ब्रेकिंग न्यूज़ 

बचाओ मुझे मेरे घर में घुस गई असहिष्णुता से

बचाओ मुझे मेरे घर में घुस गई असहिष्णुता से

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: पता है अखबारें और समाचार चैनल बता रहे हैं कि देश में असहिष्णुता का ही राज हो गया है?

पिता: सुन तो मैं भी रहा हूं।

बेटा: मुझे तो लगता है कि वह कुछ ठीक ही कह रहे हैं।

पिता: तू भी कोई पुरस्कार लौटाने वाला है क्या?

बेटा: पिताजी, लौटा तो मैं अवश्य देता पर मैं क्या करुं, सरकार ने अभी तक मुझे कोई पुरस्कार ही नहीं दिया। यदि सरकार मुझ पर अहसान करे और कोई पुरस्कार दे दे तो मैं इसके साथ ही वचन देता हूं कि मैं उसे विरोध स्वरुप तुरंत वापस लौटा दूंगा। इससे सरकार का कुछ नहीं जायेगा पर मुझे प्रसिद्धि अवश्य मिल जायेगी। मेरा नाम व फोटो समाचार पत्रों व चैनलों में कम से कम एक दिन तो छाया रहेगा।

पिता: तू कौन सा पुरस्कार चाहता है?

बेटा: पिताजी, मैं तो स्वतंत्र हूं। मैं न कोई कलाकार हूं, न कवि-लेखक, न सामाजिक कार्यकर्ता और न व्यवसायी और न कोई आंदोलनकारी ही। सरकार तो मुझे बड़े से बड़ा कोई भी पुरस्कार दे सकती है।

पिता: हां, तुझे एक पुरस्कार अवश्य मिल सकता है और वह है हर क्षेत्र में असफल रहने का।

बेटा: पिताजी, आप मेरा मजाक मत उड़ाओ। मैं आपको बता दूं कि जो कहीं सफल नहीं रहता वह राजनीति में अपने झंडे। अवश्य गाड़ देता है।

पिता: चल कुछ कर तो सही।

बेटा: पिताजी, सच्चाई तो यह है कि जीवन में सब कुछ संभव है। मांझी या राबड़ी के पिता ने कभी सोचा था कि उनके बच्चे कल को इतने बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे?

पिता: तू मुझे भी यह सौभाग्य दे दे ना।

बेटा: पिताजी, मैं यह सौभाग्य तो अवश्य दे दूं पर आप सहयोग ही नहीं करते। मैं आपको एक और बात बता दूं। जो लोग आज असहिष्णुता की बात कर रहे हैं मैं तो उन सब से सहमत हूं, आप हों या न हों।

पिता: क्यों तेरे साथ क्या हो गया?

बेटा: पिताजी, कल मैं बाजार गया। मैंने अपनी साईकिल एक दुकान के सामने खड़ी कर दी और उससे कुछ सामान लेने गया। बजाय इससे कि वह मुझसे पूछता कि भाई साहब, मैं आपकी क्या सेवा करुं? उसने मुझे बड़ी बदतमीजी से कहा कि तू पहले अपनी साईकिल मेरी दुकान के सामने से हटा। जब मैंने पूछा-क्यों? तो वह बोला मेरे ग्राहकों को असुविधा होगी। जब मैंने कहा कि मैं भी तो एक ग्राहक ही हूं तो बोला – तू पहले अपनी साईकिल हटा, कार वाले मेरी दुकान के सामने कार खड़ी करने की जगह न पाकर दूसरी दुकान चले जायेंगे। यह असहिष्णुता नहीं तो और क्या है? मैं भी तो उसका ग्राहक ही था। फिर दुकान के सामने की जमीन उसकी तो नहीं, सरकार की है।

पिता: चल बेटा, छोटी-छोटी बातों को इतना तूल नहीं देते। तूने साईकिल हटा ली। बात खत्म हुई। फिर झगड़ा क्या रह गया?

