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अखंड भारत का सच

अखंड भारत का सच

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक नवाज शरीफ के जन्मदिन पर पाकिस्तान की यात्रा कर बातचीत की एक नई पहल करके सारी दुनिया को चौंका दिया। उस पर पानी फेरते हुए उसी दिन भाजपा के महसचिव राम माधव का एक इंटरव्यू अल जजीरा ने जारी किया। अल-जजीरा को दिए इंटरव्यू में राम माधव ने कहा था कि आरएसएस को अभी भी लगता है कि करीब 60 साल पहले भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जो कुछ ऐतिहासिक वजहों से अलग हो गए थे, वह फिर से सद्भावना के साथ एक हो जाएंगे और अखंड भारत का निर्माण करेंगे। उन्होंने साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि इसे हासिल करने के लिए हम किसी देश के साथ युद्ध करेंगे या उस पर कब्जा कर लेंगे, बिना किसी जंग के आपसी सहमति से यह मुमकिन हो सकता है।

राम माधव के इस बयान ने एक बार फिर इस तथ्य को उजागर कर दिया है कि हमारे देश के हिंदू संगठन अब भी विभाजन को लेकर गलतफहमी में जी रहे हैं। उन्हें लगता है कि विभाजन गलत था और किसी दिन वह खत्म होगा। अखंड भारत के साथ उनका अब भी बेहद भावनात्मक लगाव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तो हमेशा ही अखंड भारत की कल्पना से रूमानी और भावुकतापूर्ण जुड़ाव रहा है। आजादी के बाद के वर्षों में तो 15 अगस्त को जब देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था, तब संघ की शाखाओं में अखंड भारत दिवस मनाया जाता था। उसके पीछे की सोच यही थी कि कभी हम देश के इस अलग हुए हिस्से को फिर हासिल करके रहेंगे। संघ परिवार के लोगों को लगता है कि भारत अखंड रहता तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को लेकर जो देश बनता वह इतना शक्तिशाली होता कि वह एशिया ही नहीं वरन, दुनिया की महाशक्ति होता। उस देश में गंगा के साथ हमारी पवित्र सिंधु नदी भी होती। जिसके कारण हिन्दू शब्द बना। पाकिस्तान से न युद्ध करने पड़ते, न कश्मीर में आतंकवाद का मुद्दा होता। भारत महाशक्ति न बन पाए इसलिए अंग्रेजों ने भारत का विभाजन किया। इस विभाजन को मान्यता देकर कांग्रेस भी इस पाप की भागीदार बनी। इसलिए भारत फिर अखंड होगा और आज भी संघ परिवार के समर्थक कांग्रेस, गांधी नेहरू की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। राम माधव ने अखंड भारत की संभावना के पक्ष में तर्क दिया था, कि जब पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी एक हो सकते हैं, दक्षिणी वियतनाम और उत्तरी वियतनाम एक हो सकते हैं तो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश भविष्य में एक क्यों नहीं हो सकते। यह तर्क ऊपरी तौर पर दमदार लगता है, लेकिन राम माधव इस हकीकत को भुला देते हैं कि इन देशों का विभाजन वहां की जनता ने नहीं साम्राज्यवादी ताकतों ने किया था। जबकि, भारत-पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था और देश के मुसलमान अपने लिए अलग देश चाहते थे, इसलिए विभाजन हुआ।

इस्लाम बुनियादी तौर पर एक वर्चस्ववादी, साम्राज्यवादी विचारधारा पर आधारित धर्म है। वह सारी दुनिया पर इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करने का सपना देखता है। किसी और धर्म के लोगों के साथ मिलकर रहने में मुसलमानों का कोई विश्वास नहीं। इस्लाम अपने अनुयायियों से कहता है कि या तो इस्लामी देश में रहो और देश में रहते हो तो काफिर के साथ रहने की बजाय किसी मुस्लिम राष्ट्र में हिजरत कर जाओ या वहां जिहाद करके उसे मुस्लिम राष्ट्र बनाओ। पाकिस्तान की मांग मुसलमानों की इसी जिहादी मानसिकता की ऊपज थी। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना से सवाल किया गया कि पाकिस्तान की नींव कब पड़ी? जिन्ना ने जवाब दिया जब देश का पहला व्यक्ति मुसलमान बना। जिन्ना की बात सोलह आने सही थी। इस देश का विभाजन तब हुआ जब देश के एक हिस्से में इतने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुए कि मुसलमान बहुसंख्यक हो गए, तब अलग मुस्लिम देश की मांग उठने लगी। मुस्लिम जो देश पर सात-आठ सौ साल तक शासन कर चुके थे उनमें हमेशा यह विमर्श चलता था कि अंग्रेजों के जाने के बाद इस देश पर किसका प्रभुत्व रहेगा। मुसलमानों का मानना था कि वे लंबे समय तक देश के शासक रहे हैं, इसलिए देश पर उनका ही प्रभुत्व हो। वे इस बात के लिए कतई तैयार नहीं थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद उन्हें बहुसंख्यक हिन्दुओं के द्वारा शासित होना पड़ेगा। इसलिए वे चाहते थे कि मुस्लिमों का अपना अलग, स्वतंत्र देश हो और इसके लिए वे हर तरह का संघर्ष करने और कुर्बानी देने को तैयार थे।

