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भारत की सामाजिक और धार्मिक समरसता को बिगाडऩे की कोई कोशिश करेगा तो उसकी खैर नहीं

भारत की सामाजिक और धार्मिक समरसता को बिगाडऩे की कोई कोशिश करेगा तो उसकी खैर नहीं

इस देश में असहिष्णुता से उत्पन्न स्थिति पर इस सदन में चर्चा चल रही है और मैं कहना चाहूंगा कि जिन-जिन माननीय सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। उनसे चाहे किसी की सहमति हो चाहे किसी की असहमति हो, लेकिन मैं सबके विचारों के प्रति अपने हृदय की गहराईयों से उसकी अभिव्यक्ति करता हूं। जिन हमारे सम्मानीय व्यक्तियों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। चर्चा की शुरूआत संसद सदस्य सलीम साहब ने की है, माननीय वेणुगोपाल ने इसमें हिस्सा लिया है। दिनेश त्रिवेदी जी, जितेन्द्र रेड्डी, बाला प्रसाद राव, सुप्रीया सुले, धर्मेन्द्र यादव, चन्दू माजरा, जयप्रकाश यादव, धर्मेन्द्र, धर्मवीर गांधी, किरण खेर, शशि थरूर, राधेश्याम विश्वास, दुष्यंत कुमार चौटाला, मुहम्मद बशीर साहब, सुश्री अनुप्रिया पटेल, किरण रिज्जू, मुहम्मद औवेसी, राहुल गांधी, प्रह्लाद जोशी, कौशलेन्द्र कुमार, सुश्री मीनाक्षी लेखी और प्रेम चन्द्रन। मैं ये कहूंगा कि मैं असहिष्णुता के विषय में तो कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन मैं सहिष्णुता के बारे में कहना चाहूंगा। इसका अर्थ होता है किसी भी चीज को सहना। आप किसी भी चीज से सहमत हैं या नहीं हैं। भले ही आप उस चीज को न चाहते हों आपको भले ही वह चीज मजबूरन सहन करनी पड़ रही हो या बर्दाश्त करनी पड़ रही हो तो उसे ही सहिष्णुता कहते हैं।

देखा जाये तो सहिष्णुता में एक पृथकता का भाव है, अलगाव का भाव है, थोड़ा कष्ट का भाव यदि समाज में विद्यमान हो तो समरसता सुख का भाव किसी भी कीमत में नहीं आ सकता है, बिल्कुल भी नहीं आ सकता है। हमारे यहां सहिष्णुता के भाव पर बल नहीं दिया गया है, बल्कि हमने जिसको स्वीकार किया है, जिसको अंगीकार किया है, उसे हमने अपने अंग का हिस्सा माना है। भारत में रहने वाला कोई व्यक्ति चाहे किसी मजहब का हो, किसी पंथ का हो, किसी जाती का हो, उसे ही हमारे भारतीय संस्कृति के परिणेताओं ने अपने परिवार का सदस्य नहीं माना है, बल्कि पूरे विश्व के सदस्यों को अपने परिवार का सदस्य मानते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश अगर किसी देश की धरती से गया है तो वो सिर्फ भारत की धरती से गया है। इस हकीकत को भी हम अच्छी तरह से समझते हैं हम सहिष्णु थे, हम सहिष्णु हैं और हम सहिष्णु रहेंगे। सहिष्णुता हमारी परंपरा में है, हमारी संस्कृति में है। हम मानते हैं कि हमारी इस थाती को दुनिया की कोई ताकत छीन नहीं सकती। न इस वक्त देश में ऐसा कोई माहौल है। भारत में ज्ञान और उसके घनघोर विरोधी विचारों के सम्मान की गौरवशाली एक परंपरा रही है। यह प्रवाह निरंतर जारी है और यह प्रवाह निरंतर जारी रहेगा।

