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अब धीरे-धीरे और भी निकल रहे हैं मांद से बाहर

अब धीरे-धीरे और भी निकल रहे हैं मांद से बाहर

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में कभी अध्यापक रहे इरफान हबीब बहुत गुस्से में हैं। उनका कहना है कि भारत के लोग आजकल बहुत असहनशील हो गये हैं। ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि सरकार भी कुछ नहीं कर रही। वह भी इन्हीं लोगों के साथ मिली हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक चुप्पी साध गये हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो इस्लामिक स्टेट की माफिक ही कार्य कर रहा है। उन्हीं के एक दूसरे मित्र आजम खान हैं। उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री हैं। वे इस हालत में हाथ पर हाथ धरे नहीं रह सकते। वे कोई लेखक टाइप के कलमघिस्सु तो हैं नहीं, जो अपना पुरस्कार लौटाने की अखबारी घोषणा कर चुप हो जाएंगे। उनका मानना है कि अब हिन्दुस्तान में मुसलमानों का रहना ही मुश्किल हो गया है। इसलिए वे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्टियां लिख रहे हैं कि आप हमारी रक्षा कीजिए। वे यह चिट्टी-पत्री उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कर रहे हैं या व्यक्तिगत तौर पर, इसका खुलासा होना बाकी है।

उधर कामरेडों का अपना कष्ट है। उनकी समस्या है तो इस सहनशीलता को लेकर ही, लेकिन उनका कष्ट थोड़ा अलग प्रकार का है। कामरेडों की यही खूबी है। उनका कष्ट इस देश के लोगों के कष्ट से सदा हट कर होता है। उनका कहना है कि उन्हें बीफ मतलब गौमांस खाने की सार्वजनिक सुविधा नहीं मिल रही है। लोग पकड़ लेते हैं। सरकार कुछ नहीं करती। इतनी असहनशीलता बर्दाश्त नहीं हो सकती। कोलकाता में अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिये तो कामरेडों ने सड़क पर खड़े होकर बाकायदा बीफ पार्टी की। उसमें कोलकाता के पूर्व मेयर भी शामिल हुए। जाहिर है कि कामरेडों के लिये इस देश में आज सबसे बड़ी समस्या गोमांस खाने की सुविधा का न होना है। इसलिए इस समस्या को हल करवाने के लिये वे सड़कों पर उतर चुके हैं। सदा की भांति उन्होंने अपना यह आन्दोलन कोलकाता से ही शुरु किया है। लेकिन, इस देश के लोग कामरेडों द्वारा छेड़े गये इस लोकयुद्ध की महत्ता समझ नहीं रहे और असहनशील हो रहे हैं।

