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केवल सर्वधर्म समादर खोलेगा विश्व शान्ति का द्वार

केवल सर्वधर्म समादर खोलेगा विश्व शान्ति का द्वार

By जगमोहन सिंह राजपूत

इस देश में जिन शब्दों का घोर राजनीतिकरण जानबूझ कर किया गया है उसमें सबसे पहले सेक्युलर तथा कम्युनल शब्द आते हैं। भारत के संविधान में सेक्युलर शब्द प्रारंभ में कहीं नहीं था। 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा इसे जोड़ा गया। यह आपातकाल का समय था तथा उस समय की संसद तथा जेल के बाहर रहे सांसदों के बारे में कुछ न कहना ही अपेक्षित माना जायेगा। सेक्युलर शब्द के हिन्दी अनुवाद पर काफी गहन विचार-विमर्श के बाद ‘पंथनिरपेक्ष’ पर सहमति बनी आज भी अनेक अनुभवी तथा परिपक्व राजनेता धर्मनिरपेक्ष शब्द का ही प्रयोग करते हैं। 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के संसद में दिये गये भाषण के हिन्दी अनुवाद में पंथनिरपेक्षता के प्रयोग का वामपंथी राजनेता सीताराम येचुरी ने विरोध किया तथा इसे साम्प्रदायिक यानी कम्युनल ताकतों की साजिश बताया। उनका कहना था कि सही शब्द ‘धर्मनिपेक्षता’ का प्रयोग होना चाहिये था।

पंण्डित नेहरू के समय से ही यह निरूपित किया जाता रहा है कि देश के लिये ‘साम्प्रदायिक ताकतें’ सबसे बड़ा खतरा हैं। अभी 2015 में सरकार के एक विज्ञापन में संविधान के आमुख का प्रारंभ का स्वरूप छपा तो सेक्युलर ताकतें तुरन्त सतर्क और सक्रिय हो गईं, उन्हें सेक्युलरिज्म खतरे में दिखाई देने लगा। अपनी चिन्ता को बड़ा रूप देने के प्रयास में उन्होंने यहां तक कहा कि सरकार संविधान से सेक्युलर शब्द हटाने की तैयारी कर चुकी है। वरिष्ठ मंत्री वेंकैया नायडू का स्पष्टीकरण कि ऐसा कुछ नहीं होगा कि बाद भी इनकी चिन्ता बनी रहेगी, इस वर्ग को अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिये यह सब करना ही सहज लगता है। यह भूल जाते हैं कि संविधान सभा में इस सन्दर्भ में गहन विचार विमर्श हुआ था। सेक्युलर शब्द आमुख या कहीं अन्य डालने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई – यह तो प्रथा, परम्परा तथा भारतीय दर्शन का व्यवहारिक पक्ष था जो हजारों साल से निर्बाध चल रहा था। ऐसा ही मूल कर्तव्यों को संविधान में न डालना भी था – भारत का समाज कर्तव्यों को सर्वोपरि मानता रहा था। यह भी अनुच्छेद 51-ए के रूप में बाद में संविधान में डाला गया। समय के साथ कुछ परिवर्तन आवश्यक होते हैं, मगर वहां नियम के पहले नियति को देखा जाना चाहिये।

संविधान की धारा 370 को लेकर वाद-विवाद चलता रहता है। इसके द्वारा जम्मू -कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया था मगर यह अस्थाई प्रावधान था। कुछ बदलाव तो पंडित नेहरू के समय ही हो गये। आज का युवा तो आश्चर्यचकित होता है यह जानकर कि जम्मू-कश्मीर में एक अलग प्रधानमंत्री तथा सदर-ए-रियासत होते थे! नेहरू जी ने स्वयं कहा था कि यह प्रावधान धीरे-धीरे स्वत: ही निस्प्रभावी हो जायेगा।

आज जब इसे हटाने की चर्चा होती है तब सार्थक संवाद के स्थान पर हर ऐसी मांग करने वाले को ‘कम्युनल’ घोषित कर दिया जाता है। यहां शब्दों का अर्थ एकदम गड्मड् हो जाता है – सांप्रदायिकता की रोटी सेंकने वाले पेशेवर सेक्युलरिज्म का सहारा लेकर अपने विरोधियों को कम्युनल घोषित करने में हिचकते नहीं हैं। यही स्थिति समान नागरिक संहिता को लेकर बनी हुई है। इस पर पक्ष में बोलने वाले सांप्रदायिक और न लागू करने वाले सेक्युलर! यदि समान नागरिक संहिता लागू होती तो अब तक मुस्लिम समुदाय की पिछड़ेपन की स्थिति बेहतर हुई होती, विशेषकर मुस्लिम महिलाओं को अधिकार मिले होते, उनकी सामाजिक तथा शैक्षिक स्थिति सुधरी होती और इस सब का देश की प्रगति की रफ्तार बढ़ाने पर प्रभाव पड़ा होता। सबसे अधिक प्रभाव तो इस्लाम की उस छवि को सुधारने पर पड़ता जिसके कारण आज इस पंथ को आतंकवाद तथा रूढि़वाद के साथ सारे विश्व में जोड़ा जा रहा है।