इधर कुछ दिनों से समाज में असहिष्णुता के नाम पर बनावटी गोले दागे जा रहे हैं। क्षमा कीजिएगा असहिष्णुता के बनावटी गोले, कागजी गोले दागे जा रहे हैं। हम किसी के दबाव में सहिष्णु नहीं हैं ये हमारी परंपरा में है सहिष्णुता। मैं आपसे एक अनुरोध करना चाहूंगा कि एक समाचार पत्र है ‘दैनिक भास्कर’ उसमें एक समाचार प्रकाशित हुया है जिसका मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा। इस समाचार पत्र ने असहिष्णुता की चर्चा के बीच विदेशी, भारतीयों के बारे में क्या सोचते हैं इसके बारे में लिखा है। देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर विदेशियों का आना-जाना बढ़ा है। ये कहना है उस टीम का जो पर्यटन स्थलों का अध्ययन करने गई थी वहां पर। जिसमें विदेशी सैलानियों ने अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं। भारत के बारे में सैलानियों की ये बातें 2 से 20 नवम्बर के बीच की हैं। करीब 6 लाख सैलानियों की भावनाओं को हमने इकट्ठा किया है। उनमें से यहां हम कुछ चुनिंदा विचारों को बता रहे हैं, जो समाचार पत्र में छपे हैं। एक महोदय हैं जो कजाकिस्तान के हैं, वह लिखते हैं कि मैं महात्मा गांधी को जानने के लिए साबरमती आश्रम आया था, पता चला कि भारत के लोग गांधी से प्रभावित हैं उनकी बातों में, व्यवहार में प्यार झलकता है, ऐसा कहीं और नहीं दिखाई देता है। चीन के शंघाई से आये कैडनिल लिखते हैं, कि हम लोग भारतीय मुस्लिम संस्कृति और स्थापत्य से अश्चार्यचकित हैं। बिहार के बोधगया कि विजिटर बुक में कंबोडिया की सारा लिखती हैं कि भारत की धरती पर लोग बहुत मिलनसार हैं। ऐसे कई लेख हैं मैं सभी का उल्लेख नहीं करना चाहता हूं। इतना ही नहीं मैं यहां पर ये भी उल्लेख करना चाहूंगा सऊदी गजेट एक समाचार पत्र है। उसमें एक जाने-माने स्तंभकार हैं, खलाद अल-हरबी, साहब ने लिखा है कि ”इन इंडिया व्हेयर आर मोर दैन ऑफ हंडरेड रिलिजियन।

26-12-2015मोर दैन हंडरेड लैग्वेज दी पिपुल्स लीव इन पीस एंड हारमोनी दे ऑल हैव ज्वाइंट हैंड टू बिल्ड आ स्ट्रॉन्ग नेशन दैड आर मेड एवरी थिंग फ्रॉम आ स्वींगि नीडिल टू द रॉकेट विच इज प्रिपेयरिंग टू गो टू द मार्स यानी सिलने वाली सुई से लेकर रॉकेट तक बनाते हैं। और मार्स तक जाने की तैयारी कर रहे हैं। दैट आई फिल ए बिट जैलस विकॉस आई कम फ्रॉम आ पार्ट ऑफ द वल्र्ड विच आई वंडर रिलिजन वन लैंग्वेज एंड किलिंग एवरी्हेयर। उन्होंने कहा है हमारे देश में हर जगह किलिंग है, हऊ द वल्र्र्ड स्पीक अवाऊट द इनटॉलरेंस इंडिया रिमेंस ओल्डेस्ट एंड मोस्ट इंपार्टनेंस स्कूल टू टीच टॉलरेंस एंड पीसफुल कोइंसीडेंट रिगारडलेस टू दा रिलिजियस सोशल, पॉलिटिकल एंड एथेनिकल डिफेरेंट ये सब बुहत पहले नहीं लिखा गया है। मई 2015 के महीने में ही ये लिखा गया है। असहिष्णुता अपने से भिन्न मत रखने वालों को बर्दाशत न करने की क्षमता का होना है यानी हम ऐसे लोगों को बदर्शत नहीं कर सकते हैं, इसलिए हम असहिष्णु हैं। विषय तो बहुत गंभीर है, लेकिन बोलने बालों से मैं कहूंगा कि विचार करो ये विषय आत्मघाती है और मैं समझता हूं ये देश के लिए आत्मघाती है। मैं अपील करना चाहूंगा लोगों से कि ऐसे बयानों से हमें बचना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धूमिल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए हमें। मैं ये अपील करता हूं। क्या ये पूरे विश्व को देने वाला संदेश है कि भारत का वातावरण रहने के लायक नहीं है? क्या हम ये संदेश देना चाहते हैं कि बाहर से आकर भारत में निवेश करने के लायक नहीं है? ये आरोप पार्टी या सरकार पर नहीं है, बल्कि भारतीय समाज और भारतीय राष्ट्र पर है। भारतीय राजनीति में अस्पृश्यता और असहिष्णुता का सबसे ज्यादा अगर कोई शिकार है तो वह है भारतीय जनता पार्टी, हमारी पार्टी है और अगर कोई हिंदुस्तान की राजनीति में सबसे ज्यादा असहिष्णुता का शिकार हुआ है तो वह हैं आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी।

