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जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय संपूर्ण

जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय संपूर्ण

”मैं, श्रीमान महाराजाधिराज श्री हरी सिंह जी जम्मू व कश्मीर का शासक रियासत पर अपनी संप्रभुता का निर्वाह करते हुए अपने इस एतद्द्वारा विलय के प्रपत्र का निष्पादन करता हूं ‘‘

यह वही प्रपत्र है, जिस पर देश की सभी रियासतों के शासकों ने हस्ताक्षर किये थे। जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरी सिंह ने भी इस प्रपत्र पर ही हस्ताक्षर किये थे।

इस विलय को स्वीकार करते हुए तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने लिखा ‘मैं एतद्द्वारा विलय के इस प्रपत्र को अक्टूबर के सत्ताईसवें दिन सन उन्नीस सौ सैंतालीस को स्वीकार करता हूं।’ यह भी वहीं भाषा है, जिसे माउंटबेटन ने अन्य सभी रियासतों के विलय को स्वीकार करते हुए लिखा था।

जब विलय का प्रपत्र और स्वीकृति, दोनों ही सभी रियासतों के समान थे तो विवाद का विषय ही कहां बचता है? अत: कथित विवाद का जो रूप आज हमें दिख रहा है, वह तथ्य नहीं, बल्कि प्रयासों से गढ़ा गया एक भ्रम है, जिसे बनाये रखने में न केवल अलगाववादी तत्वों की बल्कि, राज्य व केन्द्र सरकार की भी भूमिका है।

सच यह है कि पाकिस्तान की ओर से हुए आक्रमण की भारी कीमत राज्य के नागरिकों को उठानी पड़ी, जिसके कारण आम नागरिक भी पाकिस्तान को आक्रमणकारी मानता था और उसके साथ विलय की सोच भी नहीं सकता था। यहां तक की प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के सबसे निकट रहे शेख अब्दुल्ला, जिन्हें राज्य का प्रधानमंत्री बनाये जाने की जिद्द के चलते ही जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय में इतना विलम्ब हुआ, अपने ही कारणों से जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का विरोध करते थे और पाकिस्तान में विलय के पूरी तरह खिलाफ थे।

इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को लेकर जो भ्रम उत्पन्न हुआ उसका मुख्य कारण नेहरू द्वारा राज्य के साथ अन्य रियासतों से भिन्न दृष्टिकोण अपनाया जाना है। विलय करने वाली रियासतों के साथ सामान्य नीति यह थी कि एक चुनी हुई स्थानीय लोकप्रिय सरकार बनायी जाये, जिसमें एक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री राजा के दीवान की वरिष्ठ स्थिति में हो जब तक कि नवस्वाधीन राष्ट्र व्यवस्था को अपने हाथ में न ले ले। जम्मू-कश्मीर में यह व्यवस्था भिन्न रूप में पहले से ही लागू थी। किन्तु पं. नेहरू की यह जिद्द थी कि महाराजा विलय के पूर्व ही शेख अब्दुल्ला को सत्ता सौंप दें। महाराजा को यह स्वीकार नहीं था। महाराजा की इस हिचक को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि हरि सिंह देश की सबसे बड़ी रियासतों में से एक के महाराजा थे। महाराजा हरि सिंह एक देशभक्त थे। ‘नरेन्द्र मण्डल’ के अध्यक्ष की हैसियत से ही उन्होंने लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लिया था, जिसमें उन्होंने दृढ़ता से भारत की स्वतंत्रता का पक्ष रखा था। उन्होंने ब्रिटिश प्रतिनिधियों को यह भी परामर्श दिया कि वे रियासतों के राजाओं की स्थिति के बारे में अधिक चिंतित न हों और स्वतंत्रता के बाद रियासतों के साथ संबंध का मामला वे रियासतों के राजाओं पर छोड़ दें। स्वाभाविक ही अंग्रेजों को महाराजा का यह आग्रह पसंद नहीं आया और उन्होंने महाराजा को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया। 1947 में उन्हें यह अवसर मिल गया।