भारत के मुसलमान कठमुल्लों की जकड़ से आजाद होकर ही इस्लाम की सही छवि भारत में स्थापित कर विश्व के समक्ष उदाहरण बन सकते हैं। कुछ स्वघोषित ‘सेक्युलर राजनीतिक दल बिना कहे उन्हें वर्तमान स्थति से उबरने नहीं देना चाहते हैं, यदि भारत के मुसलमान शिक्षित तथा समर्थ हो गये तो इनके लुभावने वायदों पर कौन यकीन करेगा? वोट कैसे मिलेंगे?

भारत जैसे परंपरागत सब धर्मों/पन्थों का आदर सम्मान करने वाले और कितने देश हैं? होना तो यह चाहिये था कि हजारों साल से चली आ रही इस धरोहर को और सुदृढ़ किया जाता। यह अवसर स्वतंत्र भारत में आया। विभाजन कि त्रासदी झेल चुके देश के सामने गांधी के सांप्रदायिकता को भाईचारे में बदल देने के आचार-विचार तथा व्यवहार का मार्गदर्शन उपलब्ध था। इसके लिये देश की जनता नें उस कांग्रेस पर विश्वास किया, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में सभी को एकजूट करने के सतत प्रयास किये। मगर सत्ता ने उसकी चकाचौंध ने इस राजनीतिक दल को सिद्धांतों तथा सेवा भाव से पूरी तरह अलग कर दिया। संविधान की मूल भावना को तहस-नहस करने का कोई अवसर अपने नये कलेवर में इस दल ने कभी नहीं छोड़ा। आचार्य कृपालानी, पुरूषोत्तम दास टण्डन, जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, राजा जी जैसे तपस्वी इन्हें रास नहीं आये। संविधान की मूल भावना को किस कदर रौंदा गया जो 1975 में आपातकाल लगाने के रूप में चरम परिणति पर पहुंचा। अभी वह पीढ़ी मौजूद है जिसने आपातकाल के दौरान किये गये अत्याचारों को भोगा है, देखा और समझा है। तुर्कमान गेट पर जो नरसंहार हुआ, बच्चों, बूढ़ों तक की जबरन नसबन्दी, जेल में बन्द राजनेताओं पर अत्याचार और ऊपर से संविधान में सोशलिस्ट शब्द का डाला जाना एक हताशा में उस सरकार का कार्य था जो नैतिक रूप से शासन करने का अधिकार खो चुकी थी तथा एक व्यक्ति के अधिनायकवाद का प्रतीक बन गई थी। राजनीति में छोटे स्वार्थों की पूर्ति के इस दल के ऐसे ही कृत्यों के अनगिनत उदाहरण हैं। मुस्लिम समुदाय को भ्रमित करना इसमें सबसे पहले उभरता है। वे लोग अपने को ‘सेक्युलर’ कैसे कह सकते हैं जो मस्जिदों के इमामों को वेतन देते हैं, जो हज यात्रा के लिये बड़ी धनराशि खर्च करते हैं? बड़े-बड़े हज हाउस बनाने वाले अमरनाथ यात्रा के लिये अस्थाई तंबू लगाने का साहस नहीं कर पाते हैं। कश्मीरी पंण्डित जो अमानवीय यंत्रणायें कई दशकों से झेल रहें हैं वह स्थिति क्या सेक्युलरिज्म की कहानी नहीं कहती है?

