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भावभीनी श्रद्धांजलि

भावभीनी श्रद्धांजलि

मैं अभी-अभी दिल्ली के निगम बोध घाट से आया हूं। दाह संस्कार हुआ, अंतिम नमस्कार भी हुआ। जलती चिता से आवाज आई:

मैं तो चला, जाना पड़ा। छोड़ कर काम अधूरा।।

जलती चिता बोल उठी। अब काम करना है पूरा।।

पार्थिव शरीर को अपने आगोश में लिये, इठलाती, नाचती सी ऊंची लपटें बड़े गर्व से कह रही थी कि “तुम्हारे अशोकजी को मैं ले जा रही हूं। रोकना है तो रोक लो।” इतने में वास्तविक शरीर आकाश से ध्रुवतारा बनकर गरजा। “क्या जला रही हो उसको, जिसको कभी जलना ही था। है ताकत तो मुझे जला कर देखो। मैं जीवित हूं और रहूंगा। जब तक जीवन लक्ष्य पूरा नहीं होगा। न अभी विश्राम किया और न अब चैन से बैठने वाला हूं।”

अशोकजी चले गये या अभी हैं? ये आस्था का विषय है। जिनको लगता है चले गये, वह विश्राम कर सकते हैं और जिनको लगता है कि वे अहर्निश जाग्रत रह कर देख रहे हैं वे चैन से नहीं बैठ सकते। जीवन भर उनकी जीवटता जूझती रही यमराज रुपी बीमारियों से। न जाने कितनी बार यमदूत आये और उनकी जीवटता को प्रणाम कर खाली हाथ लौट गये। किन्तु 90 वर्ष की आयु में अशोकजी को लगा कि जीवन में किसी को निराश नहीं किया तो अब यमराज को ही क्यों? अत: उन्होंने अंतिम इच्छा मृत्यु स्वीकार कर ली। 1 अक्टूबर 2015 को उनके सार्वजनिक अभिनन्दन के समय ही वे बोल कुछ रहे थे, सुनने वालों में कुछ को सुनाई कुछ और ही पड़ रही थी। जैसे कृष्ण-अर्जुन को धर्मराज युधिष्ठर के प्रसंग में कह रहे हैं कि आत्म प्रशंसा करना अथवा सुनना दोनों मृत्यु के समान है। उन्होंने तय कर लिया था कि अब जाना ही पड़ेगा। 1 अक्टूबर से 17 नवंबर तक की अवधि में उनके क्रियाकलाप को ध्यान से देखने पर उनके अंतरंग रहने वाले साधक को स्पष्टतौर पर दिख रहा था कि वे जाने की तैयारी कर रहे थे। जिससे मिलना था, उनसे मिलकर अपने मन की बात कह रहे थे। मिलना संभव नहीं हुआ तो फोन से ही बात करते रहे। डायरी के पन्ने तो प्रतिदिन लिखे ही जाते थे। किन्तु सबसे महत्वपूर्ण था कि प्रात: 3 बजे उठकर स्नानादि कर 4 बजे चाय पी लेते थे। उस समय अपने निजी सेवक से अपने मन की बातें करते थे। उसके द्वारा ज्ञात हुआ कि क्या दावानल चल रहा था उनके मन में? राम जन्मभूमि, गाय, गंगा, वेद विद्यालय, एकल विद्यालय, के अतिरिक्त और कुछ नहीं था उनके मन में। हां यह पीड़ा थी कि इन पांचों विषय पर लक्ष्य पूर्ति से वंचित रह गये। मानों चिता पर लेटे हुए उसी पीड़ा की अग्नि में अपने को अर्पित कर रहे थे।