यह हकीकत है कि चंद राष्ट्रवादी कहे जाने वाले मुसलमानों को छोड़ दिया जाए तो सारा मुस्लिम समाज पाकिस्तान की मांग के पीछे एकजुट होकर खड़ा था। उसके लिए देश में सैकड़ों दंगे हुए। डायरेक्ट एक्शन जैसी हिंसक कार्रवाई हुई। इस कारण एक बात बहुत स्पष्ट रूप से इस देश का समाज जानता है कि मुस्लिम विभाजन के अपराधी हैं। यदि इतिहास के पन्ने पलटे तो एक और बात उभर कर आती है कि मुसलमानों ने आजादी से पहले पाकिस्तान के लिए वोट किया, लेकिन सभी पाकिस्तान नहीं गए। दिसंबर 1945 में हुई सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल के चुनाव में मुस्लिमों के लिए आरक्षित 30 सीटों में से सारी सीटें मुस्लिम लीग ने जीती थीं इस तरह सौ फीसदी सीटें जीतकर मुस्लिम लीग ने शानदार सफलता हासिल की थी। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के मुद्दे पर यह चुनाव लड़ा था और इस पर मुस्लिमों ने मुहर लगा दी थी। इस चुनाव के बाद मुस्लिम लीग और पुरजोर तरीके से यह दावा करने लगी थी कि वह मुस्लिमों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था है और मुस्लिम समाज में कांग्रेस के तथाकथित मुस्लिम राष्ट्रवादी नेताओं को कोई समर्थन हासिल नहीं है। नतीजों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जिन्ना ने कहा था कि यह मुस्लिम भारत द्वारा पाकिस्तान के बारे में दिया गया स्पष्ट फैसला है। इसके बाद प्रोवेंशियल लेजिस्लेटिव काउंसिल्स के चुनाव में भी मुस्लिम लीग को भारी सफलता मिली। मुस्लिम बहुसंख्या वाले राज्यों में 309 आरक्षित मुस्लिम सीटों में से मुस्लिम लीग को 261 सीटें यानी 84 प्रतिशत सीटें मिलीं। सारे भारत में 492 आरक्षित मुस्लिम सीटों में से 425 सीटें यानी 86 प्रतिशत सीटें और मिलीं। इस तरह मुसलमानों ने पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया, लेकिन पाकिस्तान बनने पर पाकिस्तान गए नहीं। अक्सर गांधी और नेहरू को हिन्दू-मुस्लिम एकता के मसीहा के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन 1945 के चुनावों ने बता दिया कि इन दोनों में से किसी को आम मुसलमानों का समर्थन हासिल नहीं था। जिन्हें राष्ट्रवादी मुसलमान कहा जाता है उनकी अपने समाज में कोई हैसियत नहीं थी। जिस उत्तर भारत में गंगा-जमुनी संस्कृति की बात चलती थी वहीं से पाकिस्तान की मांग उठी। इससे जिन्ना की यह बात सही साबित हुई थी कि सदियों से इस देश में दो राष्ट्र साथ-साथ पल रहे थे। यह इस बात से भी स्पष्ट था कि जब देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी तब मुसलमान पाकिस्तान के लिए आंदोलन कर रहे थे। वे एक ऐसे देश में रहने को तैयार नहीं थे, जहां बहुसंख्या के कारण हिन्दुओं का वर्चस्व हो। नतीजतन विभाजन अपरिहार्य हो गया था।

