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एक युग का अंत

एक युग का अंत

संत, समाज विज्ञानी, देशभक्त, जन-नेता, हिंदू हृदय सम्राट ऐसी तमाम उपाधियां अशोक सिंहल से स्वत: जुड़ी हुई थीं। किसी भी व्यक्ति को उसके मित्रों, विचारों, काम, रहन-सहन और समाज में उसकी स्वीकार्यता से जाना जाता है। हम सभी जानते हैं कि वे संघ परिवार, विहिप और देश-विदेश के संतों में कितने लोकप्रिय थे। अशोक सिंहल मूल रूप से संघ के विचारक थे। दुनिया भर के संतों और धर्मगुरुओं से उनके संबंध थे। उन्हें समाज के हर तबके में आदर हासिल था। हर तबके में वे स्वीकार्य थे, क्योंकि वे संपूर्ण समाज में सामाजिक सद्भाव कायम करने के लिए मानव मूल्यों की स्थापना करने वाले कुछेक लोगों में थे। वे जहां भी गए, अपने जीवन में हर कहीं वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन को आगे बढ़ाते रहे। उन्हें सबसे प्रेम हासिल हुआ और उन्हें आदर से माननीय अशोकजी के नाम से पुकारा जाता था।

गीता में कहा गया है कि भारत कर्मभूमि है और यहां राष्ट्र (समूचे संसार) के कल्याण के लिए सब कुछ का त्याग करना पड़ता है। अशोकजी कर्मयोगी थे, जो अपनी आखिरी सांस तक अपने जीवन के एकमात्र लक्ष्य के लिए संघर्षरत रहे। वह लक्ष्य था, ”तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दो चार दिन रहें न रहें।” अशोकजी बतौर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, समूचे देश में उत्साह जगाने की जीती-जागती संस्था की तरह थे। वे हमेशा अपने देश के उद्देश्य के लिए जागरूक थे और सनातन धर्म के मूल दर्शन को मजबूत करते रहे। हिंदुत्व के मूल सिद्धांतों पर चलते हुए अशोकजी ने एक कदम आगे बढ़कर समूचे विश्व में राष्ट्रवाद का संदेश फैलाया। वे दैवीय इच्छा ‘सर्वे भवंतु सुखिन: ‘ को पूरा करने के लिए निरंतर सक्रिय रहे।

राम जन्मभूमि आंदोलन के मूख्य सूत्रधार अशोकजी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए शेर गर्जना करते रहे। हमारे प्रधानमंत्री अगर राम मंदिर निर्माण के उनके सपने को साकार करने का कोई तरीका निकाल लेते हैं तो यही उस महान हस्ती के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का भी उतना ही बड़ा दायित्व है कि करोड़ों हिंदुओं के सपनों को साकार करें।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई और शास्त्रीय संगीत में शिक्षा पाए अशोक सिंहल सच्चे राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। वे अयोध्या में 18वीं सदी के बाबरी ढांचे के खिलाफ भावनात्मक आंदोलन चलाने के लिए देश भर में चर्चित हुए। यह ढांचा 1992 में गिरा दिया गया। उन्होंने एकता का भाव पैदा किया और गौमाता, गंगा माता, भारत माता को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाने के लिए निरंतर प्रयास किया। उन्होंने अपने बेहद सरल शब्दों में भावप्रवण भाषणों से करोड़ों हिंदुओं का हृदय परिवर्तित किया और उन्हें एक मंच पर लेकर आये। इससे अरबों लोगों की धारणा बदली और नतीजतन, राम जन्मभूमि आंदोलन हुआ। हालांकि भाजपा को विवादित ढांचा ढहाए जाने का काफी फायदा हुआ, इसी वजह से उसे 1996 और फिर 1998 में सत्ता में पहुंचने का मौका मिला, लेकिन इस अभियान के मुख्य सूत्रधार सिंहल थे। वे खुलकर हिंदुत्व की वकालत करते थे और उनका एकमात्र मिशन भारत को ”हिंदू राष्ट्र” में बदलना था।

