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अशोक सिंहल एक संस्कृतिक धरोहर

अशोक सिंहल  एक संस्कृतिक धरोहर

विश्व हिन्दू परिषद के मार्गदर्शक अशोक सिंहलजी का 17 नवम्बर 2015 को दोपहर में दिल्ली के पास गुडग़ांव में देहान्त हो गया। कुछ दिन पहले ही देशभर में उनका जन्मदिन मनाया गया था। उन्होंने जीवन के 89 वर्ष पूरे कर लिये थे और 90 में प्रवेश किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नातक अशोकजी प्रशिक्षण से धातु विज्ञानी थे। इलाहाबाद के सम्पन्न परिवार के अशोकजी ने कुछ वर्ष पहले करोड़ों की अपनी पैतृक सम्पत्ति दान कर एक न्यास बना दिया था। महर्षि वशिष्ठ के नाम से बनाये गये इस न्यास के नाम के आगे वशिष्ठ ऋषि की अर्धांगिनी का नाम जोड़कर इसका पूरा नाम अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ रखा। पीठ का मुख्य उद्देश्य दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर शोध कार्य करना है। जिस प्रकार महात्मा गांधी मानते थे कि भारत का विकास हिन्द स्वराज के आधार पर ही हो सकता है, पश्चिमी अवधारणाओं पर किया गया विकास भारत को भारत ही नहीं रहने देगा, उसी प्रकार अशोक सिंहलजी मानते थे, कि विकास की सही दिशा उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन ही हो सकता है। यही दर्शन भारतीय स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल है। गांधी का हिन्द स्वराज और उपाध्याय का मानव दर्शन मोटे तौर पर एक ही धरातल पर अवस्थित हैं।

अशोकजी की धातु प्रोद्यौगिकी से लेकर एकात्म मानव दर्शन तक पहुंच पाने की यात्रा बहुत लंबी है। 1926 में उनकी यह जीवन यात्रा आगरा से शुरु हुई थी। यह परिवार आगरा का ही रहने वाला है। वही आगरा जिसने इतिहास के न जाने कितने उतार चढ़ाव अपने जीवन-काल में देखे। इसी आगरा से निकले अशोक सिंहल ने स्वयं भी भारतीय इतिहास पर अपना एक स्थायी पद चिन्ह छोड़ दिया। अशोकजी के निकटवर्ती विजय कुमार के अनुसार नौवीं कक्षा में पढ़ते हुये उन्होंने स्वामी दयानन्द की जीवनी पढ़ ली थी। जाहिर है इस जीवनी ने बाद में अशोकजी को कभी चैन से नहीं बैठने दिया। लेकिन सभी जानते हैं कि शुरुआत चाहे आगरा से हो या किसी और स्थान से भारत को अपने भीतर आत्मसात करने का रास्ता प्रयागराज से होता हुआ काशी में जाकर ही रुकता है। 1942 में अशोकजी भी प्रयागराज इलाहाबाद में ही अध्ययन कर रहे थे। इलाहाबाद उबल रहा था। आनन्द भवन कांग्रेस की गतिविधियों का केन्द्र था। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत छोडऩे का अल्टीमेटम दे दिया था। सत्याग्रह हो रहा था। उधर द्वितीय विश्व युद्ध की ज्वालाओं में यूरोप धधक रहा था। बाबा साहिब आम्बेडकर काउंसिल के सदस्य होकर भारत में अस्पृश्यता उन्मूलन के रास्ते तलाश रहे थे। गांधीजी गिरफ्तार हो चुके थे। देश में निराशा का वातावरण छाने लगा था। अशोक सिंहलजी की उम्र उस समय सोलह साल की थी। वे संगम तट पर खड़े होकर, कल-कल, छल-छल बहती-क्या कहती गंगाधारा को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जानते थे, यह गंगाधारा ही अनन्त काल से भारत की आवाज है। वहीं उनकी भेंट प्रो.राजेन्द्र सिंह (जो बाद में रज्जू भैया के नाम से जाने गये) से हुई जिन्होंने गंगा की कल-कल ध्वनियों की व्याख्या अशोक को समझाई। भारत मां को विश्व के गुरु के आसन पर स्थापित करने की ध्वनि। विदेशी दासता से मुक्त करवाने की गुहार। अशोकजी उसी उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे। लेकिन, संघ से सोलह वर्ष के उस किशोर के लिये जुडऩा उस समय भी इतना आसान नहीं था। प्रो. राजेन्द्र सिंह को बाकायदा परिवार में बुलाया गया और उनसे संघ की प्रार्थना सुनी गई। ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे।’ प्रार्थना सुन कर अशोकजी की माताजी को संतुष्टि हुई। यही देश की मुक्ति का रास्ता है। सिंहलजी ने शाखा जाना शुरु कर दिया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कभी घर की तरफ भी नहीं।


बीज-संस्कार का विकास


हिन्दू बीज-संस्कार को लेकर अशोकजी सतत मनन और चिंतन करते थे। संस्कार बीज-रूप में विद्यमान होते थे, जो अनुकूल वातावरण मिलते ही पुष्पित एवं पल्लवित होते थे। हिन्दुत्व उनका विशेष एवं जन्मजात स्वभाव-गुण था। यह निश्चित ही पूर्वजन्म के अच्छ कर्म के कारण उन्हें प्राप्त हुए होंगे। इसी बीज संस्कार को विश्व में विकसित करने के लिए उन्होंने जीवन-भर कांटों भरा मार्ग अपनाया। देश के कोने-कोने में अनेक ऐसे आयाम खड़े किये जिससे इन संस्कारों का एक वट विशाल स्थापित हो सका। भारत में सदियों से अब तक एक ही संस्कृति का प्रवाह चला है। हिन्दुओं के अन्त:करण में उन पुराने आदर्शों के प्रति श्रद्धा है। हिन्दु-समाज के अन्त:करण में वही बीज रूप में विद्यमान है, जिसे पुन:जागृत करने का कार्य करना है। वह हिन्दू बीज पुन: पुष्पित एवं पल्लवित हो सकता है और तब दुनिया की किसी भी शक्ति द्वारा उसको उखाडऩा सम्भव नहीं होगा।


