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सोच बदलो, भारत को ‘माडर्न नेशन’ बनाओ

सोच बदलो, भारत को ‘माडर्न नेशन’ बनाओ

कई जिंदगियां ऐसी हैं जिन्होंने हमारे इतिहास को रचा है, जब इनके बारे में पढ़ता हूं तो मुझे लगता है कि ऐसी जिंदगियों की नींव में कोई दर्द बसा हुआ है। एक समय था और वो कहानी शायद सभी को मालूम भी होगी। गांधीजी एक ट्रेन में बैठे थे और उनके साथ वहां जो ट्रेन में हुआ उस घटना से उनके मन पर जो गुजरी उससे एक नया दृष्टिकोण उत्पन्न हुआ। वही दृष्टिकोण हमें आजादी के रास्ते पर ले चला। उसी वक्त एक और कहानी घटित हुई जिसे शायद हम भूल गये हैं। ये कहानी मुझे भी तब नजर आई जब में संसद की लाइब्रेरी में कुछ सर्च कर रहा था। बाबा साहब अंबेडकर बच्चे थे, वह अपने भाई और कजिन के साथ ट्रेन में बैठ कर अपने पिता को मिलने गये थे महाराष्ट्र के एक गांव में, जहां उनके वालिद की पोस्टिंग थी। उन्होंने अपने वालिद को अपने वहां आने की सूचना एक चिट्ठी के जरिये पहुंचा दी थी, लेकिन जब वह वहां पहुंचे तो देखा कि उनके वालिद वहां नहीं पहुंचे थे तो उन्होंने एक बैलगाड़ी ले ली और निकल गये। लेकिन, कुछ ही क्षणों में बैलगाड़ी के मालिक को पता चल गया कि वे दलित हैं। तो उन्हें अपनी बैलगाड़ी से उतार दिया। ये घटना उस बच्चे के दिल पर लगी। महानता के ऊपर स्मारक तो बहुत बनते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि एक-दो स्मारक दर्द के ऊपर भी बनने चाहिएं। उस गांव में जाकर याद दिला दें कि चलो साऊथ अफ्रीका में तो रेसिज्म होता था। लेकिन हमारे मुल्क में भी कम नहीं होता था। अंबेडकरजी के जीवन में जो एक महत्वपूर्ण चीज थी आज हम उसके लिये ही यहां है। वह है ‘रिलेशनशिप टू द कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ वह एक प्रिंसिपल आर्किटेक्ट थे। शायद सारे सदन को ये जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने सारी ड्राफ्टिंग 141 दिन में खत्म कर दी थी।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि 141 महीने हो गये, लेकिन जीएसटी बिल नहीं पास हो सका। गलती चाहे इसमें किसी की भी हो। अगर उनके 141 दिन के बारे में जानना है तो मैं टी.टी कृष्णाचारी को कोट करना चाहूंगा, कि आखिर क्यों उनको ड्राफ्टिंग कमेटी का पिता कहा जाता है। कृष्णाचारी कहा करते थे, कि हम क्यों आदर करते हैं, क्यों सम्मान देते है। क्योंकि ड्राफ्टिंग कमेटी में 7 लोग थे। वे लोग निजी कामों में अधिक व्यस्त रहते थे। इसलिए अंबेडकर को ज्यादा काम करना पड़ा। इसलिए अंबेडकर को याद करना बहुत जरूरी है। 1946 में अंतरिम सरकार बनी अंबेडकरजी उस वक्त वायसराय काउंसिल के लेबर मंत्री थे। 1946 में उनको सरकार में नहीं लिया गया। जगजीवन राम जिनकी उम्र उस वक्त 27-28 वर्ष की रही होगी उनको कैबिनेट में लिया गया। 17 दिसंबर 1946 को अंबेडकर इस सदन में उठते हैं और कहते हैं कि मैं जवाहर लाल की सिंसियरिटी के ऊपर अंगुली नहीं उठा रहा हूं, लेकिन शायद उनका मन अंदर ही अंदर तड़प रहा था तो सिर्फ इसलिए कि जब तक आप समस्या का समाधान नहीं देंगे तब तक अधिकार कोई मान्यता नहीं रखते।