इसके साथ ही सवाल उठता है कि अखंड भारत हिन्दुओं के व्यापक हित में होता तो क्या विभाजन हिन्दू हितों की रक्षा कर पाया। विभाजन से क्या हुआ यह तो हम सबके सामने है। पर हमें सोचना होगा कि विभाजन के विकल्प के रूप में जिस अखंड भारत को पेश किया जाता है उसकी रूपरेखा क्या होती? उसका संविधान क्या होता, हिन्दू और मुस्लिमों के अधिकार क्या होते। इन सवालों के जवाब पर ही अखंड भारत का अच्छा या बुरा होना निर्भर करता। अगर अंग्रेज विभाजन किए बगैर चले जाते और अखंड भारत रहता तो अखंड हिन्दुस्तान में लोग चैन से जी ही नहीं पाते। हिन्दू, मुस्लिम वैमनस्य इतना बढ़ जाता कि देश में गृहयुद्ध होता, जिससे और ज्यादा रक्तरंजित विभाजन होता। देश कई टुकड़ों में बंटता।

अक्सर यह कहा जाता है कि विभाजन अपरिहार्य नहीं था। बच्चों में यह मिथ फैलाई जाती है कि अंग्रेजों ने भारतीयों पर विभाजन लादा। यह एक गलत धारणा है। असल में हिन्दू-मुस्लिम साथ रह ही नहीं सकते थे। जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल हमेशा यह कहते रहे कि हिन्दू-मुस्लिम साथ काम कर सकते हैं, लेकिन जब उसकी परीक्षा का समय आया तो 1946-47 में अंग्रेजों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को अंतरिम सरकार में शामिल होने का मौका दिया तो दोनों नाकाम रहे। कांग्रेसी इस नतीजे पर पहुंचे कि जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार नहीं बनाई जा सकती। इससे तो विभाजन बेहतर है। इस तरह से विभाजन हुआ, दोनों के समझौते से। दरअसल 1915 के लखनऊ समझौते के बाद कांग्रेस के नेताओं को लगा था कि अब मुसलमान संतुष्ट हो जाएंगे, लेकिन मुसलमानों की मांगें लगातार बढ़ती गईं। अंत में तो वे तिहाई आबादी होने के बावजूद सत्ता में आधी भागीदारी मांगने लगे। तब कांग्रेस के सामने सवाल खड़ा हो गया कि द्विराष्ट्रवाद के आधार पर सत्ता के अधिकारों का, बराबरी का बंटवारा करें या जमीन का और उन्हें जमीन का बंटवारा ज्यादा हितकारी लगा। वे जानते थे कि मुस्लिम लीग के अधिकारों की भूख बढ़ती जाएगी और वह किसी भी सरकार को ठीक से काम नहीं करने देगी। इस तरह सरकार पूरी तरह मुस्लिम लीग की दया पर निर्भर हो जाएगी। जिसका नतीजा होगा घोर अराजकता।

23-01-2016

कुछ वर्ष पहले मराठी में सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शेष राव मोरे की पुस्तक – ‘कांग्रेस और गांधी ने अखंड भारत को क्यों ठुकराया’- नामक 750 पेजों की पुस्तक आई है, इस पुस्तक पर महाराष्ट्र में तो काफी चर्चा हुई। कई इतिहासकारों नें इस पुस्तक पर समीक्षात्मक लेख लिखे हैं। जिसे राजहंस प्रकाशन ने ही 350 पेज की पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें विभाजन को भावुकतापूर्ण राष्ट्रवादी नजरिये की बजाय वस्तुनिष्ठ नजरिये से देखने की कोशिश की गई है। लेखक स्वयं भी सावरकरवादी हैं, इसलिए कभी विभाजन को गलत मानते थे, लेकिन विभाजन के लिए कारणीभूत तमाम प्रवृत्तियों का अध्ययन करने के बाद पुस्तक में वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि उस समय देश के सामने उपलब्ध विकल्पों में विभाजन सबसे बेहतर विकल्प था। इस सिलसिले में उन्होंने विभाजन की घटना का गंभीरता से अध्ययन करने वाले दो महानायकों को उद्घृत किया है। एक हैं सरदार पटेल जिन्होंने कहा था- भारत की एकता को बरकरार रखने के लिए उसका विभाजन जरूरी था। यदि विभाजन को मान्यता नहीं दी होती, तो यह देश उद्धवस्त हो जाता। 1955 में डॉ अंबेडकर ने कहा था- यदि हिन्दुस्तान अखंड रहता तो हिन्दुओं को मुसलमानों की दया पर जीना पड़ता। निश्चित ही मुसलमान सत्ताधारी वर्ग बनते। जब विभाजन हुआ तो मुझे लगा कि भगवान ने इस देश पर पड़े श्राप को वापस ले लिया है। अब इस देश के एकात्म, महान और वैभवशाली बनने का रास्ता खुल गया है। दरअसल इन दो नेताओं के बयान पढऩे के बाद संस्कृत का यह श्लोक बरबस याद आ जाता है- ‘सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पंडित:।’ सब कुछ नष्ट होने की स्थिति पैदा होने पर बुद्धिमान आधे का त्याग करने को तैयार हो जाता है। यदि विभाजन न होता तो इस देश में गृहयुद्ध की स्थिति होती और ऐसी अराजकता फैलती जिसमें किसी तरह का विकास संभव ही नहीं हो पाता। हो सकता है कि देश के कई टुकड़े हो जाते। इस अराजकता के मुकाबले कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन को चुना।

