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भारत के सेक्युलर हिन्दू विरोधी

भारत के सेक्युलर हिन्दू विरोधी

ऐसे समय जब देश में यह कहना फैशन हो गया कि देश में बहुत असहिष्णुता है, मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की- ”हमारे देश में विभिन्न समुदाय सदियों से साथ रह रहे हैं। दरअसल असहिष्णुता की बात सियासी वजहों से उठाई गईं हैं। जब तक न्यायपालिका स्वतंत्र है, तब तक किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है।’’ यह बात कह कर उन्होंने असहिष्णुता पर चल रही बहस के मर्म पर अंगुली रख दी है। पिछले दिनों कई राजनीतिक दलों ने निहित स्वार्थों के कारण पूरे देश में असहिष्णुता की नकली बहस शुरू कर दी है। देश के लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के आने के बाद ऐसा क्या हो गया है कि सदियों से सहिष्णु देश कुछ राजनीतिक दलों और उनके हमदर्द बुद्दिजीवियों, कलाकारों और साहित्यकारों को असहिष्णु लगने लगा है। इस सवाल का जवाब खोजने पर एक ही जवाब सामने आता है कि यह मोदी सरकार को बदनाम करने में जुटे कुछ राजनीतिक दलों और उनके दोस्तों की साजिश है। चुनाव आने पर वे इस तरह का कोई न कोई अभियान छेड़ देते हैं। जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने वाले थे, तब अचानक चर्चों पर हमलों की बाढ़ आ गई थी। कुछ सामान्य सी घटनाओं जैसे शॉर्ट सर्किट होना, क्रिकेट की गेंद से शीशे टूटना और चोरी आदि की घटनाओं को चर्च पर हमलों के सबूत के रूप में मीडिया में पेश करना आम बात हो गई थी। ऐसा माहौल बनाया जा रहा था कि अब हिन्दुस्तान में चर्चों की खैर नहीं। देश में ईसाई समुदाय सुरक्षित नहीं है। लेकिन चुनाव खत्म हुआ और चर्चों पर हुए कथित हमले भी खत्म हो गए। ऐसे ही बिहार चुनाव से पहले असहिष्णुता के मुद्दे को उठाया गया जिसके कारण लेखक, फिल्मकार और कलाकार पुरस्कार लौटाने लगे। बिहार चुनाव खत्म और पुरस्कार लौटाने का अभियान भी थम गया। बिहार चुनाव में जंगलराज की जीत होने से देश से असहिष्णुता का माहौल खत्म हो गया है।

नरेंद्र मोदी ने जिस दिन शपथ ली उसी दिन से उनके विरोधी मिशन लिए हुए हैं कि उन्हें नाकाम करना है। एक तरह से विपक्ष मोदी को मिले जनादेश को अमान्य किये हुए हैं। याद करें उन बातों को जो नतीजों के विश्लेषण में सुनाई दी थीं। मई 2014 में चुनाव नतीजों के बाद ही नरेंद्र मोदी के विरोधियों ने कहा था कि, मोदी की पार्टी को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि 69 प्रतिशत विरोधी है। 17 मई को इसी थीसिस पर एक अंग्रेजीदा ने लिखा- ”नरेंद्र मोदी की अल्पसंख्यक सरकार।’’ तब से लेकर अब तक नरेंद्र मोदी से नफरत करने वाली लॉबी हर उस बात की तलाश में है, जिससे सरकार की धुलाई वाला सार्वजनिक विमर्श बने।

इसके पीछे तीन कारण हैं। एक, नरेंद्र मोदी गोधरा और दंगे हैं। दूसरे, नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया से पोषित सेक्युलर अंग्रेजीदा बौद्विक जमात है। इसका काम नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ परिवार को बदनाम करना ही है। तीसरी वजह सियासी विपक्ष की यह रणनीति है कि सरकार को ऐसे घेरे रखों जिससे कि वह अपने एजेंडे में कुछ कर ही नहीं पाए और वह राजनैतिक तौर पर असफल हो जाए।

लेकिन, देर सवेर ही सही कुछ लोगों को विपक्ष की संकीर्ण राजनीति समझ में आने लगी है। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो जाने- अनजाने जो सच है, वही बोल रहे हैं।