12-12-2015


देववाणी संस्कृत


देववाणी संस्कृत को राष्ट्रभाषा, राजभाषा तथा संपूर्ण विश्व में संपर्क की भाषा बनाने के लिए अशोकजी ने बीज रूप में कार्य प्रारंभ किया, जो वटवृक्ष अब विशाल होता जा रहा है। संस्कृत भारत की आत्मा है। संस्कृत ही सभी भाषाओं की जननी है। ऐसे विश्व के अनेक भाष-विज्ञानियों ने स्वीकार किया है। हमारे देश की संस्कृति के जो बीज तत्व(ज्ञान)हैं वे संस्कृत भाषा में उपलब्ध हैं। आज देश में आवश्यकता है कि संस्कृत पर शोध केन्द्र खोले जाएं। जिससे हमारे शास्त्रों में छुपा ज्ञान तथा विश्व के लिए उपयोगी सिद्ध हो।

अशोकजी का मानना है कि संस्कृत के विस्तार के लिए पूरे देश में अभियान प्रारंभ करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिक भी ऐसा मानते हैं कि कम्प्यूटर के लिए यदि कोई भाषा व्याकरणीय दृष्टि से सबसे अधिक उपयोगी है तो वह संस्कृत है। संस्कृत संपूर्ण राष्ट्र की बोलचाल की भाषा बने, इस दिशा में अशोकजी ने अनेक कार्य किए। उन्होंने विभिन्न संगठनों जैसे संस्कृत भारती तथा भारत संस्कृत परिषद को इस कार्य के लिए प्रेरित किया।

(बॉक्स सौजन्य: ‘अशोक सिंहल-हिन्दुत्व के पुरोधा ‘, महेश भागचन्दका)


12-12-2015

अशोकजी क्या थे? कुछ भी कहा जा सकता है। माता-पिता, गुरु, अध्यात्म पुरुष, प्रेरणा पुंज, युग प्रवर्तक, योद्धा पुरोधा ये सब विशेषण भी कम पड़ते हैं उनका वर्णन करने में। वे 60 के दशक में कानपुर के नगर प्रचारक की अवस्था में मेरे सरीखे सामान्य कार्यकर्ता को प्रचारक निकालने के लिये परिवार की अनुमति प्राप्त करने में अपनी पूज्या मां को सहायता के लिये बुला लिया करते थे। छोटे से छोटे कार्यकर्ता की छोटी से छोटी आवश्यकताओं की चिंता किया करते थे। अभी 17 नवंबर सायंकाल उनका शरीर विश्व हिन्दू परिषद कार्यालय लाया गया। परिसर के सभी परिवार, सफाई कर्मचारी से लेकर चालक तक की महिलाओं के रुदन से टप-टप गिरते आंसू अशोकजी के मातृत्व स्वरुप का बखान कर रहे थे। किसी के बच्चे को बड़े अस्पताल में तो किसी को अच्छे स्कूल में भर्ती कराया। बस अशोकजी के पास समाचार पहुंचने के साथ-साथ समाधान मिलता था। मैं उड़ीसा संघ के लिये गया। उड़ीसा की आर्थिक हालात की जानकारी किस को नहीं थी। किन्तु अशोकजी को इसकी सर्वाधिक चिंता हुई कि मैं वहां गया हूं तो धन चाहिए होगा, तो उन्होंने दिल्ली के लक्ष्मी पुत्रों से मेरा परिचय करवाया और साधनों की व्यवस्था कराते रहे। सैकड़ों कार्यकर्ताओं की सफलता में पिता की भूमिका निभाई। गुरु के रुप में विश्व विख्यात थे। आंखें बंद कर समस्या को सुलझाते थे तो लगता था कि किसी अदृश्य शक्ति से उनका संपर्क है। कई बार उनके विचार अटपटे लगते थे, लेकिन अंत में सही निकलते थे।