जिन्ना ने जिस द्विराष्ट्रवाद को आधार बनाकर पाकिस्तान का आंदोलन चलाया उस द्विराष्ट्रवाद के प्रवर्तक थे सरसैयद अहमद खान। उन्होंने कांग्रेस के भारत का एक राष्ट्र होने व धर्मनिरपेक्ष होने के दावे को चुनौती दी और दावा किया कि भारत में दो राष्ट्र हैं। अंग्रेजों के जाने के बाद हिन्दू-मुसलमानों पर राज करें यह उन्हें कतई मंजूर नहीं था। अंग्रेजों के जाने के बाद मुसलमान हिन्दुओं पर राज करें यह उन्हें मंजूर होता, मगर यह संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने द्विराष्ट्रवाद का सहारा लिया।

सरसैयद का यह द्विराष्ट्रवाद ही पाकिस्तान की नींव साबित हुआ। कांग्रेस ने अखंड भारत के विकल्प को नकार कर विभाजन को क्यों स्वीकार किया इस सवाल का जवाब खोजते हुए लेखक ने अखंड भारत के बारे में पेश किए गए तमाम विकल्पों इस्लामी नेताओं द्वारा पेश विकल्पों, ब्रिटिश नेताओं के विकल्पों, और सावरकर और सुभाष चंद्र बोस जैसे हिन्दू नेताओं द्वारा पेश विकल्पों की पड़ताल की और बताया यदि वस्तुनिष्ठ और तर्कपूर्ण तरीके से विचार किया जाए तो इनमें से कोई भी विकल्प हिन्दू हितों और लोकतंत्र की दृष्टि से विभाजन से ज्यादा स्वीकार्य नहीं था। यह कटु सत्य समझ आने पर कांग्रेस और महात्मा गांधी ने विभाजन को स्वीकार किया। जबकि ये वही गांधी थे, जिन्होंने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा। लेकिन उस समय के हालातों में जनभावना को देखते हुए विभाजन का खुलेआम समर्थन करना संभव नहीं था। इसलिए विभाजन का विरोध करते हुए कांग्रेस और गांधीजी विभाजन की दिशा में सुनियोजित तरीके से कदम उठाते रहे। कांग्रेसी नेता जितने तीखेपन से लगातार विभाजन का विरोध कर रहे थे उसको देखकर जिन्ना को लगा कि कांग्रेस अब विभाजन को स्वीकार नहीं करेगी। इसलिए जिन्ना और मुसलमानों ने अपनी मांगें और भी बढ़ा दीं। द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर वह हर मामले में बराबरी के अधिकारों की मांग करने लगे। बराबरी की भागीदारी द्विराष्ट्रवाद का आधार था। लेकिन कांग्रेस को उसके बजाय विभाजन पसंद था। यह बात ध्यान में न आने के कारण जिन्ना जैसे नेता अपने बनाये फंदे में फंस गये। उनके पास विभाजन को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था।

23-01-2016

इस तरह एक तरफ अखंड भारत के साथ आता गृहयुद्ध, अराजकता और मुस्लिम ब्लैकमेलिंग। दूसरी तरफ विभाजन का हिन्दुओं को यह फायदा हुआ कि भारत सेक्युलर होने के बावजूद एक हिन्दू बहुसंख्या वाला देश बना। वह किसी अन्य समुदाय की दया पर निर्भर नहीं है। और बिना किसी लाग लपेट के अपने फैसले खुद कर सकता है। पहली बार इतनी बड़ी भूमि पर हिन्दू बहुसंख्या वाला राष्ट्रर बना है। वरना पहले इसी देश में कई रियासतें होती थीं जो आपस में लड़ती थीं। अपनी बहुसंख्या के बल पर हिन्दू समाज चाहें तो अपने हितों की रक्षा कर सकता है। इस दृष्टि से तो हिन्दुओं के लिए विभाजन लाभप्रद रहा है जिसे अखंड भारत का मोह छोड़कर हिन्दुत्वादियों को स्वीकार करना चाहिए।

