ब्रेकिंग न्यूज़ 

एनजेएसी बनाम कॉलेजियम

एनजेएसी बनाम कॉलेजियम

कॉलेजियम सिस्टम न तो कानून में हैं न ही संविधान में, लेकिन जजों ने फैसला दिया है कि जजों की बहाली जज ही करेंगे। दुनिया के कितने देशों में ऐसी व्यवस्था है? संभवत एक या दो अन्यथा रिपब्लिक को छोड़कर कहीं नहीं।

हमारे संविधान के संस्थापक पिता का जुड़ाव स्वतंत्रता और लोकतंत्र के आदर्शों से रहा था। वे ब्रिटिश राज के दौरान न्यायिक प्रक्रिया के शिकार थे। इसलिए उन्होंने जानबूझ कर राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित न्यायपालिका और न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये संविधान में अनुच्छेद 124 और 217 का प्रावधान किया और राष्ट्रपति को इसका अध्यक्ष और रक्षक बनाया, जिससे कि न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो। नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी, न्यायपालिका की आजादी और लोकतंत्र की रक्षा के लिये एक अंपायर की भूमिका भी दी। हालांकि, इन संवैधानिक प्रतिज्ञाओं को आजादी के 27 साल बाद हवा में फेंक दिया गया। संविधान के संस्थापक पिता के ऊंचे सपने और विश्वास का जख्म तब हरा हो गया, जब जनता पर आपातकाल लादने की घोषणा की गई थी और लोगों के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था और न्यायिक प्रणाली अपंग थी। सभी तरह की संवैधानिक संस्थाएं जिन्होंने संविधान को बचाने के लिए शपथ ली थी, वे अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करने में विफल रहे। स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे कष्टकारक समय में भी हमारी न्यायपालिका नागरिकों की रक्षा करने में भी विफल रही।

राजनीतिक कार्यकारी लोग जो संविधान के तहत कानून के शासन को बनाए रखने, नागरिकों के कर्तव्य और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बाध्य थे। ”लोगों को इस कदर आतंकित किया कि जनता में उनकी आस्था पूरी तरह खत्म हो गई’’ साहा आयोग ने आपातकाल की ज्यादतियों की जांच की। जे.पी स्मरणोत्सव पर 18 मार्च 1979 को प्रकाशित एक खंड के एक लेख में, नारायण देसाई ने माना है कि उस दौरान देश पूरी तरह से आतंकित था। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने आपातकाल की प्रशंसा में गाना गाने शुरू कर दिये थे। ”प्रसिद्ध विधिवेत्ता एम.सी. चागला ने इसी मैगजीन के एक लेख में इस बात का बखूबी वर्णन किया कि किस तरह जे.पी ने लोकतंत्र की रक्षा के लिये प्रयास किये और अंतत: उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी।’’ उनके अनुसार, ”आजादी के लिए हमारी पहली लड़ाई राष्ट्रपिता गांधीजी की अगुवाई में लड़ी गई, जबकि जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ी गई दूसरी लड़ाई का नेतृत्व किया गया था।’’ चार्लस असलम का कहना है कि ”न्यायपालिका लोकतंत्र की रक्षा के लिए अंतिम कार्यक्षेत्र है।’’ देश को इस बात का गर्व है कि उसे एच.आर. खन्ना जैसे कई प्रतिष्ठित न्यायाधीश मिले, जिन्होंने मौलिक अधिकारों के हनन का विरोध किया और मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी ठुकरा दी थी, हालांकि इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था।

हमारा देश न्यायाधीश एच.आर. खन्ना जैसे ही न्यायाधीश वी.आर. कृष्णअय्यर, न्यायाधीश चंद्रचूड़ और न्यायाधीश पी.एन. भगवती का भी ऋणी है, जिन्होंने आपातकाल के दौरान स्वतंत्रता की रक्षा करने में नाकाम रहने के लिए खेद व्यक्त किया है। (राजेश सिंह, 31 दिसंबर को दि पायनियर, 2014)। इस विषय पर सी.ए में एक बहस के दौरान एचवी कामथ ने इसका वर्णन किया कि न्यायाधीश ”न्यायिक स्वतंत्रता का मॉडल’’ हैं। हालांकि डॉ.आंबेडकर ने न्यायपालिका, कार्यपालिका और राष्ट्रपति के बीच संतुलन की वकालत की थी और जुड़े हुए एक सामूहिक पहल के पक्ष में थे।

