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देश में फैल रही असहिष्णुता या वैचारिक संघर्ष की जड़ें

देश में फैल रही असहिष्णुता या वैचारिक संघर्ष की जड़ें

जैसा विचार हम करते हैं, वही हमारे संस्कार और व्यवहार का मूल आधार बनता जाता है। बाहरी संसार के दबावों-प्रभावों से हम प्रभावित भी होते हैं और तदनुसार अपने व्यवहार में आवश्यक समायोजन भी करते चले जाते हैं, परन्तु मूल दिशा सदा अपने विचार से ही निर्धारित होती रहती है। क्योंकि, ज्ञान ही समस्त व्यवहार का आधार एवं प्रेरक है। ज्ञान-विचार-संवेदना एवं व्यवहार यह क्रमानुसार होता है। ज्ञान के आधार पर हमारा विचार बनता है तथा वही विचार जब पूर्णत: परिपक्व एवं सामंजस्यूपर्ण हो जाते हैं, तो वही हमारे मार्गदर्शक विचारधाराएं बन जाते हैं। इसी को वैचारिक अधिष्ठान या विचारधारा नाम दिया जाता है। जैसी विचारधारा होती है, फिर, वैसे ही हम सिद्धान्त निर्धारित कर लेते हैं। फिर, वैसे ही या उसी के अनुरूप ही पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में मॉडल बने, यही हमारा प्रयास होता है, समृद्धि एवं शान्ति के लिये। यह परिकल्पित आदर्श स्थिति है।

वस्तुत: ऐसे सांगोपांग, परस्पर सामंजस्यपूर्ण मॉडल्स आधुनिक युग में कहीं बने नहीं हैं, परन्तु आदर्श यही हैं। सत्य यह है कि आधुनिक संसार में इस विषय में घनघोर अराजकता है, अध्यात्म के क्षेत्र में प्रशान्त विवेक के शीर्ष साघकों या सिद्धों को आदर्श मानने वाले उसी समय राजनीति के क्षेत्र में परम उद्वेग-वर्धक, क्षोभ-वर्धक, उन्माद-वर्धक व्यक्तियों को मॉडल्स मानते हैं और परिवार में परस्पर प्रेम, संतुलन, सबका ध्यान, सबके विकास की चिंता करने वाले को तथा आदर्श मानने वाले बाजार में होड़, एकाधिपत्य, सबको पछाड़ देने से अकेले शीर्ष पर पहुंचने वाले को रोल मॉडल मानते हैं।

इसी के साथ अनेक समानान्तर प्रयास बाजार-क्षेत्र में देखे जाते हैं। व्यापारिक प्रयोजनों से विभिन्न संस्थानों द्वारा अपने अनुकूल व्यक्तियों को खेल, सिनेमा, कला, संस्कृति, साहित्य आदि क्षेत्रों के आइकॉन या रोल मॉडल की तरह प्रस्तुत यानी प्रिजेन्ट किया जाता है। इसमें भारी होड़ चलती है और कभी कोई आइकॉन चमकता है, कभी कोई अन्य। इसके पीछे बाजार की विभिन्न शक्तियों अर्थात व्यापार के अनेक संस्थानों के बहुस्तरीय कारनामे होते हैं।

विविध प्रक्रियाओं के आधार पर हमारे रोल मॉडल, आइकॉन्स, विजिनरी या आदर्श बन जाते हैं। विचार, विचारधारा, सिद्धान्त, मॉडल, रोल मॉडल्स या आदर्श आदि का सम्मिलित प्रभाव हम व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में देखते हैं। धर्म की शाश्वत प्रज्ञा का ध्यान इस प्रक्रिया में प्राय: नहीं रहता।

दूसरी तरह से इसे हम देखते हैं तो जैसा हमें ज्ञान दिया जाता है, घर, परिवार, स्कूल व समाज में वैसे ही हमारे विचार व संस्कार बन जाते हैं। विचार ही परिपक्व होकर संस्कार या स्वभाव के रूप में हमारे साथ जुड़ जाते हैं। सबसे पहला प्रभाव प्रारम्भ होता है माता-पिता से, फिर परिवार, स्कूल, समाज इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस सम्पूर्ण सृष्टि के मूल में यदि कोई वस्तु है, तो वह विचार या संकल्प और पुरूषार्थ है और उसी का विस्तार एवं परिणाम है यह सारा संसार।

भगवान के विचार या संकल्प से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और इंसान का भी सारा अभ्युदय व नि:श्रेयस इसी विचार-जन्य पुरूषार्थ का विस्तार है। यह विषय अत्यंत गंभीर है और इसके हजारों पहलू हैं। संक्षेप में इसे कहें तो जैसा हमारा ज्ञान, जानकारी या समझ विकसित होती है, वैसे संसार के हर क्षेत्र, हर पहलू के बारे में हमारे विचार हो जाते हैं और हम हर आदमी के मुंह से हर विषय में एक ही बात सुनते हैं इस विषय में मेरे तो ऐसे विचार हैं। जैसा हमें ज्ञान, प्रशिक्षण जानकारी मिलती है वैसी ही हमारी समझ विकसित हो जाती है फिर वैसे ही हमारे विचार हो जाते हैं। इसके भी जैसे योग में अष्टचक्र हैं वैसे ही आठ चक्र हैं। ज्ञान, विचार, संवेदना, विचारधारा, सिद्धान्त, मॉडल, रोल मॉडल एवं संस्कृति। दो शब्द सबके मुख से बार-बार सुनते हैं-‘ मेरे या हमारे तो ऐसे विचार है या नहीं हैं।’ दूसरा शब्द है ‘यह हमारी संस्कृति है’ अथवा ‘यह हमारी संस्कृति नहीं है।’