पांचजन्य के संपादक भानुप्रताप शुक्ल को कैंसर हो गया था। जब उन्हें लगा कि वे ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पायेंगे तो अशोकजी के पास आये और अपनी एक खास बात बताई। 1972 की बात है गुरुजी श्रीमान भानुप्रताप शुक्ल यूपी के प्रवास पर थे और मैं उनकी सेवा में तैनात था। एक दिन मैंने उनसे पूछ लिया कि आपकी आयु तो अब निश्चित हो चुकी है तो आपके बाद हिन्दुत्व का काम कौन करेगा तो वे बोलें कि “मैं अदृश्य रहकर यह काम करता रहूंगा।” फिर मैंने पूछा कि कौन दृश्यमान रहेगा तो धीरे से बोलें अशोक सिंहल।” हम सब के लिये वो साक्षात परम पूज्य गुरु जी के अवतार थे। अध्यात्म के शिखर पुरुष के रुप में मा.अशोकजी ने जो किया वो हिन्दुत्व के पुनर्जागरण के इतिहास में सदा अविस्मरणीय रहेगा।


राष्ट्र निर्माण पर


12-12-2015

आह्वान

जो हमारे श्रीरामजन्मभूमि के, हमारे रामसेतु के, हमारी मां गंगा के, हमारे गौवंश के शत्रु हैं उनको संसद में मत पहुंचने दो।

हमारी पहचान

हमारी पहचान धर्मनिरपेक्ष नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य भारत की पहचान नहीं है। हमारा राष्ट्रधर्म रहित राज्य नहीं है। हम एक आध्यात्मिक राज्य हैं।

देश का अपमान

महात्माओं में शिरोमणि कांची के शंकराचार्य के ऊपर हत्या का आरोप लगाकर उनके प्रति श्रद्धा समाप्त करने के लिए उनको बंदी बना लिया गया, इससे बढ़कर और हमारे देश का अपमान क्या होगा?

राष्ट्रीय विषय

हमारे संतों ने स्पष्ट कहा है कि श्रीरामजन्मभूमि वोट का विषय नहीं है। जितने भी दल हैं, वे इसे राजनीति का विषय न बनायें। यह एक राष्ट्रीय विषय है।

हमारी धरोहर

मंदिर, मस्जिद टूट सकती हैं, किन्तु श्रीरामजन्मभूमि समाप्त नहीं की जा सकती। श्रीरामजन्मभूमि सदा-सदा के लिए रहेगी।

हमारे प्रधानमंत्रीमेरा ऐसा मानना है कि नरेन्द्र मोदी भी श्रीरामजन्मभूमि की ऊपज हैं, क्योंकि रामभक्त जो गौधरा में जलाये गये, जलाने के बाद जो 72 घंटे की घटनाएं हुईं हैं। राम की शक्ति उनके ह्दय में प्रवेश कर गई और एक अजेय पुरूष के रूप में हम उनके स्वरूप के व्यक्तित्व को देख रहे हैं।

गौरक्षा और विकास

इस देश में गौ की रक्षा होगी और पौष्टिक आहार मिलेगा। क्या यह विकास का काम नहीं है? क्या ऐसी हमारी गंगा है जिससे आज हम आचमन तक नहीं कर सकते हैं? अगर हम कहते हैं कि वह अविरल बहे तो क्या यह विकास की बात नहीं है?

हमारे संतों का अपमान

हमारे बड़े-बड़े महात्माओं को और बड़े-बड़े संगठनों के प्रमुखों को बदनाम करने के लिए उनके मुख से वह बातें कहलवाई जा रही हैं, जिससे कि उनके प्रति श्रद्धा समाप्त होने लग जाये।

हमारी सरकार

हमको भारत में वो सरकार चाहिए, जो स्पष्ट नीति से हमारी धर्म की मान्यताओं को मानें और उनको प्रतिष्ठित करें।

हिन्दू समाज और राजनीति

जब से देश स्वतंत्र हुआ है, तब से अब तक हिन्दू समाज का सम्मान, यह इस भारत में हमारे राजनीतिज्ञों ने घटाने का ही प्रयत्न किया है।

श्रीरामजन्मभूमि और राजनीति

श्रीरामजन्मभूमि की हत्या की गई 1528 में, हम चाहते हैं कि उसका निर्माण हो, वे तम्बू में बैठे हुए हैं, इसके लिए आंदोलन किया गया। इसको ठीक से समझना चाहिए आंदोलन है किस लिये, हमारी धार्मिक आजादी के लिये सांस्कृतिक आजादी के लिये, गौ हत्या बंद हो, हमारे देश की संस्कृति नष्ट होती है गंगा के समाप्त होने में, इसके लिए आंदोलन चला है, कोई राजनीति के लिए नहीं चला हुआ है।

