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असली हिन्दू ह्रदय सम्राट

असली हिन्दू ह्रदय सम्राट

जब भी जन आंदोलनों की बात चलती है तो गोरक्षा आंदोलन, जेपी आंदोलन, मंडल आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आदि का जिक्र होता है। लेकिन, सभी मानते हैं कि रामजन्म भूमि या अयोध्या आंदोलन जैसा देशव्यापी और जोशीला आंदोलन दूसरा नहीं हुआ। एक मंदिर के लिये सारा देश आंदोलित हो जाए, यह आपने आप में अचरज की बात थी। कभी-कभी तो लगता है, आजादी के आंदोलन के बाद देश में ऐसा आंदोलन कभी हुआ ही नहीं। जय श्रीराम, रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, अभी तो यह झांकी है, काशी मथुरा बाकी है, बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का आदि नारे तब बच्चे-बच्चे की जबान पर थे। साध्वी ऋतम्भरा, उमा भारती के जोशीले भाषणों के लोग तब इतने दीवाने थे कि, उनके कैसेट बनाकर अपने पास रखते थे। अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए देश के गांव-गांव से ईंटे भेजी गईं थीं। राज्य सरकार द्वारा लाख अड़ंगे लगाने के बावजूद लाखों लोग अयोध्या पहुंचे थे। और, फिर बाबरी का ढांचा ढहा था। रामजन्म भूमि विवाद को अयोध्या आंदोलन में तब्दील करने में जिस शख्स ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई, वो थे विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंहल। इस आंदोलन ने देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी थी। शुरूआत से ही अयोध्या आंदोलन में अहम भूमिका निभानेवाले अशोक सिंहल ने इसे एक अनूठा जन आंदोलन बना दिया था।

90 के दशक में जो रामजन्म भूमि विवाद अयोध्या तक सीमित था उसे पूरे देश तक अशोक सिंहल ने पहुंचाया था, और इसे हिन्दू अस्मिता आंदोलन बना दिया था। तब अपने भाषणों में पुरजोर ढंग से एक ही बात कहते थे कि, यदि अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनेगा तो इस देश में हिन्दू समाज और उसकी पहचान भी नहीं बचेगी। भारत की पहचान राम से और हिन्दू की पहचान राम से है, और अयोध्या ऐसे राम की जन्मस्थली है। सवाल एक मंदिर का नहीं, बल्कि राम की जन्मभूमि का है।


एक-एक पग बढा़ते जाएं, बल वैभव का युग फिर लाएं


 

किसी भी राष्ट्र की ताकत मात्र इसकी भौतिक संपदा से नहीं आंकी जाती है। देश अपनी अंर्तनिहित प्रखरता, शौर्यता, वीरता तथा ऊर्जा के कारण खड़ा हो पाता है। इसी प्रखरता के आधार पर राष्ट्र का गौरव तथा भविष्य के प्रति आशा प्रकट होती है। भारत एक प्राचीन देश है, इसका इतिहास गौरवशाली रहा है। यह एक विशाल वटवृक्ष है, जिसकी जड़े गहरे समुद्र की तरह भूमि में समाई हैं। हमारे देश की संस्कृति पर किसी भी प्रकार का प्रहार देश के लिए अहितकर होगा।


