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अमृतरूपी आंवला

अमृतरूपी आंवला

यह हिन्दुस्तान के प्राय: सब ऊष्ण प्रदेशों के बागों और जंगलों दोनों जगहों पर पाया जाता है। मूलत: उत्तर भारत, अवध, बिहार और पूर्वी देशों में इसकी उपज अधिक है। चीन एवं मालद्वीप में भी ये पाया जाता है।

बाह्म स्वरूप: आंवला गोलाकार चमकदार और छ: रेखाओं से युक्त होता हैं कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर हरापन युक्त पीले और सूखने पर काले रंग के होकर फांके पृथक-पृथक हो जाती हैं। साथ ही गुब्ली भी फट जाती है। उससे विकोणाकार छोटे-छोटे बीज निकलते हैं।

बीज से ही इसके पौधे उत्पन्न होते हैं और थोड़े ही यत्न से साधारण वृक्षों की भांति प्राय: दुमट मिट्टी में इसके वृक्ष सतेज होते हैं। प्राय: वाटिकाओं में कलमी आमले के वृक्ष रोपित किये जाते हैं। जंगली के फल एक तोले तक और बागी कलमी आंवले के पांच तोले से अधिक भी देखने में आते हैं। बनारसी आंवले सर्वोत्तम समझे जाते हैं। किंतु जितने आंवलों की यहां खपत होती है उतने उत्पन्न नहीं होते। खटिक लोग दूसरी जगह से मंगाकर बेचते हैं। पके फल बहुत कम मिलते हैं। प्राय: कच्ची अवस्था में ही तोड़कर बेंच लेते हैं।


 

अन्य भाषाओं में नाम-

हिंदी-आंवला, आंवड़ा, औठा

बंगाली-आमरो,अमला, अमलकी

पंजाबी-अम्बुल

मराठी-आवलकाठी

कन्नड़-नेल्लि,नेल्लिकायि

ब्रह्मा-शब्जु, जिफूयूशी

अंग्रेजी–Myorobalan

लेटिस –Phyllanthas Emblica


 

रासयनिक संगठन: रासायनिक दृष्टि से इसके टैनिन में गैलिक एसिड, एलाइगिक एसिड और ग्लूकोज होता है इसमे विटामिन-सी तथा पेक्टि बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है विटामिन सी की मात्रा 100 ग्राम में 600 से 950 मि.ग्रा. तक पाई जाती है।

आंवला के सूखे-चूर्ण में भी विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में होती है, क्योंकि इसके अन्दर का टैनिन विटामिन सी को नष्ट नहीं होने देता।

आयुर्वेदिक गुण कर्म और प्रभाव

  • आंवला एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि है इसका बहुत असाध्य बीमारियों को दूर करने में प्रयोग किया जाता है। रसायन के लिये एक विशिष्ट प्रकार की विधि से सेवन करने का विधान चरक में दिया गया है। ताजे सूखे आंवले के चूर्ण को लेकर उसको ताजे आंवले के रस का संस्कार करके सुखाना चाहिए। यह जितनी अधिक बार दी जायेगी उतना ही गुणकारक होगा। कम से कम 21 संस्कार देकर सुखाकर रखना चाहिये।
  • इसका ताजा फल रसायन, किडनी, रक्तपित्त को दूर करने वाला, शीतल, विरेचक, मूतल एवं यकृत की क्रिया ठीक करने वाला है।
  • इसका सूखा फल ग्राही, शीतल, दीपन एंव रक्तसत्रावरोधक है।
  • आंवला एवं हल्दी का क्वाथ वस्तिशोध एवं पित्त प्रकोपजन्य व्यधि में उपयोगी है।
  • आंवले का रस मूत्रकृच्छ, रक्तपित्त, पित्तशूल, कामला, हिक्का, वमन, जीर्ण-विबन्ध में मिश्री मिलाकर शर्बत के रूप में बहुत लाभदायक है।
  • आंवला का चूर्ण अर्श, अतिसार, संग्रहणी, अत्यार्तव एंव प्रतिशयाय में उपयोगी है।
  • पेड़ पर ही लगे आंवले को चीरने से जो रस निकलता है उससे आंख धोने से अतिशोध दूर होता है।
  • इसके कोमल पत्तों को छाछ के साथ लेने से अजीर्ण और अतिसार में लाभ होता है।
  • आंवले के चूर्ण को गोघृत तथा मधु के साथ लेने पर स्मृति मेधा बढ़ती है, श्वास, कास, वाय, पांडु अग्निमोध, वीर्यदोष आदि दूर होते हैं।

आयुष शुक्ला

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