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नीतीश की नई शुरू आत

नीतीश की नई शुरू आत

नीतीश कुमार 20 नवंबर, 2015, दिन शुक्रवार दोपहर 2 बजे अपने तीसरे कार्यकाल के लिये पांचवीं बार सीएम बने। नीतीश के बाद आरजेडी के अध्यक्ष लालू प्रसाद के दोनों बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप ने बारी-बारी से मंत्री पद की शपथ ली, तो उनकी सरकार में जातीय राजनीति की झलक साफ-साफ दिख गई। ऐसे में ये कहना शायद गलत नहीं होगा कि, बिहार में जाति की जीत हुई और बाकी सब की हार। अगर किसी को नीतीश के विकास को मैंडेट मिला हुआ दिख रहा है तो आंकड़ों का बहुत गहराई, गंभीरता और परिपक्वता से आंकलन कर लें, उत्तर खुद-ब-खुद मिल जाएगा। बिहार में विकास नीतीश और बीजेपी ने मिलकर किया था, ना कि नीतीश और लालू ने। अगर बिहार की जनता विकास के साथ होती तो बड़ी पार्टियां भी इन्हीं को बनकर उभरना चाहिये था। लेकिन, नीतीश की जेडीयू 115 से 71 और बीजेपी 95 से 53 पर सिमट गई, ये अलग बात है कि बीजेपी ने खुद ही नीतीश के साथ बिहार में किये गये विकास कार्यों का श्रेय नहीं लिया। और, पिछले 10 वर्षों के में बिहार के विकास पर तंज ही कसा। जातीय राजनीति का ही असर रहा कि, बिहार को गर्त में ले जाने वाली पार्टियां, आरजेडी 22 से 80 और कांग्रेस 4 से 27 पर पहुंच गई। अब किसी को लालू यादव अगर नीतीश कुमार से बड़े विकास पुरुष लगते हैं तो वह भी सही। आखिर, जीतने वाले का सम्मान तो करना ही पड़ता है।

नीतीश सरकार में लालू की छवि

12-12-2015लालू के जहर पीने का सबसे बड़ा पुरस्कार नीतीश कुमार को नहीं बल्कि, खुद लालू यादव और उनके बेटों को मिला। बंपर जीत के बाद पांचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रुप में नीतीश कुमार की ताजपोशी तय ही थी, उन्होंने 28 मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन, नई सरकार में लालू यादव की छाप साफ-साफ दिख रही है। लालू के बेटों तेजस्वी यादव के सिर उपमुख्यमंत्री और सड़क निर्माण मंत्री का ताज, जबकि तेज प्रताप यादव के सिर स्वास्थ्य मंत्री का ताज सजा। लालू ने अपने बेटों की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं को भी मंत्री पद देकर उपकृत करने के साथ ही कोइरी वोटरों को भी अपना बनाने का संदेश देने की कोशिश की है। ये हो भी क्यों नहीं? बिहार की जनता को सभी पार्टियों की जातिगत बयानबाजी ही लुभाई। जाति के लिये सब कुछ नजरअंदाज कर दिया, अब इसी जातिगत आधार पर नीतीश मंत्रिमंडल में भी जेडीयू-आरजेडी और कांग्रेस के विधायकों को जगह दी गई है। महुआ सीट पर तेज प्रताप की जीत शिवचंद्र राम के बिना संभव नहीं थी। इसलिए लालू ने उन्हें भी बेटे की जीत का पुरस्कार दिया है। मंत्री बनाये गये आलोक मेहता भी महुआ के ही निवासी हैं। कोइरी वोटरों को एनडीए और आरएलएसपी नेता उपेन्द्र कुशवाहा की बजाय आरजेडी के पक्ष में एकजुट करने के साथ ही लालू के बेटे के पक्ष में करने में आलोक मेहता ने अहम भूमिका निभाई थी। आलोक खुद समस्तीपुर की उजियारपुर सीट से जीते ही तेज प्रताप को भी जितवाकर अपनी बिरादरी के नेता होने का लोहा मनवा दिया।

किस जाति को क्या मिला ?

सबसे ज्यादा यादव जाति से 7 मंत्री बने हैं। 5 दलित भी हैं, 4 अति पिछड़ा, 4 मुस्लिम, 4 सवर्ण, 3 कोइरी, 1 कुर्मी (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को छोड़कर) मंत्री बना है। सवर्णों में 2 राजपूत, 1 ब्राह्मण और 1 भूमिहार शामिल हैं । पिछली सरकार में मंत्री रहे सिर्फ 4 लोगों को इस कैबिनेट में जगह मिली है। 28 में से 17 लोग पहली बार मंत्री बने हैं। दो महिलाएं भी पहली बार मंत्री बनी हैं। जेडीयू से मंजू वर्मा को मंत्री बनीं, जबकि आरजेडी से अनीता देवी को बीजेपी के बड़े नेता रामेश्वर प्रसाद चौरसिया को हराने के इनाम में मंत्री पद मिला है।