सेम्युअल हंटिंग्टन अपनी पुस्तक ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ के कारण प्रसिद्ध हुये। उनकी दूसरी पुस्तक ‘हू आर वी – कौन हैं हम’ अमेरिकी लोगों की विविधाताओं का विश्लेषण कर वहां की ‘अमेरिकी संस्कृति के सम्बन्ध में टिप्पणी करती है। वहां की संस्कृति वही है जो प्रारंभ में यूरोप से गये लोगों ने स्थापित की। वे सभी ईसाई थे। बाद में हर धर्म, मजहब तथा पन्थ के लोग आये’ और आ रहे हैं। मगर हंटिंग्टन के अनुसार जो मूल्य ‘ऐंग्लो सेक्सन’ समाज ने बनाये तथा स्वीकार्य किये उन्हें बाद में आने वाले ने भी अपनाया, अपनी विशिष्ठ पहचान बनाये रखने तथा राष्ट्रीय स्तर पर पहले से चले आ रहे मूल्यों का सम्मान तथा तद्नुसार आचरण करने में उन्हें कोई विरोधाभास दिखाई नहीं दिया। इसी तरह अमेरिकी अस्मिता का निर्माण हुआ। आज यूरोप का हर देश आतंकवाद तथा धार्मिक मदान्धता के कारण असुरक्षित है। विश्व भर में आपसी विश्वास कम हुआ। यह बार-बार दोहराया जाता है कि धर्म आतंकवाद को किसी पंथ विशेष से नहीं जोड़ा जाना चाहिये। समस्या दूसरी है – इस्लाम के मानने वालों के सामने विकट स्थिति है।

समय के साथ रूढिय़ों से न निकल पाने के कारण सबसे अधिक खून-खराबा इस्लामी देशों में हो रहा है और विश्व में कितनी जगहों पर आतंकवादियों ने सामान्य जनों की हत्यायें की हैं। वे इसी धर्म के मानने वाले हैं। इन सिरफिरों की संख्या कम होगी मगर यह दायित्व तो पूरी कौम का है कि वह अन्य पंथों की उपस्थिति को स्वीकार करें। ईश्वर तक पहुंचने के अनेक मार्ग हैं, इसे स्वीकारें तथा इस सोच से अपने लोगों को उबारे कि केवल उन्हीं का रास्ता सही है या एक दिन सभी पंथ समाप्त हो जायेंगे तथा सभी इस्लाम के अनुयायी हो जायेंगे। सब धर्मों की समानता यदि इस्लाम तथा ईसाई स्वीकार करे तो विश्वशान्ति का रास्ता खुल सकता है। तब भारत जैसे देश में प्राचीन भारत की संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट करने में किसी भारतीय को कष्ट नही होगा न किसी को यह स्वीकार करने में हिचक होगी कि जैसे-जैसे ईसाई, इस्लाम, पारसी भारत में आये, यहां कि संस्कृति और समृद्ध हुई। तब योग को लेकर पंथों के आधार पर विभाजन नहीं होगा, मनमुटाव द्वेष नहीं होगा। हर भारतीय को भारत की सभ्यता, ज्ञानार्जन में योगदान, शान्तिप्रियता, सर्वधर्म समभाव पर गर्व होगा।

हंटिंग्टन ने अपने विश्लेषण के बाद कहा था, कि हर अमेरिकी के लिये वहां की संस्कृति ‘वास्य’ यानी ‘व्हाइट’ ऐंग्लो-सेक्सन प्रोटेस्टेंट ही है, बाकी सब विविधताओं का स्थान अपनी जगह है और कोई उसे प्रभावित नहीं करता है न करना चाहता है। इस सोच से लोग असहमत हो सकते हैं, मगर इसकी व्यवहारिकता स्थापित हो चुकी है। कम-से-कम दो हजार साल पहले से भारत ऐसी सभ्यता तथा संस्कृति का पालन करता रहा है। समस्यायें सदा छोटे से वर्ग तथा कुछ जड़ताग्रस्त लोगों द्वारा पैदा की जाती हैं मगर वे विकराल रूप ले लेती हैं। भारत को ऐसे तत्वों से सावधान रहना होगा। वेद, पुराण, गीता, योग को भारत में नकारा नहीं जा सकेगा। इन्हें किसी पर थोपा न जाए ऐसी तो भारतीय संस्कृति की मान्यता सदा रही है। इसी आधार पर नई सोच विकसित करनी होगी, ताकि भारत और भारतीय भाईचारे तथा भ्रातृवाद के साथ रह सके।

रास्ता तो एक ही है, सभी धर्मों के ध्वज वाहक यह स्वीकार करें कि हर धर्म उसके अनुयायियों के लिये सर्वश्रेष्ठ है – मेरा मेरे लिये, मेरे पड़ोसी का उसके लिये। हम दोनों के रास्ते सही हैं, एक ही लक्ष्य तक ले जाने में समर्थ हैं। अत: दोनों के, सभी के रास्ते बराबरी के आदर के पात्र हैं। मनुष्य के पास पृथ्वी पर अपने को तथा मानवता को जीवित एवं जीवन्त बनाये रखने का यही रास्ता है। इसे आज स्वीकारा जाए या बाद में – विकल्प और है ही नहीं।

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