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इतिहास के आईने में कव्वाली का सफर

इतिहास के आईने में कव्वाली का सफर

”संभल के जुबां खोलना मेरे यारों, गिरेगा वरना कहर पत्थरों का,’’ किसी शायर ने अपने शब्दों के प्रभाव को अपने अंदाज में व्यक्त करके शब्दों की ताकत को बताने का प्रयास किया है, लेकिन जब यही शब्द अकीदा (आस्था) के रुप में बोले जाते हैं, गाए जाते हैं तो सूफीयाना कव्वाली बन जाते हैं। भजन बन जाते हैं। बड़े गुलाम अली खां कहते थे। हर फूल इस फुलवारी की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। कव्वाली की दुनिया में चार चांद लगाने वाली कुछ कव्वालियां इनमें प्रमुख हैं ”हाजी मलंग दूल्हा, पहाड़ी से तेरा झूला’’, ”कितने बेशर्म आशिक है वे आज के’’, ”हे अर्श की जीनत प्यारे नबी नालैन तेरे नालैन तेरे’’, ”प्यारे अब्बास ने जब मश्क है उठाई तैबा चला कारवां, ऐ सोने वाले जाग जरा, गफलत में खोई नौजवानी’’, ”गुरु ख्वाजा में तोरी गली आई’’, ”महबूब किबरिया से मेरा सलाम कहना’’, ”काहे दासी को ख्वाजा भुला दीनों, मेरे ख्वाजा का दामन सलामत रहे, कृपा करो महाराज मोईनुद्दीन आदि कव्वालियां जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा है। भारत में कव्वाली गायन का आरम्भ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के कारण हुआ बताया जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार अमीर खुसरो (जन्म 652 हिजरी) के कारण भारत में सर्वप्रथम कव्वाली गायन प्रचलन में आया था। कव्वाली की लोकप्रियता सूफियों के कारण बढ़ी। उपासना सभाओं में सूफी संत समवेत स्वर में कव्वाली गाना आरंभ करते थे और कुछ समय बाद ही, भावावेश में आकर, झूम-झूम कर गाने लगते थे। धीरे-धीरे कव्वाली गाने वालों के दल संगठित होने लगे, जो आगे चलकर पेशेवर हो गए। कव्वाली के कई भेद होते हैं यथा, हम्द, नात, मनकवत आदि। हम्द में ईश्वर की प्रशंसा के गीत रहते हैं, नात में रसूल की शान का बखान होता है और मनकवत में औलिया के संबंध में वर्णन किया जाता है। कव्वाली गाने वालों में 1-3 मुख्य कव्वाल, 1-3 ढोलक, तबला और पखावज बजाने वाले, 1-3 हारमोनियम बजाने वाले, 1-2 सारंगी बजाने वाले और 4-6 ताली बजाने वाले होते हैं। सभी लोग अपनी वरिष्ठता के क्रम में बायें से दायें बैठते हैं, अर्थात अगर आप सुननें वालो को देख रहे हैं तो सबसे वरिष्ठ कव्वाल सबसे दाहिनी ओर बैठे होंगे। कव्वाली का अर्थ है ‘कौल’ अर्थात वह जो पैगम्बरों, महापुरुषों, अवतारों और सूफी-संतों ने कहा, उसी कौल को दोहराने वाला कव्वाल कहलाता है। कव्वाली में सबसे पहले अरबी में ‘कौल’ पढ़ा गया था और वह था ‘मन कुन्तो अली मौला’ संगीत को दृष्टिगत रखते हुये अमीर खुसरो ने इस कौल में तराने के बोल भी बोल दिये थे। 1925 मे कोलकता में कालू कव्वाल द्वारा भारत में पहली कव्वाली ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड की गई। इस दौर में कालू कव्वाल के अलावा स्वालेह मुहम्मद, शेख लाल, अब्दुल रजाक, रघुनाथ यादव, प्यारू, जुम्मन, मुहम्मद बशीर, अजीम प्रेम रागी, मुमताज हुसैन, शहाबुद्दीन चाऊस और अब्दुल रहमान कांच वाले बहुत मशहूर हुए।