न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता को और नागरिकों के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए प्रासंगिक है। इस पृष्ठभूमि में हमें विशेष रूप से संवैधानिक योजना का परीक्षण करना चाहिए जिसके जरिये उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति होती हैं। न्यायिक नियुक्तियों के लिये विनियमन कानून बनाने की शक्ति अनुच्छेद 124 में है और इसे मूल रुप में 217 के जरिये लागू किया गया। मूल संवैधानिक प्रावधान में पिछले 68 वर्षों के दौरान कई तरह के बदलाव हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के वकील के रूप में जाना जाता है के केस के मामले में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता में साल 1993 में गठित एक बेंच ने कॉलेजियम की अवधारणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और दो वरिष्ठ न्यायाधीशों की राय को प्रधानता दी है। इसके बाद कई तिमाहियों में न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ समीक्षा की मांग उठी थी। जबकि 1998 में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले से सहमति जताई, लेकिन जजों की नियुक्ति में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों और न्यायपालिका को पूर्ण अधिकार देने का फैसला सुनाया जिससे कि कॉलेजियम की ताकत बढ़े।

हालांकि कोलेजियम सिस्टम को बदलने की मांग को हवा कानूनविदो द्वारा ही प्रसारित की गई। एनडीए की पहली सरकार ने संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिए पूर्व चीफ जस्टिस एन वेंकटचलैय्या की अध्यक्षता में एक आयोग की स्थापना की थी, उन्होंने भी कॉलेजियम सिस्टम में प्रतिस्थापन के लिए सुझाव दिया और इसके लिए एनजेएसी की तरह एक स्वतंत्र संस्था बनाने की बात कही। इस तरह वर्तमान व्यवस्था में बदलाव के लिये एक लंबी कानूनी प्रक्रिया और बहस के बाद कानूनी बिरादरी द्वारा एनजेएसी अस्तित्व में आया। वास्तव में एनजेएसी कानूनविदों के दिमाग की उपज है।

संप्रग सरकार ने इसके लिए कदम उठाने की पहल की और एक कानूनी मसौदा तैयार किया, लेकिन संसद में इसे पारित करने में विफल रही। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने विचार-विमर्श और संवैधानिक संशोधन की श्रृंखला के बाद इसे संसद में पेश किया और संसद ने अनुमोदित किया। इसे दो तिहाई राज्य विधानसभाओं द्वारा भी स्वीकार किया जा चुका था। न्यायपालिका के लिये नियुक्ति पारदर्शी, योग्यता केंद्रित और भ्रष्टाचार मुक्त होनी चाहिए, क्योंकि न्यायाधीशों को भगवान के अवतार ‘धर्म अवतार’ का दर्जा प्राप्त है। एनजेएसी न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में सुधार के लिए एक अच्छी शुरुआत के उद्देश्य से शुरु किया गया था। लेकिन, इसकी वैधता को 99 वें संवैधानिक संशोधन के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के 4.1 न्यायाधीशों के बहुमत से 16 अक्टूबर 2015 को नीचे गिरा दिया गया। हालांकि इसमें एनजेएसी के निर्माण के लिए एक समर्थकारी प्रावधान था। इस बहुमत की राय के पीछे प्रमुख तर्कसंगत बातें यह प्रतीत होती है कि, संविधान के मूल ढांचे और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को एक अनिवार्य अंग माना गया, जिसके तहत कानून मंत्री और चयन प्रक्रिया में दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति न्यायिक स्वतंत्रता में बाधा पैदा करेगी। हालांकि बेंच का हिस्सा रहे न्यायमूर्ति जे.चेलमेश्वर अन्य साथी जजों के फैसले से असहमत थे।