सिंहल के मन में हिंदुत्व के बीज बचपने में ही उगने शुरू हो गए थे। 1926 में ताजमहल के शहर आगरा में एक सरकारी अधिकारी के घर जन्मे सिंहल धर्मपरायण हिंदू परिवार में पले-बढ़े। वे समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती से काफी प्रभावित थे। वे राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया से मुलाकात के बाद 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए, जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपनी बुलंदी पर था। रज्जू भैया बाद में चौथे सरसंघचालक बने। बाबरी ढांचा ढहाए जाने के बाद कई भाजपा नेताओं ने उनसे दूरी बना ली, मगर सिंहल उस पर गर्व किया करते थे और तब तक संघर्षरत रहने की शपथ खाते रहे जब तक भारत ”हिंदू राष्ट्र” नहीं बन जाता।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से मेटालर्जी में इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने वाले सिंहल की हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी। उन्होंने आरएसएस के लिये कई गीतों की रचना की। विहिप के पूर्व अध्यक्ष विष्णुहरि डालमिया ने मांग की थी कि मोदी, सिंहल के 90वें जन्मदिन 15 सितंबर 2016 को अयोध्या में भव्य राम मंदिर का तोहफा दें। लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। 17 नवंबर को गुर्दे और हृदय की बीमारी से पीडि़त सिंहल 89 बरस की उम्र में ही गुडग़ांव के एक अस्पताल में स्वर्ग सिधार गए। इस तरह एक युग का अंत हो गया। भारतीय जनता पार्टी के लिए 1984 के चुनाव गहरे आघात की तरह थे। उसने सिर्फ दो सीटें जीती थीं। यह सवाल आज भी कायम है कि, अगर अशोक सिंहल विश्व हिंदू परिषद को नई ऊंचाइयों पर नहीं ले जाते और राजनीति में धार्मिक मुद्दे उठाने की खातिर भाजपा के लिए मौका नहीं बनाते तो क्या भाजपा इतनी ऊंचाइयों पर पहुंच पाती?

अशोक सिंहल दूरदर्शी थे। उनके जीवन के दो लक्ष्य थे। एक, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, और दूसरे, विश्व में वैदिक ज्ञान का प्रसार। उन्होंने ही कथित तौर पर ”देश में आजादी के बाद सबसे बड़ा जनांदोलन” खड़ा किया और उसके जरिये भारत के लोगों में आत्मगौरव की भावना का संचार किया। कहने की जरूरत नहीं कि, उन्हीं के नेतृत्व में 1984 में राम जन्मभूमि मुद्दे को मुख्य उद्देश्य बनाकर विहिप को नए सिरे से खड़ा किया गया। कई जन भागीदारी के कार्यक्रमों और हिंदू धर्मगुरुओं के सम्मेलनों के जरिये सिंहल ने 6 साल में ऐसा वातावरण तैयार कर दिया, जिसका भाजपा ने राजनैतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया। एक कमजोर से संगठन से मजबूत राजनैतिक ताकत के रूप में भाजपा का कायाकल्प न हो पाता, अगर सिंहल के प्रयासों से आडवाणी की रथ यात्रा सफल नहीं हो पाती। सिंहल ने कभी यह शिकायत नहीं की कि भाजपा ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया। लेकिन उनके देहावसान के बाद, खासकर जब भाजपा को लोकसभा में अपार बहुमत

हासिल है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती है कि, सिंहल को वह सम्मान दिया जाए, जो जीते जी नहीं मिला? आखिर सिंहलजी ने अपने जीवन-क्रम में जो कुछ हासिल किया, वह पारंपरिक राजनैतिक तरीकों से नहीं, बल्कि एक सच्चे स्वयंसेवक की कड़ी मेहनत, धैर्य और संकल्प से हासिल किया।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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