अवॉर्ड वापसी का एक दौर चल रहा था। हमारे पास जो सूचना है उसमें 39 लोगों ने अपने पुरस्कार वापस किये हैं, लेकिन मैं संज्ञान में लाना चाहूंगा, जिन लोगों ने अवॉर्ड वापस किया है, उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने लोकसभा इलेक्शन के पहले एक स्टेटमेंट जारी किया था। द परसेन लाईक नरेन्द्र मोदी हू इज द परमानेंट सोर्स ऑफ द एंजाईटी एंड इनसेक्योरिटी बैरी लार्ज सेक्शन ऑफ अवर सोसायटी कैन नॉट एंड सुड नॉट टू बी एलाउड टू बी इन इंडिया। नाम नहीं लेना चाहता हूं ये साहित्यकार हैं, लेखक हैं। इस स्टेटमेंट ने हमारे प्रधानमंत्री को फासिस्ट कहा है। जनमत का आदर करना नहीं जानते ये क्या यही असहिष्णुता है? लेकिन अगर जनमत का बहुमत प्राप्त हुआ है नरेन्द्र मोदी जी को तो उसका आदर तो करना चाहिए न? तभी तो लोग कहेंगे ना कि आप सहिष्णु हैं नहीं तो आप को लोग असहिष्णु ही कहेंगे। हमने वह दौर भी देखा है जब बहुत सारे ऐसे लोग और वह संगठन भी जो इस समय देश का माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। इमरजेंसी के दौरान भी स्वर्गीय इंदिरा गांधी के घर जाकर इमरजेंसी लगाने के बाद बधाई दी थी, पहले इंदिरा गांधीजी को और आज वो हमको सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे हैं।

सहिष्णुता का मतलब होता है कि हर वो अधिकार जो हम अपने लिए पाना चाहते हैं, वो दूसरों को भी मिले वही सहिष्णुता है। मगर देश में आज तक सिर्फ एक खास विचार धारा की सुनी गई है। अब वह दूसरों की भी तो सुनें तभी तो लोग मानेंगे की वे सहिष्णु हैं। इस देश का चप्पा-चप्पा विविधताओं से भरा पड़ा है। विविधताएं जो साथ-साथ जन्म भी लेती हैं और साथ-साथ चलती भी हैं। ऐसा उदाहरण पूरे विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा जैसा की भारत में देखने को मिलता है। मैं मानता हूं कि चीजें आ चुकी हैं, लेकिन अगर मैं नहीं कहूंगा तो शायद मेरी बात अधूरी रह जायेगी। मैं मानता हूं इस देश में बड़ी असहिष्णुता की तीन घटनाएं हुईं हैं। पहली बार जब देश का बंटवारा हुआ। भले ही किसी ने मजहबी आधार पर देश के बंटवारे की मांग की हो, भारत हिंदू और मुसलमानों के नाम पर बंट गया हो, लेकिन हमारी विचारधारा के लोग ये नहीं चाहते थे कि मजहब के आधार पर धर्म के नाम पर देश का बंटवारा होना चाहिए। हम भारत को अखण्ड चाहते थे। पहली बार जब देश का बंटवारा हुआ तब देश में असहिष्णुता देखने को मिली थी। दूसरी बार जब विरोध की आवाज दबाने के लिए इस देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई। तीसरी बार 1984 के दंगे के दौरान। आप अच्छे से जानते हैं कि इन तीनों घटनाओं के वक्त किसकी सरकार थी? कौन असहिष्णुता फैला रहा है? दरअसल विचारधारा की बात करने वाली ये जमात असहिष्णुता का बनावटी माहौल बनाकर सरकार को बदनाम कर रहे हैं। हमें अफसोस है इस वक्त असहिष्णुता के नाम पर बेमतलब का बबंडर खड़ा किया जा रहा है। और मैं इन लोगों से पूंछना चाहता हूं कि ये लोग तब कहां थे, जब कश्मीर का अमर साहित्य चल रहा था? लाईब्रेरियां आग के हवाले की जा रही थीं, उस समय आप कहां थे? लाखों कश्मीरी पंडित अपनी जन्मभूमि से भगा दिये गये उस समय आप कहां थे?

