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एक और विवेकानंद चाहिये

एक और विवेकानंद चाहिये

‘उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि मंजिल की प्राप्ति न हो जाए।’’ इन शब्दों को एक वाक्य में पिरोकर देश के युवाओं में कर्म और चारित्रिक निर्माण के प्रति जोश जगाने वाले भारत माता के ओजस्वी सपूत और भारतीय पुनर्जागरण के महान सेवक स्वामी विवेकानंद सदैव युवाओं के आदर्श रहेंगे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में हुआ था। विवेकानंद ने युवाओं, संन्यासी जीवन, संन्यासियों और गृहस्थों के आचरण को लेकर जो बड़ी और गूढ़ बातें कहीं थीं, वे सृष्टि रहने तक अनुकरणीय रहेंगी। उन्होंने कहा था- सभी मरेंगे साधु या असाधू, धनी या दरिद्र सभी मरेंगे। चिरकाल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अत: उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चरित्र चाहिए, इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल चाहिए, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़ बन सके। एक युवा संन्यासी के रूप में स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति की सुगंध विदेशों में भी खूब बिखेरी। उन्होंने हिन्दू धर्म को गतिशील तथा व्यवहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिये आधुनिक मानव से पश्चिमी विज्ञान एवं भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोडऩे की पहल की। स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस 12 जनवरी को पूरे देश में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी उपलक्ष्य में रामकृष्ण मिशन दिल्ली 30 जनवरी को एक दिवसीय युवा सम्मेलन का आयोजन कर रहा है।

सम्यक चरित्र निर्माण पर विशेष बल

रामकृष्ण मिशन आश्रम दिल्ली के सचिव स्वामी शांतआत्मानंद जी महाराज के मुताबिक स्वामी विवेकानंद का स्पष्ट कहना था कि, युवा ही देश का पुन:निर्माण कर सकते हैं। ऐसी शिक्षा जो साधारण लोगों को जीवन के संघर्ष के योग्य, चरित्रवान बनाने और सभी को बराबर समझने के योग्य नहीं है उसे विवेकानंद बेकार मानते थे। उन्होंने गुरुकुल पद्धति को अनुकरणीय बताया था। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में भारत इस समय सबसे युवा देश है, यहां 35.6 करोड़ की आबादी युवा है, जबकि भारत में 35 वर्ष से कम युवाओं की आबादी पूरे विश्व की लगभग 65 प्रतिशत है। उम्मीद की जाती है कि वर्ष 2020 तक भारत की नौजवान आबादी की औसत आयु 28 वर्ष होगी। यह एक ऐसा वर्ग है जो देश की सबसे बड़ी ताकत है। ऐसे में भारत के महान सपूत स्वामी विवेकानंद के शाश्वत संदेश को जागृत करने के लिये स्वामी विवेकानंद के विचारों पर चलने की जरूरत है। तभी मतदाता जागरूकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बेटियों के साथ यौन हिंसा के विरुद्ध हमारा समाज एकजुट और जागृत हो सकेगा और हम सच्चे इंसान बन सकेंगे।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था – ‘ज्ञान स्वयंमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।’ वे भारतीयों के पक्षपातपूर्ण रवैये, आडंबरों और चापलूसी के प्रपंचों के सख्त विरोधी थे और कहा भी था कि, जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो – उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर तनिक भी ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी अपने भीतर स्थान मत दो। स्वामी विवेकानंद ने घोषणा की कि अद्वैत वेदांत के आधार पर विज्ञान और धर्म साथ-साथ चल सकते हैं और दोनों की अच्छाईयों को हमें सीखना चाहिये क्योंकि, इसके मूल में अवैयक्तिक ईश्वर की आधारभूत धारणा, सीमा के अंदर निहित अनंत और ब्रह्मांड में उपस्थित सभी वस्तुओं के पारस्परिक मौलिक संबंध की दृष्टि है।

हाल के वर्षों में कुछ धर्म गुरुओं और साधुओं की सामाजिक प्रतिष्ठा में लगातार कमी आई है। इसका मुख्य कारण उनमें नैतिक बलों की कमी होना है। स्वामी विवेकानंद की सोच रामकृष्ण मिशन आश्रम ही नहीं सभी साधुओं के बारे में पूरी तरह बेबाक थी। रामकृष्ण मिशन आश्रम दिल्ली के सचिव स्वामी शांतआत्मानंद जी महाराज के मुताबिक, स्वामी विवेकानंद ने कहा था – साधु का एकमात्र लक्ष्य ब्रह्मचर्य के बाद मोक्ष की प्राप्ति है और एक सच्चा साधु वही होता है जो निष्कपट और पूर्णरुपेण अहंकार रहित हो न कि मौका मिलने पर दूसरों का अपमान कर उन्हें नीचा दिखाये या किसी खास इंसान से उसे व्यक्तिगत रूप से विशेष लगाव हो। क्योंकि सभी ईश्वर की संतान हैं और संन्यासी की नजरों में कोई भी छोटा-बड़ा, विशेष या साधारण हो ही नहीं सकता। साधुओं, संन्यासियों का एकमात्र धर्म और लक्ष्य मानव सेवा से उसका अटूट लगाव होना है और यही उनके मोक्ष की प्राप्ति का एकमात्र जरिया है।

