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असहिष्णुता भारत की जीवन पद्धति के लिये बाहरी तत्व

असहिष्णुता भारत की जीवन पद्धति के लिये बाहरी तत्व

भारत में विचार की स्वतंत्रता पर अंकुश और असहिष्णुता कितनी है यह तो हाल ही में संपन्न हुए बिहार के विधानसभा चुनाव से ही आसानी से नापी जा सकती है। यदि विचार की आजादी न होती और सहिष्णुता का अभाव होता तो क्या यह संभव था कि चुनाव प्रचार में लोग एक-दूसरे की गाली-गलोच तक सुन लेते और सह लेते? सुप्रसिद्ध इतिहासकार तो यहां तक कह गये कि, ”राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं आई.एस.आई.एस. में कोई अन्तर ही नहीं है’’। यदि कुछ ऐसा होता, जैसा कुछ लोग हौवा खड़ा कर रहे हैं, तो क्या हबीब यह कहने की हिम्मत दिखा सकते थे? इसका निष्कर्ष तो सब निकाल ही सकते हैं। इतिहास कोई गली-कूचे में उड़ाई गई अफवाह तो नहीं होता, जो उसकी सच्चाई नहीं जानी जा सकती। इतिहास तो सच का पुलिन्दा होता है, न कि अफवाहों व अपनी जुबान पर आई किसी भी सच्ची-झूठी अफवाहों का संकलन। हबीब ने तो ऐसी बात कह कर उनके द्वारा लिखे इतिहास पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। क्या उनका इतिहास भी उतना ही निष्पक्ष व सच्चा है जितना कि उनके द्वारा संघ और आई.एस.आई.एस. की तुलना?

अभिनेता आमीर खान का यह कहना कि उनके परिवार में भी असुरक्षा व भय की भावना इतनी गहरी घर कर गई है, कि उनकी पत्नी अपने बच्चे की सुरक्षा के डर से भारत छोडऩे की बात सोच रही है। यह तो एक सोचा-समझा व सुनियोजित विषाक्त प्रचार का हिस्सा लगता है। क्या वह जनता को यह बताना चाहते हैं कि जो धन-दौलत, प्रसिद्धि व सम्मान उन्होंने भारत की जनता से पाया है, वह इस ‘असहिष्णुता’ की भावना की ही देन है?

भारत में तो संस्कृति के उदय के समय से ही सहिष्णुता व मेल-मिलाप का साम्राज्य रहा है। यह भाव तो भारत के प्राण हैं। भारत में तो विचार की अभिव्यक्ति व विसम्मति पर सदा से ही कभी अंकुश नहीं रहा है। यह तो भारतीय जीवन पद्धति की आत्मा है। यही तो अमृत है जो अविरल विचारों के आदान-प्रदान व शास्त्रार्थ के मंथन से प्राप्त हुआ है। अतीत काल में जब भी दो ऋषि-मुनि मिल बैठते थे तो उनमें आध्यात्म पर शास्त्रार्थ का सिलसिला शुरू हो जाता था। जीतता वही था जिसके तर्क में दम होता था। शास्त्रार्थ के निरन्तर मल्ल युद्ध ने ही तो भारतीय ज्ञान व विचार को शुद्धि व शक्ति प्रदान की है। इसी ने तो उसे विश्व गुरू बनाया था।

विचार में भेद के कारण किसी को सूली पर चढ़ाना व काट देना भारत की संस्कृति के लिए एक अजनवी चीज है। हिन्दू समाज में घुस आई कुरीतियों व गलत संस्कारों के विरोध में भगवान बुद्ध खड़े हुए थे पर समाज ने उनके विरूद्ध कोई जिहाद खड़ा नहीं किया। इसके विपरीत हिन्दू समाज ने उन्हें अपना लिया और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मान कर भगवान बुद्ध कबूल कर लिया। यही किया भगवान महावीर के साथ।

चरवाक ऋषि प्रतिदिन वेदों को गाली देते थे। हिन्दू समाज ने उन पर पत्थर फेंक कर लहूलुहान नहीं किया। उल्टे उनकी विचारधारा को भी सुना और उन्हें महर्षि मान लिया।

