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उत्तम व्यक्ति ही समाज के निर्माणकर्ता

उत्तम व्यक्ति ही समाज के निर्माणकर्ता

कहा जाता है कि इस दुनिया में जितने लोग हैं उतने ही स्वभाव। यहां रहने वाले हर प्राणी का स्वभाव अलग-अलग होता है। कुछ व्यक्ति हकीकत में उत्तम स्वभाव के होते हैं तो कुछ उत्तम बनने का प्रयास करते हैं, यानी कुछ लोग उत्तम न होकर भी उत्तम होने का ढोंग करते हैं। हममें से उत्तम बनने का प्रयास करने वालों की संख्या ज्यादा है। कुछ लोग तो ऐसे होते हैं कि वे खुद को अच्छा साबित करने में ही जुटे रहते हैं। हममें से कुछ व्यक्ति होते हैं जो कुछ अच्छा ज्ञान लेकर अपने नित्य जीवन में उपयोग न करके केवल सभी के सामने बोलकर वाहवाही लूटने में लगे रहते हैं। कुछ भी कहना बहुत आसान होता है, लेकिन उसे अपने जीवन में लागू करना कई गुना मुश्किल होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अच्छे गुणों का हमें अपने जीवन में उपयोग करना चाहिए। जैसे कि एक छोटी सी बात हमें बचपन में सभी बताते हैं कि झूठ बोलना पाप होता है। वास्तव में झूठ बोलकर कोई भी इंसान चैन से नहीं रह पाता है। लेकिन, यही छोटी सी बात को हम अपने जीवन में लागू नहीं कर पाते हैं।

ज्ञान रखने वाले व्यक्ति बहुत हैं, लेकिन उसका उपयोग करना सभी के बस में नहीं होता है। जो व्यक्ति खूब उच्च आवाज में आदर्श, नीति, कर्तव्य तथा समाज सेवा की बात करते हैं, वास्तव में उनके अपने जीवन में उसका सम्पूर्ण व्यतिक्रम परीलक्षित होता है। बिना अनुभूति का ज्ञान निरर्थक होता है। जब जीवन में मुसीबत का समय आता है हम दुख के कारण भ्रमित हो जाते हैं, हमें उसी समय खुश होना चाहिए कि हमने अभी तक जो ज्ञान प्राप्त हुए किया है उसे परखने का समय आ गया है। हम जितने सहज रूप से दुख के वक्त को गुजार लेते हैं उतना ही हमारे अंदर के ज्ञान को हम नाप सकते हैं। एक ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान का ढिंढोरा नहीं पीटता। केवल समय के साथ परिस्थितियों को लेकर अपने जीवन को सरल बनाने में लगे रहते हैं।

कोई भी व्यक्ति अगर समाज में रहकर किसी को ज्ञान देना चाहता है या समाज में रह कर कोई भी परिवर्तन चाहता हैं तो अपने जीवन में पहले परिवर्तन लाएं और अपने कार्य के माध्यम से ही दूसरों को ढालें। केवल बोलकर कोई भी कार्य संभव नहीं होता है। प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव होता है कि दूसरों के द्वारा किया गया कार्य उसे आसानी से प्रभावित करता है। एक छोटे बच्चे का उदाहरण लिया जाए तो आसानी से समझा जा सकता है कि जिस चीज को हम बच्चों को शिक्षा के द्वारा नहीं सीखा पाते हैं वही चीज वह दूसरों को देख कर सहजता से सीख लेता है। सौ बार जो बात सुन कर भी हमारे दिमाग में नहीं आती वही दूसरों को करते हुए देख कर एक बार में ही हमें समझ में आ जाती है। हर व्यक्ति अनुकरण प्रिय होते हैं। कोई भी इंसान महान बनता है तो अपने कार्य के द्वारा। कभी-कभी अच्छा कार्य दूसरों को देखकर उससे प्रभावित होकर किया जाता है और कभी-कभी बड़े-बड़े भाषण हमारे मन में जितना प्रभाव नहीं डाल पाते हैं और एक छोटे प्राणी के द्वारा किया गया कार्य भी हमें प्रभावित कर जाता है।

जैसे कि हम सबको यह ज्ञान है कि हम सब पांच इन्द्रियों के द्वारा परिचालित हैं। एक व्यक्ति के एक इन्द्रिय क्षीण होने पर दूसरी इन्द्रियां अधिक सक्रिय हो जाती है। यह सभी इन्द्रियां हमारे विवेक द्वारा परिचालित हैं। हमारे अधिक बोलने के कारण हमारी समस्त इन्द्रियां दिनों-दिन क्षीण होने लगती हैं। हमारे सोचने की क्षमता भी कम हो जाती है। हमारी सोच केवल दिमाग के बाहरी हिस्से में रहकर केवल बाहर निकल कर कुछ प्रदर्शन करने का प्रयास करती हैं। जब तक किसी भी बात को गहराई से सोच नहीं पाएंगे उसे समझ भी नहीं पाएंगे। इसलिए जीवन में सुचारू रूप से आगे बढ़ते हुए और कम बोलकर अधिक सोचना, समझना तथा कार्य करने की आवश्यकता है।

उपाली अपराजिता रथ

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