बेटा: पिताजी, आम जनता से तो यह रोज होता है। परसों मैं अपने दोस्त का स्कूटर लेकर कहीं जा रहा था तो पुलिस वाले ने मुझे रोक लिया। मेरा चालान काट दिया कि मैंने हेलमेट नहीं पहन रखी। मैंने उसे समझाया कि मेरे पास स्कूटर नहीं है और इसे तो मैं अपने दोस्त से मांग कर चला रहा हूं। पर वह न माना। पिताजी, हेलमेट मैंने नहीं पहन रखी थी तो उससे सरकार या पुलिसवाले को क्या मतलब? अगर सिर फूटेगा तो मेरा, सरकार या पुलिस का नहीं।

पिता: बेटा, कानून मानना हर नागरिक का कर्तव्य है। इसमें पुलिस वाले की कोई गलती नहीं।

बेटा: एक और बात। कुछ दिन पहले मेरा एक दोस्त जा रहा था। रास्ते में उसे एक सुन्दर-सी लड़की दिख गई। उसक मन मचल गया। उसने उसे बड़े प्यार से कहा, ”आई लव यू’’। ये युनते ही लड़की ने अपनी चप्पल उतारी और उसके सिर पर इतनी जोर से मारी कि कुछ देर के लिये तो उसका सिर ही चकरा गया।

पिता: ठीक किया उस लड़की ने। ऐसे दिलफेक आशिकों के साथ यही होना चाहिये।

बेटा: पिताजी, आप भी असहिष्णु लोगों की तरह बात कर रहे हैं। मेरे दोस्त ने तो उसकी सुंदरता की कद्र करते हुये उसकी प्रशंसा ही की थी, उसकी बुराई तो नहीं। चप्पल मारने की बजाय वह भी तो मेरे दोस्ते को शांत भाव से कह सकती थी, ”नो, आई डोंट लव यू।’’ उसे हिंसा पर नहीं उतरना चाहिये था। उसे यह भी समझ नहीं कि हम अहिंसा के पुजारी बापू गांधी के देश के नागरिक हैं।

पिता: ऐसे समय बेटा गुस्सा आ ही जाता है। हिंसा-अहिंसा सब भूल जाते हैं।

बेटा: पिताजी, मुझे तो आप भी असहिष्णुता के हामी बन गये लगते हैं।

पिता: अच्छा। तेरा मतलब है कि उस लड़की को प्रतिकार नहीं करना चाहिये था। बेटा, शरीफ घराने की बहुत सी लड़कियां चुप रहती हैं और कोई प्रतिकार नहीं करतीं हैं। जिस कारण रोड छाप आशिकों के हौसले बढ़ जाते हैं। मैं तो कहता हूं कि हर लड़की को ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिये।

बेटा: पिताजी, आप तो अहिंसा के पुजारी के देश में हिंसा भड़का रहे हैं। इसे असहिष्णुता भी कहते हैं।

पिता: मैं तो बेटा इसका स्वागत करता हूं।

बेटा: पिताजी, आप भी कमाल कर रहे हैं। ऐसा कह कर तो आप देश में व्याप्त असहिष्णुता के वातावरण को ही हवा दे रहे हैं।

पिता: अच्छा तो तेरा मतलब है कि तुम जैसे लोग गलत बात करते रहें और पीडि़ता कुछ न बोले, चुपचाप सहते रहे। बेटा, यही तो कारण है कि आज उग्रता बढ़ती ही जा रही है।

बेटा: पिताजी, कहानी यहीं समाप्त तो नहीं हो जाती। आप और भी सुनो ना। आपको याद है कि दो मास पूर्व मैं बिजली का बिल जमा नहीं कर पाया था। बिजली वाले हमारे घर की बिजली ही काट गये थे। जिस कारण इस भीषण गर्मी में हमें दो दिन बिना बिजली के काटने पड़े थे।

पिता: गलती तेरी थी या बिजली वालों की?

बेटा: पिताजी, उनमें इतनी तो मानवता होनी चाहिये थी कि यदि हम बिल का भुगतान नहीं कर सके तो इसमें कोई मजबूरी रही होगी। उन्होंने बिल्कुल असहिष्णु व्यवहार किया और बिजली काट दी। यह कोई बात है?