रामकृष्ण मिशन आश्रम दिल्ली के सचिव स्वामी शांतआत्मानंद जी महाराज के मुताबिक, आज के समय में स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों को लेकर मिशन के सभी साधुओं को भी स्वयं का आत्मविश्लेषण (इंट्रोस्पेक्शक्न) करने की जरुरत है, तभी वे मोक्ष को पा सकते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने गृहस्थ आश्रम पर युवाओं को भी सीख दी। इसके बारे में स्वामी शांतआत्मानंद जी महाराज कहते हैं कि, गृहस्थ आश्रम के जो लोग परस्पर एक-दूसरे का सम्मान, सहयोग और ईमानदारी से अपने दायित्वों का पालन करने को तैयार रहते हैं वही सच्चे गृहस्थ हैं। जाहिर है कि विवेकानंद ने आने वाली पीढिय़ों के लिये देश और समाज की सेवा का मूलमंत्र सदियों पहले दे दिया था।

स्वामी विवेकानंद का दर्शन कहता है कि, किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साहित नहीं करना चाहिये। आलोचना की प्रवृत्ति का सभी पूर्णत: परित्याग करें बिना किसी वर्गीकरण के। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रसर हैं, तब तक उनके कार्य में सहायता करो और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई गलती नजर आये, तो नम्रतापूर्वक गलती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड़ है और किसी भी संगठन को नष्ट करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है। उन्होंने कहा था – ‘सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयान:’ अर्थात सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं, सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है। और…धीरे-धीरे सब होगा। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनों और सदा प्राणी मात्र से निश्चल प्रेम करो।

भारत के पुन:निर्माण के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें अंतत: 11 सितंबर, सन 1893 में शिकागो धर्म संसद में जाने के लिए प्रेरित किया। वह बिना आमंत्रण के गए थे, परिषद में उन्हें प्रवेश की अनुमति मिलनी ही कठिन थी। लेकिन एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयासों से उन्हें किसी प्रकार बोलने का समय मिला और अमेरिका तक ने स्वीकार कर लिया कि वस्तुत: भारत ही जगदगुरु था और रहेगा। स्वामी विवेकानंद ने वहां भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित की और अलौकिक प्रभाव छोड़ा। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत ‘सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका’ (अमेरिकी बहनों और भाईयों) के संबोधन के साथ की तो 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका जोरदार स्वागत किया। अपने मुख से सभी के लिये सम्मानजनक और भावनात्मक शब्द बोलकर उन्होंने आर्थिक और वैज्ञानिक रुप से बेहद धनी और भारतीयों से नफरत करने वाले गैर-विदेशियों तक को भी अपना बना लिया। गेरुए रंग का चोगा पहने विवेकानंद ने जब प्रवाहपूर्ण अंग्रेजी में असरदार आवाज के साथ भाषण दिया तो उन्हें देखने के लिये लोग उमड़ पड़े। स्वामी विवेकानंद का अलौकिक व्यक्तित्व ही था, जिसने भारत एवं हिन्दू-धर्म के गौरव को पहली बार विदेशों में जागृत किया। विवेकानंद के शब्दों में ”जिस प्रकार सारी धाराएं अपने ताल को सागर में लाकर मिल देती है, उसी प्रकार मनुष्य के सारे धर्म उसे ईश्वर की ओर ले जाते हैं।’’

पूर्व और पश्चिम एक-दूसरे से सीखें

संकीर्ण विचारधारा से मुक्त अत्यंत उदार विचार के संत स्वामी विवेकानंद जानते थे कि अनेक ऐसी बातें हैं जो पाश्चात्य संस्कृति से ग्रहण कि जा सकती हैं, क्योंकि पश्चिम का समाज रुढिय़ों और अंधविश्वासों से मुक्त है तथा वहां के निवासियों ने अत्यंत श्रम के साथ भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति की है और उनके अपनाने से भारतवासियों का कल्याण हो सकता है जबकि विदेशियों को अपने जातीय अहंकार का परित्याग कर अपने अन्दर आध्यात्मिकता का विकास करना भारत से सीखना चाहिये।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना

विवेकानंद करीब 5 वर्षों तक अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और जर्मनी में रहे और वहां भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के गौरव की अमिट छाप विदेशी विद्वानों पर डाली। विवेकानंद ने 1896 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में वेदांत समाज और 1899 में अपने गुरु के नाम पर रामकृष्ण सेवाधर्म की स्थापना की। कोलकाता के निकट बेलूर और अल्मोड़ा के निकट मायावती हिमालयाज के मठ इसके प्रधान केंद्र हैं। इन मठों में उन्होंने सन्यासियों को मिशन के कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया। विवेकानंद जी की प्रमुख रचनायें ज्ञानयोग, राजयोग, भक्तियोग और कर्मयोग हैं।

विवेकानंद के राजनैतिक विचार और देशभक्ति

विवेकानंद के लिये देशभक्ति एक शुद्ध और पवित्र आदर्श था। उनकी इच्छा थी कि भारत एक शक्तिशाली बहादुर और गतिशील राष्ट्र बने। वे धर्म को राष्ट्रीय जीवन रूपी संगीत का स्थायी स्वर मानते थे। हिंगल के समान उनका विचार था कि – प्रत्येक राष्ट्र का जीवन किसी एक तत्व कि अभिव्यक्ति है। उन्होंने भारतवासियों को मातृभूमि के लिये अपना सब कुछ लुटाने का आह्वान किया – ”मेरे बंधू बोलो, भारत की भूमि मेरा परम स्वर्ग है, भारत का कल्याण मेरा कर्तव्य है, और दिन रात जपो और प्रार्थना करो, हे गोरिश्वर, हे जगतजननी, मुझे पुरुषत्व प्रदान करो।’’

देह त्यागने से पहले

जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा – ”एक और विवेकानंद चाहिये, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।’’

कुमार मयंक

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