हम सब भारतीय संविधान को एतिहासिक कहते हैं, लेकिन हमें ये समझना होगा कि अगर ये ऐतिहासिक है तो ऐतिहासिक क्षणों को भी हमें समझना होगा, क्योंकि उसके बिना इसे समझना मुश्किल है। वो कौन सा क्षण था? मैं बता दूं कि वो बहुत ही बड़ा क्षण था। क्योंकि, अगर यूरोपियन कॉलोनाइजेशन इस देश से शुरू होती है तो यूरोपियन कॉलोनाइजेशन यहां से खत्म भी होता है। लेकिन 1947-1950 में इससे भी बड़ी बात हो रही थी। एक हजार साल का अंतरराष्ट्रीय स्तर 100 साल में चूर हो गया। दुनिया के जितने भी महान एम्पायर थे 1960 तक सारे खत्म हो गये। हिन्दुस्तान का मुगल साम्राज्य, चीन का साम्राज्य, ऑटोमन साम्राज्य सभी खत्म हो गये। उसके बाद अंग्रेजों ने कुछ वक्त इतिहास से मांग लिया, क्योंकि उन्होंने उपनिवेश की जगह पर नये उपनिवेश तैयार कर दिये थे। लेकिन न्यू नहीं चल सका। 1950 से 1960 के बीच हर जगह हर साम्राज्य में उपनिवेशवाद का खतरा था, अभी उपनिवेशवाद का खतरा नहीं है, लेकिन राष्ट्रीयता के ऊपर खतरा है ।

नेशन तो मिल गये पर हम नेशन के साथ करें क्या? हम अपने आप को मॉडर्न नेशन कहते हैं। नेशन का मतलब तो सब समझते हैं पर मॉडर्न नेशन का मतलब क्या है? हमें ये समझना है। जब तक हम मॉडर्न का मतलब नहीं समझेंगे तब तक हम मॉडर्नाइजेशन नहीं समझेंगे। मैं कहता हूं कि अगर भारतीय इतिहास ठीक से लिखा जाये तो भारतीय संविधान मैग्नाकार्टा है आने वाले 500 सालों के लिए। क्योंकि, भारतीय संविधान है जो मॉडर्निटी शब्द को परिभाषित करता है। मॉडर्निटी के चार अपरक्राम्य आधारभूत सिद्धांत हैं। एक है डेमोक्रेसी जिसकी चर्चा ज्यादा करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सब समझते हैं। सभी इसकी आजादी को समझते हैं। कभी-कभी हम जरूरत से ज्यादा आजाद हो जाते हैं, वो भी ठीक है। दूसरा विश्वास का स्तर आप तब तक मॉडर्न नहीं हो सकते जब तक आप इसका अपने संविधान में इसका मतलब नहीं समझते। आज जो दुनिया में लड़ाईयां हो रही हैं, उसकी चर्चा हो रही है। क्योंकि, एक मुल्क ने फेद की क्वालिटी के ऊपर जन्म लिया है। कई मुल्क है पश्चिम में जिन्होंने ‘फेद ऑफ प्रिमेसी’ को माना है, लेकिन यह मॉडर्न फेज में नहीं चल सकती। यहां विवाद होता है सेक्युलर शब्द पर मैं अपने आप को सेक्युलर मानता हूं। सेक्युलर शब्द हमारे संविधान में भी है। लेकिन, इसके मायने क्या हैं? ये यूरोप से निकला हुआ शब्द है। ये दो जगह से उत्पन्न हुआ है। इसके दो ऑरिजन क्षेत्र हैं। एक है फ्रेंच रेवोल्यूशन जिसमें आप वॉल्टन और लूसो को मान लीजिये या फिर आप कार्ल माक्र्स का मान लीजिये। जिसमें है कि आप मजहब को निकाल दो। लेकिन हमारा जो सेक्युलरिज्म है वो इनसे बिल्कुल अलग है। कोई भी यहां पर खड़े हो कर कह दे कि मजहब को यहां से हटा दो या धर्म को हटा दो। दो दिन नहीं चल सकता ये भारत में। वी बीलीव इन द इक्वैलिटी ऑफ फेद रादर दैन द सेप्रेशन ऑफ एलिमिनेशन। ये हमारे कानून में नहीं है ये हमारे ईमान में है। इसलिए गांधीजी हमारे सेक्युलरिज्म को रामराज्य कहते थे। क्या गांधीजी कम्युनल हो गये थो जो उन्होंने इसे रामराज्य का नाम दिया। नहीं, वे एक उदाहरण दे रहे थे कि हजारों सालों से ये धरती सर्वधर्म समभाव है। सर्वधर्म समभाव के लिए किसी और से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है। मैं कह सकता हूं कि हमारा देश इससे बढ़कर है। यूरोपियन सेक्युलरिज्म क्या चीज है। मेरा देश वह देश है जहां पर ऑडिबल सेक्युलरिज्म है। यानी पिछले 1400 साल से हर सुबह शुरू होती है अजान से और हनुमान मंदिर की घंटी से उसके बाद गुरूग्रंथ का पाठ होता है और अगर रविवार हो तो चर्च की भी घंटी बजती है। आप वाशिंगटन चले जायें चाहें लंदन चले जायें वहां आपको अजान नहीं सुनाई देगी। लेकिन हमारे यहां 1400 साल से अजान सुनाई देती रही है और आगे भी 1400 साल तक सुनाई देती रहेगी। इसलिए नहीं कि कोई सरकार इसे बचा रही है, बल्कि हर हिन्दुस्तानी इसे बचा रहा है। ये है हिन्दुस्तान का सेक्युलरिज्म। दूसरी बात की आप तब तक मॉडर्न नहीं हो सकते जब तक कि लिंगानुपात बराबर नहीं होता। सर मोरिस जिंकिन ब्रिटिश राज के आखिरी वित्त मंत्री थे। उनकी पत्नी थीं ताया जिंकिन। 1955-1956 में ताया जिंकिन वापस आईं, हिन्दुस्तान मेनचेस्टारिगडिया की कॉरेस्पॉडेंट की तरह से वो जवाहलाल नेहरू की सोशल फ्रेंड थीं।

