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भविष्य को बचाने की जद्दोजहद

भविष्य को बचाने की जद्दोजहद

पिछले कई दशकों में टाटा औद्योगिक समूह ने देश में न्यासों की स्थापना की है जिनके जरिये इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च जैसे संस्थानों का निर्माण हुआ। विप्रो कंपनी के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी ने देश में स्कूली शिक्षा की दशा सुधारने के लिये करीब दस हजार करोड़ रुपये दान में दिये हैं। इन्फोसिस कंपनी ने भी हर साल सामाजिक कार्यों के लिये इन्फोसिस फाउंडेशन के जरिये अपने लाभ का एक प्रतिशत देने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके अलावा अन्य औद्योगिक घरानों जैसे बिड़ला, महिन्द्रा, कल्याणी ने भी अपने लाभ का कुछ हिस्सा समाज के हित के लिये देने की बात कही है।

इन उदाहरणों से एक बात तो स्पष्ट है कि भले ही कम संख्या में हों, लेकिन देश में ऐसी कंपनियां अवश्य हैं जो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी या सीएसआर का निर्वहन करती हैं। ये कंपनियां जहां स्थित हैं वहां के समुदाय के विकास कार्यों में संलग्न हैं। टाटा कंपनी ने ऐसा ही उदाहरण पेश करते हुए जमशेदपुर में अपने कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों के लिये शिक्षा एवं पूर्ण स्वास्थ्य की दिशा में काफी काम किया है।

इस सबके बावजूद भारतीय माहौल में सीएसआर को बहुत कम तरजीह दी जाती है। अगर सार्वजनिक क्षेत्र के नवरत्नों एवं मिनीरत्नों कंपनियों और प्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा मुठ्ठी भर भारतीय कंपनियों को छोड़ दिया जाये तो अन्य कंपनियों में सीएसआर को लेकर एक भ्रम बना हुआ है। सामान्य रूप से इसे धर्मदान ही कहा जाता है। सामान्य रूप से कहें तो सीएसआर को कंपनियां खुद के लिए बोझ समझती हैं न कि उनके व्यापार का हिस्सा, इसलिये ही उनका रवैया संरक्षणपरक और महज चेक बुक तक ही सिमटा हुआ है।

लेकिन अब इसमें परिवर्तन आ रहा है। सीएसआर समाज के लिये कुछ बेहतर करने और एक आवश्यक व्यापारिक कार्य के तौर पर उभरा है। सरकार ने इस दिशा में यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता में गठित संसद की स्थाई समिति की सिफारिशें मंजूर की और साल 2014 में इसे लागू किया। समिति की अनुशंसा थी कि एक हजार करोड़ से अधिक टर्नओवर वाली कंपनियां या ऐसी कंपनियां जिनका लाभ सालाना पांच सौ करोड़ रूपये से अधिक है, वे अपने लाभ का 2 प्रतिशत हिस्सा सीएसआर में देंगी।

केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के लिये सीएसआर सम्बंधी जो दिशानिर्देश जारी किए गए हैं उनमें स्पष्ट कहा गया है कि औद्योगिक क्षेत्र की सामाजिक जिम्मेदारी धर्मदान से कहीं आगे जाती है और इसका विस्तार सामाजिक और व्यापारिक लक्ष्यों का एकीकरण तक है। सीएसआर को इस प्रकार देखा जाना चाहिए कि जिससे एक लंबे समय में सतत प्रतिस्पर्धी लाभों को हासिल किया जा सके।

हालांकि कई कंपनियों और औद्योगिक घरानों ने इस बात की लगातार कोशिशें की है कि सीएसआर को अनिवार्य न किया जाये। जो लोग इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं उनका तर्क है कि सीएसआर का विचार स्वत: दान देने का है और सरकार को इसे कंपनियों पर जबरन नहीं थोपना चाहिये। उनके अनुसार वास्तव में यह कंपनियों के लाभ पर एक नये तरीके का कर ही है।

