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फिर बजा न्याय का डंका

फिर बजा न्याय का डंका

न्यायपालिका ने पिछले दिनों दो महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। जिसके लिए वह प्रशंसा की पात्र है। पहले फैसले में दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कावेरी बवेजा ने एक बलात्कार पीडि़त महिला को न्याय प्रदान करते हुए बलात्कारी को उम्र कैद की सजा दी है। इसके साथ ही उन्होंने बलात्कारी के वृद्ध माता-पिता, उसकी पत्नी और तीन बच्चों के भरण-पोषण के लिये दिल्ली की विधि सेवा अभिकरण को आर्थिक सेवा देने का आदेश दिया है।

बलात्कारी के वृद्ध पिता स्कूल अध्यापक थे और मामूली पेंशन पाते थे। बलात्कारी के जेल जाने से ये लोग गंभीर संकट में फंस गए थे। बलात्कारी की पत्नी अपने भविष्य की चिंता को लेकर अदालत में बेहोश हो गई थी।

न्यायालय का आदेश इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसमें पहली बार दोषी को दंड देने के साथ-साथ उसके परिवार के हितों की भी रक्षा की, जो अपराध में शामिल नहीं था। यह उल्लेखनीय है कि इस मुकदमे का फैसला 11 महीने में ही सुना दिया गया। आमतौर पर इस तरह के मुकदमों का फैसला आने में सालों लग जाते हैं। इस मामले में भी अभियुक्त ने मुकदमे को लम्बा खींचने का प्रयास किया। उसने मांग की कि पीडि़ता को गवाही देने के लिए फिर से बुलाया जाए। उसकी इस मांग को दिल्ली उच्च न्यायालय ने मान लिया था। लेकिन, उच्चतम न्यायालय ने अपील में उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पीडि़ता को फिर से बुलाने का अर्थ है, उसे एक बार फिर उस अपमानजनक स्थिति, निर्दयी अमानुषिक अत्याचार को याद करने के लिए बाध्य किया जाए, जिसने उसके शान्तिपूर्ण जीवन को तहस-नहस कर दिया।

पीडि़ता उन भयानक क्षणों की यादों से बड़ी कठिनाई से अब उबर सकी है। उसे फिर से अदालत में पेश होने को कहना उसके घावों को कुरेदना है। इस मामले का सुखद पहलू यह है कि पीडि़ता के मंगेतर ने उसका साथ नहीं छोड़ा। वह पीडि़ता से विवाह कर के उसे अमेरिका ले गया, जहां उसने एक नई जिंदगी की शुरूआत की है। इस मामले में मंगेतर और उसके परिवार ने जिस नैतिक साहस का परिचय दिया वह अनुकरणीय है।

12-12-2015एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रदीप नन्दराजोग और मुक्ता गुप्ता की पीठ ने सार्वजनिक धन से निर्मित बड़े सरकारी अफसरों के बच्चों के लिए निर्मित संस्कृति स्कूल में ग्रुप ‘ए’ के अफसरों के बच्चों के लिए 60 प्रतिशत सीटों का कोटा समाप्त कर दिया। उच्च न्यायालय ने आरक्षण का कोटा इस आधार पर समाप्त किया कि ग्रुप ‘ए’ के अफसरों के बच्चों के साथ पृथक व्यवहार संविधान की समान संरक्षण और समानता की भावना का उल्लंघन करता है। समानता और समान संरक्षण हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि राज्य किसी व्यक्ति को कानून के सामने समानता और कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। अनुच्छेद 14 राजनीतिक लोकतंत्र में सामाजिक और आर्थिक न्याय को शामिल करता है।

संस्कृति स्कूल की स्थापना 1998 में सिविल सर्विसेज सोसाइटी ने की थी। सिविल सर्विसेज सोसाइटी के प्रमुख सदस्यों में कैबिनेट सचिव, विदेश सचिव, वाणिज्य सचिव और अन्य शीर्ष अफसरों की पत्नियां शामिल थीं। इस सोसाइटी को सरकार ने चाणक्यपुरी में करीब 7.78 एकड़ जमीन 1 रुपये के प्रीमियम और 1 रुपये सालाना के किराये पर दी थी। स्कूल की इमारत और अन्य जरुरतों के लिए भी सरकार ने उदारता से सार्वजनिक धन दिया। स्कूल के लिए 10 करोड़ रुपये की समग्र निधि बनाई गई। सरकार के विभिन्न

विभाग अब तक स्कूल को लगभग 22 करोड़ रुपये दे चुके हैं।

स्कूल में कुल 2,287 बच्चे पढ़ सकते हैं। इनमें से 60 प्रतिशत यानि 1,372 स्थान ग्रुप ‘ए’ के अफसरों के लिए आरक्षित हैं। रक्षा सेवाओं के सेवारत कमीशन प्राप्त अफसरों के बच्चे भी इस आरक्षण के अधिकारी हैं। 25 प्रतिशत यानी 668 स्थान शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत आर्थिक दृष्टि से कमजोर बच्चों के लिये, 10 प्रतिशत यानि 229 स्थान आम जनता के बच्चों के लिये, और 5 प्रतिशत स्थान स्कूल कर्मचारियों के बच्चों के लिये आरक्षित है। नर्सरी में कुल 140 सीटें हैं। इनमें से 68 ग्रुप ‘ए’ के अधिकारियों के बच्चों के लिए हैं। इसके अलावा 16 सीटें विवेकाधीन हैं जो ग्रुप ‘ए’ के अफसरों के बच्चों को दी जा सकती हैं। इस प्रकार आम जनता के लिए केवल 11 सीटें हैं।

बच्चों से ली जाने वाली फीस में भी काफी अन्तर है। अन्य बच्चों की तुलना में गु्रुप ‘ए’ के अफसरों के बच्चों से 40 प्रतिशत कम फीस ली जाती है। नर्सरी वर्ग में अफसरों के बच्चों से प्रति वर्ष 1,18,371 रुपये फीस ली जाती है, जबकि आम लोगों से 1,57,386 रुपये फीस ली जाती है। इसी तरह कक्षा 5 से कक्षा 10 तक के ग्रुप ‘ए’ के अफसरों के बच्चों से प्रति वर्ष 88,513 रुपये और आम लोगों से 1,38,593 रुपये फीस ली जाती है। इंटर में पढऩे वाले ग्रुप ‘ए’ के अफसरों के बच्चों की फीस 88,283 रुपये, जबकि सामान्य लोगों के लिये 1,37,328 रुपये प्रति वर्ष है।

उच्चतम न्यायालय ने सरकार से इस बारे में विचार करने को कहा है कि, क्या स्कूल को वर्तमान केन्द्रीय विद्यालय संगठन का हिस्सा बनाया जा सकता है। इस स्कूल का फीस ढांचा इसे कठिन बना देता है। इससे बेहतर विकल्प यह है कि इसे आदर्श पब्लिक स्कूल बना दिया जाये जो अपना खर्च स्वयं उठाए।

नवीन पंत

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