यही चिन्ता सोनिया गांधी को भी सता रही है। उन्हें भी लगता है कि भारत के लोग अब सहिष्णु नहीं रहे। वे असहनशील हो गये हैं और सरकार ने इस पर चुप्पी साध रखी है। जब वे इस देश में आई थीं तब तो सब कुछ ठीक था। फिर उनके पति ही देश के प्रधानमंत्री बन गये, इसलिये उस समय किसी के भी असहनशील होने का प्रश्न नहीं था। बाद में तो इस देश के लोगों की सहनशीलता इतनी बढ़ी की उन्होंने परोक्ष रुप से दुनिया के सबसे पुराने देश की बागडोर ही सोनिया गांधी के हाथों में सौंप दी। वह इस देश के लोगों की सहनशीलता का स्वर्णयुग था। लेकिन, अब नरेन्द्र मोदी के आने से हालत बदल गये हैं। सरकार से लेकर इस देश का आम आदमी तक सब असहनशील हो गये हैं। उनको लगता है मोदी ने ही लोगों को असहनशील बनाया है और वे स्वयं भी इस देश के लोगों के साथ मिल गये हैं, तभी तो उनकी असहनशीलता पर चुप्पी धारण किये हुए हैं। इसकी शिकायत करने के लिये वे भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तक पहुंच गई। वैसे तो सोनिया गांधी की शिकायत सही है। एक वक्त था कि भारत के लोग सोनियाजी की कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचा देते थे, लेकिन देखते ही देखते वे कांग्रेस के प्रति इतने असहनशील हो गये कि पार्टी को लोकसभा में 45 सीटों तक पहुंचा दिया। उन्हें गुस्सा तो आएगा ही कि आखिर भारत के लोग उनके प्रति इतने असहिष्णु कैसे हो गये। वे भी इस देश में अब इतने अरसे से रह रहीं हैं, इसलिये कुछ न कुछ तो यहां के लोगों को जानने बूझने लगीं हैं। उन्हें लगता है कि नरेन्द्र मोदी ने ही इस देश के लोगों को गुमराह किया है, जिसके कारण वे कांग्रेस से इतने असहिष्णु हो गए कि उसे 45 पर लाकर पटक दिया। पहले तो सोनियाजी ने इस देश के लोगों को ही समझाने की कोशिश की, कि उनकी कांग्रेस के प्रति इतनी असहनशीलता ठीक नहीं है। लेकिन जब से मोदी आये हैं कोई सोनियाजी की बात समझने की तो दूर, सुनने तक को तैयार नहीं है। वे जगह-जगह अपने बेटे को भेजती हैं। लेकिन, लोगों का समझना तो दूर मुफ्त में जगहंसाई अलग से हो रही है। दिल्ली में लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया तो आशा बंधी थी कि सोनियाजी की कांग्रेस को लेकर लोग अब तक सहनशील हो गए होंगे। लेकिन, उन्होंने केजरीवाल तक को दिल्ली की कुंजी दे दी, कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ कर दिया। अब जब इस देश की जनता से कोई आशा नहीं बची तो उनका राष्ट्रपति के पास जाकर शिकायत करना बनता ही था।