वैशाली और दरभंगा से सबसे ज्यादा मंत्री

सबसे ज्यादा मंत्री वैशाली जिले से बने हैं। वैशाली जिले में विधानसभा की 8 सीटें हैं। 6 सीटों पर महागठबंधन की जीत मिली थी। इनमें से 3 को मंत्री बनाया गया है। दो लालू के बेटे हैं, जबकि तीसरे राजापाकड़ क्षेत्र से 15 हजार वोटों से जीते शिवचंद्र राम हैं। वहीं दरभंगा जिले से भी तीन मंत्री बने हैं। अलीनगर के विधायक अब्दुल बारी सिद्दीकी वित्त मंत्री, गौराबौराम के जेडीयू विधायक मदन सहनी और दरभंगा से एमएलसी कांग्रेस नेता मदन मोहन झा को राजस्व मंत्री बनाया गया है। जबकि नीतीश के करीबी जेडीयू नेता ललन सिंह को जल संसाधन मंत्री और विजेंद्र यादव को ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है।

किस जिले से कितने मंत्री ?

लालू यादव की राजनीतिक कर्मभूमि छपरा से 2, रोहतास से 2, और समस्तीपुर से 2 विधायकों को मंत्री बनाया गया है। जबकि, सीमांचल में सिर्फ पूर्णिया जिले से ही मंत्री बना है। यादव बहुल कोसी के तीनों जिले मधेपुरा, सहरसा और सुपौल से 1-1 विधायक को मंत्री बनाया गया है। पूर्वी बिहार के इलाके मुंगेर, जमुई से भी 1-1 विधायक को मंत्री बनाया गया है। मगध में जहानाबाद और औरंगाबाद से 1-1 विधायक को मंत्री बनाया गया। नीतीश के नालंदा से भी 1 विधायक ही मंत्री बन सका। मधुबनी, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और बेतिया से भी 1-1 विधायक ही मंत्री बने।

18 जिलों से 1 भी मंत्री नहीं

कहीं छप्पर फाड़ तो कहीं सूखा ही सूखा। मोतिहारी, सीतामढ़ी, शिवहर, गोपालगंज, सीवान, अररिया, कटिहार, किशनगंज, भागलपुर, बांका, खगडिय़ा, लखीसराय, नवादा, आरा, पटना, अरवल, कैमूर, गया जिलों को निराशा हाथ लगी है। नीतीश के कैबिनेट में कुल सूबे के 38

जिलों में से 20 को ही प्रतिनिधित्व मिला है। 18 जिलों के विधायक खाली हाथ ही रहे। इन इलाकों से महागठबंधन के करीब 70 विधायक आते हैं। भविष्य में मंत्री पद के लिये इनके किसी भी संभावित क्रांति को शांत रखना लालू-नीतीश के लिये बड़ी चुनौती होगी।

लालू के कोप के शिकार रजक और शाही !

वहीं नीतीश के प्रिय रहे पूर्व मंत्री और जेडीयू विधायक श्याम रजक को लालू विरोध का दंड मिला। वहीं बताया जाता है कि पी.के. शाही को लालू यादव को चारा घोटाले में जेल की सीखचों तक पहुंचाने में बड़ा योगदान करने का दंड मिला। इसमें नीतीश की एक नहीं चली। नतीजा ये हुआ कि जेडीयू प्रत्याशी के रुप में फुलवारी से 45, 548 वोटों से जीतने के बाद भी रजक को सजा मिली।

केजरीवाल के लिये लालू अब पवित्र !

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मंच पर लालू यादव को गले लगाया। खुद को कलियुग का राजा हरिशचंद्र बताने वाले केजरीवाल कई मौकों पर लालू को महाभ्रष्टाचारी का खिताब दे चुके हैं। वहीं लालू यादव केजरीवाल को पागल तक करार दे चुके हैं। ये बातें जनता के गले नहीं उतर रही हैं। इससे अन्ना भी केजरीवाल से खफा हैं।

मोदी का डर !

मोदी का डर नीतीश सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भी व्याप्त रहा। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की उपज केजरीवाल-लालू के अलावा, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी अपने धुर विरोधी सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी के साथ मंच पर बैठीं। एकजुटता दिखाने के लिये जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्लाह और फारुक अब्दुल्लाह, पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा सहित कई बड़ी राजनैतिक हस्तियां शामिल हुईं। राहुल पटना पहुंचकर भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो सके। समारोह में बीजेपी की सहयोगी दल शिवसेना की तरफ से महाराष्ट्र सरकार में शामिल दो मंत्री, तो अकाली दल की तरफ से पंजाब के डिप्टी सीएम सुखबीर बादल खुद ही हाजिर हुए। लेकिन, पड़ोसी राज्य यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने इससे दूर रहना ही बेहतर समझा। इसका मतलब भी दूर की सियासत का ही आभास कराती है। इसे समाजवादी पार्टी द्वारा आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव को यूपी की राजनीति से दूर रहने के खुले संदेश के रुप में भी देखा जा रहा है।

कुमार मयंक

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