उस वक्त ऐसी सिक्योरिटी नहीं होती थी तो वह जवाहलाल के घर पर ही आकर रूकती थीं। एक दिन ताया जिंकिन शायद 1961 की बात होगी, वह जवाहरलाल के घर गईं और उन्होंने जवाहलाल नेहरूजी से पूछा कि आपकी अब तक की सबसे महान उपलब्धि क्या है? जवाहरलाल थे आसानी से कह सकते थे कि आजादी, हमने आजादी दिलाई लेकिन, उन्होंने ऐसा नहीं कहा। उन्होंने कहा कि हिन्दू कोड बिल हमारी उपलब्धि है। उसके बाद ताया जिंकिन ने एक सवाल पूछा, जिसका जबाव हम आज तक नहीं दे सके। उन्होंने कहा कि आपने हिन्दू औरतों को तो समानता और बराबरी का हक दे दिया है, लेकिन आपने मुसलमान औरतों को तो ये सब नहीं दिया। जवाहरलाल नेहरू का जवाब था कि वह वक्त सही नहीं था। कब सही वक्त आएगा? शाहबानो के जमाने में वक्त सही नहीं था। तो कब आयेगा? मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि किसी भी कौम के ऊपर आप कोई भी कानून थोप नहीं सकते है। लेकिन, बातचीत तो कीजिए कम-से-कम ये तो न सुनने को मिले कि आप कोई इक्वैलिटी देंगे तो वह इस्लाम के खिलाफ होगा। इस्लाम एक रिवोल्यूशनरी मजहब है। 7वीं सदी में महिलाओं को इस्लाम में जो अधिकार मिले थे वो कहीं नहीं मिले। ये वो इस्लाम है जिसका पहला इंसान एक महिला है और उनका नाम है खदिजा। औरतें पहले आईं इस्लाम में क्योंकि इस्लाम ने अधिकार दिया महिलाओं को। इन 1400 सालों में इस बहस में मुसलमानों को सबसे आगे होना चाहिए था और देखिए हम ही पीछे रह गये हैं। मैं फिर से कहूंगा कि किसी भी कौम पर कानून को थोपा नहीं जा सकता, लेकिन जुबान बंद रखना भी तो सही नहीं है। चौथी चीज इकोनॉमिक इक्विटी नहीं होगी तो आप अपने आप को मॉडर्न नहीं कह सकते हैं। इकोनॉमिक इक्विटी का मतलब क्या है? इसका मतलब है की गरीब भी समझें कि ये जो राइजिंग इकोनॉमी है उसके हिस्सेदार हम भी हैं। आपने गरीब को तालीम नहीं दी है, इसका मतलब ये नहीं है कि वह बेवकूफ हैं और उन्हें समझ नहीं है। उसे भी ये कहने का हक है कि अगर मैं दो रोटी खाते हुए पैदा हुआ हूं तो क्या मरते वक्त मुझे चार रोटी खाने का हक है कि नहीं? क्या ये हक नहीं कि सिर पर छत नहीं है तो छत मिलनी चाहिए? बड़े आंकड़े निकलते हैं कि 1950 में गरीबी रेखा से नीचे 65 प्रतिशत थे और आज 30 प्रतिशत है। हम चार वक्त का खाना खाते हैं। अगर एक वक्त का डॉक्टर मना कर देता है तो बुरा नहीं लगता। लेकिन उनसे पूछिये जिन्हें एक वक्त का भी खाना नसीब नहीं होता तो उन्हें कैसा लगता है? वह जानना चाहते हैं कि 60 प्रतिशत से 30 प्रतिशत करने में इतना वक्त लगा 30 प्रतिशत से शून्य करने में और इतना ही वक्त लगेगा क्या? सदन को इस सवाल का जबाव देना होगा अगर सदन इस सवाल का जबाव नहीं देती है तो भूखा इस सदन को नहीं चलने देगा। हमारे संविधान में लिखा है गरीबी को कम किया जाये।

मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि जब मैंने अपने प्रधानमंत्री के मुंह से सुना पॉवर्टी एलीविएशन का जमाना खत्म हो गया है पॉवर्टी एलीमिनेशन का जमाना है तो मुझे बड़ा अच्छा लगा। कम-से-कम यहां तो हम सब एक हो जायें कि पॉवर्टी एलीमिनेशन ही हमारी तकदीर है और कुछ नहीं है। जब वह कहते हैं कि हिन्दू को तय करना पड़ेगा कि वह मुसलमान से लड़ेगा या गरीबी से लड़ेगा, मुसलमान को तय करना पड़ेगा कि वह हिन्दू से लड़ेगा या गरीबी से लड़ेगा। इसके सिवाय कहने को अब और है क्या?

अगर हम अपने आप को मॉडर्न नेशन बनाना चाहते हैं तो सारी पार्टियों से मेरी अपील है कि आपको एक चीज तय करनी पड़ेगी कि चुनाव जो है हर तीन महीने में होंगे, छह महीने में होंगे, हर साल होंगे। लेकिन हमें यह तय करना पड़ेगा कि ये जो इलेक्शन है वह पिछले 25 सालों का आखिरी इलेक्शन है। या अगले 25 सालों का पहला इलेक्शन है। जिस दिन ये सफाई हो जायेगी दिमाग में उस दिन विवाद भी नहीं रहेगा। क्योंकि, अगले 25 सालों का इलेक्शन गरीबी का चुनाव है। मजहब का चुनाव नहीं है जो बांटता है उसका नहीं, बल्कि जो जोड़ता है उसका है। जहां से भी आवाज ऊठे ये विवाद खत्म होकर हम कहीं न कहीं डॉ. अंबेडकर तक ही पहुंचते हैं। 1950 में उनकी अपनी पार्टी थी, डिप्रेस क्लासेज उनकी ड्राफ्टिंग कमेटी का काम खत्म हो गया था, बॉम्बे में बड़ा जश्न हुआ। वहां पर उन्हें एक गोल्ड ट्रॉफी दी गई। उन्होंने एक ही जबाव दिया कि मैं जानता हूं कि तुम किस पीड़ा से निकले हो, खुद अपनी कम्यूनिटी को कहा। क्योंकि खुद उनके मन में पीड़ा थी।

26-12-2015

मैं फिर एक बार कहूंगा कि महाराष्ट्र में स्मारक तो बहुत बने हैं उनके नाम पर लेकिन एक स्मारक उनके दर्द का भी बनाओ। उन्होंने सब कुछ सहा और सहकर कहा कि अपनी कम्युनिटी की बात तो जरूर कहो, लेकिन तुम्हारी कम्युनिटी से बड़ा है तुम्हारा देश। इस बात को याद नहीं रखोगे तो तुम्हारी आजादी खतरे में पड़ जाएगी। लेकिन, आज आजादी खतरे में नहीं है, लेकिन भविष्य जरूर खतरे में है।

मैं बस एक बात बोलूंगा कि यहां का युवा है जो इस सवाल का जवाब जानता है। उसको चाहिए अगले 25 साल का इलेक्शन, अगले 25 साल की दिशा। अगर हम वो नहीं दे पायेंगे तो याद रखिये ये बात सभी के लिये है और ये एतिहासिक तथ्य है कि, राजीव गांधी ने वोटिंग की उम्र को 18 साल कर दिया। तब से केवल 2009 के इलेक्शन के सिवा कोई दुबारा रिइलेक्ट नहीं हुआ। कोई भी सरकार 2009 के सिवा दुबारा नहीं चुनीं गई। 2019 में ये दुबारा होने वाला है पर वो एक अलग बात है।

यहां का युवा चाहता है कि आप मुल्क को मॉडर्न बनायें। मुल्क को विवाद से ऊपर उठाईये। तब तक आप लोगों को 19वीं सदी के पिंजरे में बांध कर रखेंगे। वो जमाना गया उसे भूल जाइए आगे की तरफ देखिये। देश आगे की तरफ देखता है चलिए हम भी देश के साथ मिल जाएं।

एम. जे. अकबर

(राज्यसभा में एम.जे. अकबर के दिये गये बयान पर आधारित)

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