प्रयागराज से ही अशोकजी काशी गये। महामना मालवीयजी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के लिये। यहीं उन्होंने मनुष्यों के भीतर भी ऐसी धातु निर्माण का मंत्र सीखा जिसके चलते कोई अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में अर्पित कर देता है। सबसे पहले उन्होंने यह ताकत अपने भीतर ही पैदा की। गंगा के चौरासी घाटों पर गंगा को निहारते हुये, काशी विश्वनाथ मंदिर के घंटानाद को सुनते हुये, महामना की प्रयोगस्थली में घूमते हुये, उन्होंने अपने भीतर को फौलादी बना लिया। बी.ई. की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वे 1948 में जेल चले गये। पंडित नेहरु ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जेल से छूटने के बाद ही उन्होंने अपनी बी.ई की पढ़ाई पूरी कर डिग्री हासिल की। लेकिन इसके साथ- साथ उन्होंने संघ की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी। यही कारण है कि इंजीनियर बनने के बाद वे वापस घर नहीं गये, बल्कि संघ के प्रचारक बन गये।

लगभग 800 साल की गुलामी के कारण भारतीय इतिहास पुरुष के शरीर पर पड़ गये काले धब्बे अशोकजी की चिन्ता का कारण थे। यह चिन्ता तो देश में और अनेक चिन्तकों को भी है। लेकिन अशोकजी चिन्तन और यथार्थ के अन्तराल को कर्म से पाटने वाले वीरव्रती थे। यही कारण है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से धातु विज्ञान में पढ़ाई करने के बाद भी सांसारिक झमेलों से किनारा करते हुये वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये थे। अशोकजी की यही चिन्ता उन्हें बार-बार अयोध्या की ओर खींच कर ले जाती थी। विदेशी आक्रमणकारियों ने अयोध्या में राम स्मृति मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर बाबर की स्मृति में एक ढांचा खड़ा कर दिया था। भारत के लोगों को आशा थी कि जिस प्रकार यूरोपीय विदेशी शासकों के भारत से चले जाने के बाद सरकार ने उन शासकों के बुत और अन्य चिन्ह सार्वजनिक स्थानों से हटा दिये थे, उसी प्रकार मंगोल, तुर्क, अफगान व अरब शासकों के चिन्ह भी हटा दिये जायेंगे। सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से उसकी शुरुआत भी की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वह कार्य वहीं स्थगित हो गया। सरदार पटेल के उसी कार्य को आगे बढ़ाने का प्रश्न था। अयोध्या में बने बाबरी ढांचे को लेकर अशोकजी की चिन्ता भी यही थी। बहुत से लोग अज्ञानतावश यह मानते हैं कि वे मुसलमानों के विरोधी थे, इसलिये बाबरी ढांचा हटाना चाहते थे। लेकिन इस का लेशमात्र भी सत्य नहीं है। मुझे अशोकजी का सानिध्य पिछले लगभग पन्द्रह बीस सालों से मिलता रहा है। दरअसल वे तो आश्चर्य व्यक्त किया करते थे कि भारत के मुसलमानों का बाबर से क्या सम्बंध है? ये मुसलमान तो अपने ही बन्धु हैं, जो विदेशी इस्लामी सत्ता के दिनों में किन्हीं कारणों से मतान्तरित हो गये। इनका बाबर से क्या लेना देना है। अशोकजी का कहना था कि इन लोगों को कुछ निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनैतिक नफा-नुकसान के लिए भड़काते रहते हैं। बाबर मध्य एशिया से आया विदेशी आक्रमणकारी था। जिसने भारत के इस खंड को जीत ही नहीं लिया था, बल्कि यहां के लोगों पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। धीरे-धीरे देश में बाबर के वंशजों का राज्य फैलता गया। मतान्तरण उसी कालखण्ड के अत्याचारों का परिणाम है। लेकिन, उस कालखंड में भी भारत के लोग निरन्तर संघर्षशील रहे। आज जिन भारतीयों ने इस्लाम मजहब को अंगीकार कर लिया है, उन्हीं के पूर्वज इन विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों के अत्याचारों का सर्वाधिक शिकार हुए थे। भारत के मुसलमानों का न तो मध्य एशिया से और न ही बाबर से कोई ताल्लुक है, बल्कि इनके पूर्वज तो बाबर और उनके वंशजों के अत्याचारों का शिकार हुए। इसलिए अयोध्या का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है, उसका मजहब से कुछ लेना-देना नहीं है। यह सभी भारतीयों के सम्मान का प्रश्न है, चाहे वे इस्लाम मजहब को मानते हों, वैष्णव सम्प्रदाय के हों, या शैव मत के, जैन मताबलम्बी हों या बौद्ध पंथ के अनुरागी हों। सिक्ख पंथ के उपासक हों या नास्तिक ही क्यों न हों। क्योंकि, राम सभी के यशस्वी पूर्वज थे। कभी अल्लामा इकबाल ने सभी भारतीयों की तरफ से राम की महत्ता का जिक्रकरते हुये लिखा था –