सीएसआर के समर्थकों के अनुसार यह एक संकुचित दृष्टिकोण है। कंपनियां जिस परिवेश में काम करतीं हैं उसमें बहुत परिवर्तन आ गया है। एक कंपनी बिना सामुदायिक मदद के ठीक से काम नहीं कर सकती है। पिछड़े लोगों व क्षेत्र के लिये कार्यरत सरकारी संगठनों या एनजीओ के उभरने से हालात बदले हैं। साथ ही केंद्र और राज्य सरकारें विकास की रणनीति के तहत समग्र वृद्धि को महत्व देने लगीं हैं। इतना ही नहीं उपभोक्ता, आम लोग और निवेशक यही उम्मीद करते हैं कि कंपनियां जिम्मेदारी के साथ-साथ सतत विकास की दिशा में काम करेंगी। इस प्रकार से सीएसआर विभिन्न सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक दबावों के परिणाम के तौर पर उभर रहा है।

भारत में कई अग्रणी औद्योगिक घराने पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, जीविकोपार्जन निर्माण, दक्षता विकास और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान में लगे हुए हैं। जून 2009 में 300 व्यापारिक घरानों पर हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सीएसआर की गतिविधियां 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं। सीएसआर का सर्वाधिक लाभ महाराष्ट्र को मिल रहा है। आंकडों के अनुसार सीएसआर गतिविधियों के कुल दान में से 36 प्रतिशत इस राज्य में संकेद्रित है तथा गुजरात इस सूची में दूसरे नम्बर पर है। पश्चिमी भारत में बसे इस राज्य की सीएसआर में हिस्सेदारी 12 फीसदी की है जबकि दिल्ली 10 प्रतिशत और तमिलनाडु नौ प्रतिशत के साथ क्रमश: तीसरे और चौथे पायदान पर हैं। ये कंपनियां सीएसआर के तहत समग्र तौर पर कुल 26 क्षेत्रों में काम कर रहीं हैं। इनमें पहले स्थान पर सामुदायिक कल्याण है और इसके बाद शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास का नम्बर आता है।

23-01-2016हालांकि यह चौंकाने वाली बात तो नहीं है लेकिन इस सर्वे से यह भी स्पष्ट हुआ है कि सीएसआर सम्बंधी गतिविधियां ज्यादातर वहीं केंद्रित हैं जहां पर वे कार्य करती हैं। दूसरे यह कि इस प्रवृत्ति के जारी रहने के भी संकेत हैं। इसका खराब पक्ष यह है कि सीएसआर से मिलने वाले लाभ उन्हीं राज्यों को मिल रहे हैं जो पहले से ही विकसित हैं न कि ऐसे राज्यों को जो विकास के निचले पायदान पर हैं और वे केंद्र सरकार की सहायता पर ही निर्भर हैं।

भारतीय कंपनियों की सीएसआर गतिविधियों पर हुए एक अन्य सर्वे में पाया गया कि कोई भी कंपनी इसमें उच्चतम स्तर हासिल नहीं कर सकी। इसके लिए सर्वे में शून्य से पांच तक का एक विकसित पैमाना प्रयोग किया गया। कुल 500 कंपनियों में से केवल 16 प्रतिशत कंपनियों ने ही पूर्ण परिभाषित सीएसआर के अनुसार काम किया। इसका आशय यह हुआ कि शेष 84 प्रतिशत कंपनियों ने सीएसआर के इस विचार को अभी ग्रहण नहीं किया है। इसके अलावा समझ की कमी, अपर्याप्त प्रशिक्षित मानव श्रम, वास्तविक आंकड़ों की कमी, नीति और सीएसआर गतिविधियों की विशिष्ट जानकारी का अभाव भी इसके कार्यक्रमों और पहुंच को कठिन बना रहे हैं।

सरकार सीएसआर से जुड़ी पहल को मजबूत बनाने की दिशा में एक ढांचे का निर्माण करने का प्रयास कर रही है। इस बात का भी प्रयास किया जा रहा है कि हरित पहल करने वाली कंपनियों को मिलने वाले कार्बन क्रेडिट की तर्ज पर ही सीएसआर अपनाने वाली कंपनियों को सीएसआर क्रेडिट दिया जा सके।