26-12-20151984 में हजारों बेकसूर सिक्ख सड़कों पर जला दिये गये उस वक्त आप कहां थे? इनमें से 2300 लोग केवल देश की राजधानी दिल्ली में ही आग के हवाले कर दिये गये उस वक्त आप कहां थे? 131 गुरूद्वारे नष्ट कर दिये गये उस वक्त कहां थे? भागलपुर, नैल्ली, हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ में बेकसूरों का कत्लेआम हुआ। जब लेखिका तस्लीमा नसरीन पर कोलकाता में हमला हुआ, उन्हें कोलकाता से किस राजनीतिक पार्टी ने खदेड़ा? जब जयप्रकाश जी की आवाज को दबाने के लिए इमरजेंसी थोपी गई तब क्या? उस वक्त तो प्रेस की आजादी का गला घोंटा गया था क्या वे लोग सहिष्णु हैं? नागरिकों के मौलिक अधिकार कुचले गये, अभिव्यक्ति की आजादी पर डांका पड़ा था। भारत की संस्कृति पर निरंतर ऐसी घटनाएं हुईं हैं। तब ये जमात कहां थी और क्यों चुप थी? इनकी संवेदनशीलता के तार तब क्यों नहीं बजे? मैं ये सब ऐसे लोगों से जानना चाहता हूं। क्या ये सच नहीं है कि सारे विश्व के देशों को मिला कर देखें तो सबसे अधिक सहिष्णुता अगर कहीं है तो वो सिर्फ भारत में ही है। देश का गृहमंत्री होने के नाते मैं अपनी तरफ से न केवल अपनी तरफ से बल्कि, अपने प्रधानमंत्री की तरफ से हम इस देश को विश्वास दिलाना चाहते हैं कि यहां की सामाजिक और धार्मिक समरसता को बिगाडऩे की कोई कोशिश करेगा तो उसकी खैर नहीं है। विश्व के दूसरे देशों को देखिये सऊदी अरब, पाकिस्तान जैसे मित्र देश शून्नी प्रधान देश हैं, वहां के शियाओं और अहमदियों की हालत दोयम दर्जे के लोगों से भी बदतर है। उसी तरह इराक, ईरान, बहरीन जैसे शिया बहुल मुल्कों में ऐसा ही सलूक शुन्नी मुसलमानों के साथ हो रहा है। यहां तक कि शुन्नी मुसलमानों के भीतर भी अरबों और कुर्दों के बीच भी भीषण टकराव होते ही रहते हैं। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं, कि तमाम इस्लामी राज्य एक ही मजहब के भीतर अलग-अलग पहचानों के नाम पर आपस में बुरी तरह से टकराते रहते हैं। जिसकी परिणति भंयकर नरसंहार और रक्तपात के रूप में होती है। इसके विपरीत भारत में चाहे मुस्लिम हो या ईसाई हो सभी अपनी तमाम शाखाओं के साथ खुली हवा में फलते-फूलते आ रहे हैं। यहां सूफी इस्लाम भी सलामत है, तो अहले सुन्नत भी आबाद है, देवबंदी है, तो वहाबी भी, बरेलबी तो सलाफी भी है। देवबंदियों और बरेलबियों के बीच के संबंध तो जगजाहिर हैं। लेकिन दोनों ही पूरी तरह से अपनी-अपनी मिन्नतों को अंजाम देने का काम कर रहे हैं। ये काम वो भारत में ही कर रहे हैं।