इस समय देश में उठ रहे सबसे बड़े विवाद कि देश का माहौल खराब हो रहा है, इसके मूल में हमें जाना होगा। माहौल आज-कल खराब हो रहा है यानी पहले अच्छा था। वह अच्छा कब था, उसके लक्षण क्या थे, क्या हैं? यह चर्चा नहीं होती। बस एक लहर जैसे फैल रही है या फैलाई जा रही है कि आजकल भारत का माहौल खराब हो रहा है। कम-से-कम बौद्घिक क्षेत्र में बात बयानबाजी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। खराब माहौल या असहिष्णुता का मूल स्वरूप क्या है। और जब अच्छा माहौल था, सहिष्णुता थी, तब विभिन्न समाजों के बीच सम्बन्धों का स्वरूप क्या था? ये बातें सार्वजनिक चर्चा में उभर कर आनी चाहिए, तभी किसी बयान का अर्थ है। अन्यथा यह केवल राजनैतिक प्रतिस्पर्धा एवं विद्वेष से प्रेरित कथन दिखने लगता है।

मुख्य बात यह है कि माहौल खराब होने की चिंता से व्यवहारिक परिणाम निकले। हम अपने नागरिकों में कौन से विचार प्रतिष्ठित कर रहे हैं, इस पर गहराई से ध्यान दें। इसका स्वाभाविक अगला चरण होगा कि हम भावी नागरिकों को अपने बच्चों को किस रूप में तैयार कर रहे हैं, ढाल रहे हैं, उन्हें कौन से संस्कार एवं विचार दे रहे हैं? इसकी चिन्ता की जाए, क्योंकि देश के माहौल की चिंता तो वर्षों के लिए नहीं, बल्कि दशकों और शताब्दियों के लिए की जाती है, की जानी चाहिए। स्पष्ट है कि इस खराब माहौल के लिए हम एक व्यक्ति या एक पार्टी या किसी एक संस्था अथवा किसी संगठन विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। वस्तुत: कतिपय सार्वभौमिक कसौटियों के आधार पर ही दायित्व का निर्धारण उचित है, विद्वेष के आधार पर नहीं।

सभी राष्ट्रवासियों को पूरी ईमानदारी, गंभीरता व प्रमाणिकता के साथ इस पर गंभीर चिन्तन व मंथन करके एक सही निष्कर्ष पर पहुंचना होगा और इस समस्या की जड़ में जाना होगा और तब एक ही निर्विवादित समाधान निकलेगा कि सार्वभौम कसौटियों के आधार पर खराब माहौल की जिम्मेदारी निश्चित की जा सकती है, दोषारोपण के आधार पर नहीं, इसी के साथ स्वास्थ्य के ज्ञान परम्परा की नींव हमें बचपन से बच्चों में डालनी पड़ेगी। एक ऐसी ज्ञान परम्परा जिसमें सार्वभौमिकता, पूर्ण वैज्ञानिकता, पंथ निरपेक्षता तथा साथ ही भौतिकता व आध्यात्मिकता का पूर्ण समावेश हो। यही भारत की मूलभूत सत्य सनातन वैदिक ऋषि ज्ञान परम्परा या आर्ष परम्परा है। ‘सा प्रथमा संस्कृति: विश्ववारा’ पर हमें लौटना ही पड़ेगा, इसी वैदिक परम्परा एवं आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की परम्परा को लेकर हम शिक्षा एवं संस्कारों को लेकर आचार्यकुलम की शिक्षा क्रान्ति के एक बहुत बड़े आंदोलन को लेकर आए हैं।

हमें बचपन में बच्चों की नींव या फाउंडेशन को ठीक करना पड़ेगा। यदि बचपन की नींव मजबूत होगी तो फिर व्यक्ति का जीवन, घर, परिवार, समाज, संगठन, संस्था, राष्ट्र व विश्व अपने आप सही दिशा में बढ़ेगा। यही एक पूर्ण समाधान है। अब थोड़ी बहुत मलहम पट्टी करने से बात नहीं बनेगी अब तो सम्पूर्ण शिक्षा में हमें एक बड़ा आंदोलनकारी परिवर्तन लाना होगा। भारत की मूल ज्ञान परम्परा यही है। इसे ही हमारे पूर्वज अपरा व परा विद्या का नाम देते थे। देश के आधुनिक बुद्धिजीवी भी बिना किसी आग्रह के इस संदर्भ में विचार करें तो वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। सत्य सनातन है, शाशवत है और उसकी ही विजय होती है। वही उपास्य है, वही कल्याण का पथ है। वैचारिक संघर्षों के नाम पर अपनी-अपनी संकीर्ण अर्हता या पांथिक एकांगिता पर आत्यांतिक आग्रह रखते हुए भिन्न विचार वालों को दोष देते रहना तो असहिष्णुता है, और इसमें असहिष्णुता ही बढ़ेगी। परस्पर सहजीवन के सर्वमान्य आधार जो हमारे संविधान की भी मूल प्रेरणा है ,उनको राष्ट्रीय परिवेश में सुदृढ़ता से प्रतिष्ठित करना होगा। अन्यथा अविचारित आरोप और राजनैतिक विद्वेष सदा असहिष्णुता बढ़ाएंगे, घटा नहीं सकते। अन्य को असहिष्णु कहते समय तत्वनिष्ठ, वस्तुनिष्ठ होकर स्वयं का आत्म-परीक्षण करना कर्तव्य है।

                (साभार: योग संदेश)

बाबा रामदेव

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