लेकिन उनके लिए यह केवल बाबरी मस्जिद की जगह राम मदिर बनाने भर का आंदोलन नहीं हिन्दू स्वाभिमान की पुर्नस्थापना हिन्दू चेतना के पुनर्जागरण का आंदोलन था। 1989 में अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के बाद अशोक सिंहल ने कहा था कि “यह मात्र एक मंदिर का नहीं, हिंदू राष्ट्र का शिलान्यास है।” तभी तो इस आंदोलन ने देश में एक ऐसा माहौल पैदा किया, जिसके कारण देश में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। यह सरकार राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा और सहयोगी दलों को मिले वोटों के कारण बनी थी। और, इससे यह मिथ टूट गया कि, हिन्दू केवल जाति के आधार पर ही वोट देते है। लोगों को पहली बार पता चला कि, हिन्दू समाज वृहत्तर मुद्दों पर वोट दे सकते हैं। कभी-कभी लगता है कि, अक्सर बाल ठाकरे और नरेंद्र मोदी को हिन्दू ह्रदय सम्राट कहा जाता है। लेकिन, इस उपाधि के असली हकदार अशोक सिंहल ही हैं। जिन्होंने एक सशक्त और संगठित हिन्दू समाज का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे। उन्ही के संघर्ष का नतीजा है कि, अब हिन्दू समाज जाग गया है। अब कोई हिन्दू हितों को नजरअंदाज करने की गुस्ताखी नहीं कर सकता।


वसुधैव कुटुम्बकम्


आज विश्व में अतिविलासिता के कारण अंत:करण में एक प्रकार की रिक्तता का आभास हो रहा है। वह रिक्तता है अध्यात्म की, जिसे करोड़ों वर्ष पूर्व हमारे देश के मनीषियों ने पहचाना और उसका निवारण भी किया। आज संपूर्ण विश्व भारत के ज्ञान-विज्ञान तथा अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहा है। पूरी दुनिया मथुरा, वृंदावन, काशी, हरिद्वार तथा ऋषिकेश में योग, साधना तथा अध्यात्म की शिक्षा के लिए भारत का रूख करती है। निश्चित ही भारत अपने इस ज्ञान के आधार पर पुन: विश्व का नेतृत्व करेगा। देश जिस प्रकार से करवट बदल रहा है, उससे भारत के बारे में निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि, भारत पुन: अपने दायित्व के निर्वाह के लिये उठ खड़ा हुआ है। इसी आधार पर वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा के अनुरूप विश्व संरचना करने में भारत अग्रणी भूमिका निभाने वाला है।


1963 में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। जिसने बाद में धर्म संसद के सम्मेलन में दाऊ दयाल खन्नाजी द्वारा प्रस्तुत वह ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया जिसमें अयोध्या, मथुरा और काशी के मंदिर को मुक्त कराने का संकल्प लिया गया था। वह बीज था, भारतीय स्वतंत्रता के बाद के इतिहास के सबसे बड़े जन आंदोलन का। इसके बाद अखिल भारतीय स्तर पर एकात्मता यात्रा, शिलान्यास, तीन लाख गांवों से रामशिलाओं का लाया जाना और कार सेवा तक की यात्रा संघर्ष, बलिदान और जय-पराजय का एक ऐसा अध्याय है, जिसके नायक अशोक सिंहल ही रहे। यह काम आसान नहीं था। अनेक विभिन्नताओं वाले हिन्दू समाज सभी संत महंतों को एक मंच पर लाना और इस एकता को बनाए रखना यह असंभव काम है, लेकिन यह केवल अशोक सिंहल ही कर सकते थे। क्योंकि, वे विभिन्न साधु संतों, शाक्त, वैष्णव, शैव जैसे सैकड़ों संप्रदायों और अखाड़ों के बीच अपार सम्मान व श्रद्धा पाने वाले सेतु समान थे। सब उनका आदर करते थे, और उनकी बात मानते थे।