है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज

अहले नजर समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द

अशोकजी इसी राम के वजूद की निशानियों को समेट रहे थे, जिनको नष्ट कर दिया गया था या करने के प्रयास हो रहे थे। एक वक्त ऐसा भी आया जब राम के वजूद की दूसरी निशानी राम सेतु को तोडऩे की लगभग सब तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। यदि उस वक्त अशोकजी के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद सक्रिय न होती तो सचमुच राम सेतु का वजूद समाप्त हो जाता। लेकिन, इन सभी प्रयासों में मुस्लिम विरोध कहीं दूर-दूर तक नहीं था। यही कारण था कि अशोकजी प्रयास कर रहे थे कि अयोध्या में वर्तमान राम मंदिर का विस्तार कर भव्य राम मंदिर सर्वानुमति से बनें। संसद इसके लिये प्रस्ताव पारित करे। इसी हेतु वे समाज के सभी वर्गों से मिलते थे। देह शान्त हो जाने से पूर्व भी उन्होंने यही कहा कि अभी भव्य राम मंदिर का निर्माण करना है, ऐसा समाचार पत्रों में छपा भी था। अयोध्या में राम मंदिर तो अशोकजी ने बना दिया था। अब तो केवल उसका स्वरुप युगानुकूल भव्य बनाना है।


हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति


12-12-2015हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है। यह अन्य धर्मों की तरह मात्र एकदेव उपासना पर आधारित नहीं है। इसकी व्यापकता के कारण हिन्दू शब्द को परिभाषित करना एक दुरूह कार्य है। अशोकजी का यह मानना था कि हिन्दुत्व आदि-अनादि काल से प्रवाहित सांस्कृतिक धारा है। जिसमें युगानुकूल परिवर्तन होते रहे हैं। हिन्दुत्व जीवन की बाध्यता नहीं है। यह समग्र विकास के लिये पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है। जीवन को विभिन्नता प्रदान करता है। जीवन के विभिन्न पक्षों पर सदैव विभिन्न विचारों का इसने स्वागत किया है। हिन्दुत्व का लक्ष्य संकीर्ण व सांप्रदायिक न होकर पारस्परिक सौहार्द रहा है।

हिन्दुत्व जीवन पद्धति में आंतरिक शुद्धता की व्यवस्था की गई है। समाज में समय-समय पर अनेक समाज सुधारकों ने अपना जीवन कुरितियों, विकृतियों तथा अंध विश्वास को समाप्त करने के लिए लगाया। हिन्दू संस्कार में समाज सुधारकों के अलावा अनेक चिंतक हुए हैं, जिन्होंने समाज व्यवस्था की व्यापक योजना बनाई है। भगवान बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की। भगवान महावीर ने जैन धर्म के माध्यम से कार्य किया। बासव ने लिंगायत सम्प्रदाय की स्थापना की ज्ञानेश्वर और तुकाराम ने वारकरी पंथ की शुरूआत की। गुरू नानक ने सिक्ख धर्म के माध्यम से हिन्दु धर्म की रक्षा की। स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से सनातनी संस्कृति को पुन:जीवित किया। स्वामी विवेकानंद ने विश्व में हिन्दुत्व का शंखनाद किया। महारानी लक्ष्मीबाई ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए गौरवशाली संघर्ष किया। महाराणा प्रताप ने विधर्मियों तथा आततायियों से समाज की रक्षा की। वीर शिवाजी ने धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए युद्ध किया। इन सभी के विचारों में भिन्नता अवश्य दिख सकती है, किन्तु सूक्ष्म रूप से सभी का समान मूलभाव परिलक्षित होता है। हिन्दु धर्म का यही विशिष्ट लक्षण सांस्कृतिक धारा को सतत प्रवाहित करता है।

धर्मशास्त्रों में हिन्दूशब्द

प्राचनी हिन्दू धर्मशास्त्रों में भारत को आर्यावर्त’ और ब्रह्मावर्त’ कहा जाता है। विष्णु पुराण में भारत की भौगोलिक सीमाएं दर्शाते हुए कहा गया है।

उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्ष तद् भारतं नाम, भारती यञ सन्तति:।।

अर्थात हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय पर्वत के दक्षिण में जो भू-भाग है उसे भारत कहते हैं। वहां के समाद को भारत की संतति अर्थात भारती या भारतीय के नाम से पहचानते हैं। भारत के निवासियों को पिछले सैंकड़ों-हजारों वर्षों से हिन्दू के रूप में पहचाना जाता है। हिन्दुओं के देश को हिन्दुस्तान कहते हैं। विश्व के अनेक देश इसे हिन्द व यहां के नागरिकों को हिन्दी भी कहते हैं। बृहस्पति आगम में कहा गया है-

हिमालय समारभ्य यावद्इिन्दुसरोवरम्।

तं देवनिर्मित देशं, हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।

अर्थात् हिमालय से लेकर इन्दु (हिन्दु) महासागर तक देवपुरूषों द्वारा निर्मित इस भूगोल क्षेत्र को हिन्दुस्थान कहते हैं।