भारतीय संस्कृति का कैनवास बहुत ही बड़ा है, उसमें हर प्रकार के रंग हैं और हर प्रकार के जीवन भी। यह देश सदियों से सहिष्णुता, सहयोग और अहिंसा के लिये जाना जाता है और जाना जाता रहेगा। मुट्ठी भर लोगों के बनावटी प्रचार से हमारी छवि पर कालिख नहीं पुतेगी। सम्मान लौटाने की बनावटी मुहिम ये बताती है कि देश में नफरत कौन फैला रहा है, घृणा कौन फैला रहा है? अपार जनसमर्थन से चुनी हुई सरकार के प्रति नफरत कौन लोग फैला रहे हैं? हमें पहले इस असहिष्णुता से मुक्ती पानी होगी। असहिष्णुता भारत की परंपरा में कहीं भी मौजूद नहीं है। समाज में असहिष्णुता बढ़ी है, जब हम मूल भारतीय विचारों को छोड़ कर ऐसे विचारों को अपने जीवन का आदर्श बना लेते हैं। तो ऐसे लोग असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं। मैं ये भी कहना चाहूंगा कि कुछ लोगों को लगता है कि आज बोलने की कोई स्वतंत्रता या आजादी नहीं है। याद दिलाना चाहता हूं कि अभी पिछले महीने ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े एक विद्वान अब्दुल रहीम कुरैशी ने अपनी किताब में यहां तक कह दिया कि भगवान राम पाकिस्तान में पैदा हुए थे। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़ा व्यक्ति अगर भगवान राम के बारे में धार्मिक मान्यताओं पर आघात करने वाली टिप्पणी कर दे और उसके बाद भी भारत में किसी तरह की कोई प्रक्रिया नहीं होती है तो ये हमारे देश की सहिष्णुता है। किसी विद्वान को जो भी उचित लगा वही बोल दिया, इससे मान्यताएं नहीं बदल जाती हैं। इसके बाद भी अगर किसी को लगता है कि देश में सहिष्णुता नहीं है तो इससे ज्यादा आश्चर्य की बात कुछ और नहीं होगी।

26-12-2015

मैं इसे आश्चर्य और संदेह की बात इसलिए कहता हूं, क्योंकि सहिष्णुता किसी विशेष संदर्भ में देखने का सारा प्रकरण उत्तर प्रदेश के दादरी में जो घटना देखने को मिली वहां से प्रारंभ हुआ। दादरी घटना की जैसे ही जानकारी प्राप्त हुई मैंने गृह मंत्रालय से एक एडवायजरी जारी की। साथ-ही-साथ इस संबंध में मैंने उनसे एक रिपोर्ट भी मांगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने जो उत्तर दिया उसमें कहीं भी संप्रदायिकता का जिक्र नहीं है, गोमांस का कोई जिक्र नहीं है, न ही सुनियोजित हत्या का ही कोई जिक्र है। मैं तो राज्य के द्वारा जो तथ्य उपलब्ध कराये जायेंगे उसी के आधार पर बोलूंगा और उन्हीं तथ्यों को मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। उत्तर प्रदेश की सरकार अपनी प्रारंभिक जांच में किसी निश्चित नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। केन्द्र को या सीबीआई को सूचित करने की आवश्यकता उत्तर प्रदेश सरकार ने नहीं समझी। मैं तैयार बैठा था कि यदि उत्तर प्रदेश सरकार दादरी कांड की सीबीआई जांच करने के लिए अपनी अनुशंसा भेजे तो तुरंत केन्द्र सरकार उसकी जांच कराने के लिए तैयार है। ताकि दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाये। हां उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ मंत्री उस चीज को जिसे खुद उनकी सरकार खुद सांप्रदायिक तय नहीं कर पा रही थी। सांप्रदायिकता के आधार पर ही यूनाईटेड नेशन ले जाने की बात कर रहे थे।