जब भारत की स्वतंत्रता का निश्चय हो गया और यह चर्चा शुरू हो गयी कि अंग्रेज कांग्रेस को सत्ता सौपेंगे, साथ ही भारत का एक हिस्सा काट कर, पाकिस्तान नाम का नया राज्य बनेगा जिसकी बागडोर जिन्ना संभालेंगे, तो शेख के मन में भी यह इच्छा बलवती हो उठी कि कश्मीर की सत्ता उसे सौंपी जानी चाहिये। 1946 में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने ‘कश्मीर छोड़ो’ का नारा दिया जो अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं बल्कि, महाराजा के खिलाफ था। उसकी मांग थी कि कांग्रेस की तर्ज पर नेशनल कॉन्फ्रेंस को सत्ता सौंप कर महाराजा कश्मीर छोड़ दें। परिणामस्वरूप महाराजा ने राजद्रोह के आरोप में शेख को कारावास में डाल दिया। पं. नेहरू ने शेख के आंदोलन का समर्थन किया जो महाराज और नेहरू के संबंधों में खटास का कारण बना। पं. नेहरू की जिद्द के चलते महाराजा को शेख के हाथों सत्ता सौंपने को विवश होना पड़ा। लेकिन, इसके पूर्व शेख को जेल से तभी छोड़ा गया, जब उसने महाराजा के प्रति निष्ठा की शपथ ली। 26 सितम्बर 1947 को महाराजा को लिखे गये अपने पत्र में शेख अब्दुल्ला ने लिखा –

इस बात के बावजूद की भूतकाल में क्या हुआ है, मैं महाराजा को यह स्पष्ट करना चाहता हूं की मैंने और मेरी पार्टी ने कभी भी महाराज या उनकी राजगद्दी या उनके राजवंश के प्रति अनिष्ठा की भावना नहीं रखी है। महाराज, मैं अपने और अपने संगठन की तरफ से आपको पूर्ण निष्ठा व समर्थन का आश्वासन देता हूं। पत्र खत्म करने से पहले महाराज मैं एक बार फिर आपको अपनी अविचल निष्ठा का आश्वासन देता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह मुझे महामहिम के संरक्षण में वह अवसर प्रदान करें, जिससे की इस राज्य को शांति, समृद्धि और सुशासन हासिल हो सके।

1 अक्तूबर 1947 को श्रीनगर के हजूरी बाग में एक सभा को संबोधित करते हुए शेख ने कहा – ‘जब तक मेरे शरीर में खून की आखिरी बूंद है, तब तक मैं द्विराष्ट्र के सिद्धांत में विश्वास नहीं करूंगा।’ यह दर्शाता है कि मतभेद के बावजूद शेख स्वयं भी पाकिस्तान के साथ जाने को तत्पर नहीं थे। यद्यपि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार विलय का निर्णय करने का अधिकार केवल शासक को ही था, जनमत का वहां कोई संदर्भ ही नहीं था, फिर भी, कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर का बहुमत, यहां तक कि मुस्लिम बहुमत भी भारत में विलय के विरुद्ध नहीं था।

देखा जाय तो सारे विवाद की जड़ है, विलय पत्र। इस पर हस्ताक्षर के साथ ही माउंटबेटन द्वारा महाराजा हरि सिंह को लिखा गया पत्र, जिसमें उन्होंने जनता की राय लेने की बात कही। उन्होंने लिखा – ‘अपनी उस नीति को ध्यान में रखते हुए कि, जिस रियासत में विलय का मुद्दा विवादास्पद हो वहां विलय की समस्या का समाधान रियासत के लोगों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए किया जाये, मेरी सरकार की इच्छा है कि जब रियासत में कानून और व्यवस्था बहाल हो जाये और इसकी भूमि को आक्रमणकारियों से मुक्त कर दिया जाय तो रियासत के विलय का मामला लोगों की राय लेकर सुलझाया जाये। ‘इस पत्र की कीमत सिर्फ यही है कि यह गवर्नर जनरल द्वारा महाराजा हरि सिंह को लिखा गया है। इसकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है।