लेकिन, राम मंदिर आन्दोलन तो बहुत बाद की बात है। संघ की दृष्टि से उनका लम्बा कार्यकाल कानपुर का ही रहा। आपातकाल में देश पर लाद दी गई संवैधानिक तानाशाही के खिलाफ नानाजी देशमुख के नेतृत्व में देशभर में आन्दोलन चला तो उसमें अशोकजी भी अग्रणी पंक्तियों में थे। पुलिस ने उन्हें पकडऩे के भरसक प्रयास किये लेकिन, भूमिगत हो गये अशोकजी की छाया को भी वे पकड़ नहीं पाये। अशोकजी से प्रेरणा लेकर न जाने कितनें युवकों ने जेल जाना स्वीकार कर लिया अपने व्यवसाय और कैरियर को ठोकर मार कर। आपातकाल में देशवासियों द्वारा किये गये संघर्ष की भट्टी में से तप कर निकले अशोकजी दिल्ली में प्रान्त प्रचारक बन कर आये। उधर सांय प्रचारक का दायित्व इन्द्रेश कुमार जी ने संभाला। इन दोनों की योजना से ही दिल्ली का ऐतिहासिक तीर्थस्थान झंडेवाला मंदिर किसी की निजी सम्पत्ति न रह कर सार्वजनिक न्यास के रुप में विकसित हो सका। 1981 में अशोकजी ने विश्व हिन्दू परिषद की जिम्मेदारी संभाली। उन दिनों विश्व हिन्दू परिषद सीमित क्षेत्रों में ही जाना जाता था। उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत होते हुये भी, काम सीमित ही था। अशोकजी ने इसे व्यापक फलक प्रदान किया। कार्यों का विस्तार किया। मीनाक्षीपुरम में हुए मतान्तरण ने उन्हें कहीं भीतर तक हिला कर रख दिया। जाति के आधार पर सामाजिक स्थान और नियति का निर्धारण। उन्होंने हिन्दू समाज के भीतर अस्पृश्यता विरोधी व ऊंच-नीच विरोधी आंदोलन को और गतिशील बनाया। सामाजिक समरसता परिषद का नारा बन गया। बाबा साहेब आम्बेडकर जिंदगी भर इस कार्य में लगे रहे थे। उन्होंने अनेक स्थानों पर जाति की जड़ता की चट्टानों को हिलाकर रख दिया था। लेकिन इन चट्टानों को तोडऩे का काम अभी बाकी था। अशोक सिंहल ने यही काम शुरु किया। मंगल काल में अनेक बन्धु अनेक कारणों से हिन्दू समाज को त्याग कर इस्लाम में दीक्षित हो गये थे। कालान्तर में वे उनकी सन्तानें राष्ट्र विरोधी धरातल पर जा खड़ी हुईं। मतान्तरण से राष्ट्रन्तरण होता है। लेकिन, शिक्षा के प्रभाव के कारण ऐसे अनेक बन्धु, खासकर युवा पीढ़ी पुन: अपने घर वापिस आ जाना चाहती थी।


भारतीय दर्शन के प्रति झुकाव


अशोकजी को श्रीमद्भगवद्गीता बहुत प्रिय थी। वे जीवन के गूढ़ रहस्यों को सदा जानने व समझने का प्रयास करते रहते थे। वे सदा जिज्ञासु प्रवृति के रहे, जिज्ञासा उनका सहज स्वभाव था। प्रत्येक विषय में दार्शनिक चर्चा एवं चिंतन उनकी प्रकृति थी। दर्शन का अर्थ है देखनाअर्थात मनुष्य-जीवन के गूढ़ रहस्यों को सूक्ष्म दृष्टि से देखना तथा समझना। उनके साथ कभी फुरसत में बैठें तो वे जीवन के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या सहज ही करते थे। उन प्रशनों के उत्तर सरलता से देते थे, जिन प्रशनों को हम दैनिक जीवन में देखना व समझना चाहते हैं, यही आत्मदर्शन है। उन्हें स्वयं का साक्षात्कार हुआ था। अशोकजी की कुशल योजना का परिणाम था कि धर्मरक्षा-राष्ट्ररक्षा हेतु सब विधाओं की ज्ञानवृद्धि का आपस में एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाकर उन्होंने लोगों में हिन्दू विचार को जीने की सार्थकता उजागर की। संगठन द्वारा खड़े किए गए सभी प्रकल्पों, कार्यों तथा विधाओं की अधिक से अधिक उन्नति हो, उसके लिए वे सदा प्रयत्नशील रहते थे।


विश्व हिन्दू परिषद ने परावर्तन आंदोलन शुरु किया। यह एक प्रकार से स्वामी दयानन्द द्वारा चलाये गये शुद्धि आंदोलन का ही विस्तार था। इसी परावर्तन से आगे जाकर धर्म जागरण का आंदोलन फैला। धर्म जागरण ने गौ-रक्षा के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्र बिन्दु में स्थापित कर दिया।

सनातन भारत के भावात्मक प्रतीकों को सायास नष्ट करने के प्रयासों का अशोक सिंहलजी विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से विरोध कर रहे थे। वे मानते थे कि भौतिक उपादानों से राज्य का निर्माण होता है। राष्ट्र के निर्माण के लिये भावात्मक कारकों के प्रति लगाव एवं भक्ति ही इतिहास-सिद्ध मंत्र है।

यह अशोक सिंहलजी की ऊर्जा ही थी जिसने विश्व हिन्दू परिषद को उसकी पहचान और दिशा दी। परिषद के संस्थापक महासचिव दादा साहेब आप्टे ने परिषद की जो कल्पना की थी, उससे भटका न जाये इसी की पूर्ति हेतु अशोकजी ने कुछ वर्ष पूर्व हिन्दुस्तान समाचार संवाद समिति के साथ मिलकर (समिति के संस्थापक भी आप्टे ही थे) दादा साहिब आप्टे की जन्म शताब्दी मनाने का निर्णय किया और आप्टेजी की जीवनी लिखने का जिम्मा मुझे सौंपा था। उन दिनों मुझे अशोकजी से बार-बार मिलने का मौका मिलता था, इसलिये उनके विषय में जानने का अवसर भी। दरअसल उन दिनों ही अशोकजी के व्यक्तित्व को मैं सही ढंग से पकड़ पाया।

अशोकजी की हिन्दू व हिन्दुत्व की अवधारणा बहुत व्यापक थी। वे मानते थे कि यूरोपीय बुद्धिजीवियों ने या तो अपनी अज्ञानता के चलते या फिर साम्राज्यवादी षडयंत्र के कारण हिन्दुत्व को भी सामी सम्प्रदायों के समकक्ष मान कर उसे संकीर्ण मजहबी सीमाओं में समझने की भूल की। दुर्भाग्य से नई शिक्षा पद्धति से पढ़े-लिखे लोग भी हिन्दुत्व को उन्हीं संकीर्ण सीमाओं में देखने लगे। अशोकजी हिन्दुत्व को जीवन शैली के तौर पर देखते थे। इसे सुखद संयोग ही कहना चाहिये कि, उच्चतम न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में हिन्दुत्व को जीवन शैली की ही संज्ञा दी। शायद यही कारण था कि वे ब्रिटिश शिक्षा पद्धति के स्थान पर भारतीय शिक्षा पद्धति के पक्षधर थे। इस स्थल पर अशोकजी महामना मदनमोहन मालवीय के अनन्य प्रशंसकों में से थे। ये मालवीयजी ही थे जिन्होंने अंग्रेज काल में भी सीमित स्पेस उपलब्ध होने के बावजूद शिक्षा पद्धति को भारतीयता का पुट देने का प्रयोग किया। अशोकजी उसी प्रयोग को आज भी आगे बढ़ाने के पक्षधर थे।


