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स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई सोती सरकारें, जागते बच्चे

स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई  सोती सरकारें, जागते बच्चे

बड़े-बड़े नामी गिरामी स्कूलों के लिये भी जानी जाती है दिल्ली। यहां ऐसे ऐसे स्कूल हैं, जो हर प्रकार की सुविधा, संसाधन तथा सम्पन्नता से परिपूर्ण हैं। देशभर से अनेक बड़े शहरों से भी साधन-सम्पन्न माता-पिता, सरकारी अधिकारी, बड़े व्यापारी, बिल्डर, दिल्ली में ही अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं तथा इन स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिये हर प्रकार का प्रयत्न करते हैं। वैसे यहां सरकारी स्कूल भी हैं और दिल्ली की वर्तमान सरकार वायदा कर चुकी है कि, वह इनको इतना आकर्षक बना देगी की जो लोग इस समय भारी-भरकम फीस देकर ‘पब्लिक स्कूलों’ में बच्चे पढ़ा रहें हैं, वे सरकारी स्कूलों की तरफ भागे चले आयेंगे। लेकिन, लोगों की राय अलग है। ऐसे वायदे तो पहले की सरकारों ने भी किये थे। स्कूलों को सुधारने के सपने तो सभी राजनेता और सरकारें देशभर में दिखा चुकी हैं। चुनावों के समय तो लगता है कि, सरकारी स्कूलों का कायाकल्प बस नई सरकार के आते ही हो जाएगा। लोगों ने इन वायदों का ‘सामान्यीकरण’ कर दिया है। स्थितियां या तो जैसी की तैसी बनी रहती हैं या और नीचे ही चलती जाती हैं। किसी भी जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में जाकर स्पष्ट देखा जा सकता है कि, हर व्यक्ति कितना व्यस्त है, काम के बोझ तले दबा जा रहा है। वह क्या कर रहा है? यह अलग तथ्य है और इस पर कुछ न कहना ही सही व्यवहार माना जाता है। यदि किसी बड़े अधिकारी से चर्चा करने का समय आपको मिल जाए तो वह चर्चा में नये कार्यक्रमों, योजनाओं तथा उस पर लगातार बढ़ रहे कार्यभार पर ही भाषण देता जाएगा। देश हित में वह कितना बोझ अपने कंधों पर उठा रहा है, यह तो आप को सुनना ही पड़ेगा। आप को वहां यह भी समझाया जाएगा कि नीचे के अधिकारी अक्षम हैं और ऊपर के लोग सुनते ही नहीं हैं।

शिक्षा सुधारों तथा शैक्षिक प्रगति की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है। लेकिन, न जाने क्यों, जमीनी स्तर पर छोटे-छोटे परिवर्तन भी कार्यान्वित क्यों नहीं हो पाते हैं? कितनी ही बार यह अनुशंसा की गई है कि, प्राथमिक पाठशालाओं के प्रारम्भ होने तथा बंद होने के समय को मुख्य अध्यापक तथा समुदाय के लोग मिलकर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप तय करें। 1990-91 में मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ ब्लाक में एक सर्वेक्षण में यह पाया गया था कि, अनेक बच्चे परीक्षा इसलिए छोड़ देते हैं, क्योंकि उस समय उन्हें महुए के फूल चुनने पड़ते हैं। यह वहां की अर्थव्यवस्था का आधार है। महुए के फूल नीचे गिरने के बाद यदि तुरंत न उठाये जायें तो उनका तेल जमीन सोख लेती है। यदि स्कूल स्थानीय परीक्षा का समय दो घंटे आगे कर देता तो समस्या सुलझ जाती। मगर स्थानीयता को कागजों पर महत्व देते हुए भी व्यावहारिक रूप में लागू करना तब भी संभव नहीं हुआ था। इस प्रकार की अनेक समस्याएं स्थानीय स्तर पर नये-नये स्वरूपों में उभरती रहती हैं और उनकी ओर प्रशासन का ध्यान नहीं जा पाता है। नोएडा-ग्रेटर नोएडा में लाखों की संख्या में मजदूर अनेक राज्यों से आते हंै। अधिकतर माता-पिता दोनों ही-दिहाड़ी पर काम करते हैं। सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजना चाहते हुए भी नहीं भेज सकते हैं, क्योंकि बच्चों को वहां तक जाने-आने की सुविधा नहीं है। स्कूल की दूरी, भारी ट्रैफिक, लड़कियों की असुरक्षा, शौचालय की अव्यवस्था इत्यादि उनके आगे रास्ता रोक कर खड़े हो जाते हैं। यहां ‘अथॉरिटी’ के पास पैसे की कमी नहीं है। क्या वे सरकारी स्कूलों तक बच्चों के लिये चक्रीय बस-व्यवस्था द्वारा आवागमन की सुविधा उपलब्ध नहीं करा सकती है? इन दोनों जगहों पर अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, व्यापारी, तकनीकी विशेषज्ञ, प्राध्यापक, कुलपति तथा अन्य अनुभवी व्यक्ति सेवानिवृत हो कर रहते हैं, वे निश्चत रूप से अपना समय और अनुभव सरकारी स्कूलों को बिना किसी अपेक्षा के देने को तैयार हो जाएंगे। इस प्रकार के नवाचार से व्यवस्था दूर क्यों रहती है? कारण सभी जानते हैं। नोएडा-ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के लगभग सभी अधिकारियों तथा कर्मचारियों के बच्चे ‘पब्लिक स्कूलों’ में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन्हें ‘अथॉरिटी’ ने हर प्रकार की सुविधा प्रदान की है। इनमें से अनेक शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत वंचित वर्गों के लिये प्रारम्भिक कक्षाओं में 25 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का मखौल उड़ाते हैं। अधिकारी इससे अनभिज्ञ तो नहीं हो सकते हैं? सरकारी स्कूल तो किसी एक विभाग की कुछ फाइलों तक और आदेश-निर्देश देने तक ही सीमित हो गए हैं। सरकारें और उसके निर्देशों को क्रियान्वित करने वाले जब तक यह भावना खुद के अंदर नहीं पैदा करेंगे कि वे देश के भविष्य निर्माण में भागीदार हैं, तब तक ‘अन्य’ के प्रति, देश की भावी पीढ़ी के प्रति’ उनकी संवेदना सीमित या नगण्य ही रहेगी और लाखों-करोड़ों बच्चों के अधिकारों का हनन हर प्रकार से होता ही रहेगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्थिति की भयावहता को समझते हुए जो निर्देश दिया है, उसे लागू करने की इच्छाशक्ति कहां से आएगी? यह अपेक्षा तर्कसंगत ही नहीं, सामजिक रुप से न्यायसंगत भी लगती है कि, जनता के धन से निर्मित सरकारी खजाने से वेतन पाने वाला हर व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारों द्वारा चलाये गए स्कूलों में ही पढ़ाएं! जनतांत्रिक व्यवस्था में यह जनता का हक है कि, वह जिन लोगों को सेवक नियुक्त करती है, उन पर आवश्यक सेवा-नियमावली भी लागू कर सके। भारत के लगभग 65 प्रतिशत बच्चे नीचे के स्तर की शिक्षा पाते रहें और देश इसकी ओर ध्यान न दे – यह अस्वीकार्य स्थिति है और इसका समाधान आवश्यक है।

