती है, जिसे स्वर-तंत्र और नाड़ी में महसूस किया जा सकता है। अगर पूरी तन्मयता से इसे उच्चारित किया जाये, तो यह शरीर के छिद्रों को खोल देता है। जिससे मनुष्य के शरीर की नकारात्मकता बाहर निकलने लगती है। ऊँ के उच्चारण से मनुष्य अपने मस्तिष्क को एकाग्र करने के साथ ही उसमें उठने वाले विरोधाभासों पर आसानी से काबू पा सकता है। ‘ओ’ का लंबा उच्चारण शरीर में पीड़ानाशक की तरह काम करता है और ‘म’ का लंबा उच्चारण कष्टों का निवारण करता है। ऊँ का उच्चारण सामंजस्य, समरसता और तारतम्यता स्थापित करने में सक्षम है। ऊँ सर्वश्रेष्ठ प्रतिध्वनि है, जिसके उच्चारण से मन को वश में कर के भौतिकता से बचा जा सकता है। इस ध्वनि के सही उच्चारण से अपनी आत्मा के साथ सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है।

‘ऊँ’ संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार या फैलाव। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ उपनिषदों में बताये गये हैं। भारतीय सभ्यता के प्रारंभ से ही ओंकार ध्वनि के महत्व से सभी परिचित रहे हैं। ऊँ को बोलते वक्त ‘ओ’ पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों के संयोग से उत्पन्न न होने वाली ध्वनि। संपूर्ण ब्रह्मांड में तपस्वियों, ऋषियों, मुनियों और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है, जो लगातार सुनाई देती रहती है, शरीर के भीतर और बाहर। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांति महसूस करती है, तो उन्होंने उस ध्वनि को ‘ओम’ नाम दिया। साधारण मनुष्यों के लिये इस ध्वनि को सुनना मुश्किल होता है, लेकिन जो भी लगातार ओम का उच्चारण करता रहता है, उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। जो भी इसकी ध्वनि को सुनता है, वह परमात्मा से सीधा जुडऩे लगता है। ऊँ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों के अर्थ उपनिषद में बताये गये हैं।

‘ऊँ’ ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोक का प्रतीक है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रोंं और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाती है। प्रात: उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करने से तमाम रोगों का शमन होता है। ऊँ की ध्वनि शरीर और मन को एकाग्र करने में मददगार होती है। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की उत्पत्ति होती है। वहीं ऊँ के उच्चारण से शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा तेजी से प्रवाहित होती है। पांच अवयव- ‘अ’ से अकार ‘उ’ से उकार एवं ‘म’ से मकार, ‘नाद’ और ‘बिंदु’ इन पांचों को मिलाकर ‘ओम’ एकाक्षरी मंत्र बनता है। इस एकाक्षरी मंत्र का उच्चरण आत्मविश्वास में वृद्धि करता है। शरीर के तंत्र सुचारु होकर ठीक ढंग से कार्य करते हैं। अत: ‘ऊँ’ ही परम सत्ता है और उससे बढ़कर कुछ नहीं।

उदय इंडिया ब्यूरो

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