धर्मप्रसार एवम धर्मरक्षा


अशोकजी हिन्दू धर्म प्रचार-प्रसार तथा विदेशियों द्वारा हिन्दुओं के प्रति की जा रही साजिशों के प्रति सदैव चिंतित रहते हैं। वैसे तो जब से विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई है, धर्मांन्तरण का विषय प्रमुख रहा है। स्थापना के समय में ही संदीपनी आश्रम में ही सभी संतों ने इस पर आपत्ति जताई थी। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए धर्म प्रसार के कार्य की शुरूआत हुई। इस धर्मप्रसार के कार्य में अशोकजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


अशोकजी विज्ञान के छात्र थे। लेकिन उनकी रुचियों का क्षेत्र विस्तृत था। शास्त्रीय संगीत उनकी कमजोरी थी। शास्त्रीय गायन में सिद्धहस्त थे। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में गाये जाने वाले अनेक गीतों की लय उन्होंने ही बनाई थी। विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय विज्ञान में होने वाले विकास और शोध की भंग हो चुकी परम्परा को वे पुन: स्थापित करने के पक्षधर थे। वेद-विज्ञान विषय विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाने चाहिये और उनमें स्थापित मान्यताओं को आधुनिक उपकरणों से प्रयोगशालाओं में प्रमाणित भी किया जाना चाहिये। विश्व हिन्दू परिषद में ही कार्य कर रहे एक अन्य प्रचारक विजय कुमार का कहना है कि वेदों में अशोकजी की रुचि अपने कानपुर के कार्यकाल में पैदा हुई। वहां उनका सम्पर्क रामचन्द्र तिवारी नाम के विद्वान से हुआ, जिन्होंने उन्हें वेदों की ओर आकर्षित किया। वेदों में उनकी यह रुचि जीवन भर बनी रही। यह संयोग ही कहा जायेगा कि विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक महासचिव दादा साहेब आप्टे विदेशों में स्थान-स्थान पर वेद भगवान की स्थापना कर आये थे और उनके उत्तराधिकारी अशोक सिंहलजी अब वेद को विश्व के विज्ञान पटल पर स्थापित करने का उद्यम कर रहे थे।



12-12-2015पिछले कुछ अरसे से उनके शरीर ने अपनी सीमा के संकेत देने शुरु कर दिये थे। चिन्तन और कर्म की गति का यही विरोधाभास है। कर्म की गति शरीर पर निर्भर है और शरीर की क्षमता और उम्र, दोनों सीमित हैं। चिन्तन तो कालातीत है, परन्तु शरीर तो काल के पाये से बंधा हुआ है। काल के पाये से बंधा यह शरीर ही अब धीरे-धीरे उनका साथ नहीं दे रहा था। शरीर के इन संकेतों को उनसे ज्यादा और कौन समझ सकता था? वे ऋषि परम्परा के सिद्ध पुरुष थे। संघर्षों की ज्वाला में साधना करते सन्यासी योद्धा थे। कुछ मास पहले की बात है। उनका फोन आया। उन्होंने दिल्ली बुलाया था। मैं वहां गया और मिला तो अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ की चर्चा शुरु कर दी। प्रो. मुरली मनोहर जोशी पीठ के मार्गदर्शक हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी उसके अध्यक्ष हैं , इत्यादि बताते रहे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे सब क्यों बता रहे हैं। फिर बोले, मैं चाहता हूं आप इस पीठ के महासचिव का कार्यभार संभालें। मैं चुप हो गया और वे भी। कुछ देर बाद शायद अपने आप से ही बोल रहे हों, भारत का रास्ता इसी एकात्म मानव दर्शन से निकलेगा और कोई रास्ता नहीं है। मैंने उनके चरण स्पर्श किये और उनके स्वप्न को धारण किया। मेरे लिये यही अशोकजी का प्रसाद था।


गौरक्षण-संवर्धन के लिए कार्य


गौवंश, हिन्दू धर्म का आधार स्तंभ है। यह बात मुस्लिम आततायी भी भली प्रकार जानते हैं। इसी कारण से उन्होंने गौवंश की हत्या करनी प्रारंभ कर दी थी, ताकि हिन्दू समाज की भावना आहत हो। समय-समय पर अनेक हिन्दू वीरों ने गौहत्या रोकने की दिशा में सफल प्रयास किये। अशोकजी का गौमता के प्रति सदैव लगाव रहा है। उनका स्पष्ट मानना है कि भारत देव भूमि है, हम देवों की संतान हैं। अपना देश आध्यात्मिक देश है। गौमाता हमारे धर्म का आधार है और गौ की सेवा द्वारा सब पापों से मुक्ति मिलती है। भीष्म पितामह ने अंतिम समय पर गौमाता को ही याद किया था, उसके बाद ही उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ था। गौ, गंगा तथा गायत्री हमारे देश की संस्कृति के आधार हैं। हमने वेदों से ज्ञान प्राप्त किया है। गाय हमें दूध देती है, गोबर-मूत्र देती है और पर्यावरण की शुद्धि में सहयोग करती है। किन्तु हमने अपनी गौमाता के प्रति दयनीय व्यवहार किया है। देश की अनेक हल ना होने वाली समस्याओं का हल गौ-संरक्षण से संभव है। गौ-संरक्षण से ही देश की आर्थिक व सामाजिक रक्षा हो सकेगी।



