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मन, विवेक और सोच सकारात्मक हो

मन, विवेक और सोच सकारात्मक हो

दुनिया में घटने वाली हर होनी और अनहोनी से हम सब वाकिफ हैं। हम में से बहुत ही कम व्यक्ति होंगे जिनके जीवन में कोई अनहोनी घटनाएं न होती हों। परमात्मा की सृष्टि में जब हम सब कुछ अपनी इच्छा से करने लगते हैं, खुद को महान मानने लगते हैं, तब परमात्मा ऐसा खेल-खेलने लगता है कि हमारे समस्त प्रयास क्रियाहीन हो जाते हैं। सभी को उनके सामने हार माननी पड़ती है। सबसे बड़ी बात ये है कि जीवन की इस सच्चाई को हम सब जान कर भी अनजान बन बैठते हैं। बहुतों का ये मानना होता है की जीवन में जो कुछ घटित हो रहा है, वह पहले से निर्धारित होता है। हम जितना भी प्रयास कर लें उससे भिन्न कुछ घटित नहीं हो सकता, अपने पूर्वजन्म के कर्र्मों का फल भी इसी जन्म में चुकाना पड़ता है। जबकि, कुछ लोगों का यह मानना होता है हमारे ऊपर जो विपत्तियां आती हैं, वह केवल हमारे इसी जन्म के कर्मों का फल हैं। हम इस जीवन में जिसके साथ जैसा व्यवहार करते हैं। वैसा ही प्रतिफलित होकर हमारे सामने भी आता है। हमारे ऊपर आने वाली विपदा से हमें मुक्ति कैसे पानी है, बस इसी सोच में हमारी पूरी जिंदगी बीत जाती है। लेकिन, एक छोटी सी चीज क्यों हमारी समझ में नहीं आती कि हम इतना सोच कर जिंदगी को जटिल बना लेते हैं और हम जीवन में सकरात्मक सोच क्यों नहीं रखते?

मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है। इसी सोच के कारण आज हम कहां-से-कहां तक पहुंच गये हैं। लेकिन कभी-कभी यही सोच उनके जीवन में विपत्ति को निमंत्रित कर बैठती है। सोच उसी वक्त हमारा नुकसान कर बैठती है जिस वक्त वह नकारात्मक हो जाती है। जो व्यक्ति खुद को जरूरत से ज्यादा होशियार समझते हैं, ऐसे व्यक्ति हमेशा आगे की सोच कर वर्तमान को नष्ट कर बैठते हैं। हमको यह ज्ञान होना चाहिए कि हमारी सोच में कितनी ताकत है। इसलिए संत कवि तुलसीदास ने सुंदरकांड में कहा है। ”जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपत्ति निदाना’’ जहां पर अच्छी सोच हो वहां पर हमेशा अच्छा ही होता है।

हमारे पुराणों में वर्णित कहानियां भी हमें अनेक ज्ञान प्रदान करती हैं। जैसे- हम सावित्री सत्यवान की कहानी पढ़ते हैं, हम देखते हैं कि सावित्री के अटूट संकल्प और सकारात्मक सोच में दृढ़ता के कारण और उनकी अटूट श्रद्धा के आगे स्वयं यमदेव को भी झुकना पड़ा था। ऐसा भी देखा गया कि भक्त प्रह्लाद बालक मन से ही विष्णु भगवान को ऐसे मन में बसा लिया था और मन में सकारात्मक सोच रखी थी कि उनका कुछ नहीं होगा, क्योंकि स्वयं विष्णु उनके साथ हैं। प्रह्लाद की इसी सोच की वजह से उनके पिता के द्वारा किए गये अनेक शोषण उनके सामने क्रियाहीन हो गये। ठीक उसी तरह मीराबाई को भी भगवान श्रीकृष्ण पर विश्वास था, उनके मन में केवल यह भावना थी कि उनके साथ कभी भी कुछ भी बुरा नहीं होगा। उनके मन में होने वाली गंभीर सकारात्मक सोच के कारण ही उनको दिया गया विष भी अमृत बन गया था।

हम अगर हमेशा केवल यह सोचकर रहे कि सब कुछ सही होगा। यह केवल ईश्वर के निर्देश से ही हो रहा है। जिसे हम चाहकर भी बदल नहीं पाएंगे, उस पर सोचकर क्या फायदा। हम अगर केवल अपने कर्म पर ध्यान दें, आगे की सोचकर वर्तमान में व्यथित न रहें तो यह सकारात्मक सोच हमारे जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकता है। नकारात्मक सोच हमारे जीवन को छिन्न-भिन्न कर देती है।

उपाली अपराजिता रथ

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