पिता: पर उन्हें क्या पता था कि तू इतना लायक है कि घर से पैसे तो बिल चुकाने के लिये ले गया था पर बिल का भुगतान करने की बजाय कई दिन तुम उसकी शराब ही पीते रहे और झूठ बोलते रहे कि बिल दे दिया है।

बेटा: पिताजी, शराब तो बहुत सारे बिजली वाले भी पीते हैं। उन्हें तो मेरी तरह मानवीय और सहिष्णु होना चाहिये था।

पिता: हां, शराब पीना जरूरी है बिजली का बिल चुकता करना गैर जरूरी।

बेटा: पिताजी, उनमें इतनी तो समझ व मानवीयता होनी चाहिये कि शराब की तलब तो तुरंत पूरी होनी चाहिये, बिजली का बिल तो इंतजार कर सकता है।

पिता: हां, कल को तू हमें भी भूखा मारेगा और राशन के पैसे से शराब पी लेगा।

बेटा: पिताजी, बुरा न मानना। पर सच तो यह है कि हमारे परिवार में भी असहिष्णुता का ही राज है।

पिता: अब परिवार में क्या हो गया?

बेटा: पिताजी, आपको याद है कि मैं अपना प्रेम विवाह रचाना चाहता था पर आपने बीच में टांग अड़ा दी और मुझे अपनी मर्जी से उसके साथ विवाह नहीं करने दिया, जिसको मैं अपना दिल दे बैठा था। यदि आप असहिष्णुता न गिखाते तो उसी के साथ मेरा विवाह हो गया होता।

पिता: तूने अपना दिल वापस ले लिया था या अभी उसके पास ही पड़ा है?

बेटा: पिताजी, दिल तो अब मेरे पास ही है।

पिता: उसको तो दे दिया था पर अपनी पत्नी को नहीं दिया। पर खैर, तू खुशकिस्मत है कि मैंने वहां तेरी शादी नहीं होने दी। वरना तेरा भी वही हाल होता जो उसके साथ हुआ, जिसने उस लड़की के साथ शादी की।

बेटा: मेरे साथ तो पिताजी आपने हर कदम पर असहिष्णुता ही की है।

पिता: और क्या किया मैंने?

बेटा: पिताजी, मैं एक बड़ा अफसर बनना चाहता था, पर आपने मुझे आगे पढऩे ही नहीं दिया और मुझे एक छोटे से दफ्तर में चपरासी बना दिया।

पिता: वाह, वाह। मैट्रिक में तू छह बार फेल हुआ। यदि आगे पढ़ाता तो बी.ए. और एम.ए. करते-करते बूढ़ा हो जाता। शुक्र कर कि मैंने तुझे चपरासी तो बनवा दिया। वरना आज तुझे यह नौकरी भी न मिलती। शायद पड़ोसियों या किसी ढाबे पर बर्तन साफ करता होता।

बेटा: इसे छोडिय़े पिताजी। आगे सुनिये। जब आप रिटायर हुये तो आपको 20 लाख रुपये मिले थे। मैंने सोचा कि मेरे भी भाग्य खुल जायेंगे। मैं दस लाख लगाकर एक बड़ा व्यवसाय कर चपरासी की शर्मनाक नौकरी से छुटकारा पा लूंगा। मैं आपका नाम रौशन कर दूंगा। पर यहां भी मुझे आपके असहिष्णु रूप के ही दर्शन हुए।

पिता: अच्छा, तो मैं तुझे दस लाख देकर स्वयं खाली हो जाता। तूने तो मेरे यह रूपये भी डुबो देने थे।

बेटा: मेरी मुसीबत भी तो यही है कि आपने मुझ पर कभी विश्वास नहीं किया। इसी का दूसरा नाम तो असहिष्णुता है।

पिता: बेटा, तूने भी तो मुझे हर स्थान पर निराश ही किया है। इस कारण मैं कैसे तेरे पर विश्वास करने का जोखिम उठा लेता?

बेटा: चलिये, इसे भी छोडिय़े। आपने कहां असहिष्णुता नहीं दिखाई?