इस्माइल आजाद

कव्वाली को सूफियों की महफिल से उठाकर आम लोगों के बीच लाकर खड़ा करने वाले कव्वाल इस्माइल आजाद ने 15 वर्ष की उम्र में कव्वाली गायन में प्रवेश किया था। इस्माइल आजाद कव्वाल ने अफगानी कव्वाली की प्रेरणा मिली। उनकी आवाज में बला की मिठास थी। अल्फाजों के तजफ्फुस (उच्चारण) की अदायगी में महारत हासिल थी, कव्वाली को इतना लोकप्रिय बना दिया कि फिल्मों में भी कव्वाली की आवश्यकता महसूस होने लगी। हकीकत यह है कि थियेटर से लेकर फिल्मों तक कव्वाली को कामयाब करने का श्रेय इस्माइल आजाद को ही जाता है। इस्माइल आजाद ने एच.एम.वी. कंपनी से पहली कव्वाली ”हाजी मलंग दूल्हा, पहाड़ी से तेरा झूला’’ को रिकॉर्ड किया। कव्वाली जगत में आज तक इस्माइल आजाद कव्वाल से अधिक रिकॉर्ड और किसी दूसरे कव्वाल के नही हो सके हैं।

यूसुफ आजाद

कव्वाली जगत में यूसुफ आजाद को नज्मों का बादशाह कहा जाता है। मुम्बई मेंं जन्मे यूसुफ आजाद ने 1950 में एच.एम.वी. कंपनी ने उनकी आवाज में एक नज्म (इक बार मुस्करा दो) ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड की, ताबिश कानपुरी द्वारा लिखित उक्त नज्म ने यूसुफ आजाद की शोहरत में चार चांद लगा दिये। यूसुफ आजाद ने पहली बार फिल्म ‘तलवारका धनी’ में अपनी आवाज दी। इसके बाद ‘आलम आरा की बेटी’, प्राइवेट लाइफ, पुतली बाई, नूरे इलाही आदि फिल्मों में कव्वाली प्रस्तुत की, फिल्म पुतली बाई में रशीदा खातून के साथ गायी हुई कव्वाली ”कितने बेशर्म आशिक हैं वे आज के’’ बड़ी मशहूर हुई।

अब्दुल रब चाऊस

अब्दुल रब चाऊस दुनिया के बड़े काबिल कव्वाल माने जाते हैं। निराला अंदाज, मनमोहक आवाज के धनी चाऊस साहब कव्वाल ही नहीं, एक अच्छे शायर भी हंै। हैरा उनका तखल्लुर है। 1952 में एच.एम.वी. द्वारा उनकी आवाज में पहली कव्वाली है ”हे अर्श की जीनत प्यारे नबी नालैन तेरे नालैन तेरे’’ ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड की गई जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया चाऊस के अनेक रिकॉर्ड हुए चाऊस ने फिल्म भूल-भूलैया, आदमखोर औलिया-ए-इस्माल आदि फिल्मों में अपनी आवाज में कव्वालियां पेश की। शायर होने के नाते उन्होंने फिल्म ज्यारतगाहे हिन्द तथा दयारे मदीना के लिये गीत भी लिखे हैं। चाऊस साहब मुकाबले के कव्वाल माने जाते हैं।

जॉनी बाबू कव्वाल

सुरीली, मीठी और कशिश भरी आवाज के मालिक जॉनी बाबू कव्वाल का पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1952 में कोलम्बिया कंपनी ने जारी किया। जिसके बोल थे दमादम मस्त कलंदर, इसके बाद उनके द्वारा अनेक कव्वाली के रिकॉर्ड बनाये गये। जिनमें वो इक भोली सी लड़की है, छोड़ दे पीना छोड़ शराबी, ऐ मेरी जाने गजल, आजा-आजा मेरे महबूब आ और दे-दे सदका जवानी का आदि रिकॉर्ड कव्वाली जगत में बड़ी लोकप्रिय हुई। जॉनी बाबू ने 1959 में पहली बार फिल्म जगत, पिंरस में शकीला बानो भोपाली के साथ मुकाबले की कव्वाली पेश की। इसके बाद सखी लुटेरा, छैला बाबू, दो खिलाड़ी, शिरडी के साईं बाबा, मस्जिद-मंदिर, रोटी-कपड़ा और मकान आदि फिल्मों के लिये अपनी आवाज दी, वे मात्र गायकी तक सीमित नहीं रहे। बल्कि फिल्म नूर महल में संगीत भी दिया है।