‘मेक इन इंडिया’ ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका बखान वो भारत से लेकर अमेरिका के मैडिसन स्क्वॉयर तक कर चुके हैं। ‘मेक इन इंडिया’ के इस सपने को प्रधानमंत्री अपने थ्रीडी के चश्मे से देखते हैं। जिसे वो डिमांड, डेमोक्रेसी और डेमोग्राफी के रुप में परिभाषित करते हैं। मगर ‘मेक इन इंडिया’ के सपने या लक्ष्य को हासिल करने के लिए सिर्फ जनसंख्या से पैदा हुई मांग, लोकतांत्रिक शासन या बड़ी संख्या में कामगारों की मौजूदगी ही जरुरी नहीं है। भारत में औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये इन मजदूरों में कुशलता और कौशल का होना सबसे ज्यादा जरुरी है। प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि में कोई कमी नहीं है। कोई शक नहीं है कि बेहतर और कुशल कामगार ना सिर्फ देश में बेरोजगारी की समस्या को खत्म कर सकते हैं बल्कि देश और कारोबार की तरक्की में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन फिलहाल उन्हें कॉर्पोरेट इंडिया के सहयोग की जरुरत है। सीएसआर यानि कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व की योजनाओं के जरिये ही कुशल कामगारों की फौज खड़ी की जा सकती है। ऐसा भी नहीं है कि कॉर्पोरेट इंडिया हाथ पर हाथ धरे बैठा है – टाटा कंपनी और आईसीआईसीआई जैसी संस्थाओं ने स्किल डेवलपमेंट के मूल मंत्र को काफी पहले ही समझ लिया और आज वो अपनी कंपनी और संस्थाओं में कुशल (स्किल्ड मैनपावर) कारीगरों की जरुरत को अपनी खुद की सीएसआर योजनाओं के जरिये ही पूरा कर रही हैं। वहीं सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस)विकल्प वाउचर्स प्रोग्राम के जरिए स्किल डेवलपमेंट के काम में कई अनोखे प्रयोग कर रहा है। प्राइवेट एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज के जरिए भी गुजरात जैसे राज्यों में कामगारों की कुशलता को निखारा जा रहा है।


बिजनेस सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं हो सकता: वीरल देसाई


23-01-2016मझोले उद्योग से होने की वजह से यह जरुरी नहीं कि आप सीएसआर कार्यों पर ध्यान दें, लेकिन आज पूरी दुनिया में आपके सीएसआर कार्यों की धूम मची है। इस पर आप क्या कहेंगे?

हां आपका कहना सही है, यह जरुरी नहीं की हम सीएसआर कार्यों पर ध्यान दें, लेकिन यह देखना होगा कि कहीं हम सिर्फ अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिये ही काम करें चाहे वह बिजनेस में हो या दान करने में। हम यहां जेनिटेक्स में इस बात पर विश्वास करते हैं कि ‘एक बिजनेस सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं हो सकता है।’ यही सोच रखते हुए हमने एक फाउंडेशन बनाया है जिसका नाम है hearts@work foundation’ इसी फाउंडेशन के अंतर्गत हम अपने सभी सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। 360 डिग्री सस्टेनेबिलिटी के कॉन्सेप्ट के अंतर्गत हम निम्न कार्य करते हैं :-

1 कर्मचारी कल्याण: कर्मचारियों एवं उनके परिवारों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का ध्यान रखना।

2 ऊर्जा संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा एवं वृक्षारोपण

3 सामाजिक कार्य एवं कल्याण ।

हमारा मानना है कि जिस वातावरण में हम रहते हैं उसका एक अपना ही तरीका है। आपको वह लौटाना होता है जो वह आपके लिये करती हैं। हमारे मामले में, जिस तरह से हमें वैश्विक पहचान मिल रही है, उससे हम अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानते हैं।

आप हमेशा कहते है कि बिजनेस सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं हो सकता।इससे आपका क्या आशय है?