उधर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे इरफान हबीब अपना इतिहास गा-गाकर सुना रहे हैं। अखबारों में आया है कि उन्हें मिला कर पचास बुद्धिजीवियों ने, जिनमें कॉलेजों, विश्वविद्यालयों से रिटायर हो चुके अध्यापकों के अतिरिक्त भी कुछ लोग थे, इस बात को लेकर शोक प्रस्ताव पास किया है कि देश में असहिष्णुता बहुत बढ़ गई है और इसके लिये मोदी की सरकार जिम्मेदार है। वैसे इरफान हबीब और उसके कुछ साथी आज से नहीं लम्बे अरसे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अपना शोक प्रस्ताव पास करते रहते हैं। उन पर हस्ताक्षर करने वाले पचास लोग भी पक्के हैं। मोटे तौर पर ध्यान रखा जाता है कि इन शोक सभाओं में रिटायर होने के बाद ही शामिल हुआ जाये, उससे प्रतिबद्धता भी बनी रहती है और कोई खतरा भी नहीं उठाना पड़ता। मैंने इन पचास इतिहासकारों के हस्ताक्षर वाली रसीद देखी तो नहीं है, लेकिन मुझे शक है कि उसमें कहीं गलती से हिमाचल प्रदेश के विमल चन्द्र सूद का नाम भी शामिल न कर लिया गया हो। सूद साहेब को गुजरे कुछ साल हो गये हैं। लेकिन, इस प्रकार के शोक प्रस्तावों में हिस्सा लेने वालों में वे भी हबीब साहेब के पुराने और आजमाये हुए साथी थे। जब किसी ग्रुप ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ प्रस्ताव पास करने के लिये स्थायी सूची छपवा रखी हो तो कई बार संसार छोड़ चुके किसी व्यक्ति का नाम गलती से कटने से रह जाता है। इसलिये मेरा डर है कि इन्होंने विमल चन्द्र सूद का नाम अभी तक न काटा हो। (लोक युद्ध के सेनापति कृपया चेक कर लें) बाकी इतिहास विभाग के पुराने अध्यापकों में रोमिला थापर तो हैं हीं। उन्होंने भी बिना संस्कृत जाने वेदों का काफी गहराई से अध्ययन कर लिया है। इन पुराने इतिहासकारों को भी अब लोगों की असहनशीलता चुभने लगी है। वे दिन कितने भले थे जब ये अध्यापक इतिहास को लेकर अपनी क्लास में जो भी पढ़ाते थें उसे छात्र चुपचाप सुन और मान भी लेते थें। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी ने तो इस देश में इतिहास का एक ऐसा अध्याय लिख दिया, जिसने देश को ही बांट दिया, लेकिन यहां के छात्रों ने उस समय जो इतिहास अध्यापकों ने बताया उसे ही इलाही वाणी मान लिया। लेकिन, इरफान हबीब और रोमिला थापर को दुख है कि अब लोग उनके बताये इतिहास को आंखें बंद करके नहीं सुनते, बल्कि उनसे प्रश्न करने लगे हैं। रिटायर अध्यापक का यही सबसे बड़ा दुख होता है। क्लास में छात्र को तो डांट कर चुप करवाया जा सकता है, लेकिन अब इन बाहर बालों ने अपने प्रश्नों से घेर रखा है, उसका क्या किया जाए? कम्युनिस्टों में भी और सामी सम्प्रदायों में भी प्रश्न पूछने वाले को ही काफिर मान लिया जाता है। काफिर को जो दंड दिया जा सकता है, उसे इरफान हबीब तो जानते ही होंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतिहास को लेकर हबीब एंड कम्पनी से प्रश्न पूछ रहा है। औरंगजेब का जमाना होता तो इरफान भाई संघ को इस जुर्म में फांसी पर लटका देते। लेकिन, इस युग में तो यह संभव नहीं है। इसलिये इरफान भाई संघ को इतनी बड़ी गाली दे रहे हैं जो फांसी से भी भारी हो। प्रश्न का उत्तर देने की बजाए प्रश्न पूछने वाले के लिये ही गाली निकाली जाये। इरफान हबीब की यह टोली यही काम कर रही है। उनकी टोली का कष्ट भी यही है कि उनके लिखे और पढ़े को तर्क से चुनौती दी जा रही है। इस देश के लोग जब प्रश्न पूछना शुरु करते हैं तो इरफान हबीब से लेकर अशोक वाजपेयी तक सब भागते हैं। हबीब अब वही भाषा बोलना शुरु कर रहे हैं जो कभी जिन्ना बोला करते थे। जिन्ना की मुस्लिम लीग भी सबसे ज्यादा गाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देती थी। उनको लगता था कि यदि उनके रास्ते में कोई बाधा है तो वह संघ ही है। अब इरफान हबीब और उनके साथी भी सबसे ज्यादा गालियां संघ को ही दे रहे हैं। इरफान हबीब का कहना है कि संघ तो इस्लामिक स्टेट ऑफ इराकएंड सीरिया से भी खतरनाक है। यानि वे विश्व को संकेत दे रहे हैं कि आप लोग आई.एस.आई.एस के ठिकानों पर तो बेकार में ही बमबारी कर रहे हो। उसको छोड़ो, इधर हिन्दुस्तान का रुख करो और संघ को पकड़ो, वही दुनिया के लिये खतरा है। आई.एस.आई.एस की मदद करने का यह नायाब तरीका इरफान हबीब ही निकाल सकते थे। आखिर अलीगढ़ इतिहास के घुटे हुए इतिहासकार हैं। यह काम तो शायद रोमिला थापर भी नहीं कर सकती थीं। कहा भी गया है, जिसका काम उसी को साजे। इरफान भाई मानते हैं कि असहिष्णुता पहले भी थी, लेकिन तब राज कांग्रेस का था। इसलिये चिन्ता करने की जरुरत नहीं थी। अब सबसे बड़ा कष्ट यह है कि राज, संघ के लोगों का है। अलीगढ़ ब्रिगेड का कष्ट ही यह है कि देश की राजनीति के केन्द्र में राष्ट्रवादी शक्तियां क्यों आ गई हैं? वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति, भारतेन्दु तो अरसा पहले यह लिख गये हैं। धीर-धीरे और भी निकल रहे हैं मांद से बाहर।