12-12-2015

अक्सर यह माना जाता है कि ‘पब्लिक स्कूलों’ के बच्चों का जीवन अत्यंत सुख-सुविधापूर्ण है। इसको अन्दर से झांक कर देखने पर पता चलता है कि, यदि सरकारी स्कूलों में गुरुजी के न आने पर बच्चे नहीं जानते है कि क्या करें, पब्लिक स्कूलों के बच्चे कितने ही बोझ के तले दबे रहते हैं। दो उदाहरण लीजिये – कपिल सिबल ने सतत-समग्र मूल्यांकन (सीसीई) बिना सोचे-समझे एक आदेश द्वारा लागू कर दिया। कोई तैयारी तो थी नहीं। अत: सरकारी स्कूल जैसे चलते थे, वैसे ही चलते रहे। पब्लिक स्कूल प्रसन्न हुए- इसकी प्रेरणा ‘यूएस’ से जो आई थी। अब प्रति सप्ताह बच्चों का अलग-अलग विषयों में मूल्यांकन, यानी टेस्ट, होता है। जब टेस्ट होगा तो तैयारी करनी होगी! अत: रविवार को जो थोड़ी सी राहत बच्चों को मिलती थी, वह भी समाप्त हो गई। माता-पिता भी घर में ही कैद हो गये- बच्चों को तैयारी जो करानी है! इस श्रेणी के स्कूलों में एक अन्य अलिखित प्रतिस्पर्धा भी चलती रहती है। यदि पड़ोस का स्कूल किसी कक्षा में पांच पुस्तकें निर्धारित करता है, तो यह स्कूल उससे एक पुस्तक ज्यादा ही लगाएगा। वह इसकी चिंता क्यों करें की बच्चों पर क्या बीतेगी। अब इन बच्चों के साथ हो रहे गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार का दूसरा उदाहरण लें- बस स्टैंड पर बच्चे को सुबह 6:00 या 6:30 बजे प्रात: पहुंचना है पूरी तरह तैयार होकर मतलब कि उसके एक घंटे पहले बच्चों को जगाया जाएगा, तैयार किया जाएगा, उन्हें कुछ खिलाया-पिलाया जाएगा, इच्छा हो या न हो। हर उस बड़े शहर में, जहां पब्लिक स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, यह दृश्य प्रतिदिन देखा जा सकता है। आजकल ‘प्री-स्कूल’ पर संभ्रांत वर्ग बड़ा जोर देता है। वे यह भूल जाते हैं कि 3-5 वर्ष की आयु में बच्चे को कम-से-कम 10-13 घंटे सोना चाहिए और 6-13 आयुवर्ग में यह 9-11 घंटे होना ही चाहिए।

समाधान तो निकालने ही पड़ेंगे। बच्चों की समस्याएं बाल श्रम से लेकर भारी-भरकम स्कूलों तक फैली हुईं हैं। इनके समाधान सरकारी तंत्र, स्कूल तथा माता-पिता मिल-बैठ कर निकाल सकते हैं। पहल स्कूलों को करनी चाहिए। यदि स्कूलों का समय बदलने का अधिकार विकेंद्रीकृत कर दिया जाये तो करोड़ों बच्चों का दैनंदिन जीवन अधिक आनंदमय हो जाएगा। तब सुधारों की शुरुआत तो हो ही जाएगी।

जगमोहन सिंह राजपूत

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