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जिन लोगों की संविधान में कोई आस्था नहीं वही इसके अगुवा बनना चाहते हैं

जिन लोगों की संविधान में कोई आस्था नहीं वही इसके अगुवा बनना चाहते हैं

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकरजी की 125वीं जयंती पर हम उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। ये ऐतिहासिक दिन है। 66 साल पहले आज ही के दिन संविधान सभा ने हमारे देश को संविधान दिया था। यह संविधान लोकतंत्र और कानून के राज का, सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण, हमारी देश की एकता को मजबूत करने के साथ ही, हमारी अनेकताओं का अभिनंदन करने वाला दस्तावेज है। हमारे संविधान का निर्माण दशकों के संघर्ष का नतीजा है। यह संघर्ष महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुआ। इससे प्रेरणा लेते हुए समाज के हर वर्ग से करोड़ों लोगों ने देश की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष किया और देश को आजाद कराया। संविधान लिखे जाने में करीब 3 वर्ष लगे थे। इस पर बहुत गंभीर चर्चा हुई थी। डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जो कि संविधान के प्रारुप समिति के अध्यक्ष थे, उन्होंने ही संविधान के प्रारुप को संविधान सभा के सामने पेश किया था। उन्होंने संविधान की सभी मुख्य धाराओं और प्रावधानों की पृष्ठभूमि इसके उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला और संविधान में निहित दर्शन की विस्तृत व्याख्या की। 26 नवंबर 1949 की सुबह जब संविधान का प्रारुप औपचारिक रुप से स्वीकार किया गया तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने डॉक्टर अम्बेडकर की प्रशंसा करते हुए कहा था कि, उन्हें प्रारुप समिति में रखने और इसका अध्यक्ष बनाने से बेहतर और सही फैसला हो ही नहीं सकता था। डॉक्टर अम्बेडकर ने संविधान का प्रस्ताव पेश करते समय अपने संभाषण में कहा था – मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था, जब प्रारुप समिति ने मुझे अपना अध्यक्ष चुना, समिति में मुझसे बड़े, बेहतर और सक्षम लोग थे। आगे चलकर डॉक्टर अम्बेडकर ने यह भी कहा कि यह कांग्रेस पार्टी के अनुशासन का ही कमाल था की प्रारुप समिति संविधान सभा में संविधान को हर धारा और हर संसोधन के बारे में निश्चित जानकारी के साथ प्रस्तुत कर सकी। ये बात आमतौर पर भुला दी जाती है कि डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की अनोखी प्रतिभा और क्षमता को पहचानते हुए कांग्रेस पार्टी ही उन्हें संविधान सभा में लाई थी। डॉक्टर बी. आर. अम्बेडकर ने अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। जब वे भारत लौटे तो उनका एक ही मकसद था। अनुसूचित जातियों और पक्षपात पीडि़त जातियों के सम्मान और आवाज देने के लिये संघर्ष करना। उनके लिये राजनीतिक सत्ता के अवसर दिलाने और उसे संभव करने के लिये संघर्ष करना। जिस शानदार संविधान का हम सब सम्मान करते हैं, जिसकी रक्षा की शपथ लेकर हम संसद में प्रवेश करते हैं, उस पर ऐसे बेहतरीन दिमागों और आत्माओं की छाप है जो संसार में कभी-कभी ही जन्म लेते हैं। हमारे संविधान का इतिहास लंबा है, अनिवार्य रुप से स्वाधीनता संग्राम से जुड़ा हुआ है और इसलिए ही कांग्रेस पार्टी के इतिहास से भी यह आंतरिक रुप से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिये, मार्च 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के करांची अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु ने मूलभूत अधिकारों और आर्थिक नीति से संबंधित प्रस्ताव तैयार कर पारित कराया था। हमारे संविधान में विशेष कर सामाजिक न्याय और महिला समानता संबंधी प्रावधानों में इस प्रस्ताव का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।

संविधान सभा को चार लोगों जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद और मौलाना आजाद का मार्गदर्शन मिला, जिन्हें सभी का आदर प्राप्त था। संविधान सभा की 8 प्रमुख समितियां थीं, इनके अध्यक्ष या तो नेहरुजी, सरदार पटेल या तो फिर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद थे। मौलाना आजाद इनमें से 5 समितियों के प्रमुख सदस्य थे। 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरु ने जो उद्देश्य प्रस्तुत किया उसी ने संविधान की प्रस्तावना का रुप लिया। संविधान अद्भुत रुप से लचीला साबित हुआ है। इसमें 100 से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं। जिनमें से अधिकांश बदलती परिस्थतियों और उभरती चुनौतियों के नतीजे हैं। लेकिन, यह र्निविवाद है कि संविधान ने हमारे समाज के कमजोर तबकों को भागीदारी और गौरव का अहसास दिया है। हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का समावेश है और ये भी र्निविवाद है कि संविधान ने हमारे लोकतंत्र, जनप्रतिनिधि और शासन को अधिक जवाबदेह बनाया। लेकिन, हमें डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की चेतावनी नहीं भूलनी चाहिये, जब उन्होंने कहा – कोई संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो अगर उसे लागू करने वाले लोग बुरे निकले तो वह निश्चित रुप से बुरा ही साबित होगा। और कोई संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो अगर उसे लागू करने वाले लोग अच्छे निकले तो वह निश्चित रुप से अच्छा ही साबित होगा। संविधान का व्यवहारिक अमल केवल संविधान की अपनी प्रकृति पर निर्भर नहीं करता।

संविधान की भावना का भी उतना ही महत्व है, जितना की इसके शब्दों का। जैसा कि स्वयं डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इशारा किया था कि अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये संविधानिक तौर-तरीकों का कोई विकल्प नहीं हो सकता। आज एक खुशी का दिन है, लेकिन दु:ख का दिन भी है। दु:ख इसलिये क्योंकि संविधान के जिन आदर्शों और सिद्धांतों ने हमें प्रेरित किया उन पर खतरा मंडरा रहा है। उन पर जान-बूझ कर हमला हो रहा है। हमने पिछले कुछ महीनों से जो कुछ भी देखा है, वह पूरी तरह से उन मूल्यों के खिलाफ है, जिसको संविधान के जरिये सुनिश्चित किया गया है। जिन लोगों की संविधान में कोई आस्था नहीं रही है, न इसके निर्माण में कोई भूमिका रही है वह आज इसका नाम जप रहे हैं और इसके अगुवा बनना चाहते हैं। वो आज संविधान के प्रति वचनबद्धता पर बहस कर रहे हैं। इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है।

अंत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरफ से मैं डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और संविधान सभा के सभी सदस्यों को नमन और सलाम करती हूं। जिन्होंने हमें यह अमूल्य विरासत प्रदान की है।

सोनिया गांधी

(सोनिया गांधी के लोकसभा में दिए गए बयान पर आधारित)

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