12-12-2015

हालांकि अशोक सिंघल को रामजन्म भूमि आंदोलन के कारण ही जाना जाता है। मगर, उनके नेतृत्व में विहिप ने कई तरह के प्रकल्प और कार्यक्रम हाथ में लिये, जो इस बात का प्रतीक है कि, उनकी दृष्टि केवल आंदोलन तक सीमित नहीं थी, वरन सारे हिन्दू समाज का सर्वांगीण विकास उनका मकसद था। अपने लंबे समाजिक अनुभव से उन्होंने जाना था कि, सामाजिक विषमता और अस्पृश्यता हिन्दू समाज की सबसे बड़े दुश्मन हैं। और, उसके उन्मूलन के बिना वास्तविक हिन्दू एकता हो ही नहीं सकती तो हिन्दू धर्म की इन अंदरुनी कमजोरियों के खिलाफ भी उन्होंने मोर्चा खोला। रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान भी यह बात कभी उनकी नजरों से ओझल नहीं हुई। 1986 में अयोध्या में शिलान्यास हुआ तो सिंहल ने कामेश्वर पासवान नामक हरिजन से पहली ईंट रखवाई। देश के मंदिरों में दलित और पिछड़े पुजारियों की नियुक्ति का अभियान भी उन्होंने चलाया।


 श्रीरामसेतु


श्रीरामसेतु को बचाने के लिये अशोकजी के आह्वान पर रामसेतु रक्षा मंच के माध्यम से चक्का जाम का आयोजन भी किया गया। उन्होंने इस कार्य के लिये सीधे प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराया था। उनका मानना था कि, श्रीरामसेतु को तोड़े बिना किसी अन्य वैकल्पिक मार्ग की तलाश करनी चाहिए, जिससे करोड़ों हिन्दुओं की आस्था सुरक्षित रह सके। इसके बाद ही सरकार को दबाव में आकर शपथ-पत्र वापस लेना पड़ा।


आरएसएस में करीब 40 साल तक काम करने के बाद अशोक सिंहल 1980 में विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव बनाए गए थे। 1981 का साल था। तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम की एक घटना ने अशोक सिंहल के कामकाज के तरीके को बदल कर रख दिया। मीनाक्षीपुरम में ऊंची जातियों के व्यवहार से तंग आकर 400 दलितों ने इस्लाम धर्म अपना लिया। धर्म बदलने वालों की सबसे बड़ी शिकायत ये थी कि, उन्हें मंदिरों में प्रवेश करने नहीं दिया जाता है। वीएचपी ने दलितों के लिये 200 से ज्यादा मंदिरों का निर्माण कराया। इसमें अशोक सिंहल ने बड़ी भूमिका निभाई।

दलित और पिछड़ों को वेद पढ़ाने के लिए सिंहल ने मुहिम चलाई, शंकराचार्यों से सहमति भी दिलवाई। दक्षिण भारत में दलित पुजारियों के प्रशिक्षण का बड़ा काम सिंहल ने शुरु करवाया। अस्पृश्यता के मुद्दे और दलितों के प्रति हिन्दू समाज के नजरिये में आमूल-चूल परिवर्तन हो, इसके लिए उनके द्वारा की गई कोशिशें अभूतपूर्व हैं।


हिन्दू स्टूडेंट काउंसिल की स्थापना


हिन्दू स्टूडेंट कांउसिल की स्थापना हिन्दू छात्रों को संगठित करने के लिये माननीय अशोकजी के प्रयासों से साल 1990 में अमेरिका में की गई थी। उस समय उन्होंने कहा था, जब अमेरिका से हिंदू नागरिक भारत में फोन करते हैं तो उन्हें अपने आप को हिंदू कहलाने में शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। हमारी चिंता ये है कि, अमेरिकी नागरिकता लेने के कारण उन्हें अपने मूल को नहीं भूलना चाहिए। उस समय उन्होंने कहा कि हमारा प्रयास एक विश्वविद्यालय खोलने का है, जिसकी अंतर्निहित भावना हिन्दू होगी। काउंसिल का काम अभी विश्व के 90 विश्वविद्यालयों में चल रहा है।