एक बिजनेस का अपने आस-पास के वातावरण और समाज पर खासा असर होता है। आप सिर्फ दान दे कर अपने कर्तव्यों की तिलांजलि नहीं दे सकते, ‘गो ग्रीन’ जैसे माध्यम हमें भविष्य की पीढिय़ों के लिये एक बेहतर पर्यावरण तैयार करने देते हैं। हम सिर्फ पकृति से लेते हैं और प्रकृति का एक अपना ही नियम होता है वह जो देती है उसे वापस देना भी होता है।

आपका मेटलूबे के साथ जो संयुक्त उपक्रम हुआ है उसे ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। क्या आप इसी तरह के और संयुक्त उपक्रम अंतरराष्ट्रीय बाजार में करेंगे?

पूरी दुनिया में बढ़ती लोकप्रियता ने इस क्षेत्र के बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय खिलाडिय़ों को हमारी तरफ आकर्षित किया है और उनकी तरफ से हमें बहुत प्रपोजल्स आ रहे हैं। हम अभी उन सभी प्रपोजल्स के अध्ययन में लगे हुए हैं।

कपास की बढ़ती कीमत, ग्लोबल मेल्टडाउन और ऐसे बहुत से कारण हैं जो टेक्सटाइल सेक्टर को कमजोर कर रहे हैं। इससे बचने के लिये आपका क्या सुझाव है?

यह एक वैश्विक मुद्दा है जो डिमांड और सप्लाई के सिद्धांत पर काम करता है। हमें ऐसे तकनीक का प्रयोग करना होगा जो कि प्राकृतिक हो और जिससे हमारी कपास उपजाने की क्षमता बढ़े। इससे हम किसानों को बढ़ती कीमतों के भंवरजाल से बचाने में कामयाब होंगे। साथ ही किसानों को कपास की खेती के लिये प्रेरित भी कर सकेंगे। अगर हमारे पास कपास का एक बढिय़ा स्टॉक होगा तभी हम अमेरिका, चीन की शर्तों पर नाचने की जगह अपनी शर्तों पर काम करवा सकेंगे।

भविष्य के लिए कोई प्लान?

हां, हमें बड़ी खुशी हो रही है यह बताने में कि हम जल्द ही अपना खुद का ‘जेनटेक्स फैशंस क्लोथिंग’ लाइन खोलने जा रहे हैं। यह भी हमारे बाकी प्रोजेक्ट्स की तरह ही चिरस्थायिता के सिद्धंतों पर काम करेगा और साथ ही इससे होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा सामजिक कार्यों पर खर्च किया जाएगा।


23-01-2016

जेनिटेक्स: सबका साथ सबका विकास के मंत्र पर खरा उतरता

साल 2003 में सूरत के सचिन नामक जगह पर शुरू हुआ जेनिटेक्स प्राइवेट लिमिटेड आज बहुत से लोगों की आंखों में चुभता हुआ उभरता तारा है। इतने कम समय में ही इस कंपनी ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों की वजह से प्राप्त किये हैं। भारत और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ते कॉम्पीटिशन और ग्लोबल मेल्टडाउन होने के बावजूद जेनिटेक्स ने अपने 20 प्रतिशत के सालाना विकास दर को बरकरार रखते हुए 2011-12 के वित्तीय वर्ष में 10 करोड़ का टर्नओवर दिखाया। ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में अपने कदम रखते हुए और अपनी कंपनी का विस्तार करते हुए यह कंपनी 2022 तक 100 करोड़ का ब्रांड बनने की कोशिश में है।

जेनिटेक्स, जिसने अपनी शुरुआत 6 करोड़ के सीड कैपिटल से की थी, हमेशा यह मान के चलता है कि ”एक व्यवसाय जो सिर्फ पैसा बनाने का जरिया हो वह एक अच्छा व्यवसाय नहीं होता।’’ इसलिए कंपनी विभिन्न रास्तों के द्वारा समाज के सेवा में जुटा है जिसके तहत बेकाम हीरा कामगारों का पुनर्वास, नो टोबैको डे के बारे में जागरूकता फैलाना, मुफ्त कैंसर जांच शिविर, पिंक रिबन डे मनाना, वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम करना शामिल है। इसलिए ही कंपनी के सीएसआर कार्यक्रम hearts@work foundation को विश्व भर से वाहवाही मिल रही है।