26-12-2015

सर्कस के मालिक जब किसी नगर में सर्कस लेकर आते हैं तो उन्हें हैरान कर देने वाले कारनामे दिखाने के लिये मनोवैज्ञानिक तरीके से एक सधी हुई समय सारणी तैयार की होती है। कारण यह कि वे जानते हैं कि उन्हें लम्बे समय तक दर्शकों को बिठाये और बांधे रखना है। इसलिए वे एक शो के बाद दूसरे शो तक अन्तराल भी देते हैं। लगता है जिन सूत्रधारों ने भारत में असहिष्णुता को लेकर बहस चलाई है, उन्होंने भी अपनी रणनीति और उद्देश्य की पूर्ति के लिये इस बहस के लिये एक निश्चित समय सारणी बना रखी है और उसी के अनुसार बहुत ही चालाकी से एक के बाद एक एपिसोड दिखाया जा रहा है। अभी हाल ही में असहिष्णुता को लेकर चल रहे धारावाहिक में नया एपिसोड दिखाया जा रहा है, जिसमें नायक के तौर पर आमिर खान को लिया गया है। वैसे तो आमिर खान बड़े पर्दे के जीव हैं, लेकिन जब से बुद्धू बक्से ने रफ्तार पकड़ी है तब से बड़े पर्दे वाले भी इस बुद्धू बक्से में दिखाई देने लगे हैं और अब तो असहिष्णुता जैसे प्रायोजित धारावाहिकों में भी नजर आ रहे हैं।

आमिर खान ने असहिष्णुता के इस धारावाहिक में भाग लेने का निर्णय तो कर लिया और अपने संवाद भी बहुत अच्छे ढंग से कहें। भारत में अपने बच्चों के भविष्य को लेकर उनकी चिन्ता श्रोताओं को भावुक कर सकती है। बच्चों को बीच में लाने से ज्यादा प्रभाव उत्पन्न होता है। फिल्मों में नाटक इत्यादि करने वाले लोग आजकल जब अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिन्ता व्यक्त करते हैं तो दर्शक थोड़ा पिघलता है। क्योंकि, सुनील दत्त के परिवार में संजय दत्त ने जो किया और उसके बाद उसे जो भुगतना पड़ा, उससे फिल्म जगत में बच्चों के भविष्य को लेकर चिन्ता ज्यादा होने लगी है। आज भी लोग कहते ही हैं कि यदि सुनील दत्त ने शुरु से ही अपने बच्चों पर ध्यान दिया होता और उनके भविष्य की चिन्ता की होती तो संजय दत्त को यह दिन नहीं देखना पड़ता। इसमें मजहब की कोई बात नहीं है। बच्चों के भविष्य का मसला है।

लेकिन, आमिर खान ने अपने बच्चों के भविष्य को बहाना बना कर बहुत ही चतुराई से मजहब को बीच में लाकर खड़ा कर दिया है। वे यह संकेत करना चाह रहे हैं कि इस देश में मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित नहीं है। भाव कुछ इस प्रकार का है कि हमारी तो जैसे-तैसे कट जाएगी, लेकिन आप का क्या होगा जनाब-ए-आली? हमारे बच्चों का इस देश में क्या भविष्य होगा? इसका उत्तर भी उन्होंने खुद ही सुझाया है। उनका कहना है कि क्या किसी और देश में चला जाये? ऐसा देश जिस में मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित हो। उसके आगे वे चुप हो गए किसी देश का नाम नहीं सुझाया। शायद जल्दी में कोई देश ध्यान में आ नहीं आया होगा। लेकिन, आमिर खान ने इन संवादों में एक गलती कर दी। उन्होंने इस पूरे दृश्य में अपनी पत्नी किरण राव को ढाल के तौर पर प्रयोग किया। ये सारी बातें वे खुद भी कह सकते थे। तब किरण राव को बीच में लाने की जरुरत आखिर क्यों पडी? शायद इसलिए कि फिल्म या धारावाहिक बिना स्त्री पात्र के ज्यादा प्रभाव नहीं दे पाता। बच्चों के भविष्य की बात करनी होगी तो मां को बीच में लाना ही पड़ेगा, क्योंकि मां बच्चों को लेकर ज्यादा चिंतत रहती है। इसका एक और संकेत भी हो सकता है कि अब तो हिन्दू भी यह मानने लगे हैं कि इस देश में मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित नहीं है। बड़ी रणनीति में बहुत कुछ संकेतों और प्रतीकों के माध्यमों से भी सम्प्रेषित किया जाता है।