हिन्दू शब्द की उत्पत्ति


हिन्दू शब्द की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में अनेक मत हैं। श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दू शब्द की उत्पत्ति नामक लेख में हिन्दू शब्द की व्यापक चर्चा की है। उनके अनुसार कुछ विद्वान इसकी उत्पत्ति सिंधु शब्द से मानते हैं। उनका मत है कि सिंधु नदी के पास रहने वालों को हिंदू कहा गया। इसी के साथ सिंधु शब्द का अपभ्रंश हैं हिंदूअर्थात सिंधु शब्द से ही अंग्रेजी शब्द इंडिया बना है। पं. धर्मानंद भारती के अनुसार-फारसी में हिंदूशब्द यद्यपि रूढ़ हो गया है, तथापि वह उस भाषा का नहीं है। लोगों का ख्याल है कि फारसी का हिंदू शब्द संस्कृत शब्द सिंधु का अपभ्रंश है, वह लोगों का केवल भ्रम है। ऐसे अनेक शब्द हैं, जो भिन्न-भिन्न भाषाओं में एक ही रूप में पाए जाते हैं। यहां तक कि उनका अर्थ भी कहीं-कहीं एक ही है। पर वे सब भिन्न-भिन्न धातुओं से निकलते हैं। हिंदूशब्द ईसा के जन्म से भी कई हजार वर्ष पहले का है। तो फिर क्या वह वेद में है? नहीं। किसी शास्त्र में है? नहीं। जैन या बौद्धों के पुराने ग्रंथों में है? नहीं। फिर है कहां? अग्निपूजक पारसियों के धर्मग्रंथ जेंदावास्तामें उनके प्राचीनतम ऋषियों और विद्वान पंडितों ने हिंदू शब्द के आदिम रूप को स्थान दिया है। वह आदिम रूप हनद्शब्द है। यहूदियों की धर्म पुस्तक ओलड टैस्टामैंट’(बाईबल के पुराने भाग) में भी हनदशब्द पाया जाता है।

क्रिश्चियन लोगों का कथन है कि बाईबलका पुराना भाग क्राइसटसे पांच हजार वर्ष पहले का है। इसमें कोई संदेह नहीं। इसे वे पूरे तौर पर सच समझते हैं। ‘‘हमारा धर्मग्रंथ जेंदावस्ता इतना पुराना है, जितनी यह सृष्टि, वह इतना प्राचीन है, जितना सूर्य या चंद्रमा।’’ पारसियों की यह उक्ति सच है। इसके प्रमाण हैं- यहूदियों का धर्मशास्त्र, ‘ओल्ड टैस्टामैंटजो हिब्रू अर्थात इब्रीय भाषा में है और पारसियों का जेंदावस्ताजेंद भाषा में। हिब्रू भाषा की अपेक्षा जेंद भाषा बहुत पुरानी है।

 



भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियां


अशोकजी का मानना था कि भारत की लोक संस्कृति में विज्ञान समाहित है। हमारे वेदों में विज्ञान के सूक्ष्म सूत्र छुपे हुए हैं। भारतीय साहित्य में अनेक ऐसे उद्धरण आते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि जिस समय विश्व के अन्य देशों में सभ्यता के विकास का प्रारंभ भी नहीं हुआ था। उस समय भारत अपने गौरवशाली वैज्ञानिक युग में जीता था।



एकात्मता यात्रा


सम्पूर्ण भारत मां गंगा, भारत माता एवं गऊ माता के प्रति समान रूप से आस्था रखता है, यह प्रकट करने के लिए प्रथम बार 1983 में तथा दूसरी बार वर्ष1995 में सम्पूर्ण भारत में यात्राओं का आयोजन एक साथ किया गया। विराट जनजागरण हुआ। इसे एकात्मता यात्रा का नाम दिया गया था।


उस वीरव्रती ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता के चरणों में खपा दिया। स्वयं के लिये किसी पद की कामना नहीं की। आपातकाल में जेल में हम जयप्रकाश नारायण की जेल में समगल की गई एक कविता पढ़ा करते थे, जिसमें जयप्रकाश नारायण ने लिखा था कि यदि मैं चाहता तो कितना ही बड़ा पद प्राप्त कर सकता था। पद मेरे पास चल कर आये। लेकिन मेरा उद्देश्य पद प्राप्त करना नहीं था। यही भाव अशोक सिंहलजी का था। पद प्राप्त करना उनके जीवन मार्ग का हिस्सा ही नहीं था। वे समस्त मानव जाति की मंगल कामना के लिये भारतीय दर्शन के विविध प्रयोग कर रहे थे। यही उनका रास्ता था। यही मानव मंगल का रास्ता है। सुरुचि प्रकाशन में कार्य कर रहे विजय कुमार ने लिखा, जिनके लिये सारा देश शोक में डूबा है वे स्वयं अ-शोक थे।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री