23-01-2016

अपने ‘गो ग्रीन’ जैसे कार्यक्रम से सूरत को प्रदूषण की समस्या से निजात दिलाने में जेनिटेक्स ने एक अहम भूमिका निभाई है। अपनी कंपनी में ऊर्जा संरक्षण तकनीकों का प्रयोग करते हुए कंपनी ने अपने भीतरी और बाहरी पर्यावरण का बेहतरीन ख्याल रखा। जेनिटेक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विरल सुधीरभाई देसाई का कहना है कि चिरस्थायिता के लिए यह जरुरी है की हम पानी वगैरह जैसे संसाधन का प्रयोग मनुष्य के जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा में कर सके। हर वो चीज जो हमारे जैविक विकास और स्वास्थय के लिए जरुरी है, उसका सम्बंध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे पारंपरिक पर्यावरण से है। चिरस्थायिता ऐसे स्थितियों का निर्माण करती है। जिसमें मनुष्य और प्रकृति दोनों ही समान रूप से अभी और भविष्य की पीढिय़ों की सामाजिक भौतिक और बाकी जरूरतों का ख्याल रख सकें।

23-01-2016

यहां यह वर्णन करना जरुरी है कि जेनिटेक्स प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर विरल देसाई इकोनॉमिक्स में स्नातकोत्तर होने के साथ ही मार्केटिंग में एमबीए की डिग्री रखते है। अभी वह सचिन प्रोसेसर एसोसिएशन और सचिन इंफ्रा मैनेजमेंट लिमिटेड के डायरेक्टर हैं। 2007 में उन्हें पहली बार यंगेस्ट डायरेक्टर के रूप में चुना गया था। इनके बारे में जितना लिखा जाए कम ही होगा। समाज के कल्याण के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से यह हमेशा अपना योगदान देते रहते हैं। विरल देसाई hearts@work foundation के संस्थापक और चेयरमैन हैं जो कि अपने सामाजिक कार्यों के लिए चहुंओर चर्चित हैं।

23-01-2016जेनिटेक्स प्राइवेट लिमिटेड अब तक 4 बार राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुका है। पहला 2010 में आउटस्टैंडिंग उद्यमी के लिए, फिर लगातार तीन बार (2011-12-13) राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अवॉर्ड। साल 2013 के वाइब्रेंट गुजरात समिट के दौरान कंपनी ने बेस्ट इंडस्ट्री अवॉर्ड (क्वालिटी एंड एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन) पा कर इस श्रृंखला में एक और तिकड़ी लगाई। हाल ही में गुजरात सरकार ने जेनिटेक्स के साथ एक एमओयू किया है। जिसके तहत कंपनी 600 आईटीआई छात्रों को उद्यमी बनने की ट्रेनिंग देगा। कंपनी का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी आ चुका है। अभी हाल ही में जेनिटेक्स के सीईओ विरल देसाई को लंदन के हाउस ऑफ लॉड्र्स में ‘महात्मा गांधी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय के चुनिंदा 20 लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने कार्यों से देश की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाये हैं। विरल देसाई को सामुदायिक कल्याण के क्षेत्र में किये गये उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिये यह सम्मान दिया गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि विरल देसाई को यह सम्मान उन लोगों के साथ दिया गया जिन्हें भारत के पद्म अवॉर्डों से सुशोभित किया जा चुका है।

कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की जो अवधारणा विकसित हो रही है वह अब सिर्फ दान देने की अवधारणा से आगे जा चुका है और इसके तहत अब कंपनियों को अपने कानूनी कर्तव्यों के अलावा सामाजिक, पर्यावरणीय चिन्ताओं का भी ख्याल रखना होगा। इसको देखते हुए और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का ख्याल रखते हुए जेनिटेक्स ने अपने प्रतिष्ठान की नीतियों में ईमानदारी और न्याय जैसे मूलभूत मूल्यों का समावेश किया है, ताकि अपने सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में पूरी ईमानदारी बरत सके।

सूरत से महेन्द्र राउत

 

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