लेकिन, आमिर खान का असहिष्णुता को लेकर यह एपिसोड यहीं खत्म नहीं हुआ, हो भी नहीं सकता था। आजकल नाटकों की एक नई विधा विकसित हो रही है। जो रंगमंच पर पात्र अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं, वे तो संवाद बोलते ही हैं, लेकिन कुछ पात्र मंच के सामने आम दर्शकों में भी बिठाए गए होते हैं। वे ठीक वक्त आने पर अपने संवाद नीचे से ही बोलते हैं। जब आमिर खान अपनी पत्नी को उद्धृत करते हुए अपने संवाद बोल चुके तब नीचे से राहुल गांधी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने चिल्ला कर कहा, आमिर खान ठीक बात बोलते हैं। बच्चों के भविष्य की बात आये और सोनिया परिवार न बोले, यह तो हो ही नहीं सकता। जब इन्दिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं थीं तब भी सोनियाजी को अपने बच्चों के भविष्य की बहुत चिन्ता होने लगी थी। कहा जाता है वे भी देश से चले जाने का विचार कर रही थीं। वे तो फिर भी इटली अपने मायके जा सकती थीं, लेकिन आमिर खान बेचारे? इसलिए राहुल गांधी का इस संकट काल में आमिर खान का समर्थन करना लाजिमी था। वैसे भी इस बात का खुलासा बहुत पहले हो ही चुका है कि राहुल भारत को खतरा लश्कर-ए-तैय्यबा से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मानते हैं।

26-12-2015इस पूरे नाटक में राहुल गांधी अपनी भूमिका निभा कर अभी बाहर हुए थे कि अपने हैदराबाद वाले असदुद्दीन ओवैसी भाई प्रकट हुए। तब दर्शकों को भी आभास होने लगा कि यह एपिसोड जिसमें प्रत्यक्ष तौर पर तो केवल आमिर खान ही दिखाई दे रहे थे, इतना छोटा नहीं है, जितना वे समझ बैठे थे। इसमें तो एक के बाद एक पात्र प्रकट होते जा रहे हैं और पूरी कडिय़ां जुड़ रही हैं। ओवैसी भाई ऑल इंडिया मजलिसे इत्तिहाद अल मुसलमीन के अध्यक्ष हैं। इससे पहले इनके अब्बूजान इसके सदर थे। उन्होंने आमिर खान के संवाद का पूरक हिस्सा गरज कर सुनाया कि भाग कर कहीं जाने की जरुरत नहीं है। यहीं लड़ कर अपने हक की लड़ाई लड़ेंगे। कहीं आमिर खान और ओवैसी मिलकर तो नहीं बोल रहे थे? पहला हिस्सा मैं बोलूंगा और दूसरा लड़ाई लडऩे वाला हिस्सा तुम बोलोगे। क्योंकि, ओवैसी ने जब भयंकर लड़ाई लडऩे का इरादा मजलिसे इत्तिहाद अल मुसलमीन की ओर से जाहिर कर दिया तो आमिर खान फिर रंगमंच पर प्रकट हुए। उन्होंने कहा, भारत छोड़ कर जाने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता, लेकिन हमारे भविष्य के बारे में मैंने जो कहा था, उसके एक-एक शब्द पर मैं कायम हूं। यानि आमिर खान और ओवैसी भाई के बयानों को तारतम्यता में पढ़ा जाये, तो रणनीति स्पष्ट होने लगती है। (यदि इसमें सोनिया की पार्टी के मल्लिकार्जुन खडग़े की इस धमकी को कि देश में रक्तपात हो जायेगा को फिलहाल छोड़ भी दिया जाए।)