अजीज नाजां

बुलंद आवाज के धनी अजीज नाजां कव्वाल ने कव्वाली जगत में गुरु ख्वाजा में तोरी गली आई के रिकॉर्डिग की शुरुआत की। अजीज नाजां की कव्वाली का यह रिकॉर्ड कव्वाली की दुनिया में बड़ा प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद ख्वाजा हिन्दल बली, झूम शराबी, चढ़ता सूरज ढलता है, ढलता जायेगा। लोकप्रियता की अनूठी मिसायल कायम कर सका। अपने कव्वाली जीवन में लगभग सौ रिकॉर्ड तैयार किये। अजीज नाजां ने पहली बार फिल्म दो शत्रु में अपनी आवाज दी, इसके बाद चट्टान सिंह, नहले-पे दहला, हर -हर महादेव, रफूचक्कर, जय-विजय, खंज, अली बाबा, शंकर-शंभू, लैला-मजनूं, कुर्बानी, तृष्णा आदि फिल्मों में उन्होंने पाश्र्व गायक के रूप में आवाज दी है।

शंकर-शम्भू

शंकर-शम्भू कव्वाल हाथरस के रहने वाले थे। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा इन दोनों भाइयों को पिता से प्राप्त करने के बाद कव्वाली गायन की शिक्षा सोहनलाल (जयपुर) तथा चांद खां (दिल्ली) से ली, कानपुर के हजरत सूफी साहब की सालह पर शंकर-शंभू दोनों अजमेर-शरीफ के उर्स में कव्वाली पेश करने गये वहां जो कव्वाली पेश की तो सुनने वाले आश्चर्यचकित होकर तीन घंटे तक सुनते रहे। इस कव्वाली के बोल थे ”महबूब किबरिया से मेरा सलाम कहना’’ इसे सुनकर श्रोताओं का रो-रो कर बुरा हाल था। इसके बाद तो शंकर-शंभू को कव्वाली के क्षेत्र मे काफी शोहरत मिली। शंकर-शंभू का पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड सल्लल्लहो अलैहै वसल्लम बड़ा प्रसिद्ध हुआ। इनकी कव्वालियों में काहे दासी को ख्वाजा भुला दीनो, मेरे ख्वाजा का दामन सलामत रहे, कृपा करो महाराज मोईनुद्दीन आदि कव्वालियां बड़ी प्रसिद्ध हुईं। शंकर-शंभू ने पहली बार फिल्म सपूत में कव्वाली प्रस्तुत की, इसके बाद बादल-बिजली, फाइटिंग, मीन, मुराद, प्रोफेसर एंड जादूगर, बरसात की रात आदि फिल्मों में अपनी आवाज में कव्वालियां पेश कीं, शास्त्रीय संगीत पर आधारित सुर और ताल को बांधकर कव्वाली प्रस्तुत करने वाले शंकर-शंभू कव्वाल अपने कार्यक्रम में नात मनकबत (भजन) को प्रमुखता देते हैं।

अजीज अहमद खां बारसी

खानकाही कव्वालों में पद्म श्री अजीज अहमद खां 14 वर्ष की उमर से कव्वाली गाने लगे थे। 5 अक्टूबर 1971 में पद्म श्री की उपाधि से सम्मानित अजीज अहमद खां द्वारा कव्वाली के अनेक ग्रामोफोन रिकॉर्ड तैयार किये गए जो कव्वाली जगत में बड़े मशहूर हैं। फिल्म गर्म हवा में प्रस्तुत कव्वाली आका सलीम चिस्ती मौला सलीम चिश्तीं बड़ी लोकप्रिय हुई।

असलम साबरी

असलम साबरी 11 वर्ष की उम्र से कव्वाली गाने लगे थे। वे असलम साबरी का पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1966 में एच.एम.वी. ने तैयार किया। आपके कलामों में मुहम्मद के शहर में ऐ मेरी जाने गजल, ये तो ख्वाजा का कर्म है आदि बड़े मशहूर है। फिल्म परम्परा में अपनी आवाज में एक कव्वाली प्रस्तुत की।

मकबूल साबरी

पाकिस्तान के साबरी बंधुओं के नाम से प्रसिद्ध कव्वाली गायक गुलाम सावरी, मकबूल सावरी का जन्म भारत में हुआ था। उनका परिवार 1947 में भारत विभाजन के बाद कराची में जाकर बस गया था। दमादम मस्त कलंदर और छाप तिलक सब छीनी साबरी बंधुओं की मशहूर कव्वालियों में शामिल हैं।

अंजु अग्निहोत्री

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