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किशोरों को पढ़ायें नैतिकता का पाठ

किशोरों को पढ़ायें नैतिकता का पाठ

आखिरकार किशोर न्याय (संशोधन) विधेयक, 2015 राज्यसभा से 22 दिसंबर को पारित हो गया। लिहाजा अब कानूनन किशोर उम्र की सीमा 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष कर दी गई। इसके तहत बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधों के सिलसिले में 16 वर्ष या उससे अधिक उम्र के युवाओं के साथ वयस्कों जैसा बर्ताव किया जायेगा। यह जिक्र करना भी लाजिमी है कि संगीन अपराध वे होते हैं जिनमें 7 या उससे अधिक साल की सजा का प्रावधान है। अगर किशोरों को जेल भेजा जाता है तो उन्हें 21 साल की उम्र होने तक किशोर सुधार गृहों में भेजा जाएगा और उसके बाद उसकी समीक्षा की जाएगी। इस तरह यह कानून उन दोनों तरह के किशोरों के कानूनी प्रावधानों को मजबूती देगा, जिन्हें सुरक्षा और देखरेख की दरकार है या जो कानून तोड़ बैठे हों। असल में, यह नहीं भुलाया जाना चाहिये कि भारत संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि का सदस्य है। इसलिए नये कानून के प्रावधानों में मुकदमे के दौरान और सजा सुनाये जाने के बाद भी 21 साल की उम्र तक किसी किशोर को सुरक्षित स्थान पर रखने की अनिवार्यता है। उसके बाद उसका मूल्यांकन कोई अदालत करेगी। 16 साल या उससे अधिक उम्र के किशोर पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाने का फैसला भी किशोर न्याय बोर्ड लेगा, जिसमें एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के तहत दो सामाजिक कार्यकर्ता सदस्य होंगे।

यहां यह जिक्र करना भी जरूरी है कि संसद के शीतकालीन सत्र में खासकर राज्यसभा में लगातार गतिरोध ही दिखा। चिंताजनक यह भी है कि राज्यसभा में जब किशोर न्याय (संशोधन) विधेयक पारित किया जा रहा था, तब सीपीआई (एम) ने विधेयक को सदन की प्रवर समिति के पास भेजने की मांग के साथ वॉकआउट किया। इस संदर्भ में देखें तो विपक्ष के लगातार गतिरोध से संसद की मर्यादा ही भंग नहीं हो रही है, बल्कि देश के खजाने पर भी इसका बोझ बढ़ा है।

नये विधेयक से अब बढ़ते किशोर अपराधों पर अंकुश लग सकेगा। ये आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। भारत में 2012 में 31,973 किशोर अपराध हुए और 2014 में ये आंकड़े बढ़ कर 38,565 हो गये। ये आंकड़े 22 दिसंबर को सरकार ने लोकसभा में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से जाहिर किये। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में पकड़े गये किशोर अपराधियों में 55.6 प्रतिशत उन परिवारों से थे जिनकी सालाना आमदनी 25,000 रुपये से कम की है। यह आंकड़ा 2013 में 50.2 प्रतिशत और 2012 में 52.8 प्रतिशत ही था। इसके अलावा, पिछले साल पकड़े गये किशोर अपराधियों में 22 प्रतिशत के परिवार की वार्षिक आय 25,000 रुपये से 50,000 रुपये के बीच है, 14.2 प्रतिशत 50,000 रुपये से 1 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों से हैं, जबकि 1-2 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों के किशोर 5 प्रतिशत हैं और 2-3 लाख रुपये सालाना आय वाली श्रेणी में 1.6 प्रतिशत हैं। 3 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले परिवारों के 1 प्रतिशत से भी कम बच्चे अपराधों में पकड़े गये। इस जिक्र के बाद मैं इस राय का पैरोकार हूं कि कानून और दंड का मकसद किसी को सजा देने से अधिक उसे सुधारने की कोशिश होनी चाहिये।

इस बात पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि हमें भावी पीढिय़ों पर ध्यान देने की दरकार है। उन पर पश्चिमी जीवन-शैली का अधिक असर नहीं होना चाहिये, जो उनमें नैतिकता के बदले भौतिकतावादी आग्रह भर देती है। हमें पश्चिमी शिक्षा पद्धति का आंख मूंदकर अनुसरण नहीं करना चाहिये, जो युवाओं में नैतिक शिक्षा पर जोर नहीं देती है। इसके बदले हमें अपनी पारंपरिक गुरुकुल प्रणाली अपनानी चाहिये, जिसमें छात्रों को नैतिक शिक्षा और बुजुर्गों के आदर की बातें भी सिखाई जाती हैं।

इस संदर्भ में यह भी जिक्र किया जाना चाहिये कि हम अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम के हवाले करके अपनी युवा पीढ़ी को अपनी तपी-तपाई पुरानी परंपराओं और उसकी सीख से दूर कर रहे हैं। इसके लिये हमें एकल परिवारों की व्यवस्था को तोडऩा होगा, जिसका चलन अब बड़े पैमाने पर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दरअसल, नैतिक शिक्षा के प्रसार को राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप दिया जाना चाहिये। ऐसे स्कूल बनाए जाने चाहिए जो बच्चों को नैतिक, जिम्मेदारी और दूसरे के प्रति आदर-सम्मान रखने वाला नागरिक बनाएं, उनका चरित्र निर्माण करें और ऐसे मूल्यों की सीख दें जो हम सबको भाते हैं। वे बच्चों को ईमानदारी, साफगोई, दायित्व बोध और सबको सम्मान देने के गुणों की सीख दें। यह भी याद रखना चाहिये कि नैतिक शिक्षा कोई ऐसी वस्तु नहीं जो बाजार से खरीद कर हासिल की जा सके या एक झटके में सीखी जा सके। हालांकि इसमें हमारे समाज के दीर्घकालिक नैतिक और शैक्षणिक समस्याओं का समाधान छुपा है। लिहाजा, नैतिक शिक्षा सिर्फ हमारे बच्चों के ही काम नहीं आएगी, बल्कि समाज को समरस बनाने के भी काम आएगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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