हिन्दुत्व का दर्शन


जो लोग हिन्दू और हिन्दुत्व को जानते नहीं हैं वे सवाल उठाते हैं। अब देखिये हिन्दुत्व की फिलॉसफीक्या है। ‘एकम सत्य विप्रा बहुधा वदन्ति’ यानी सत्य एक है उसे जानने और जताने के रास्ते अलग हो सकते हैं। दुनिया में अकेला हिन्दू धर्म ऐसा कहता है कि ईश्वर एक है (गॉड इज वन) कभी हिन्दू ये नहीं कहता कि ये मुसलमान का भगवान है या ईसाई का भगवान है या सिक्ख का भगवान है। वो कहता है कि ईश्वर एक है। वो कहता है भक्त जैसा, वैसा भगवान। अगर भक्त पहलवान है तो भगवान हनुमान है। जहां पर ये फिलॉसफी हो, वहां पर ये सवाल उठने का कारण ये होता है कि हिन्दुत्व को हम समझे नहीं हैं। देखिये इजराइल की एक ऑफिशियल बुक है। उसमें ये कहा है कि कोई ये न समझे कि जर्मनी ने केवल हम पर अत्याचार किया थे, 2500 साल में हम दुनिया में जहां-जहां गये हर जाति ने किसी-न-किसी मौके पर हम पर जुल्म ही किया था। लेकिन अगर कोई दुनिया में अपवाद था तो वो अकेला हिन्दुस्तान था, जहां पर हमें 2500 साल के इतिहास में कोई तकलीफ नहीं हुई। हम पर किसी तरह का कोई अत्याचार नहीं हुआ। हिन्दुस्तान ऐसा देश है। यहां पर जब पारसी आये तब गुजरात के किनारे पर राजा बसते थे। उन्होंने उनसे प्रार्थना कि की हम जो अग्नि लाये हैं अपने साथ उसके 50 किलोमीटर के दायरे में कोई गैर-ईरानी नहीं आना चाहिए। यानी राजा हिन्दू, व्यवस्था हिन्दू, और उन्होंने मांग की गैर-हिन्दू की। यहां का हिन्दू ऐसा है कि उसने कहा कि आप चिन्ता मत कीजिए, हम ऐसी व्यवस्था करेंगे कि आपकी व्यवस्था भंग ना हो और आपकी परंपरा बनी रहे और उनका आदर हो। आज जो दुनिया आतंकवाद के खतरे में आई है। जो इमोशनल ब्लैकमेलिंग हो रहा है उसमें धर्म का काफी उपयोग हो रहा है। उसका कारण है कि तेरे संप्रदाय से मेरा संप्रदाय ऊंचा है। जब ये भाव पैदा होता है तब विवाद पैदा होता है और ये विवाद आतंकवाद तक की सीमा तक पहुंच जाता है। हिन्दू सर्वसमावेशक हैं जो कहता है कि आप जिस भगवान को मानते हैं विश्वास से मानिये आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी। आप जिस ग्रंथ को मानते हैं उसे विश्वास से मानिये आप को परमात्मा मिलेंगे। ये मूलत: हिन्दू फिलॉसफी है। अगर कोई इसे नहीं समझता है और हिन्दुत्व पर ही सवाल खड़े कर देता है तो मैं समझता हूं कि समस्या पैदा होगी ही।

नरेन्द्र मोदी

(यह लेख नरेन्द्र मोदी के हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशीप समिट में एक सवाल के उत्तर पर आधारित है)