(बॉक्स सौजन्य: ‘अशोक सिंहल-हिन्दुत्व के पुरोधा ‘, महेश भागचन्दका)


राम जन्मभूमि आंदोलन में वो योद्धा की भूमिका में रहे और धर्मांतरण के मुद्दे पर हिन्दुत्व के पुरोधा बन जाते थे। गौशालाओं से लेकर कत्लखाने के अत्याचारों से पीडि़त गौवंश के लिये अशोकजी का दिल चित्कार उठता था। कार्यालय की गौशाला में प्रतिदिन गाय की पूजा करते थे। तो अलकबीर कत्लखाने के लिये सत्याग्रह में भी सर्वाधिक सक्रिय दिखते थे। गंगा की रक्षा के लिये आमरण अनशन पर बैठकर जीवन की बाजी लगा दी थी।

उन्हीं के पुण्य प्रताप से एकल विद्यालय यहां तक पहुंचा है। संघ जब 40 वर्ष का हो गया तो पूज्य गुरुजी ने विहिप की स्थापना की थी और विहिप 25 का तो हो गया तो मा. भावरावजी ने एकल विद्यालय की कल्पना दी थी। एकल विद्यालय 10 साल का हो गया तो मा.अशोकजी ने रामजी की सेना बनाने के लिये उसकी अंगुली पकड़ ली। 1999 के अभियान में 1 लाख विद्यालय का लक्ष्य दिया, ब्रह्मास्त्र की संज्ञा देकर इसके प्रयोजन को स्पष्ट किया। झारखंड से लेकर पूरे भारत और अमेरिका तक इसकी गूंज पहुंचाई। सेवादार कहते हैं कि पिछले 2 वर्षों में हुई हर बैठक में एकल विद्यालय की चर्चा करते थे। यहां तक की लक्ष्मी पुत्रों की बैठक में भी। कुछ दिनों पहले ही कहा था कि, “देखना यही एकल विद्यालय देश की समस्याओं का समाधान करेगा।” प्रणाम करने पर उनका प्रश्न होता था कोई परेशानी तो नहीं है। धन और कार्यकर्ताओं की पर्याप्त व्यवस्था हो रही है कि नहीं? एकल के जीवन में जब संकट आया तो अशोकजी को चट्टान की तरह अड़ते हुए भी देखा। हमेशा ढांढस बंधाते हुए कहते थे कि, “बिल्कुल चिंता मत करना। यह सब अग्नि परीक्षा है जो रामजी लेते ही हैं। बस प्रभु ऐसी कृपा करेंगे कि तुम देखते रह जाओगे।”