यह हिन्दू समाज की उदारवादिता व सहिष्णुता का ही कमाल था कि उन्होंने गैर-हिन्दू धर्मों को दिल खोल कर गले लगाया। यदि हिन्दू असहिष्णु होते तो यह संप्रदाय कभी भारत की पवित्र धरती पर पांव ही न रख पाते। यह हिन्दू समाज व हिन्दू राजे-महाराजे ही थे जिन्होंने गैर-भारतीय धर्मों को उनके पूजा स्थल बनाने के लिए धन और भूमि दान की।

यह भी उदारता व सहिष्णुता की ही हिन्दू मानसिकता थी कि उसने धर्म के आधार पर हुये भारत के विभाजन को स्वीकार किया और भारत में रह गये गैर-हिंदुओं के साथ वह व्यवहार नहीं किया जो पाकिस्तान व बांग्लादेश में रह गए गैर-मुस्लिम लोगों के साथ हुआ।

सहिष्णुता या असहिष्णुता को मापने का कोई पैमाना नहीं है। इस कारण यह कह पाना कठिन है कि जब कोई तर्कवादी व बुद्धिजीवी किसी दूसरे व्यक्ति या समूह की आस्था व विश्वास पर चोट करता है या उसका मजाक उड़ाता है तो वह उसकी सहिष्णुता का सबूत है या असहिष्णुता का। क्या यह असहिष्णुता है कि यदि कोई व्यक्ति या समूह उनके इस आचरण या कथन से आहत हो जाये या उसका प्रतिकार करे जो उसका मौलिक अधिकार है? यह तो सब जानते ही हैं कि किसी की आस्था को किसी तर्क की कसौटी पर नहीं आंका जा सकता। किसी तार्किक को किसी की आस्था पर प्रश्न उठाने का अधिकार है तो क्या वह अपने इस आचरण से असहिष्णुता पैदा नहीं कर रहा?

क्या जब धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ तो वह असहिष्णुता का प्रमाण नहीं था? स्वाधीनता के बाद पिछले 68 वर्षों में अनेक सांप्रदायिक दंगे हुए, क्या वह असहिष्णुता के प्रमाण नहीं थे? 1984 में इंदिरा गांधी की दुखद हत्या होने पर जो सिख-विरोधी दंगे भड़के वह असहिष्णुता का नमूना नहीं थे? तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तो यहां तक कह दिया था कि जब कोई बड़ा वृक्ष गिरता है तो नीचे की जमीन जरूर हिलती है। क्या उनके इस कथन ने असहिष्णुता की भावना को हवा नहीं दी? बाद में तो उन्हें ही भारत रत्न के सर्वोच्च सम्मान से सुशोभित कर किया गया था।

तार्किक कलबुर्गी की हत्या कर्नाटक में हुई और दादरी हत्याकांड उत्तर प्रदेश में। कानून व्यवस्था प्रदेश का उत्तरदायित्व है। लेकिन फिर भी दोष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिर मढ़ा जा रहा है क्यों? क्या तर्क है?

राहुल गांधी बड़ा शोर मचा रहे हैं कि मोदी कर्नाटक व दादरी की घटना पर कुछ क्यों नहीं बोलते? पर वह स्वयं यह क्यों नहीं बताते कि वह अपने कांग्रेसी मुख्यमंत्री से क्यों नहीं पूछते कि वह घटना उन्होंने होने क्यों दी और अब तक अपराधी पकड़ा क्यों नहीं गया?

नरेंद्र दाभोलकर भी कुलबर्गी ही की तरह एक प्रत्यक्षवादी थे। उनकी भी हत्या 2013 में पुणे में हुई जब केंद्र में भी और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। उनकी हत्या के बारे से हमारे नेता व बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं? क्या वह कम मानव थे या कम निर्दोष थे? सम्मान वापसी वाले हमारे महानुभावों की आत्मा को कुलबर्गी की हत्या से क्यों अत्यंत दुख हुआ पर दाभोलकर की हत्या पर क्यों नहीं या कम दुख हुआ?

असहिष्णुता की भावना पर जो आज छाती पीट रहे हैं उनमें से कईयों ने राजीव गांधी व अन्य कांग्रेसी सरकारों से किस मुंह से पुरस्कार ले लिये थे? सहिष्णुता के लिये कुर्बानी देने वाले यह ‘शहीद’ अब तक क्यों चुप रहे जब कश्मीर से 5 लाख हिंदुओं को धर्म के आधार पर अपने प्रदेश से निकाल कर अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया और जो पिछले 25 वर्षों से वे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं?