फिल्म गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर, पिछले दिनों एक न्यूज चैनल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के मंच पर थे। सवाल-जवाब के क्रम में जावेद अख्तर ने कहा – ”वे नास्तिक हैं और किसी भी ‘रिलीजन’ अथवा ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते। पीके (फिल्म) में हिन्दू धर्म पर नहीं धर्म का धंधा करने वालों पर चोट की गई थी।’’ हिन्दू संस्कृति और परंपरा के बारे में सबसे खूबसूरत बात यही है कि वो इजाजत देती है कि कुछ भी कहो, कुछ भी सुनो, कुछ भी मानो। और, यही परंपरा और मूल्य हैं जिसके कारण इस मुल्क में लोकतंत्र है। देश से बाहर निकलेंगे तो फिर भूमध्य सागर तक लोकतंत्र नहीं मिलता। मगर मुझे हैरत होती है जब लोग मिलते हैं और कहते हैं कि ‘साहब पीके में आपने हिन्दू धर्म के बारे में तो इतनी लिबर्टी ले ली। क्या मुसलमानों के साथ ऐसा कर पाते?’ क्या आप मुसलमानों जैसे बनना चाहते हो? अरे भाई कोशिश करो कि वे तुम्हारे जैसे बनें। बजाय इसके कि तुम उनके जैसे हो जाओ। यहां तो खून में है कि, हम जो चाहे कह सकते हैं। दिलीप कुमार की एक फिल्म है दाग, जिसमें वो भगवान की मूर्ति को उठा लेता है और कहता है कि ”ये हमारा भगवान नहीं है, ये तो सेठ का भगवान है। मैं इसे नाली में फेंक दूंगा।’’ और, वो फिल्म अपने जमाने में सुपरहिट हुई थी। आज आप ऐसी फिल्म बनाने की कल्पना कर सकते हैं? ये जो सेमेटिक मजहबों (इस्लाम, ईसाइयत, यहूदी) की असहनशीलता हिन्दू समाज में आ गई है, (उसके कारण) आप बर्बाद हो जाएंगे। आप इन्हें ठीक कीजिये, खुद इनके जैसे मत बनिए। ये मुल्क बहुत महान मुल्क है। इसकी परंपरा कमाल की है। ये अजीब जगह है। हम अलग हैं, उन लोगों से जिनमें सहनशीलता नहीं है। हममें वो खराबी नहीं आनी चाहिए।’

सबसे पहले तो, जावेद अख्तर ने हिन्दू परंपरा की सहनशीलता के बारे में जो कहा वह कोई नई बात नहीं है। लेकिन, भारत के सार्वजनिक जीवन में इस बात को कहने से कन्नी काटने की भी परंपरा पिछले कुछ दशकों में डाल दी गई है। इसलिए वे धन्यवाद के पात्र हैं।

कुछ ऐसी ही बात अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्रकार एवं लेखक तारेक फतह ने कही है – ”भारत एकमात्र देश है जो बतलाता है कि भविष्य में राष्ट्र राज्यों को कैसा होना चाहिए और किस प्रकार भाषाओं, नस्लों एवं उपासना पद्घतियों को सारी कठिनाइयों के बावजूद स्थान देना चाहिए। एक मुस्लिम के रूप में मुझे यह सम्मोहक लगता है कि कैसे यह दुनिया में एकमात्र स्थान है जहां मुस्लिम बिना किसी भय के अपनी जगह बना सकते हैं। भारत में मुसलमान पाकिस्तान और बंगलादेश से ज्यादा सशक्त हैं।’’

लेकिन, असहिष्णुता के मुद्दे पर सबसे बेबाकी से अपनी बात किसी ने कही हैं तो वह हैं तस्लीमा नसरीन। एक तरह से उन्होंने भारत के सेक्युलर लोगों को बेनकाब कर दिया है। उन्होंने हाल ही में दिये एक इंटरव्यू में कहा -”भारत के अधिकांश धर्मनिरपेक्ष लोग हिन्दू विरोधी हैं। वे हिन्दू कट्टरपंथियों के कामों पर तो विरोध प्रदर्शन करते हैं, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के घृणित कार्रवाइयों का बचाव करते हैं।’’

