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तेल का खेल वैश्विक परिदृश्य और भारत

तेल का खेल वैश्विक परिदृश्य और भारत

By अमिताभ मुखर्जी

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल कि कीमतों में तकरीबन 60 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट आई है। यही वह वक्त है जब भारत को आने वाले दशक के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित कर लेना चाहिए। इसके लिए एक दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है, क्योंकि घटते तेल की कीमतें भारत और चीन जैसे आर्थिक रूप से उभरते देशों के लिए आप्रत्यशित लाभ के जैसा है। हालांकि इसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी हैं, इसलिए नई दिल्ली को सौर ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के स्रोतों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि शेल गैस के दोहन को अतिशीघ्र रोका जा सके।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि तेल की कीमतों में गिरावट भारत के आर्थिक योजनाकारों को एक बड़ा सौदा करने में मदद करेगा। इससे देश के राजकोषीय घाटे में कटौती होगी। जून के महीने में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक बैरल कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर थी। भारत में तेल की 80 प्रतिशत जरूरतें आयात के जरिए पूरी की जाती हैं, जिसके चलते सरकारी राजकोष पर अतिरिक्त खर्च का दबाव था। लेकिन, पिछले 8 महीनों में तेल कि कीमतों में आई गिरावट से सरकारी राजकोष पर पडऩे वाले अतिरिक्त दबाव से काफी राहत मिली है। 2013-2014 में दुनिया के कुल तेल आयात बिल में देश के कुल आयात बिल का प्रतिशत चौंका देने वाला है। दुनिया में जितनी तेल की खपत है उसका 36 प्रतिशत केवल भारत में ही खपत हुआ है और इसकी वजह से 2013-2014 में 165 बिलियन डॉलर का भार सरकारी राजकोष पर पड़ा है।

तेल के लिए मध्य-पूर्व और पश्चिम एशियाई देशों पर अमेरिका की निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। विश्लेषकों के मुताबिक, पेट्रोलियम की कीमत 2015 के अंत तक गिर सकती है। ऐसे हालात में दुनिया की राजनीतिक स्थिति में अस्त-व्यस्तता आ सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने शेल गैस के भारी मात्रा में खपत को ध्यान में रखते हुए उसकी खोज को बढ़ावा देने के लिए और खपत को कम करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा के उत्पादन के लिए प्रशस्त किया, लेकिन शेल गैस कि कीमत गिरने के पीछे एक कारण नहीं है। अमेरिका तेल का उत्पादन बढ़ाकर जानबूझ कर तेल बाजार में इसकी भरमार कर रहा है, ताकि यूक्रेन संकट को लेकर तेल और गैस के निर्यात पर आधारित रूस की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जा सके ।

पिछले साल की दूसरी छमाही में संयुक्त राष्ट्र ने तेल के उत्पादन में काफी बढ़ोत्तरी की थी। संयुक्त राज्य अमेरिका में जुलाई के महीने में तेल का उत्पादन 8.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन (बीपीड़ी) था, जिसे दिसंबर में बढ़ा कर 9 मिलियन कर दिया था। वास्तव में 2012, 2013, 2014 में अमेरिका में लगातार प्रति वर्ष 1 लाख बैरल प्रतिदिन इसके उत्पादन में वृद्धि हुई थी। कुछ अमेरिकी सरकारी शाखाओं के अनुसार 2015 में तेल उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि लागू करने के लिए वॉशिंगटन पूरी तरह से तैयार है।

2344;ुमान लगाए जा रहे हैं। तेल उत्पादन में लगातार वृद्धि के बावजूद उत्तरी अमेरिका में तेल कि मांग घटती रही है, क्योंकि 2000 के दशक के मध्य से बिजली से चलने वाले ऑटोमोबाइल की तादात बढ़ी है। दूसरा, पूरा यूरोप एक गंभीर अर्थिक मंदी से गुजर रहा है, जिसमें फ्रांस की वृद्धि दर शून्य दर्ज की गई है। तीसरा, चीन जो कि दुनिया की प्रमुख अर्थिक शक्तियों में से एक है, उसे भी विकास दर में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। बीजिंग के आवास और संबंधित उद्योगों में लगातार गिरावट नजर आ रही है। पिछले साल चीन की तेल मांग 4 लाख बैरल प्रतिदिन रही।

स्पष्ट है कि तेल कंपनियों को ऐसी स्थिति से निबटने में मुश्किलें पेश आ रही हैं। पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपीईसी – ओपेक) अब दुनिया में होने वाले तेल के उत्पादन में केवल 40 प्रतिशत ही योगदान कर रही है। ओपेक के सदस्य देश लीबिया, अलजीरिया, ईरान, इराक, नाइजीरिया और वेनेजुएला के बीच एकता की कमी होने की वजह से उत्पादन की मात्रा घटी है, लेकिन ओपेक तेल राजस्व पर पूरी तरह से निर्भर है। इसलिए उच्च उत्पादन और उच्चे मूल्य की जरूरत है। वास्तव में ओपेक दो सालों में उत्पादन के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। ओपेक देशों के बीच केवल सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत ही उत्पादन में कटौती करने की स्थिति में हैं।

भारत को ऐसे परिदृश्य पर कैसी प्रतिक्रि या देनी चाहिए? अगर एक शब्द में कहें तो भारत को इस संबंध में चीन का अनुसरण करना चाहिए। तेल की कीमतों में आई गिरावट का लाभ उठाते हुए बीजिंग अपने तेल भंडार में वृद्धि करने में व्यस्त है। दूसरा, तेल उत्पादन और उसके लाभ के लिए आवश्यक  बुनियादी ढांचे के लिए वेनेजुएला को दिए जाने वाले ऋण का विस्तार 20 बिलियन डॉलर तक करेगा। इसके बदले में बहुमूल्य तेल क्षेत्रों में चीनी कंपनियों को कुछ साझेदारी दी जाएगी।

तेल की कीमतों में आई गिरावट निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था के विकास के लिए एक वरदान साबित होगा, लेकिन अगर देखा जाए तो इस मुद्दे का दूसरा पक्ष भी मौजूद है और वह ये है कि 2 ट्रिलियन से अधिक की राशि तेल की खोज और उत्पादन के कारोबार में फंस हुआ है। अगर तेल की कीमतों में गिरावट लगातार जारी रही तो कई परियोजनाओं की व्यवहार्यता की संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसके आलवा कंपनियों ने ऊंची लागत पर पॉलीमर, रसायन और सिंथेटिक यार्न की भी खरीददारी की है, लेकिन अब घाटे का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही उन्होंने अपने आधारभूत सामग्री यानी तेल की भी खरीददारी उच्च कीमत पर की, लेकिन तेल की कीमत में गिरावट आने से अब वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है।

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