अमेरिका में श्रीरामजन्मभूमि हेतु समर्थन प्राप्त करने के लिए श्री राम जन्म भूमि मुक्ति आंदोलन के यूएएस चैप्टर की स्थापना की गई एवं 1989 से 1990 के बीच विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री होते हुए श्री अशोक सिंहल जी ने 30 देशों का कनाड़ा, यूएसए, सूरीनाम, यूके, नॉर्वे, डेनमार्क, नीदरलैंड, जर्मनी, बल्जियम, इजरायल, जांबिया, बोट्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, नेपाल, मलेशिया, श्रीलंका, बंाग्लादेश, थाईलैण्ड, हांगकॉंग, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, चीन, स्पेन, पुर्तगाल, स्वीडन आदि देशों से अयोध्या के लिए पूजित रामशिलाएं इकट्ठी करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


2005 में अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष और भाजपा नेता सूरजभान ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था। उन्होंने धर्माचार्यों से कहा था कि, मनु-स्मृति जैसे धर्मग्रंथों में जो दलितों की अवमानना करनेवाले उद्धहरण है उन्हें हटाएं। लेकिन, धर्माचार्यों का कहना था कि हिन्दू धर्मग्रंथों में आपत्तिजनक बातें नहीं हैं, इसलिए उन्हें बदलने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन, अशोक सिंहल ऐसे हिन्दू नेता थे, जिन्होंने कहा कि मनुस्मृति में ऐसे आपत्तिजनक वचन हैं, जिन्हें निकाला जाना चाहिए। वे तब विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष थे। तब उन्होंने मनु-स्मृति के खिलाफ एक आलोचनात्मक लेख लिखा था जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि, “विश्व हिन्दू परिषद मनु स्मृति को पूरी तरह से खारिज करती है। किसी सभ्य और सुसंस्कृत समाज में उसके लिये कोई स्थान नहीं हो सकता। जैसा कि गीता के नौवें अध्याय में कहा गया है, श्रीमद्भागवदगीता ही असली मनुस्मृति है। विश्व हिंन्दू परिषद के धर्माचार्यों, संतों, महामंडलेश्वरों और महंतो से बने मार्गदर्शक मंडल ने हिन्दू समाज में प्रचलित अस्पृश्यता को पूरी तरह खारिज किया है। उन्होंने बिना बेदभाव के सभी को मंत्र दीक्षा देने का फैसला किया है।”

अशोक सिंहल ने हिन्दी में -श्रीमद्भागवदगीता ही वास्तविक मनुस्मृति नामक पुस्तक लिखी थी। जो हिन्दू संगठनों में सामाजिक सुधारों की पुरजोर वकालत करती है।


वानप्रस्थ जीवन की हमारे समाज में भूमिका


साल 2004 में मा. अशोकजी ने अमेरिका में बोस्टन, हार्टफोर्ड, कनेक्टीकट, पिस्टबर्ग, पेनीसिलवेनिया, सिनसिनाटी, ओहियो, डेट्रोइट, ऑर्लेंडो, फ्लोरिडा आदि शहरों का दौरा किया। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने समाज में मंदिरों के महत्व से सभी को अवगत कराया। मंदिर हमारे समाज में सभी कार्यों का केन्द्र होते हैं। वानप्रस्थ जीवन की हमारे समाज में भूमिका भी सभी को समझाई। उन्होंने कहा कि अमेरिका में लगभग 2,00,000 भारतीय अपनी नौकरी से सेवानिवृत होने वाले हैं। उनके कला, कौशल तथा ज्ञान का उपयोग विश्व में हिन्दुओं के के विकास के लिये किया जा सकता है। हर जगह उनका सारगर्भित संबोधन कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाता गया।