महाराजा हरि सिंह ने अपने पत्र में कहा:-”मेरे इस विलय पत्र की शर्तें भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के किसी भी संशोधन द्वारा परिवर्तित नहीं की जायेंगी, जब तक कि मैं इस संशोधन को इस विलय पत्र के पूरक में स्वीकार नहीं करता।’’

भारतीय स्वाधीनता अधिनियम 1947 के अनुसार शासक द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के उपरान्त आपत्ति करने का अधिकार किसी को भी नहीं था।

1951 में राज्य संविधान सभा का निर्वाचन हुआ। संविधान सभा में विपक्षी दलों के सभी प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त कर दिये गये। सभी 75 सदस्य शेख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के थे, जिनमें से 73 कोई अन्य प्रत्याशी न होने के कारण निर्विरोध निर्वाचित मान लिये गये। मौलाना मसूदी इसके अध्यक्ष बने। इसी संविधान सभा ने 6 फरवरी 1954 को राज्य के भारत में विलय की अभिपुष्टि की। 14 मई 1954 को भारत के महामहिम राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान के अस्थायी अनुच्छेद 370 के अंतर्गत संविधान का आदेश (जम्मू व कश्मीर पर लागू) जारी किया, जिसमें राष्ट्र के संविधान को कुछ अपवादों और सुधारों के साथ जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू किया गया।

राज्य का अपना संविधान 26 जनवरी 1957 को लागू किया गया। इसके अनुसार-धारा-3 जम्मू-कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा।

धारा-4 जम्मू-कश्मीर राज्य का अर्थ वह भू-भाग है, जो 15 अगस्त 1947 तक राज्य के आधिपत्य या संप्रभुता के अधीन था।

इसी संविधान की धारा-147 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि धारा- 3 व धारा-147 को कभी बदला नहीं जा सकता।

1974 के इंदिरा गांधी-शेख अब्दुल्ला समझौते में पुन: यह कहा गया कि, जम्मू-कश्मीर राज्य भारतीय संघ का एक अविभाज्य अंग है, इसका संघ के साथ अपने संबंधों का निर्धारण भारतीय संविधान के अस्थायी अनुच्छेद-370 के अंतर्गत ही रहेगा।

14 नवम्बर 1962 को संसद में पारित संकल्प एवं 22 फरवरी 1994 को संसद में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से यह कहा गया कि जो क्षेत्र चीन द्वारा (1962 में) व पाकिस्तान द्वारा (1947 में ) हस्तगत कर लिये गये, वह हम वापस लेकर रहेंगे और इन क्षेत्रों के बारे में कोई सरकार समझौता नहीं कर सकती।

इतने तथ्यों के बावजूद जो लोग भ्रम का वातावरण निर्मित कर रहे हैं अथवा अलगाववादी मांगों का समर्थन कर रहे हैं, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में सहभागी हैं। समय आ गया है कि केन्द्र व राज्य सरकार ऐसे तत्वों से कड़ाई से निपटे। 26 अक्टूबर को विलय दिवस के रूप में इन घटनाओं का स्मरण करते हुए हमें इन तथ्यों को देश की जनता तक स्पष्ट रूप से पहुंचाए जाने के गंभीर प्रयास करने होंगे, ताकि इस विषय पर विगत छह दशकों से भी अधिक समय से छाया कुहासा छंट सके, राष्ट्रीय एकात्मता की अभिवृद्धि हो तथा जम्मू-कश्मीर के वे नागरिक जो अनुच्छेद 370 की आड़ में बनाये गये प्रावधानों के चलते अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें देश के अन्य नागरिकों के समान अधिकारों का उपभोग करने तथा राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर मिल सके।

आशुतोष भटनागर

(लेखक जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के डायरेक्टर है)

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