पिता: आज तेरे को मेरी हर बात में असहिष्णुता ही दिखाई दे रही है क्या?

बेटा: देश के अनेक महान कलाकारों, लेखकों, इतिहासकारों ने इस मुद्दे को उठाकर मेरी आंखें खोल दीं हैं। उन्होंने मुझ में अपनी दुखी भावनाओं को उजागर करने की हिम्मत पैदा कर दी है। आपके सामने आपकी इस असहिष्णुता के विरूद्ध झंडा खड़ा करने की प्रेरणा मुझे उनसे ही मिली है।

पिता: अब समझ आया कि मेरे इतने वफादार बेटे के तौर-तरीके कैसे बदल गये? आज तो तू मेरे साथ बड़ी जुबान चला रहा है।

बेटा: पिताजी, असहिष्णु लोग देश की तरक्की में बाधा डाल रहे हैं, देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं और समाज में भाईचारा समाप्त कर रहे हैं। उसी प्रकार आपने भी हर जगह असहिष्णुता दिखा कर मेरी जिंदगी खराब कर दी है। मैं भी तो इन्सान हूं। मेरे भी तो मानवाधिकार हैं।

पिता: क्या मैं जानवर हूं, मेरा कोई अधिकार नहीं हैं? मेरे केवल कर्तव्य हैं। तुझ जैसे नालायक को पाल-पोस कर बड़ा करने के, तुझे पढ़ाने के और नौकरी लगवाने के।

बेटा: पिताजी, वह तो हर माता-पिता का कर्तव्य है मुझ पर कोई अहसान नहीं किया आपने।

पिता: पर तेरा भी अपने माता-पिता, भाई-बहन के प्रति कोई कर्तव्य है या नहीं? क्या तुमने कोई एक भी कर्तव्य निभाया है?

बेटा: पिताजी, यह देश अधिकारों का देश है, कर्तव्यों का नहीं। यहां तो अधिकारों के लिये ही लड़ाई लड़ी जाती है, कर्तव्यों के पालन के लिये कभी नहीं। इस लिये आप पहले हमें हमारे अधिकार दें। हमारे कर्तव्यों के पालन की बात तो आप फिलहाल भूल ही जाएं।

पिता: अच्छा तो क्या माता-पिता के केवल कर्तव्य ही हैं और तुम्हारे केवल अधिकार?

बेटा: पिताजी, मुझे तो दुख है कि यह आपकी असहिष्णुता ही है कि, मेरे जैसे सुशील और सीधे-साधे पुत्र से भी आज तक आप कभी संतुष्ट नहीं रहे और न कभी आपने गर्व ही महसूस किया। आपको पता है कि मैं कितना सुशील व भोला-भाला हूं, कभी लहसून-प्याज तक नहीं खाता। यदि कभी खाता हूं तो तभी जब मीट-मुर्गा बनता है। मैं वह भी तब ही खाता हूं जब बोतल खुलती है। मैं बोतल भी होठों से तब लगाता हूं जब कोई हसीना भी संग होती है। पर आप हैं कि मुझे सदा बुरा ही कहते रहते हैं।

पिता: मूर्ख, अपनी ही टांग खिंचाई कर रहा है।

बेटा: क्योंकि आप जैसे लोग देश में सहिष्णुता का माहौल बिगाड़ रहे हैं।

पिता: मेरे जैसे?

बेटा: हां, आप जैसे। आप अपने परिवार में किसी को अपनी मर्जी कुछ करने ही नहीं देते। इससे परिवार में असहिष्णुता का माहौल है, आखिर देश भी तो लाखों-करोड़ों परिवारों का एक समूह ही तो है।

पिता: अब मैंने और क्या कर दिया?

बेटा: पिताजी, सिगरेट व शराब पीना तो व्यक्ति का मानवाधिकार है। आपने दिया यह अधिकार अपने परिवार में किसी को?

पिता: यदि ऐसे अधिकार देना ही सहिष्णुता है तो इस सहिष्णुता की ऐसी की तैसी।

купить детские кубики пластмассовыеМалий Владислав

Leave a Reply

Your email address will not be published.