इस फैसले के बाद मीडिया, नेताओं, बार, पूर्व न्यायाधीशों सहित विभिन्न हलकों से प्रतिक्रियाएं और अलग-अलग तरह की राय भी आईं। अपने संपादकीय में इंडियन एक्सप्रेस ने इस ”दुर्भाग्यपूर्ण फैसले’’ का वर्णन किया। ‘दा पायनियर’ ने 19 अक्टूबर, 2015 के अपने संपादकीय में इसे ”गहरा त्रुटिपूर्ण’’ और ‘न्यायिक सुधारों के लिए एक झटका’ बताया। संवैधानिक विशेषज्ञ वी. सुधीश ने फैसले पर इंडियन एक्सप्रेस में 03 नवंबर, 2015 को लिखे अपने लेख में कहा कि, ”यह निराधार मान्यताओं, अभिमानी दावे और विकृत तर्क से भरा है।’’ जबकि, वकील ए.एम.सिंघवी मानते हैं कि, ”एनजेएसी को एक उचित मौका दिया जाना चाहिए था।’’ ( 17 अक्टूबर 2015 द हिन्दू ) पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी मानते हैं – ”इस फैसले को काटना गैरजरुरी था’’। द हिंदू अखबार में 19 अक्टूबर, 2015 को छपे एक अन्य लेख में वकील संजय हेगड़े कहते हैं – ”अदालत के पास अब इसका विकल्प है कि वह संसद द्वारा बनाई गई परिवर्तन की नई राह को सुधार के लिये चुने’’। उत्तम गुप्ता ने 30 अक्टूबर, 2015 को पायनियर में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि, ”कॉलेजियम प्रणाली दोषपूर्ण है और शीर्ष अदालत ने यह स्वीकार किया है। फिर भी, अदालत की प्रक्रिया का समर्थन किया है’’।

बीजेपी और एनडीए के आलोचक पूर्व लोकसभाध्यक्ष और अनुभवी वकील सोमनाथ चटर्जी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसकी निंदा की, जो 26 अक्टूबर, 2015 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी। ”यह अधिकार न तो संविधान में है और न कानून में, लेकिन जज अपने फैसले से जजों की ही नियुक्ति करेंगे। कितने देशों में ऐसी व्यवस्था है? मैं नहीं जानता लेकिन, संभवत एक या दो बनाना रिपब्लिक को छोड़ कर कहीं नहीं। कोई मुझे बता सकता है’’। इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश थॉमस ने कहा – ”मैं कॉलेजियम के सदस्य के रुप में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर रहा हूं। अपने पिछले अनुभव से मैं इस बात का स्वागत करता हूं कि, कार्यकारी और सिविल सोसायटी से न्यूनतम भागीदारी हो जिससे कि अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्तियों को टाला जा सके’’। 27अक्टूबर, 2015 को ”हिंदू’’ में प्रकाशित एक अन्य लेख में, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और लॉ कमीशन के पूर्व अध्यक्ष ए.पी. शाह ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता का अभाव है और यह स्वाभाविक रुप से गोपनीय है, इसमें न्यायपालिका के जांच की कोई गुंजाइश नहीं है।

09-01-2016

”न्यायाधीशों के चयन की प्रक्रिया बड़े पैमाने पर अज्ञात मापदंड के आधार पर होती है, इसने अज्ञात परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक घाटे को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है’’। जस्टिस प्रकाश मानते हैं कि चयन की वर्तमान प्रक्रिया सिद्धांतों पर आधारित है। – ”आप मुझे व्यक्ति दिखाइये, मैं आपको नियम दिखाऊंगा’’। इसकी पृष्ठभूमि में यह प्रासंगिक है कि हमें उस याचिका का स्मरण करना चाहिए, जिसे न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार को लेकर साल 2010 में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने दायर किया था, इसका मीडिया के साथ ही सार्वजनिक वाद-विवाद में खूब बोल-बाला रहा।

इसकी प्रतिक्रिया में 21 अक्तूबर, 2010 को हिंदू में प्रकाशित एक लेख में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने ‘कार्रवाई करने या उसे संक्षिप्त करने के लिए आरोपों का वर्गीकरण करने ”सर्वोपरि महत्व देने’’ को न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों के लिये गलत ठहराते हुए ”कार्रवाई करने या पतन के लिए’’ तैयार होने की बात कही थी’’।