12-12-2015

धनबाद में 1,2,3 मार्च, 2015 को परिणाम कुंभ का आयोजन था। एक साल पहले उन्होंने स्वयं तीन दिनों तक रहने की इच्छा जताई थी। हम सब तो अभिभूत ही थे कहां कार्यकर्ता उनसे कार्यक्रम में रहने की प्रार्थना करते थे और कहां अशोकजी हमे स्वयं सूचना कर रहे हैं। किन्तु दिल्ली विधानसभा चुनाव के कारण स्वर्ण जयंती समारोह के लिए आयोजित हिन्दू सम्मेलनों की योजना में अचानक परिवर्तन करना स्वाभाविक था। अत: आयोजकों ने अपनी तरफ से इसकी घोषणा कर दी जो हम तक पहुंची कि, अशोकजी 1 मार्च को धनबाद में आयोजित सार्वजनिक सभा में नहीं रह पायेंगे। हम भी दिल्ली के महत्व को लेकर नतमस्तक थे। किंतु आश्चर्य तब हुआ जब अशोकजी को ये बात पता चली और वे बहुत नाराज हुए तथा अपना निर्णय सुनाया कि “मैंने एकल को वचन दे दिया है मैं उसको ही निभाऊंगा।” और अचानक ही तीन दिनों पहले हमारे पास समाचार आया कि अशोकजी 1 मार्च को कार्यक्रम में रहेंगे। इसके बाद हम सभी आनंद के सागर में गोते लगाने लगे। उनकी उपस्थिति में यह आवश्यक लगा कि एकल पर अब किसी को बोलने की आवश्यकता नहीं है। यह बात अलग है कि उनके नहीं आने की जब सूचना मिली थी तो विषय प्रतिपादन का दायित्व मुझे मिला था। किन्तु जब उनको कार्यक्रम की तालिका एक घंटे पूर्व दी गयी तो पूछने लगे कि श्यामजी का भाषण क्यों नहीं है? कार्यकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने स्वयं मना कर दिया तो अशोकजी ने मुझसे फोन पर बात की। मैंने प्रार्थना करते हुए कहा कि “जब आप बोल रहे हैं तो एकल का विषय आ ही जायेगा।” तब वे नाराज हो गये और बोले “क्या मैं तुम्हारी पंचमुखी शिक्षा में समझाऊंगा।” तब मैंने कहा कि “आप जो बोलेंगे वही पंचमुखी शिक्षा बन जायेगी।” तो वे नाराज होकर बोले आपका भाषण आवश्यक है। अथवा मैं वहीं मंच से आपको भाषण देने का आदेश दे दूंगा।” उनके अपनेपन के आगे मैं नतमस्तक था। पूरे तीन दिन तक प्रत्येक सत्र पर दर्शकों के बीच आकर बैठ कर और ध्यानस्थ होकर सब कुछ सुनते थे। कुछ समझ में नहीं आता था तो बीच-बीच में पूछते थे। जबकि हमें संकोच होता था कि स्वास्थ्य की इस अवस्था में इतनी देर बैठना कहां तक उचित है। एक दिन मैंने धृष्ठतापूर्वक कह दिया कि आप घर पर ही विश्राम करें तो भी चलेगा। वो खूब नाराज हुए बोले “मैं यहां क्यों आया हूं?” मैंनें भी समय का लाभ उठाने के लिये जवाब दिया तो फिर आपको आशीर्वाद देने हेतु आग्रह भी करेंगे” तो एक दम बोल पड़े “बिल्कुल नहीं। जिस सत्र में बोलना पहले से तय किया है उसके अतिरिक्त एक शब्द नहीं बोलूंगा।” अब समझ में आया कि पूरे समय कार्यक्रम में क्यों उपस्थित रहते थे। मानों उनकी उपस्थिती रामजी की कृपा की वर्षा की गारंटी बन गई थी। व्यवस्थाओं की कमियों से हम सब घबराये थे किन्तु सफलता हेतु बधाइयों का तांता देने वालों की वर्षा हो गई तो हम सब आश्चर्यचकित थे कि आखिर सब अपने आप कैसे हो रहा है? उस समय लगा कि रामजी ही कृपा कर रहे हैं। किन्तु रामजी की कृपा की व्यवस्था कौन कर रहा था? आज जब अशोकजी हमारे बीच नहीं हैं तब उनकी आध्यातिमक पहुंच की एक और मिसाल समझ में आई। ऐसा था मा.अशोकजी का एकल के प्रति प्यार तथा इसकी सफलता के प्रति गहरी चिन्ता।