और यह भी तो ‘असहिष्णुता’ के वातावरण का ही कमाल है कि 2001-11 के दशक में देश की आबादी की वृद्धि की दर तो 18 प्रतिशत रही पर हमारे मुस्लिम भाईयों की आबादी 24 प्रतिशत बढ़ गई। आबादी का उनका प्रतिशत 13.4 से बढ़ कर 14.3 हो गया जो 1951 में केवल 10.4 प्रतिशत था। इसी प्रकार हिन्दुओं का प्रतिशत 84.1 से घट कर 80.5 प्रतिशत रह गया।

असहिष्णुता के माहौल या भावना पर हो-हल्ला करने का मतलब यह नहीं कि किसी व्यक्ति, समूह या संप्रदाय के मन में अन्याय, उत्पीडऩ, भेदभाव, उत्तेजना या अपमान को सहने की भीरू प्रवृति पैदा कर दी जाये। भारत का मुस्लिम तथा अंग्रेज विदेशी आक्रमणकारियों के प्रति सहिष्णुता का भाव ही तो प्रमाण है कि भारत को 1000 वर्ष तक गुलाम रहना पड़ा, अपमान सहना पड़ा। वास्तविकता तो यह है कि उल्टे इन आक्रमणकारियों ने भारतवासियों के प्रति असहिष्णुता का भाव रखा और उन्होंने हिन्दू संस्कृति, उनकी आस्थाओं, परंपराओं, संस्कृति व इतिहास की खिल्ली उड़ाई और उसे नीचा दिखाने व मिटाने के लिये सब कुछ किया, जो एक आक्रमणकारी कर सकता है। उन्होंने अपने धर्म, रहन-सहन व संस्कृति को महान और भारतीय को हीन दिखाने की कोशिश की। वह उन सभी चीजों के प्रति असहिष्णु थे, जिससे उनको भारतीयता की बू आती थी। फिर भी भारत उनके अत्याचारों व अपमानों के प्रति सहिष्णु रहा। इतिहास की दृष्टि से देखा जाये तो असहिष्णुता का भाव ही हिन्दू संस्कृति व सभ्यता से मेल नहीं खाता और यह पूर्णतया विदेशी तत्व है, जिसे आक्रमणकारी अपने साथ लाये थे। यदि कभी भारतीयों ने विदेशियों के प्रति असहिष्णुता का भाव प्रदर्शित किया तो वह पूरी तरह स्वभाविक है, क्योंकि धैर्य की भी कोई सीमा होती है।

हालात तो यह हैं कि भारत के जनतंत्र में आज अल्पसंख्यक ही बहुसंख्यकों पर राज कर रहे हैं। भारत के संविधान में समान नागरिक आचार संहिता बनाये जाने के लिये कहा गया है और उच्चतम न्यायालय सरकार को कई बार इस प्रावधान को याद भी करवा चुका है। फिर भी यह संहिता नहीं बनाई जा सकती क्योंकि, अल्पसंख्यक इसके लिये तैयार नहीं हैं। अस्थाई धारा 370 अब पिछले 68 वर्ष में व्यावहारिक रूप से स्थाई बन चुकी है, क्योंकि अल्पसंख्यक इसके लिये तैयार नहीं हैं। अब तो ऐसा लगने लगा है, मानों कश्मीर के मुसलमान बाकी प्रदेशों के भाइयों से घटिया हैं क्योंकि उन्हें वह विशेषाधिकार नहीं चाहिएं जो उनके कश्मीरी भाइयों को मिलते हैं।

मान लेते हैं कि मोरल पुलिसिंग व बीफ खाने का विरोध करना असहिष्णुता का सबूत है, तो क्या किस ऑफ लव या बीफ पार्टियां आयोजित करना सहिष्णुता का सबूत हैं? क्या ये किसी के लिये चेतावनी या उत्तेजना नहीं है? क्या हर दूसरे दिन मणीशंकर अय्यर, सिद्दीकी, सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी व आजम खां जैसे सेक्युुलर नेताओं के भाषण व टिप्पणियां देश में असहिष्णुता पैदा नहीं कर रहे हैं?

भारतीय समाज सदैव उदार, समझदार व मिलनसार रहा है। असहिष्णुता का भाव ही भारतीय मूल का नहीं है और यह विशुद्ध आयातित भावना है। लड़ाई की जड़ तो यह है कि सेक्युलर दूसरों को वह उपदेश देते हैं जिस पर वह स्वयं कभी नहीं चलते हैं।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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