मोरे की किताब पर प्रतिक्रियात्मक लेख लिखते हुए पुणे से भाजपा के पूर्व सांसद प्रदीप रावत ने कहा कि अखंड भारत संघ और हिन्दुत्ववादियों का भावुक सपना है वह सपना ही रहेगा। मेरी तरह कई हिन्दुत्ववादी मोरे की बातों से सहमत हैं। मोरे की किताब के बहाने हिन्दुत्ववादियों का गुबार सामने आया है और यदि वे विभाजन को स्वीकार करने को तैयार हो तो यह इस पुस्तक की सफलता कही जाएगी।

दरअसल कई लोगों को लगता यह है कि विभाजन को स्वीकार करना मजबूरी थी उसे स्वीकार करके कांग्रेस ने कुछ गलत नहीं किया। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी गड़बड़ी यह रही कि उसने विभाजन को उसकी आखिरी अंजाम तक नहीं पहुंचाया। क्योंकि पाकिस्तान तो मुसलमानों का हो गया, लेकिन भारत सभी की संयुक्त संपत्ति है। दरअसल विभाजन से सबक सीखकर यह स्वीकार कर लेना चाहिए था कि हिन्दू-मुस्लिम साथ नहीं रह सकते, इसलिए विभाजन से पहले हिन्दू- मुस्लिम आबादी की अदला-बदली होनी चाहिए थी। ऐसा न करके हम फिर विभाजन पूर्व की स्थिति में पहुंच गए हैं। भारत में आज भी उतने ही मुसलमान है जितने पाकिस्तान में है। यानी विभाजन के बाद भी हिन्दू, मुस्लिम समस्या जहां की तहां है। विभाजन के समय हमें इस समस्या को पूरी तरह हल करना चाहिए था। नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान ने तो अपनी हिन्दू आबादी का सफाया कर दिया दूसरी तरफ भारत में लगातार मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही है। यानी विभाजन के पहले की समस्या फिर मुंह बाये खड़ी है। यह इस बात का सबूत है कि मनुष्य इतिहास से कुछ नहीं सीखता जो इतिहास से सबक नहीं सीखते वे इतिहास दोहराने को मजबूर होते हैं। कहना न होगा कि हम इतिहास को दोहरा रहे हैं।

वैसे विभाजन की एक व्याख्या और है। दुनिया के ज्यादातर देश इस्लाम के हमले के सामने कुछ ही वर्षों तक ही टिक सके और इस्लामी हो गए। सारा अरब तो मोहम्मद साहब की मृत्यु के सौ साल के भीतर इस्लाम के झंडे तले आ गया था। लेकिन भारत का इतिहास सबसे अलग है। भले ही मुसलमान एक जमाने में सारे भारत पर कब्जा करने में कामयाब हो गए हों, लेकिन हिन्दू, इस्लामी साम्राज्यवाद से पिछले 1300 साल से संघर्ष कर रहे हैं। इस्लाम हर हथकंडे से धर्मांतरण करने के बावजूद पूरे भारत को इस्लामी रंग से रंगने में कामयाब नहीं हो पाया। हिन्दू एक बार फिर भारत में वर्चस्व स्थापित करने में कामयाब रहे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस देश में इस्लाम को सफलता नहीं मिली। धर्मांतरणों के कारण जिन इलाकों में मुसलमान बहुसंख्यक हो गए थे वहां पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान बना। इन इलाके में इस्लाम की विजय का परचम फहरा चुका है। इसके अलावा कश्मीर घाटी धर्मांतरण के कारण मुस्लिम बहुल हो गई जो वहां के हिन्दू राजा के चलते भारत में जरूर है, लेकिन उसका अलगाववाद हमेशा भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है। पाकिस्तान हिन्दू समाज के दिल में कांटे की तरह चुभता है, क्योंकि इसके पहले के तेरह सौ साल में कभी मुसलमाने जीते तो कभी हिन्दू लेकिन कभी हिन्दुओं ने यह स्वीकार नहीं किया था कि यह धरती मुसलमानों की हो गई। लेकिन, पाकिस्तान बनने के बाद अधिकृत तौर पर मान लिया है कि पाकिस्तान अब मुस्लिमों का देश है। इस तरह यह मान लिया है कि यह धरती हम हार चुके हैं। पर कुछ हिन्दू संगठन अब भी इस हार को पचा नहीं पाए हैं। लेकिन हकीकत को कब तक नकारेंगे।

सतीश पेडणेकर

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