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कब उठेगा समाज कुरीतियों से ऊपर?

कब उठेगा समाज कुरीतियों से ऊपर?

‘ऐ गंगा तुम बहती क्यों हो’ लेखक ‘विवेक मिश्र’ की कहानयिों का संग्रह है। इसे उन्होंने जिंदगी में हासिल किये गए कई अनुभवों के आधार पर रचा है। इस पुस्तक में 14 कहानियों का संग्रह है। हर कहानी का अपना एक अलग पहलू है। हर कहानी को लिखते समय उसकी वेदना का एहसास खुद अपने ह्दय में करते हुए लेखक ने प्रत्येक कहानी के शब्दों को अपने अंत:करण की गहराई से गढ़ा है। इस कहानी संग्रह की हर कहानी में अनकहा सा दर्द छुपा है।

जिसे बयां करना शायद इतना आसान नहीं था, लेकिन लेखन ने बहुत ही खूबसूरती से हर कहानी को बयां किया है। कहानी को पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे इन्हें लिखते वक्त साक्षात मां शारदा ने शब्दों का भंडार लेखक के लिए खोल दिया हो।

09-01-2016संग्रह की पहली कहानी है ‘घड़ा’ इस कहानी में हमारे समाज की पुरानी परंपरा से चिपके रहने और आगे न बढऩे को अपनी परंपरा का हिस्सा मानने वालों की तरफ इशारा किया गया है। कहानी राजस्थान के एक परिवार की है। जो आज भी लड़की के पैदा होने को कलंक मानते हुए उन्हें मारने में ही अपनी शान समझता है। गर्भवती पत्नी को अस्पताल में भर्ती नहीं कराया जाता है, क्योंकि अगर बेटी जनी तो उसे मारना शायद अस्पताल में आसान नहीं होगा। इसलिए गर्भवती की जान जोखिम में डाल दी गई और हुआ भी वही जिसका डर था ‘बेटी’ न होकर वो समाज के लिये एक कलंक हो। कलंक के साथ आखिर कोई कैसे जी सकता है तो रूढ़ीवादी परंपरा के अनुसार नवजात को नमक से भरे घड़े में ठूंस कर उसे काले कपड़े में बंधने के बाद कभी प्रयोग में न आने वाले गंदे पानी के कुंए मे फेंका गया। इस कहानी से पता चलता है कि चांद पर पहुंचना आसान है पर परंपरा के नाम पर सड़ी-गली मानसिकता को खत्म करना शायद इतना आसान नहीं है।

ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं

लेखक : विवेक मिश्र

प्रकाशक : किताबघर

मूल्य: 180 रु.

पृष्ठ: 104

दूसरी कहानी ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं’ इसमें दलितों की संवेदओं को कुचल कर समाज कैसे अपने मान को बरकरार रखता है, दर्शाया गया है। इतने विकास के बाद भी हमारा समाज जाति की बेडिय़ों में जकड़ा रहता हैै। रणवीर एक सवर्ण युवक है जो एक दलित युवती से विवाह करना चाहता है। लेकिन, कोई सवर्ण इस बात को स्वीकार नहीं कर सका कि कोई दलित उनके बराबर खड़ा हो सके। अत: रणवीर के सामने एक ही रास्ता था या तो वह परिवार को चुने या प्रतिभा को। वह इस सामाजिक सोच को बदलने की चाहत रखता था, अत: उसने प्रतिभा को चुना जिसका परिणाम ये हुआ कि

उसे अपने परिवार से दूर रहना पड़ा। भले ही रणवीर के पिता ने इस विवाह को स्वीकृति दी थी, पर फिर भी वह अपनी पत्नी को सवर्ण की पत्नी होने का दर्ज नहीं दिला सका। ये हमारे समाज की विकृत मानसिकता ही है।

इसी तरह कहानी ‘खरोंच’ में एक स्त्री की उस पीड़ा को दर्शाया गया है जिसे शायद वह मरते दम तक बर्दाश्त करती है। सामाजिक न्याय-व्यवस्था उसकी इस तकलीफ पर अपनी दबी इच्छाओं की तृप्ति करती है, बजाय उसके दर्द पर मरहम लगाने के। इस कहानी में न्याय-व्यवस्था के बिगड़े स्वरूप की एक तस्वीर पेश की गई है। सदना के जिस्म को भेडिय़ों ने नोंच-नोंच कर खाया और जब उसने न्याय के लिए गुहार लगाई तो पूरा न्याय-तंत्र उस पर हंसता रहा। इस हंसी में सदना के ह्दय से निकलती चीखें दब गईं थीं। जिसे किसी ने नहीं सुना। आखिर में सदना ने कोर्ट के सामने निर्वस्त्र होकर वह दृश्य दोहरा दिया जो वह शायद शब्दों में कभी भी बयां नहीं कर पाती। उसने उन घटनाओं का चित्रण किया कि कैसे उसे पकड़ा गया? कैसे उसके जिस्म के हिस्सों को हवस का शिकार बनाया गया? तब वहां मौजूद सबकी हंसी सन्नाटे में बदल गई और आखिर में एक चीख के साथ वह कहती है कि, मुझे एक और एफआईआर लिखवानी है इस कोर्ट के खिलाफ जिसमें एक-दो नहीं बल्कि, पचासों ने मिलकर मेरा बलात्कार किया है।

कहानी ‘निर्भया नहीं मिली’ निर्भया कांड पर आधारित है। ये पूरा कहानी संग्रह समाजिक कुरीतियों को खत्म करने का एक प्रयास है।

प्रीति ठाकुर

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