तस्लीमा से जब सवाल पूछा गया कि क्या आप मानती हैं कि, प्रधानमंत्री को ज्यादा सहानुभूति के साथ बोलना चाहिए। जब, मुसलमान और भारतीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का मामला हो। तो लेखिका ने कहा कि – ”भारत में राजनीतिक नेता वोटों की खातिर लोगों को खुश रखते हैं। मुसलमानों को ज्यादा तवज्जो दिये जाने से अनेक हिन्दू नाराज हैं। यह सच है कि, मुसलमानों को कभी-कभी उनके मुसलमान होने से उत्पीडि़त किया जाता है, लेकिन यह अन्य धर्मों के लोगों के साथ भी होता है।’’

बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा है कि, ”भारत में टकराव हिंदुत्व और इस्लाम के बीच नहीं बल्कि, धर्मनिरपेक्षता और कट्टरवाद के विचारों के बीच है। उन्होंने कहा कि मेरे लिए यह टकराव मूलत: तर्कसंगत तार्किक सोच और तर्कहीन अंधी आस्था के बीच है। मेरे लिये यह टकराव आधुनिकता और आधुनिकता के विरोध के बीच, मानवतावाद और बर्बरता के बीच, नवाचार और परंपरा के बीच है।’’ उन्होंने कहा कि – ”भारत मूलत: असहिष्णु देश नहीं है। इसका संविधान और कानून असहिष्णुता और कट्टरता पर आधारित नहीं हैं, लेकिन यह सच है कि धार्मिक समूहों में कुछ लोग असहिष्णु हैं और यह बात हर समाज में आम है।’’

बिहार चुनाव के बाद तथाकथित असहिष्णुता के खत्म हो चुके मुद्दे को फिर से हवा देने की अभिनेता आमिर खान की कोशिश की हर तरफ आलोचना हो रही है। आम लोगों के अलावा राजनीतिक नेताओं, फिल्मी हस्तियों के बाद अब साहित्य जगत से भी आमिर के खिलाफ आवाज उठी है। मशहूर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ट्वीट के जरिये कहा है कि, ”असहिष्णुता दुनिया में कम या ज्यादा हर जगह है। आमिर खान जैसे सेलेब्रिटी और उनके परिवार के लिये भारत सबसे सुरक्षित जगह है।’’

आमिर खान की फिल्म पीके देखने के बाद भी तस्लीमा ने ट्वीट किया था कि – ”पीके जैसी फिल्म बनाकर आपने 300 करोड़ रुपये कमाये हैं। आमिर अगर यही फिल्म आपने पाकिस्तान और बांग्लादेश में बनाई होती तो आपका जनाजा निकल जाता।’’ आरजीवी के नाम से मशहूर फिल्मकार रामगोपाल वर्मा ने तथाकथित असहिष्णुता पर अभिनेता आमिर खान के बयान की आलोचना करते हुए बहुत पते की बात कही है- ”यदि तीन मुस्लिम आमिर, सलमान और शाहरुख एक हिन्दू प्रधान देश में सुपरस्टार हो सकते हैं तो मुझे यह समझ नहीं आता कि असहिष्णुता कहां है? इससे साबित हो जाता है कि, यहां बहुसंख्यक असहनशील नहीं हैं।

असहिष्णुता पर बहस करते अब कुछ साहित्यकार अस्पृश्यता का आचरण करने लगे हैं। कर्नाटक में बैंगलुरू लिट फेस्ट में कुछ साहित्यकारों ने इसलिए जाने से मना किया, क्योंकि फेस्टिवल के निदेशकों में से एक निदेशक ने पुरस्कार वापसी के खिलाफ लेख लिखा था। इसलिए पूरा फेस्टिवल उन लेखकों के लिए अछूत हो गया। उस निदेशक के कारण वे संवाद के उत्सव का बहिष्कार करना चाहते थे। ताकि, लिट फेस्ट में लेखकों के बायकॉट का शिकार न हों। तो असहिष्णुता का विरोध करने वाले लेखक इतने असहिष्णु हो गए है कि, पुरस्कार वापसी का विरोध करने वालों के साथ संवाद करना तो दूर उनके साथ अस्पृश्यता तक बरतने लगे हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि, असहिष्णुता का झूठा मुद्दा उठाने वाले खुद कितने असहिष्णु हैं।

सतीश पेडणेकर

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