अब इस रणनीति के अगले-पिछले हिस्से को भी जोड़ दिया जाये। अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक लम्बा आलेख पिछले दिनों प्रकाशित किया था कि हिन्दुस्तान पर एक प्रकार से हिन्दू तालिबान का राज्य स्थापित हो चुका है। लेख में इस बात पर चिन्ता प्रकट की गई थी कि हिन्दू तालिबान का कब्जा हो जाने के कारण हिन्दुस्तान की हालत कैसी हो जायेगी, इस पर चिन्ता प्रकट करनी चाहिये। यहां पर किसी खाली स्थान पर सोनियाजी के सुपुत्र राहुल की यह चिन्ता भी जोड़ी जा सकती है कि देश को खतरा लश्कर-ए-तैय्यबा की बजाय संघ से है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने उसी की हामी भरी है। लेकिन अब क्या किया जाये? देश छोड़ दिया जाये या बाहर से सहायता मांगी जाये? पहले प्रश्न का उत्तर ओवैसी ने दिया है और दूसरे का उत्तर आजम खान दे ही चुके हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्टी पहले ही लिख दी है कि आप आकर इस देश को बचाइए।

इस सारी स्थिति को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने भारत को हल्की सी चेतावनी दे ही दी है। यदि भारत मजहबी आधार पर बिखर नहीं जाता, तो तरक्की करेगा। भारत को असहिष्णुता से बचना चाहिये। यह वह अमेरिका कह रहा है जहां की पुलिस किसी मामूली से विषय को भी बहाना बना कर काले युवकों को दिनदिहाड़े बीच सड़क पर गोलियों से भून ही नहीं देती, बल्कि अपनी पीठ भी थपथपाती है। बंग्लादेश से निष्कासित होकर आईं तस्लीमा नसरीन ने वैसे तो इन सभी प्रश्नों का उचित उत्तर दे दिया है। लेकिन, प्रायोजित धारावाहिकों में काम करने वाले पात्रों को सूत्रधार की बनाई गई रणनीति पर चलना होता है। इन उत्तरों से उनका कुछ लेना देना नहीं होता। वे प्रश्न को उत्तर लेने के लिये नहीं उछालते बल्कि, उनका उद्देश्य शोर और धूल उड़ाना होता है। एक बार धारावाहिक में काम करने के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिया तो विकल्प समाप्त हो जाता है। लेकिन जैसा कि मैंने शुरु में ही लिखा है, निश्चित हुई समय सारणी के अनुसार अभी और भी हैरतअंगेज कारनामे दिखाये जाएंगे। उठिए मत दिल थाम कर बैठे रहिये।

पुराने जमाने में शेर का शिकार करने के लिये हांका लगाया जाता था। शेर को मारना आसान नहीं होता। इसलिए जरुरी है कि उसे उसके पथ से विचलित करके बाहर निकाला जाये। इतना शोर मचाया जाए और धूल उड़ायी जाये कि वह उस शोर और धूल के चक्रव्यूह में फंस जाए। इस काम के लिए शिकारी, लोगों को भाड़े पर ले लेते थे। उन्हें अनेक दिशाओं में खड़ा कर शोर मचाते हुए आगे बढऩे के लिए कहते थे। बहुत से लोग अनेक दिशाओं से शोर मचाते और धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ते थे। भयंकर कोलाहल करते थे। उस कोलाहल से घबराकर या अचंभित होकर शेर अपने स्थान से उठ खड़ा होता था। तब उसे घेर कर शिकारी लोग मार देते थे। शेर को मारने की यह पद्धति हांका कहलाती थी। शिकारी अच्छी तरह जानते थे कि सीधे हमले में वे शेर को नहीं मार सकते। इसलिए हांका पद्धति का चयन किया जाता था।