श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के सूत्रधार


12-12-2015

6 दिसंबर 1992, सांस्कृतिक गौरव का वह दिन है, जिस दिन प्रभु श्रीराम के भक्तों ने अयोध्या में स्थित सदियों पुराने मस्जिदनुमा बाबरी ढांचे को धूल धूसरित कर दिया। इस आंदोलन में माननीय अशोक सिंहलजी की भूमिका आंदोलन के सूत्रधार के रूप में महत्वपूर्ण रही। मुलायम सरकार के समय जब कार सेवा हुई तो अशोकजी घायल हो गए। पुलिस उन्हें ढूंढती रही। वे घायल होने के बाद श्रीराम अस्पताल में भर्ती हो गए, किन्तु पुलिस उन्हें पहचान भी न सकी। मस्जिद के ध्वस्त होते ही छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों ने अलाप शुरू कर दिया। लेकिन, सभी रामभक्तों ने इस दिन सांस्कृतिक शौर्यता की अनुभूति की। चारों तरफ विजय पर्व का हर्षनाद हो रहा था। भारत ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में हिन्दू समाज ने सांस्कृतिक कलंक के गिरते ही गौरव की अनुभूति की थी। मुस्लिम वोट बैंक तथा हिन्दू विरोधी मानसिकता होने के कारण कुछ छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी लोग श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का विरोध करते रहे हैं। कौन नहीं जानता है कि, उस स्थान की रक्षा तो स्वयं हनुमानजी करते हैं? उस स्थान के विरोध का कोई औचित्य ही नहीं है। कौन इस सत्य को ठुकरा सकता है कि, अयोध्या ही प्रभु श्रीराम का जन्म स्थान है। अब तो न्यायालय द्वारा भी यह बात सिद्ध हो चुकी है कि, वही श्रीराम जन्मभूमि है। भारत में बसने वाला मुस्लिम समाज विदेशी नहीं है। उनके पुरखे एक ही हैं, धर्म परिवर्तित करने से पुरखे नहीं बदला करते हैं। मुस्लिम समाज को इतिहास के उस दौर से बाहर आना होगा, जब उनके पूर्वजों ने तलवार के भय से इस्लाम स्वीकार कर लिया था। अन्य समाज की तरह उन्हें भी यहां की मूल संस्कृति में समरस होना ही पड़ेगा। हम सब एक ही सांस्कृतिक धारा के अंग हैं। राम-कृष्ण हमारे पूर्वज एक होने के कारण हम सब भाई-भाई ही हैं।


आतंकियों को ललकारा


अशोकजी का मानना था कि भारत जैसे सांस्कृतिक राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वह सांस्कृतिक गुलामी की जंजीरों को तोड़े। हिन्दू होना स्वयं में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है। तर्क-वितर्क तथा दर्शन के इस देश में आतंकवाद का कोई स्थान नहीं है। आज भारत अनेक प्रकार के आतंक के साये में जी रहा है। एक तरफ पाकिस्तान इस देश में आतंकवाद के अड्डे चला रहा है, तो दूसरी तरफ बंाग्लादेश से मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ भारत में हो रही है। पूर्वोत्तर में चीन की कुदृष्टि भारत माता के आंचल(अरूणाचल) पर है।


प्रभु श्रीराम भारत की आत्मा में वास करते हैं। संत महात्माओं की गाथाओं में वे आदि- अनादि काल से अंकित हैं। कोई शासन-प्रशासन इस आस्था तथा विश्वास को समाप्त नहीं कर सकता। अयोध्या ही प्रभु श्रीराम की जन्म भूमि है। सदियों से यह पूरी दुनिया में रहने वाले जनमन की श्रद्धा का केन्द्र रही है। वहां मंदिर था। बर्बर आक्रमणकारी बाबर ने श्रीराम जन्मभूमि पर खड़े मन्दिर को नष्ट भ्रष्ट कर भारत की संस्कृति पर आघात किया था। लेकिन, जब हिन्दू हृदय की ज्वाला को पुन: जागृत किया गया, तभी वह स्थान मुक्त हो सका। इन सभी कार्यों के पीछे दैवीय शक्ति निहित थी। अशोक जी बताते हैं कि, एक बार जब वे अपने गुरूदेव के पास मंदिर आंदोलन की चर्चा कर रहे थे तो गुरूदेव ने उत्तर दिया था-जो तुमको मुक्त करता है उसे तुम क्या मुक्त करोगे? फिर कहने लगे, ‘‘ठीक है। हिन्दू संगठन का कार्य है सो होना ही चाहिए।’’ विश्व में मा. अशोक सिंहलजी को जो ख्याति प्राप्त है, वह श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के सफल संचालन के कारण है। अशोकजी ने करोड़ों हिन्दुओं के मंदिर निर्माण संकल्पकी सिद्धि के लिए आह्वान किया। इसके लिये पूरे देश में अनेक प्रकार की गतिविधियों का आयोजन किया गया। प्रभु श्रीराम की पवित्र नगरी अयोध्या भारत में 7वीं मोक्षदायिनी प्राचीन नगरी है। यह कहा जाता है कि मनु ने इस शहर का निर्माण कराया था। श्रीराम जन्मभूमि को प्राप्त करने के लिए 1528 ई. से लगातार संघर्ष चल रहा था। अन्ततोगत्वा हिन्दू समाज की विजय हुई। हाल ही में आये न्यायालय के निर्णय से भी यह सिद्ध हो गया कि, प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि यही है, जिसके लिये हिन्दू समाज सैंकड़ों वर्षों से संघर्ष करता आ रहा है।

8 अप्रैल 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत के अनेक धार्मिक संतों को एकत्र करके प्रथम धर्म संसद का आयोजन किया गया और इसी धर्म संसद में व्यापक जनजागरण का संकल्प लिया गया। राम जानकी रथयात्रा द्वारा संपूर्ण देश में जनजागरण किया गया। अशोक जी बताते हैं कि, मंदिर आंदोलन के दौरान मन में तरह-तरह के प्रश्न धर कर रहे थे। देवरहा बाबा ने कहा था ‘‘एक बार शिलान्यास हो जाने दो, जनसाधारण को यह विश्वास हो जाएगा कि मंदिर कार्य संपन्न होगा। यदि यह नहीं होगा तो लोगों ने आपके ऊपर जो विश्वास किया है, वह विश्वास बिखर जाएगा। देश एक बार पुन: बंट जायेगा।’’ सन् 1989 में पूज्य देवराहा बाबा की उपस्थिति में शिलापूजन का निर्णय लिया गया। पूरे देश से पौने तीन लाख पूजित शिलाएं अयोध्या पहुंची। 9 नवंबर, 1989 ईं को भावी राम मंदिर का शिलान्यास सम्पन्न हुआ। शिलापूजन के कारण देश की राजनीति में भी परिवर्तन आया। केन्द्र की सरकार बदल गई।

