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परिवर्तन को स्वीकार करो

परिवर्तन को स्वीकार करो

जीवन की सच्चाई से हम सभी वाकिफ होकर भी उसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते हैं और हम खुद को परेशानी के घेरे में रखते हैं। हमारे जीवन में आने वाले दुख के कई कारण होते हैं। लेकिन, हमारी इच्छा या कामना को ही मुख्य कारण माना जाता है। लेकिन, हकीकत में हमारे जीवन में आने वाले परिवर्तन को हम सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाते हैं। परिवर्तन जो कि जीवन का सत्य होता है। जिसे चाहकर भी हम दूर नहीं कर सकते और उससे व्यथित हो जाते हैं। ज्ञानी गण इस संसार को ही मिथ्या मानते हैं और मात्र पारब्रह्म को ही सत्य मानते हैं। वे मानते हैं कि संसार में कोई भी चीज स्थायी नहीं होती है। जो आज हमारे पास है वह हमेशा के लिए हमारे पास नहीं रहेगी। जो चीज आज जिस अवस्था में है वह धीरे-धीरे परिवर्तित हो जाती है। इसी प्रकार परिवर्तनशील दुनिया को हम सत्य कैसे मान लें। हम सभी वर्तमान में जीने वाले जीवन में खुद को इतना ज्यादा मग्न कर लेते हैं कि उसके आगे-पीछे का सोच भी नहीं पाते हैं। हम जो आज देख रहे हैं उसे कल नहीं पाने से चिंतित हो जाते हैं। हमारे जीवन में नित्य घटने वाली कोई भी चीज में थोड़ा भी व्यतिक्रम हम स्वीकार नहीं कर पाते हैं।

एक शिशु के जन्म लेने के बाद उसके जीवन में अनेक परिवर्तन घटित होते हैं। बहुत से परिवर्तन ऐसे होते हैं, जिनसे हमें आनन्द मिलता है, लेकिन बहुतों से हम व्यथित हो जाते हैं। शिशु के खिलखिला कर हंसने से घर खिल उठता है। शिशु की हर उन्नति का हम खुद भी आनन्द लेते हैं। लेकिन, जब वह थोड़ा बड़ा होने लगता है तो उसके अंदर अनेक ज्ञान आ जाते हैं। आप से कही गई बातों से हटकर कुछ करने लगता है, तब हम दु:खी हो जाते हैं। हम बचपन से बड़े होने तक बच्चे को अपने पास रखते हैं। उसके सुख-दु:ख को ही अपना सुख-दु:ख मानने लगते हैं। जब वही बच्चा बड़ा होकर हमसे थोड़ा भी दूर जाने लगता है, तो भी हमें दु:ख होने लगता है। इस प्रकार अनेक परिवर्तनों को हम महसूस करते हैं। परिवार को छोड़कर भी हम जिस वातावरण में रहते हैं। उसमें खुद को इतना ज्यादा डुबा लेते हैं कि उससे अलग रहना मुश्किल हो जाता है। कोई भी चीज जो हमें अच्छी लगती है या कोई भी चीज की जिसकी हमें आदत बन गई हो उससे दूर होना हमारे लिये मुशकिल हो जाता है। यौवन अवस्था में हर कोई शौर्यवान, सौन्दर्यवान, बलवान होता है। उम्र के बढऩे से ही हमारी यह सभी चीजें हमसे धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। हमारे कार्य करने की क्षमता कम होने लगती है। जिन व्यक्तियों को यौवन अवस्था पर गर्व होता है उन्हें अधिक दुख होता है, जब यह एहसास होता है कि आज जो भी अभी मेरे पास है वह कल मेरे पास नहीं रहेगा। अगर हम इस परिवर्तन को सहजता से स्वीकार कर लें तो हमें दुख नहीं होगा, लेकिन हम में से अधिकतर लोग इसे स्वीकार नहीं कर पाते हैं।

भगवान की बनाई हुई ये दुनिया हमें नित्य-नियमित रुप से अनेक चीजें सिखाती हैं। जैसे नित्य दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है और ये परिवर्तन होता ही है। जैसे एक के बाद दूसरी ऋतुओं का परिवर्तन होता है। इन सभी चीजों को परिलक्षित कर के हमें इतनी तो आदत हो जानी चाहिए। जब हम पहले से यह दृष्टि में रखते हैं कि आज हमारे सामने जो दृश्यमान है उन सभी चीजों का परिवर्तन सुनिश्चित कर लें तो हमें उतना ज्यादा दुख नहीं हो सकता। परिवर्तन किसी भी प्रकार हो सकता है। हमारा अपना शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और दूसरों का हमारे प्रति होने वाले व्यवहार में भी परिवर्तन हो जाता है। आजकल जब दुनिया में किसी से बहुत अधिक अच्छा व्यवहार देखने को मिलता है। फिर उसी व्यक्ति से कुछ ही दिनों में हमें दुव्र्यवहार देखने को मिलता हैं, तो इसे उस व्यक्ति की ही मानसिक स्थिति मानकर खुद को दु:खी नहीं करना चाहिए। सर्वोपरी हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि सामने आने वाले हर हालात में हमें खुद को सचेत रखना चाहिए। हम जितना अधिक खुद को परस्थितियों के मुताबिक सचेत रखेंगे उतनी ही हमें कम तकलीफ होगी और हम परिवर्तन को स्वीकार कर पाएंगे।

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