लगता है नरेन्द्र मोदी को घेरने के लिये सूत्रधारों ने उसी हांका पद्धति का प्रयोग किया है। हांका पद्धति की सफलता के लिये एक अनिवार्य शर्त यह है कि कोलाहल सुन कर शेर घबरा जाये और अपना स्थान छोड़ कर हांका लगाने वालों की ओर चल दे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो शेर को मारा नहीं जा सकता। लगता है भाजपा सरकार की विरोधी शक्तियां इसी हांका पद्धति से सरकार को घेरने की रणनीति पर चल रही हैं। प्रश्न केवल भाजपा या राष्ट्रवादी शक्तियों को केन्द्रित करने का नहीं है, बल्कि यह लड़ाई भारत की मूल अवधारणा को लेकर है। जिसे लोकसभा में नरेन्द्र मोदी ने आइडिया ऑफ इंडिया कहा है। भारत की मूल अवधारणा सर्वसमावेशी और सर्वपंथ समभाव की है। यह बहुलतावादी है। यह पराई पीर को अपनी पीर मानने वाली अवधारणा है। उपरी विभिन्नताओं के बावजूद समस्त भारत आतंरिक सूत्रों से एकरस है। इसका स्पष्ट जिक्र डॉ. अम्बेडकर ने किया है। भारत विभिन्नताओं का मिश्रण नहीं है, बल्कि वह उनका यौगिक है। भारत में चाहे सामी पंथों के लोग भी हैं, लेकिन वे बाहरी नहीं हैं। वे भी उसी पुरातन भारतीय विरासत का हिस्सा हैं। इसलिए मूलत: यहां मुसलमान का बाकी संप्रदायों से कोई मौलिक भेद नहीं है। यहां के मुसलमान अरब या तुर्की से नहीं आएं हैं।

लेकिन, इसके विपरीत भारत को लेकर दूसरी अवधारणा यूरोपीय अवधारणा है। उनके अनुसार भारत एक राष्ट्र है ही नहीं। यह विभिन्न राष्ट्रों का समूह है। यहां विभिन्न कालों में अलग-अलग स्थानों से आये हुए अलग- अलग समुदायों के लोग रहते हैं जो परस्पर विरोधी मजहबों में विश्वास रखते हैं। उनकी कोई सांझी विरासत नहीं है। मोटे तौर पर हिंदू और मुसलमान दो समुदाय तो एक दूसरे के विरोधी हैं हीं। यूरोपीय लोगों का कहना है कि इन लोगों को एक साथ अच्छे नागरिकों की तरह आपस में बिना लड़े-झगड़े रहना उन्होंने ही सिखाया। भारत की यह अवधारणा यूरोपीय अवधारणा है। 1857 को ब्रिटिश इंडिया में चालू की गई शिक्षा पद्धति ने शिक्षित भारतीयों के मानस में भारत की यूरोपीय अवधारणा को स्थापित करने का सफल-असफल प्रयास किया। असफल इसलिए कि इस शिक्षा पद्धति में से निकले कुछ लोगों ने इस अवधारणा को नकार दिया। उदाहरण के लिये महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानन्द को उद्धृत किया जा सकता है।

जाहिर है कि अब देश में जिन राष्ट्रवादी शक्तियों को लोगों ने सत्ता सौंप दी है, वे महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानन्द के भारत की सर्वसमावेशी अवधारणा को मानने वाले हैं। इसलिए उन विस्थापित लोगों को कष्ट होना स्वाभाविक ही था, जो भारत की यूरोपीय सामी अवधारणा को लेकर चले थे। इसलिए वे सभी मिल कर राष्ट्रवादी शक्तियों को परास्त करने के लिये हांका लगा रहे हैं। मिल कर इतना शोर और धूल उड़ा रहे हैं कि चारों ओर संभ्रम फैल जाये। लेकिन, इतना शोर और धूल तभी उठ सकेगा, जब दूसरे पक्ष को भी किसी तरह खींच कर इस शोर-शराबे में शामिल कर लिया जाए। दूसरे पक्ष के मैदान में निकले बिना इनका हांका कामयाब नहीं हो सकता। लेकिन दुर्भाग्य से कहीं-कहीं दूसरा पक्ष भी इनकी रणनीति का शिकार हो रहा है।