धर्मांतरण देश के लिए सबसे बड़ा खतरा


12-12-2015

सेवा राष्ट्र का कार्य है। राष्ट्र का कार्य ही ईश्वरीय कार्य है। धर्मांतरण देश के लिये सबसे बड़ा खतरा है, इसके लिए सेवा कार्य करने की आवश्यकता है। इस खतरे से देश को बचाने के लिये ये सभी कार्य किये जा रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद द्वारा देश में जो सेवा प्रकल्प चल रहे हैं, उनकी योजना तथा प्रेरणा में अशोकजी की महत्वपूर्ण भूमिका है। संगठन द्वारा देशभर में सेवा प्रकल्प, छात्रावास, विद्यालय, महिलाश्रम, बाल कल्याण केन्द्र, एकल विद्यालय, सत्संग केन्द्र, अस्पताल आदि चलाए जाते हैं। सेवा शब्द बहुत व्यापक है, उसके अनेक क्षेत्र हैं जैसे शिक्षा,स्वास्थ्य, स्वावलंबन, दरिद्रता, आर्थिक सहायता। इन सभी क्षेत्रों में अशोकजी ने प्रभावी कार्य किये हैं। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वंचितों के लिए समर्पित कर उनकी अहर्निश भाव से सेवा की। वनवासी अंचल में सभी को स्वावलंबी बनाने के लिए भिन्न-भिन्न अस्पताल खोले। स्वयं को सेवा कार्य में लगाकर रखा, लेकिन कर्म करते हुए सदैव बंधनों से मुक्त रहे। यह उनकी जीवनशैली का ही परिणाम है कि कर्म करते हुए सदैव बंधनों से मुक्त रहे। उनका यही सूत्र उनकी साधना का मार्ग प्रशस्त करता रहा। कभी भी मन में यह विचार नहीं आने दिया कि यह कार्य मैं कर रहा हूं। सदैव स्वयं को ‘कर्तापनÓ के बोध से दूर रखा।

(बॉक्स सौजन्य: ‘अशोक सिंहल-हिन्दुत्व के पुरोधा ‘, महेश भागचन्दका)


अब देश में श्रद्धांजलि के कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे। हम और आप श्रद्धांजलि देंगे। किन्तु क्या देंगे हम अशोकजी को? क्या टप-टप गिरते आंसुओं से उस महापुरुष को प्रसन्न कर पायेंगे? क्या श्रद्धा सुमन के दो शब्द प्रशंसा से प्रभावित हो पायेंगे वह विकास पुरुष? क्या चित्र पर पुष्पों की वर्षा की अपेक्षा कर रहा है हिन्दुत्व का वह पुरोधा? नहीं! बिल्कुल नहीं!! उसे तो अधूरी यात्रा को पूरी करने का संकल्प चाहिये। उस संकल्प को पूरा करने के लिये परिश्रम का पसीना चाहिए। उसके लिए उपयुक्त कार्य योजना चाहिए। उस योजना के माध्यम से समय का योगदान चाहिए। उनके पांचो प्रिय विषयों हेतु इस देश में चाहिए संगठित लोकमत और चाहिए रामजी की सेना। उस काम के लिये ही समर्पित है एकल अभियान योजना। मा.अशोकजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हेतु प्रबल हिन्दु शक्ति के रुप में विश्व हिन्दू परिषद का स्वरुप चाहिए। कभी स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।” आज प्रत्येक हिन्दू गर्व से कहे कि “मैं विश्व हिन्दू हूं।” ऐसा हिन्दुस्तान चाहिए।