नरेन्द्र दाभोलकर हत्या कांड की यहां पर चर्चा हुई है। मैं इस संबंध में कहना चाहूंगा कि हत्या पुणे में 20 अगस्त 2013 में हुई थी इस केस की जांच सीबीआई कर रही है ये घटना हम लोगों के कार्यकाल में नहीं घटी है पहले की है। मैं गोविन्द पंसारे के बारे में बोलना चाहूंगा। कोल्हापुर में 16 फरवरी 2015 को इन पर हमला हुआ था और 20 फरवरी को उनका देहांत हो गया था। महाराष्ट्र सीआईडी की एसआईटी स्पेशल टीम ने शक के आधार पर सनातन संस्था के समीर गायकवाड़ को इस मामले में गिरफ्तार किया था। जहां तक कलबुर्गी की हत्या की बात करें तो इस मामले की जांच स्टेट सीआईडी कर रही है। मैं जानता हूं कि कर्नाटक सरकार सच में ये चाहती है कि इस केस की जांच केन्द्र के द्वारा की जाये। वहां की राज्य सरकार की अगर सच में अनुशंसा आती है, तो मैं सीबीआई द्वारा इसकी जांच करवाऊंगा। सनातन संस्था को टैरेरिस्ट ऑर्गेनाइजेशन करार करने देने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में पीआईएल नम्बर 141 , 2011 में दाखिल की गई है। 2013 में संभवत: जो सरकार थी उसने एक एफिडेविट फाइल किया है, जिसमें है कि इसमें इतने तथ्य मौजूद नहीं है कि इसे टैरेरिस्ट ऑर्गेनाइजेशन घोषित किया जाये। मैं इन तथ्यों की जानकारी दे रहा हूं। हाई कोर्ट ऑफ बॉम्बे में एम.एच.ए. ने 12 अप्रैल 2013 को अपने एफिडेविट में ये कहा है कि भारत सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि 2013 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गये तथ्य सनातन संस्था को आतंकी संगठन घोषित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अब मैं आता हूं दादरी कांड पर, जिसमें अखलाक की हत्या हुई है। उस संबंध में अखलाक के भाई के बेटे हैं सरताज उन्होंने कहा- मैं सरताज, स्वर्गीय अखलाक अहमद, तहसील दादरी, गौतमबुद्ध नगर निवासी, मैं आपका तहे दिल से आभार व्यक्त करना चाहता हूं। ये कैलाश अस्पताल के डॉ. महेश शर्मा के अस्पताल के मुख्य प्रबंधक को लिखा है। आप और आपका समस्त स्टाफ खासतौर से डॉ. वरूण भार्गव और डॉ. बी.एम मंजू ने जिस तत्परता, निष्ठा और ईमानदारी से मेरे भाई दानिश खान का ऑपरेशन किया है और इस ऑपरेशन में अस्पताल में उपलब्ध उच्चतम तकनीक का भी भरपूर योगदान रहा है, इसके लिए मैं आपका, आपके स्टाफ, नर्सों का, गार्डों का और अन्य सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। सभी के सामूहिक प्रयास से मेरे भाई को एक नया जीवन दान में मिला है। जिसके लिये मैं हमेशा कैलाश अस्पताल का ऋणि रहूंगा।

26-12-2015

जहां तक वी. के. सिंह या कुछ बयानों का संबंध है और ये कहा जाता है कि प्रधानमंत्री ने क्यों चुप्पी साधी है तो मैं ऐसे सवाल उठाने वाले लोगों से पूछना चाहूंगा कि जब भी इससे पहले कोई घटना हुई है तो इस देश के प्रधानमंत्री ने हमेशा ही कोई प्रतिक्रिया दी है। प्रधानमंत्री ने मुझे गृहमंत्री की जिम्मेदारी दी है। अंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी, अगर किसी मंत्रालय की है तो वह गृह मंत्रालय की होती है। जब भी कोई वारदात या ऐसी घटना होती है, जिससे सामाजिक समरसता पर कोई आंच आती है तो गृह मंत्रालय की ओर से जो भी संभव होता है वह कार्यवाही मैं करता हूं। जहां तक अपने कुछ नेताओं के स्टेटमेंट का सवाल है तो दिल्ली में ही नहीं, हिन्दुस्तान के समस्त समाचार पत्रों की मेन हेडलाईन थी। और जो बयान मैंने दिया था तो कुछ लोगों के जवाबी बयान आ गये थे कि मुझे स्टेटमेंट संभल कर देना चाहिए। सोच-समझ कर हमको बोलना चाहिए। अगर कोई ये कहता है कि हमारे स्टेटमेंट की गलत व्याख्या की जा रही है तो मैं समझता हूं कि स्टेटमेंट देते समय सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि उसकी गलत व्याख्या करने की कोई गुंजाईश ही न बचे। ये मैंने दो टूक अपने शब्दों में कहा। अब हमारा प्रतिपक्ष क्या चाहता है? क्या करें हम, जहां तक वी.के. सिंह का सवाल है तो वी.के. सिंह से खुद मेरी बात हुई। वी.के. सिंह जी ने स्वयं प्रेस में जाकर कहा कि हमारे स्टेटमेंट को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने अपना जवाब दे दिया है। उसके बाद भी बार-बार ये कहना कि उन्होंने ऐसे अपशब्दों का प्रयोग किया, ये बोला, वो बोला तो मैं समझता हूं कि ये न तो एक सरकार के साथ न्याय है और न ही ये देश के साथ न्याय है। एक घटना का मैं और यहां उल्लेख करना चाहूंगा। कुछ साल पहले केरल के एक प्रोफेसर डी.एस. जोसेफ का हाथ काट दिया गया था, इस आरोप में कि उन्होंने किसी मजहब के बारे में अपत्तिजनक प्रश्न पूछ लिया था। परन्तु कुछ ऐसे साहित्यकार जो अपनी पुस्तकों में यह लिखें कि मूतिर्यों पर… मैं उस शब्द का प्रयोग नहीं करूंगा। मैं समझता हूं उसका कोई खंडन न करे इतना ही कहना चाहूंगा कि ये कबीर का देश है। अलोचना सुनने की सहिष्णुता क्या थी ये हमारी पुरानी परंपरा से सिखना चाहिए।