एक उदाहरण से बात और स्पष्ट हो जायेगी। कुछ दिन पहले कोलकाता में कुछ साम्यवादी मार्का लोगों ने बीच सड़क में बीफ पार्टी का आयोजन किया था। उसमें कोलकाता के पूर्व मेयर भी शामिल हुए थे। लोग गिनती के ही थे। यह एक प्रकार से हांका लगाया गया था। बीफ पार्टी के लोग जैसा चाहते थे, वैसा ही उनकी रणनीति के अनुसार सब कुछ हुआ। बीफ पार्टी के विरोध में दूसरे पक्ष की ओर से बयानबाजी शुरु हुई। अखबारों में तीन-तीन कॉलम की खबरें बनने लगीं। यही हांका लगाने वाले लोग चाहते थे। पहले मोर्चे पर वे जीत गये। बीफ पार्टी के दिन कुछ लोग नारे लगाते हुए विरोध दर्ज करवाने पहुंच गये। इसी की उन्हें प्रतीक्षा थी। संख्या दोनों ओर उतनी ही थी जितनी इस प्रकार की नौटंकी में हो सकती है। लेकिन, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को दिन भर का काम मिल गया। इस देश में असहिष्णुता की हद हो गई है। कोई आदमी क्या खायेगा, क्या इसका फैसला भी सरकार ही करेगी? यदि दूसरा पक्ष इस तमाशे को पूरी तरह नजरअंदाज ही कर देता तो हांका लगाने वाले अपनी रणनीति में पिट जाते। सभी जानते हैं कि कोलकाता की सड़क पर रोज तो बीफ पार्टी हो भी नहीं सकती। दो तीन दिन यह तमाशा करके पूर्व मेयर समेत सभी हांका लगाने वाले अपने-अपने घर में माछ का झोल खाने के लिए लौट जाते।

एक दूसरा उदाहरण मामले को और ज्यादा स्पष्ट कर देगा। पिछले दिनों ओडिशा की राजधानी में एक ऐसे सज्जन पहुंचे जिन्होंने पुरस्कार वापसी के शुरुआती दौर में अपनी भूमिका निभाई थी। उन्हें लगता था कि, उनके भुवनेश्वर में उदय होने से चारों ओर प्रकाश फैल जाएगा। लेकिन, जब लगा कि सुनने के लिये पचास-सौ लोग जुटाना भी पसीने छुड़ा रहा है, तो हांका पद्धति का उपयोग किया। अपने दो-तीन मित्र उस खेमे में भेजे, जिनके बारे में उन्हें विश्वास था कि मेरा नाम सुनते ही भड़क उठेंगे। रहस्यवादी स्वरों में बताया गया कि पुरस्कार वापसी धारावाहिक के एक प्रमुख पात्र इस देवनगरी में आये हैं, आपको काले झंडे दिखाकर अपनी राष्ट्रवादी चेतना को प्रकट करना चाहिए। राष्ट्रवादी चेतना वाले इस जाल में फंसने वाले ही थे कि उनमें से एक ने जो शेर को हांका लगा कर मारने की पद्धति जानता था, अपनी समन्वय बुद्धि लगा कर इस जाल में न फंसने की सलाह दी। दूसरे दिन पुरस्कार वापसी के इस नायक को किसी ने काले झंडे नहीं दिखाए। इसलिए बंद कमरे की इस बैठक की खबर समाचार पत्रों में एक कॉलम से आगे नहीं जा सकी। यदि दो-चार काले झंडे वहां दिखाई दे जाते तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये सारे दिन की खुराक तो बन ही जाती। ध्यान रखना चाहिए हांका की सफलता दूसरे पक्ष की भागीदारी पर निर्भर करती है। प्रश्न केवल इतना ही है कि राष्ट्रवादी शक्तियां क्या इस रणनीति में एक पक्ष बनने को तैयार है? उनका तैयार होना उन शक्तियों की सफलता मानी जायेगी, जो भारत की यूरोपीय अवधारणा को आगे बढ़ाना चाहती हैं।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

Влад Малийtranslate medical terminology

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