राम मंदिर निर्माण के संकल्प के साथ संपन्न हुई श्रद्धांजलि सभा


12-12-2015

22 नवम्बर 2015 को दिल्ली के के.डी. जाधव रेसलिंग स्टेडियम में विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक व हिंदुत्व के महामानव श्री अशोक सिंहल की श्रद्धांजलि सभा राममंदिर निर्माण के संकल्प के साथ संपन्न हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघाचालक मोहनराव भागवतजी ने मेदांता अस्पताल में भर्ती अशोक सिंहलजी के साथ हुई उस वार्ता की चर्चा करते हुए सभा को बताया कि, अशोक सिंहलजी ने अपने जीवन में दो संकल्प किये थे- एक अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण करना और दूसरा संसार में वेदों का प्रचार-प्रसार करना। मोहन भागवतजी ने कहा कि “हमें अशोक सिंहलजी के संकल्प को पूरा करने हेतु उनके संकल्प को अपना संकल्प बनाना होगा। ईश्वरीय कार्य तो अवश्य पूर्ण होगा, बस हमें निमित्त मात्र बनना होगा।” विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष राघव रेड्डीजी ने “अशोक सिंहल जी को 21वीं सदी का विवेकानंद बताते हुए उन्हें अपना गुरू व मार्गदर्शक बताया।” विश्व हिन्दू परिषद के कार्याध्यक्ष डा. प्रवीण तोगडिय़ा ने “अशोक सिंहलजी को संत-सेनापति और भारत की राजनीति में धर्म को पुर्नस्थापित करने वाला बताते हुए कहा कि, उन्होंने 23 प्रतिशत जनसंख्या द्वारा 77 प्रतिशत पर वीटो पावर के इस्तेमाल पर अंकुश लगाया। छुआछूत का उन्मूलन, अविरल व निर्मल गंगा, गौवध पर अंकुश तथा एक लाख से अधिक गैर ब्राह्मणों को अर्चक पुरोहित बनाकर हिंदुत्व के विजय का शंखनाद किया।” उन्होंने कहा कि “अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण हेतु मात्र एक ही रास्ता है, कि देश की संसद सोमनाथ की तर्ज पर राम मंदिर निर्माण हेतु अविलम्ब कानून बनाये।” भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डा.मुरली मनोहर जोशी ने अशोक सिंहल को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि “वे सर्वधर्म समभाव के प्रबल समर्थक और एक प्रकाश पुंज थे, जिसकी पूर्ति हम सभी छोटे-छोटे दीपक के रूप में उनके दिखाए मार्ग पर चलकर कर सकते हैं।” भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए “अशोक सिंहलजी को साहसी, पराक्रमी, अडिग, अचल तथा विनम्र बताते हुए कहा कि, उनके जाने से एक युग का अंत हो गया है, जिसकी पूर्ति नहीं की जा सकती है।” हालैंड से पधारे राजा लुईस ने श्रद्धाजंलि व्यक्त करते हुए कहा कि “देवभूमि व वेदभूमि के रूप में अशोक सिंहल ने संसार से भारत का परिचय करवाया।” इस अवसर पर साध्वी ऋतंभरा, सतपालजी महाराज, स्वामी चिदानंद मुनि, वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, तरुण विजय, वीरेश्वर द्विवेदी, नवीन कपूर, विष्णु हरि डालमिया, महेश भागचंदका इत्यादि लोगों ने भी सभा को संबोधित किया। इस अवसर पर संघ-परिवार के दत्तात्रेय होसबले, कृष्ण गोपाल, दिनेश चन्द्र, चम्पत राय, विनायकराव देशमुख, विज्ञानानंद, रामलाल, श्याम जाजू, भूपेन्द्र यादव, अनिल जैन, दीनानाथ बत्रा के साथ-साथ भारत सरकार के केन्द्रीय मंत्री रविशंकर, साध्वी निरंजन ज्योति, जे.पी.नड्डा, डॉ. हर्षवर्धन के साथ-साथ अनेक गणमान्य लोगों से स्टेडियम खचाखच भरा रहा। अशोक सिंहलजी की श्रद्धांजलि सभा में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, दलाई लामा, सुधांशुजी महाराज, रॉयल भूटान सरकार, नेपाल के उप-प्रधानमंत्री, मुलायम सिंह यादव, शीला दीक्षित जैसे कई वरिष्ठ नेताओं का संदेश पढ़ा गया।


तो निजधाम हेतु यात्रा पर प्रस्थान करते हुए मा.अशोकजी को आइये हम जोर-जोर से सुनायें कि “अशोकजी! आप जाते हो तो जाओ! किन्तु आपके सपनों को नहीं जाने देंगे। कभी नहीं, कतई नहीं।” इसी में हमारे जीवन की सफलता है और यही प्रभु रामजी के चरणों में हमारी प्रार्थना है।

श्याम गुप्त

 

 

 

 

 

 

 

 

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