एक संसदीय लोकतंत्र में संस्थाएं और फर्म विधायी उपायों द्वारा संचालित होते हैं। इसलिए विधानमंडल किसी भी कानूनी साधन को आकार देने के लिये चर्चा और बहस करने के लिए सही मंच है।

जो भी हो एक संस्था बौद्धिक रूप से समृद्ध हो सकती है, लेकिन यह विधायिका की भूमिका नहीं ले जा सकती। एक तरीके से संयुक्त राज्य अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट एक राजनीतिक संस्था है। जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई है, लेकिन इसके कार्य बिल्कुल गैर-राजनीतिक हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नामित होते हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति की सार्वजनिक रूप से जांच होती है और सीनेट के सदस्यों के बहुमत से उनका चुनाव होता है। फ्रांस में न्यायाधीशों की नियुक्ति वहां के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित एक बहुत बड़ी समिति करती है। ऑस्ट्रेलिया में कार्यपालिका ही न्यायाधीशों के नाम को नामांकित करती है। तो सभी लोकतांत्रिक देशों में न्यायपालिका में नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका से अलग नहीं रखा गया है।

न्यायिक स्वतंत्रता अकेले न्यायपालिका की एकमात्र चिंता का विषय नहीं है। न्यायिक स्वतंत्रता के लिए जनता और बार अधिक चिंतित है, आखिर अंत में वे ही इसका लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इसलिए न्यायिक सुधार की चुनौती को नागरिकों, बार, सरकार और न्यायपालिका के सामूहिक विवेक से पूरा किया जाना चाहिए। बार, पीठ और साथ ही नागरिकों के बीच इस तरह के ज्वलंत राय को ध्यान में रखते हुए न्यायिक सुधार के मामले में आम सहमति पर पहुंचने के लिए कानून मंत्रालय / विधि आयोग, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और स्टेट बार काउंसिल को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के साथ बातचीत करनी चाहिए।

मैं एक विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज में एक दशक तक कानून का अध्यापक था और कानूनी शिक्षा की समस्या के प्रति जागरुक हूं। मुझे दृढ़ विश्वास है कि किसी भी कानूनी कार्यालय के लिये किसी संवैधानिक विषय पर एक घंटे की लिखित परीक्षा बहुमत के साथ ही संभावित उम्मीदवारों की दावेदारी को खत्म कर देती है। किसी भी संवैधानिक पद के लिये संभावित उम्मीद्वारों के पक्ष की योग्यता की रक्षा के लिये उनकी मेधा का उचित मूल्यांकन होना चाहिए। इसी कारण दशकों बाद भी सुधार में विलंब की वजह से इन समस्याओं का हल नहीं किया जा सका है।

हम माननीय उच्चतम न्यायालय के आभारी हैं, जिसने कॉलेजियम प्रणाली में खामियों को स्वीकार किया है। हम समान रुप से प्रधानमंत्री के भी आभारी हैं, जिन्होंने एनजेएसी कानून को हाथ में लिया और तात्कालिक सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए इसके पक्ष में माहौल बनाया। अगर एनजेएसी को अधिनियमित नहीं किया गया तो सुधार की मांग ने जो रफ्तार पकड़ी है वह नहीं होगा। इस मुद्दे पर बहस के लिए जो सुझाव दिये गये हैं, उसके लिये माननीय अदालत के पास ”बहुत ज्यादा समय नहीं है’’ और न ही यह व्यवहारिक रूप से संभव है।

एक दीर्घकालिक उपाय के रूप में इस प्रमाणित कानूनी प्रक्रिया को नियमितता हासिल करने की जरूरत है। कानून बनाना संसद का काम है, अनुमति के आधार पर ही अदालत द्वारा नियुक्त एक कानूनी मसौदा कानूनी विशेषज्ञों की समिति द्वारा तैयार कर विधायिका द्वारा पुनरीक्षण और विचार के लिए सरकार और संसद को भेजी जाये।

 राम चंद्र पांडा

михаил безлепкин харьковпрограммы для взлома

Leave a Reply

Your email address will not be published.