वे लगातार यह कोशिश करते रहे कि, हिन्दू समाज दलितों को वह सम्मान दे, जिसके वे हकदार हैं। इस जरूरत को रेखांकित करते हुए वे अपने भाषणों में कहते थे, अस्पृश्यता की प्रथा के लिए “इस्लामी आक्रमणकारियों का दमन” जिम्मेदार है। इस्लामी आक्रमण शुरू होने से पहले तक हिंदुओं में कोई अस्पृश्यता नहीं थी। हिंदू समाज में चार वर्ण थे, जो पेशे पर आधारित थे। कामगारों का यह बंटवारा किसी भी तरीके से वर्गीकृत नहीं था। सभी से समान व्यवहार किया जाता था।” “कई सदियों पहले इस्लामी आक्रमणकारियों ने हिन्दुओं के एक वर्ग को मैला ढोने जैसा काम करने के लिए मजबूर किया, क्योंकि उस वर्ग ने दमन के बावजूद इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार कर दिया था। वे कहते थे “इस गलती को ठीक करने का सही समय आ गया है। मैं हिन्दुओं का आह्वान करता हूं कि, वे दलितों को वह सम्मान दें जिसके वे हकदार हैं। उन्हें आगे से अछूत नहीं बल्कि धर्म के योद्धा के रूप में देखा जाना चाहिए। जिन्होंने अपना धर्म छोडऩे की बजाय ऐसे काम करने का फैसला किया और अपमान सहा।”

अयोध्या आंदोलन के समय से ही अशोक जी के भाषणों में एक बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आती थी कि, अब इस देश का हिन्दू जाग गया है। अब कोई उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। अब जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा, अब हिन्दू उसे ही देश की बागडोर सौंपेगा। नरेंद्र मोदी के प्रधाननमंत्री बनने के बाद उन्हें लगता था कि, उनका यह सपना साकार हुआ है। एक कार्यक्रम में अशोक सिंहल ने कहा था – 800 साल बाद दिल्ली की कमान हिंदू स्वाभिमानियों के हाथ आई है। पृथ्वीराज चौहान के बाद दिल्ली की सत्ता हिंदुओं के पास आई है।


त्रिनिदाद में मंदिर हेतु आह्वान


यहीं पर उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा था कि, हिन्दू वैश्विक दृष्टि से संगठित हों ताकि, श्रीगुरू गोलवलकरजी और डॉ. हेडेगवार का स्वप्न साकार हो सके। यहां पर हिन्दू संस्कृति पर अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा था ”भारत आध्यात्मिक देश है सांप्रदायिक नहीं। हम सब महान धर्म से संबंधित हैं, जो कि सबसे प्राचीन है। दुनिया के सभी धर्मों की शिक्षा को और अन्य धर्मों को सम्मान देना सीखना चाहिए। सभी धर्म बराबर हैं, इसलिए सभी को समान सम्मान मिलना चाहिए।”


(बॉक्स सौजन्य:अशोक सिंहल-हिन्दुत्व के पुरोधा ‘, महेश भागचन्दका)

विश्व हिन्दू परिषद को सही मामलों में उन्होंने एक वैश्विक संगठन बनाने की कोशिश की थी। यह उन्हीं का प्रयास था कि आज अमेरिका, इंग्लैंड, सूरीनाम, कनाडा, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया , श्रीलंका आदि 80 देशों में विहिप का संपर्क है। और सारी दुनिया जानती है कि, विश्व हिन्दू परिषद सारे हिन्दुओं की प्रतिनिथि संस्था है।

जिन लोगों ने अशोकजी को नजदीक से देखा है उनका कहना है कि, वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल वाली सूक्ति उन पर पूरी तरह लागू होती थी। मीडिया अक्सर उन्हें भावनाएं भडकाने वाले हिन्दू नेता के रूप में चित्रित करता है। मगर अशोकजी साफ और संयमित वाणी का प्रयोग करते थे। निजी जीवन अत्यंत सादगी से बिताते थे, जैसे कोई साधु बिताता है। जिससे मिलते थे उसे चंद समय में अपना बना लेते थे। मगर अपने काम के मामले में वे उतने ही कठोर, अनवरत संघर्ष करते थे। उनको देखने पर लगता था कि, उनके जैसे व्यक्ति को केवल एक ही उपमा दी जा सकती है, वह है – संत सिपाही या संन्यासी योद्धा।

सतीश पेडणेकर

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