संत कबीर का एक उदाहरण है, उन्होंने हिंदू मान्यता पर कटाक्ष किया तो मुस्लिम समाज पर भी उन्होंने कटाक्ष किय। पाथर पूजे हर मिले तो मैं पूजूं पहाड़, आटे की चाकी भली पीस खाये संसार। तो वहीं उन्होंने मुस्लिम समाज के लिए भी कहा है कि कांकड़ पाथर जोड़ कर मस्जिद दियो बनाये, ता चढ़ मुल्ला बांग दे का बहरा भयो खुदाय। अंत में कबीर ने कहा कि हिंदू मोहे राम कहे, मुसलमान कहे खुदाय कहे कबीर एक जीवता दुएमये कहे न जाये। उस कबीर को हम अपना पूज्य मानते हैं, संत मानते हैं। हम असहिष्णु कैसे हो सकते हैं? फिर भी हमारी सहिष्णुता पर लगातार प्रश्न चिन्ह लगाने की ये कोशिश की जाती है। मैं एक और उदाहरण देना चाहता हूं 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर शहनाई बजाने वाले बिस्मिल्लाह खान का हुनर बनारस के मन्दिरों से और धार्मिक स्थलों से प्रारंभ हुआ। अपने अंतिम समय में भी वह भारत सरकार के तमाम आग्रहों को ठुकरा कर प्राण त्यागने की इच्छा व्यक्त की थी, तो उन्होंने यही कहा था कि वह अपने प्राण भारत की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में ही त्यागेंगे। ये है भारत की परंपरा। आज भी कोई शास्त्रीय गायक जब शुरूआत करता है, तो सरस्वती वंदना से ही शुरूआत करता हैं। इससे पता चलता है कि सहिष्णुता कितनी रची-बसी है हम भारतीयों में। एक पक्ष को निर्विरोध आलोचना करने की छूट और दूसरे पक्ष के लिए गतिरोध ये कहां का इंसाफ है? यदि हम इस भाव से मुक्त होकर सभी पक्षों को समान भाव दें आलोचना का और विरोध के हर स्वर को हम स्वस्थ्य भाव से स्वीकारें, तभी हम सही मामले में सहिष्णु कहे जायेंगे।

देश फैसला करेगा कि कौन सहिष्णु है और कौन असहिष्णु है। अब असहिष्णुता के दूसरे पक्ष की ओर भी मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। केन्द्र में मोदीजी की सरकार आने के बाद ये आरोप लगाया जा रहा है कि देश में असहिष्णुता बढ़ी है। हां मैं मानता हूं हमारी सरकार में असहिष्णुता बढ़ी है। अब हम भ्रष्टाचार पर सहिष्णु नहीं है। आतंकवाद पर हम सहिष्णु नहीं है। गरीब और गरीबी पर हम सहिष्णु नहीं है। हम गंदगी के लिए भी सहिष्णु नहीं है। अब हम बेटियों के साथ होने वाले दोहरे व्यवहार के लिए बिल्कुल असहिष्णु हैं। हमारी जन-धन योजना बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और स्वच्छ भारत अभियान आदि इन्हीं दुर्गुणों के परिणाम के प्रति हमारी असहिष्णुता है। जहां तक हमारी सरकार का प्रश्न है तो मैं अपनी सरकार की तरफ से आश्वस्त करना चाहता हूं कि सभी राजनैतिक दलों को भी सभी कलाकारों को भी और सभी बुद्धिजीवियों को भी की किसी भी सूरत में हम देश में असहिष्णुता पैदा नहीं होने देंगे। उसे रोकने के लिए जो भी प्रयत्न होगा वो हम करेंगे।

      राजनाथ सिंह          

(यह लेख राजनाथ सिंह के लोकसभा में दिये बयान पर आधारित है)      

 

 

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