02 नवम्बर,1990 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने रामभक्तों पर गोलियां चलवा दीं। यह नृशंस नरसंहार राम विरोधी तथा मुस्लिम परस्त राजनीति का संकेत था। मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि अयोध्या में परिन्दा भी पर नहीं मार सकतालेकिन अशोक जी अपनी सफल योजना के कारण हजारों रामभक्तों के साथ अयोध्या में प्रकट हो गए। उनमें गजब की निर्भीक संकल्प शक्ति थी। वे ‘‘सौगंध राम की खाते हैं- हम मंदिर वहीं बनाएंगे’’ के उद्घोष के प्रतीक बन गए। उनके कुशल नेतृत्व के कारण ही विरोधियों के होश उड़ गए थे।


सामाजिक समरसता


समाज में जाति भेद को समाप्त करना आवश्यक है। इस दिशा में अशोकजी ने अनेक कार्य किये। तमिलनाडु, उड़ीसा, राजस्थान, एवं आंध्र प्रदेश के दूर-दराज के क्षेत्रों में रथों की यात्राएं निकाली गईं। जिसमें यात्रा-रथ दलित बस्तियों के घरों तक पहुंचता था। लोगों को यह अहसास होता था कि प्रभु स्वयं चलकर उनके घर पर आये हैं। सभी प्रकार के अगड़ी तथा पिछड़ी जाति के मदभेदों को भुलाकर सभी लोगों में सामाजिक समानता का भाव जागृत किया गया। हिन्दू समाज में जाति भेद के कारण बहुत से लोग इस्लाम कबूल कर लेते थे, क्योंकि उन्हें हीन समझा जाता था। इन यात्राओं के कारण हजारों हिन्दू तमिलनाडु, राजस्थान, तथा उड़ीसा में पुन: अपने धर्म में वापस आए।


30 मई 2013 को अशोकजी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी से भेंट की। सभी ने श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए सहयोग का आग्रह किया। यह भी आग्रह किया गया कि, राष्ट्रपति स्वयं मुस्लिम समाज को समझाएं जिस पर उन्होंने कहा था कि वहां कोई मंदिर होना सिद्ध होता है तो मुस्लिम समाज के लोग ही अपना दावा छोड़कर शांतिपूर्वक तरीके से मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

12-12-2015

श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन का प्रारंभ एक छोटे से रूप में हुआ था। दैवीय शक्ति के कारण यह विशाल रूप लेता चला गया। कभी राम जानकी रथ-यात्रा तो कभी पैदल यात्राओं का आयोजन होता। जब राम जानकी रथ यात्रा दिल्ली के निकट पहुंची तो श्रीमती इंदिरा गांधी का देहावसान हो गया, केन्द्र की सरकार बदल गई थी। इस नई सरकार के समय में भी रथ-यात्रा लगातार निकाली जा रही थी। इन यात्राओं के माध्यम से हिन्दू समाज में जनजागरण होता रहा। इसी समय शाहबानो प्रकरण भी अपने जोरों पर था, मुसलमान आंदोलन करने पर उतारू थे। इस आंदोलन के कारण हिंदू समाज भी जागृत हुआ। कांग्रेस का व्यवहार भी प्रतिक्रियात्मक ही था। संतों की ललकार के कारण उत्तर प्रदेश की सरकार सहम सी गई थी।


भगवा आतंकवादशब्द का विरोध


देश के तत्कालीन गृहमंत्री सुशील शिंंदे द्वारा भगवा आतंकवाले शब्द को लेकर अशोकजी बहुत उग्र हो गए थे। उन्होंने कहा था ‘‘यह बड़ा आश्चर्य है कि जब देश के सभी हिन्दू सम्प्रदायों के जगद्गुरू, आचार्य, महामंडलेश्वर और लाखों संत कुंभ के महापर्व पर एकत्र कोटि-कोटि हिन्दुओं के बीच प्रवचन में लगे हुए हैं, उस समय हिन्दू समाज को आतंकवाद तथा भगवा आतंक का स्वर उठाने में उन्हें तनिक भी लज्जा नहीं आई। यदि हमारे गृहमंत्री अपने इस कथन के प्रति पूरे हिन्दू समाज से माफी नहीं मांगते तो संतों को कोई उग्र कदम उठाना पड़ेगा’’। उनका स्पष्ट मत था कि गृहमंत्री को पाकिस्तानी भाषा नहीं बोलनी चाहिए। उस समय उन्होंने कहा ‘‘हजारों वर्षों से हिन्दू समाज और भगवा वस्त्र पर हिंसा और आतंक का आरोप संत तथा हिन्दू समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता है।’’


अशोकजी मानते थे कि, इस कार्य के पीछे कोई दैवीय शक्ति थी। जिसने इस कार्य को सुचारू रूप से चलाने में मदद की। उन्होंने आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाते हुए सुप्त हिन्दु समाज को गहरी निद्रा से जगाया। संपूर्ण विश्व से प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण के समर्थन में सहयोग प्राप्त होने लगा।

संपूर्ण गंगोत्री पथ पर बड़े-बड़े बांध बनाकर विनाश का तांडव चल रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि, इस क्षेत्र को हत्यारों के हवाले कर दिया गया है। इस क्षेत्र की आध्यात्मिक शांति सामप्त हो रही थी। अशोकजी ने सरकार को चेतावनी दी की तत्काल यहां काम बंद कराया जाये, उन्होंने कहा था कि, गंगा की हत्या हो रही है। कुछ लोग रोजगार का सवाल खड़ा कर रहे हैं, लेकिन क्या अपनी मां की हत्या करके रोजगार बढ़ाया जाता है? मैं देख रहा हूं कि किस निर्ममता से गंगा तट के पहाड़ों का विध्वंस हो रहा है।


(सभी बॉक्स सौजन्य: ‘अशोक सिंहल-हिन्दुत्व के पुरोधा’ , महेश भागचन्दका)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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